भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 427, कुल 778 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 427

यहाँ दिए गए पृष्ठ का शुद्ध देवनागरी में पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यन्तरण प्रस्तुत है:

श्रीरासपञ्चाध्यायी ४१७ हैं, पर जहाँ वह शृंगारसुधासागर हितसमुद्र उमड़ा कि सब उसमें अन्तर्हित हो जाते हैं, अहर्निश डूबने- उतराने लगते हैं, जैसे बर्फकी पूतरी कभी गलती है, कभी पानी और बर्फ बनती है। विप्रयोगातापमें गलनेकी और शुद्ध शृंगारमें पूतरी-भावना है। इस प्रकार ऊँचे भावकी आराधिका ये व्रजांगनाएँ हैं, सम्मिलित रूप ही इनकी उपासना है, इन्हें ही उस सम्मिलित सौगन्ध्यका परिचय है, इन्होंने ही पूछा— अप्येणपत्त्युपगतः प्रिययेह गात्रै- स्तन्वन् दृशां सखि सुनिर्वृतिमच्युतो वः। कान्ताङ्गसङ्गकुचकुङ्कुमरञ्जितायाः कुन्दस्रजः कुलपतेरिह वाति गन्धः ॥ (श्रीमद्भा० १०।३०।११) हरिणीके कुछ दूर जाकर अन्तर्हित होनेपर यह गन्ध आया है, ऐसा वे अनुभव कर रही हैं। वे सोच रही हैं—यह गन्ध अवश्य कान्तांगसंगकुचकुंकुमरंजित कुन्दमालाका ही है। वह प्रियाजीके वक्षोजलग्न कुंकुमसे रँग उठी है, भीज गयी है; उसके बिना यह विविध रूपसे सम्मिश्रित अष्टगन्ध अन्यका हो ही नहीं सकता। अतः यहीं कहीं प्राणप्यारे छिपे हैं अथवा हरिणी कहे कि 'मैं नहीं जानती तुम्हारे श्यामसुन्दर कहाँ हैं?' तो कहती हैं—'नहीं, तुम झूठ बोलती हो, श्यामसुन्दर यहीं हैं, इसका प्रमाण यह सौगन्ध्य दे रहा है। सखि हरिणी! मान न करो, बतलाओ, प्यारे मनमोहन कहाँ विराजे हैं?' ये प्रेष्ठ सखीके भाव हैं। दूसरे भावकी सखी कहती हैं—'वे श्रीश्यामसुन्दर मदनमोहन केवल वृषभानुनन्दिनीके पति नहीं, अपितु 'कुलपति' हैं, फिर देखो उनका अन्याय, वे अकेली वृषभानुनन्दिनीके साथ ही रमण कर रहे हैं।' व्रजांगनाओंकी पुनः हरिणीपर दृष्टि जाती है। वे कहती हैं—'यह हरिणी नहीं, सर्वदुःखहारिणी हैं, श्रीकृष्ण-दर्शन कराकर सर्वदुःख दूर करनेवाली हैं।' वे उसे अपनी सखी मानती हैं, यह इसलिये कि समान ख्याति होनेसे सख्य होता है। व्रजांगना भी कृष्णपत्नी हैं और हरिणी भी (कृष्णसार)-पत्नी हैं, अतः कृष्णपत्नीत्वेन सख्य हुआ। दूसरे यह पुण्यवती है। 'कृष्णो मृगयतेऽनेनेति कृष्णमृगः।' वही 'एण' कहलाता है। पत्नी कहनेसे 'पत्युर्नो यज्ञसंयोगे' से यज्ञसम्बन्ध सूचित हुआ—याज्ञिककी पत्नी। मानो दर्श, पौर्णमास, चातुर्मास्यादि श्रीकृष्णमिलनके लिये ही किया और उसे कृष्णार्पण कर दिया। इस तरह कृष्णको ढूँढ़नेवाले मृगकी—एणकी पत्नी यह हरिणी कृष्णको ही ढूँढ़नेवाली है, यह हमारी सखी है। फिर यह और हम दोनों हरिणाक्षी हैं। श्रीकृष्णमनोहारिणी हम हैं और दुःखहारिणी यह है। गोपांगनाओंके हरिणीके प्रति बड़े मार्मिक भाव हैं। वे कहती हैं— 'हे सखि हरिणी! हमको एक शंका है कि कहीं तुम हमसे सापत्यभाव तो नहीं रखती हो? यह तो नहीं सोचती हो कि इन सौतोंको उनका परिचय कैसे दूँ, श्रीश्यामसुन्दरका तो मुझे अवश्य दर्शन मिला, पर इन सौतोंको कैसे बतलाऊँ?' फिर कहती हैं—'पहले यह एणपत्नी अवश्य रही, पर अब तो कृष्णपत्नी ही हो गयी है; क्योंकि 'क्वचित्वेणुरववञ्चितचित्ताः** गोपिका** इव विमुक्तगृहाशाः ॥' (श्रीमद्भा० १०।३५।१९) श्रीकृष्णकी मुरलीने गोपिकाओंकी तरह इनके भी घरबारकी आशा छुड़ा दी। ऐसा होनेसे मृगोंने इनके साथ द्वेष नहीं किया, प्रत्युत इनको साथ लेकर भगवान् कृष्णकी पूजा की— 'पूजां दधुर्विरचितां प्रणयावलोकैः ॥' (श्रीमद्भा० १०।२१।११) गोपांगनाओंद्वारा हरिणियोंके सौभाग्यकी सराहना इनके पति स्वयं 'कृष्णसार' हैं, वे भगवत्परायणा अपनी पत्नीसे द्वेष कैसे करेंगे? हरिणी पशुकोटिमें है, पशु मूढ़मति गिने जाते हैं। परंतु ये कृष्णप्रेमवती हरिणी मूढ़मति भी धन्य है, हम व्रजांगना विवेकवती भी अहरिणाक्षी हैं, अधन्य हैं। इनके पति कृष्णसार (कृष्णपरायण) हैं, इनको साथ लेकर श्रीकृष्णका दर्शन करने आते हैं। हमारे पति अभिमानसार हैं, अतः 'इमा धन्याः वयं विवेकवत्योऽधन्याः।' प्रेमवती होनेके कारण जैसे व्रजांगना कृष्णपत्नी, वैसे ही हरिणी भी कृष्णपत्नी हैं—