भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 429

श्रीरामपञ्चाध्यायी ४१९ जो कान्तभाववती व्रजांगना हैं, उनका भी तुम्हारे दर्शन करने इधरसे निकले हैं?' यहाँ सम्भावना सापत्‍न्य नहीं; क्योंकि वैसा होनेपर कोई भी सौत और प्रश्न दोनों हैं- 'दृशां सुनिर्वृतिं तन्वन् इह पतिका पता किसीको न देगी। अतः ये भी 'सखी' उपगतः।' 'निर्वृति' परानन्दका नाम है, उसके साथ कहकर परम प्रीति बतला रही हैं। यदि कोई कहे कि 'सु' भी जुड़ा है। नेत्रोंकी सुन्दरता, विशेष आह्लादकी एकपत्नीत्वेन सापत्‍न्य तो होगा ही, तब कहा-वे सार्थकता तभी सम्भव है, जब उन्हें श्रीश्यामसुन्दर भगवान् 'अच्युत' हैं। इसी आशयसे प्रकृत पद्य मदनमोहन देखनेको मिलें। अन्यथा उनकी सुघराई दो 'अप्येणपत्न्यो०' (श्रीमद्भा० १०।३०।११)-में कौड़ीकी है। यह बहुत ऊँची बात है कि वे 'अच्युत' पद है। ईर्ष्या वहाँ होती है, जहाँ एक कमलदललोचन जगभयमोचन मोहन भी इन नेत्रोंको स्वामी और अनेक पत्नी हों अर्थात् स्वामी, सौन्दर्य, देखनेके लिये उत्सुक हों और दोनों, दोनोंके नेत्रोंको सौभाग्य आदिका परिच्छिन्न होना, प्रेमके चुक जानेका लुभायें। यह तो श्रीव्रजसुन्दरी-जैसोंके लिये ही सम्भव डर होना आदि ही ईर्ष्याका मूल है, यह प्राकृत है, जो उन त्रैलोक्य-मनोमोहनके भी मनको मोह लेती नायकभावमें है, परंतु जहाँके सौगन्ध्य, सौन्दर्यादि है-हरण कर लेती है-'आभीरवामनयनाहृत- अपरिच्छन्न हैं, चुकनेवाले नहीं, संविदानन्दसुधानिधि मानसाय''''।' यह गोपी-कृष्ण दोनोंकी शिकायत है। हैं, वहाँ ईर्ष्या कैसी? 'यह रस विरस होत नहीं वे कहती हैं-'वे हमारे धैर्यादिको चुरा ले गये, कबहूँ।' जहाँ थाह ही नहीं, वहाँ ईर्ष्या भी नहीं। मनोमंजूषिकाके भीतरसे। यह सब किया उन्होंने केवल अतएव भक्त नहीं चाहते कि हमारे भगवान्‌को कोई नेत्रोंसे।' उधर आभीरवामनयनाओंने उनके मनको हर न भजे। हाँ, ऐसा भी भाव कभी होता है। जैसे लिया, वह भी नेत्रोंसे ही। अतएव वे अमना हो गये। श्रीश्यामसुन्दरके पक्षकी सखी जब श्रीवृषभानुनन्दिनीके पहले भी वे 'अमना' ही थे। तभी तो 'रन्तुं मनश्चक्रे' पास जाती है, तब उस पक्षकी सखियोंको यह शंका कहा गया है। गोपांगनाओंके सौन्दर्य, माधुर्य, लावण्यपर होती है कि 'कहीं यह हमारे प्यारे श्यामसुन्दरको न वे 'अमना' मुग्ध हो गये और उनके साथ रास करनेके भजने लग जाय' और उसे वहाँसे हटानेका प्रयत्न लिये मन बनाया, पर वह भी फिर हृत हो गया। करती है कि यदि सखि! तुम अपने धर्मकी रक्षा अपने प्रियतमके दर्शनोंकी तीव्र चाहती हो तो शीघ्र ही उनके सामीप्यका परिवर्जन उत्कण्ठा ही सच्ची प्रीति है करो। प्रेमकी 'अहेरिव कुटिला गतिः' है। यह ये अन्तरंग भाव हैं। जैसे वेदान्ती 'त्वं' पदार्थका केवल तात्कालिक भावविशेष है। वास्तवमें यह शोधन करते हैं, वैसे ही भावुक अपना शोधन करते प्रेमरस समुद्र अथाह है, कभी चुकनेवाला नहीं, हैं। दोनों भाव हैं। अपने इष्टपर स्वयं लुब्ध होना और अतएव सभी भक्त सभीको बुलाते हैं। इस प्रकार अपनेपर उन्हें लुभाना। प्यारेके दर्शनोंकी प्रतीक्षांमें सापत्‍न्यव्यावृत्त्यर्थ ही उक्त पदमें 'अच्युत' पद है। चित्त सदा ललचा रहे। इसी प्रतीक्षाकी पुष्टिके लिये अथवा व्रजांगनाओंका कहना है कि 'सापत्‍न्य वृन्दावनके बाँके बिहारीजीके मन्दिरमें दर्शनके समय बराबरीमें होता है, सो तुम तो सखि हरिणि ! हमसे क्षण-क्षणमें परदा आता रहता है, जिससे दर्शनोंकी बहुत बड़ी हो, उन प्राणप्यारे नन्दनन्दनके साथ सब प्रतीक्षा, उत्कण्ठा बढ़ती ही रहती है। प्रियतमके जगह जा सकती हो, दर्शन कर सकती हो। परंतु हम दर्शनोंकी दिनभर चिन्ता, विह्वलता, नवीनता बनी तो कुलांगना हैं, हमारे लिये सर्वत्र जाना मना है। सखि रहे-यही सच्ची प्रीति है। बहिर्मुखोंके लिये यह हरिणि! यह मत कहना कि हमने तुम्हारे प्यारे कठिन है, परंतु भावुकोंके लिये यह सुगम बन जाता मनमोहनका दर्शन नहीं किया है; क्योंकि हम उन है। 'चलापि यच्छ्रीर्न जहाति कर्हिचित् ॥' (श्रीमद्भा० आँखोंको पहचानती हैं, जिन्होंने हमारे प्यारे मोहनका १।११।३३) समस्त सौन्दर्यका धाम साक्षात् लक्ष्मी दर्शन किया है। सखि ! बतलाओ, क्या प्यारे श्यामसुन्दर भी लोभवश प्रतिक्षण नवनवायमान रमणीयताके