भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 428, कुल 778 में से

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पृष्ठ 428

४१८ भक्तिसुधा 'धन्याः स्म मूढमतयोऽपि हरिण्य एता या नन्दनन्दनमुपात्तविचित्रवेषम्।' (श्रीमद्भा० १०।२१।१९) इसमें 'अपि' का 'हरिण्यः' के साथ सम्बन्ध लगाया। मूढमति हैं, अतः धन्य हैं। मूढ़—मोहसे (श्रीकृष्ण-मोहसे) व्याप्त है मति जिनकी, ऐसी ये हैं। ये 'पुष्टिमार्गी' हो गयीं। 'पोषणं तदनुग्रहः' सभी इसे मानते हैं। कहीं अपने पुरुषार्थसे प्राणी कृतार्थ होता है और कहीं श्रीकृष्णचन्द्र पूर्णतम पुरुषोत्तम ही अपनी अनुकम्पासे उसे कृतार्थ करते हैं। उत्तराके गर्भमें परीक्षित्‌का अपना कोई पुरुषार्थ नहीं था, वहाँ मायाजवनिकाका अपसारण करके भगवान्‌ने अनुग्रह किया। तात्पर्य यह कि जो सर्वसाधनशून्य हो, उसे भगवान् अपने अनुग्रहसे साधनसम्पन्न करके अपना दर्शन देते हैं। हरिणीको अपने प्रभुकी पूजासामग्रीका परिज्ञान नहीं, कोई बोध नहीं, कोई सामग्री ही नहीं। ऐसी स्थितिमें उन्हें भगवान्‌ने अपनी अनुकम्पासे स्वरूपसाक्षात्कार कराया। अब उनका वही मूढ़मतित्व भूषण हो गया, विवेकशून्य न होकर अब वे कृष्णविषयक आसक्तिमती हो गयीं। मोह दो प्रकारका होता है—एक तो वह, जिसमें कुछ पता न रहे, दूसरा गाढ़ स्नेह, श्रीकृष्णके प्रति आसक्ति। श्रीकृष्णविषयक स्नेह ही तरल न होकर अत्यन्त गाढ़ मुद्रामें मोह होता है, अतः 'मूढमतयोऽपि धन्याः' कहा गया। इसके प्रतिकूल विवेकवती भी अधन्य हैं। विज्ञानकी यथार्थ सफलता श्रीकृष्णचन्द्र आनन्दकन्द पूर्णतम पुरुषोत्तममें उक्त मोह ही सम्भव है और सब तो दो कौड़ीका है। स्वयं भगवान्‌ने इनका अपनेमें प्रेम प्रकट किया, आसक्तिभरे नेत्रोंसे प्रभुके दर्शन करें, यही इनकी पूजा है। पूजामें फूल चढ़ाये जाते हैं। हरिणियोंने अपने कमलदलसदृश नयनोंको जो प्रेमरसपूर्ण थे, श्रीश्यामसुन्दर मुरलीमनोहरके चरणोंमें चढ़ाया। उन्होंने इस पूजाके बदलेमें प्रतिपूजन भी प्राप्त किया, पूजाकी सफलता तभी है। प्रतिपूजन न मिले, पूजा ही स्वीकार हो जाय यह भी बहुत है। किसी भक्तने भगवान्‌के इस प्रतिपूजनपर उन्हें उलाहना भी दिया है—'प्यारे श्यामसुन्दर, वह तुम्हारी नीति समझमें नहीं आती, तुम व्रजकर्दममें विचरते हो, पर याज्ञिकोंके मण्डपमें एक बार भी नहीं पधारे। उनकी लम्बी स्तुतियोंका कोई उत्तर नहीं देते, पर व्रजमें बछड़ोंकी भी हुंकारका उत्तर देते हो, बड़े-बड़े महात्माओंके स्वामी बनना नहीं चाहते, पर इन पुंश्चली गोपियोंका दास बनना चाहते हो।' हरिणांगनाओंकी पूजाके फलमें भगवान्‌ने उनका प्रतिपूजन किया, अपने अनुकम्पापूर्ण नेत्रोंसे उनकी ओर देख दिया। बड़े-बड़े पुजारियोंको पूज्य-स्वरूप आदिका परिज्ञान रहता है, पर पूजामें मोह, आसक्ति, बछड़ोंकी-सी हुंकार एक बार भी नहीं होती। जैसे स्नेहसे पुजारी पूजा करेगा, प्रभु भी वैसे ही स्नेहसे प्रतिपूजन कर देंगे। हरिणांगनाओंको तो मंगलमयी स्वानुकम्पासे स्वविषयक मोह, सूझ आदि प्रभुने दी कि 'तुम अपने इन नेत्रोंसे हमारी पूजा करो' और फिर प्रतिपूजन भी किया। परंतु इस पूजाकी सफलता 'मूढमति' होनेसे ही हुई। पुजारी पूजा करते-करते पूजाकी सामग्रीको भूल जाय, सेव्यमें सेवककी आसक्ति हो जाय, यही मूढ़मतित्व है, यही सच्ची पूजा है और यही सहस्रों करोंसे स्वीकृत होती है। उन हरिणांगनाओंका ही यह सौभाग्य है कि भगवान्‌ने उनके समीप वेशपरिवर्तन किया, विचित्र वेश धारण किया—'उपात्तविचित्रवेषम्।' (श्रीमद्भा० १०।२१।१९) विचित्र अर्थात् नायिकावेश धारण किया। मानो श्रीवृषभानुनन्दिनीके साथ वर्तमान होकर हरिणियोंके समक्ष श्रीश्यामसुन्दरने वेश बदला। इतना मूढ़मतित्व, इतनी आसक्ति भगवान्‌के प्रति हरिणांगनाओंको हुई। अतएव पहले मृगपत्नी, फिर कृष्णपत्नी होनेपर भी इनके पतियोंको श्रीकृष्णसे द्वेष नहीं हुआ। इस गहराईपर दृष्टि डालनेसे व्रजांगनाओंने अपनी शंकाका समाधान पा लिया कि इन्हें हमारे प्रति सापत्न्य, ईर्ष्या नहीं है, ये तो हमारी ही तरह अन्तरंग हैं। अतएव उन्हें 'सखी' सम्बोधन करनेमें कोई संकोच नहीं। नित्यकुंजमन्दिरमें प्रविष्ट सखी कहती है कि 'हे हरिणांगने! तुम हमारे बराबर हो; क्योंकि हमारी मति उनके सामने मूढ़ हो जाती है। इस तुल्यतासे तुममें हमारा सखित्व है, सापत्न्य नहीं।'