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भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 415

श्रीरासपंचाध्यायी ४०५ सखि! तुम भाग्यशालिनी हो, हम तो भाग्यविधुरा हैं। सखि, वसुधे! तुम ऐसी महाभाग्यवती हो कि ये श्यामसुन्दर कभी वामनरूपसे तो कभी वाराहरूपसे तुम्हारा आलिंगन करते हैं और साक्षात् श्रीकृष्णचन्द्र यशोदा-नन्दन आनन्द-कन्दरूपसे भी सदा तुमसे संयुक्त रहते हैं। हमसे, गोपालसे, अपने प्रियसखाओंसे वे वियुक्त हो जाते हैं, पर तुमसे कभी वियुक्त नहीं होते। सचमुच तुम स्वाधीनभर्तृका हो। अनन्तानन्त महापुण्यवानोंको भगवद्ध्यान, भगवत्स्पर्श प्राप्त होता है, फिर साक्षात् सम्बन्ध हो जाय तो कहना ही क्या?' अघासुरकी मुक्ति लोग चकित रह गये, अघासुरकी मुक्ति देखकर। पहले उसके कन्दराकार मुखमें ग्वाल-बाल, वत्स प्रविष्ट हुए, फिर श्रीगोपाल स्वयं भी प्रविष्ट हो गये और उसके मुखका विदारणकर वत्सादिके सहित उससे बाहर निकल आये। अपनी दृष्टिसे सुधासिंचनकर वत्स-वत्सपोंको सजीव किया। उस समय उस असुरके मुखसे एक ज्योति निकली और उन त्रिभुवनमोहनके मुखमें समा गयी। इस घटनासे सब आश्चर्यचकित रह गये। जो प्रत्यक्ष सायुज्य देवोंको दुर्लभ है, वह इस हत्यारेको मिली। श्रीशुकदेव महामुनि कहते हैं— सकृद् यदङ्गप्रतिमान्तराहिता मनोमयी भागवतीं ददौ गतिम्। स एव नित्यात्मसुखानुभूत्यभि- व्युदस्तमायोऽन्तर्गतो हि किं पुनः ॥ (श्रीमद्भा० १०।१२।३९) एक बार भी अन्तःकरणमें विराजित प्रभुकी मनोमयी मूर्ति भावुकोंको भागवती गति देती है— आत्मसमर्पण कर देती है। उक्त अघासुरको तो फिर वह साक्षात् ही मिली, फिर उसको प्रभुप्राप्तिमें सन्देह ही क्या? बाहर मन्दिरादिमें प्रतिष्ठित दिव्य काष्ठादि-निर्मित भगवन्मूर्तिका दर्शन करके भक्तलोग वैसी ही मूर्ति अपने हृदयमें पधराकर रखते हैं। इसीके लिये काष्ठादिकी मूर्ति बनाकर पूजा- सेवाके विधान हैं। इस विषयमें श्रीवल्लभाचार्यजीका सिद्धान्त इस प्रकार है— मानसी-आराधनाकी महिमा कृष्णसेवा सदा कार्या मानसी सा परा मता। चेतस्तत्प्रवणं सेवा तत् सिद्धयै तनुवित्तजा॥ तत्प्रवणता ही सेवा है, अपने प्रियतम, पूर्णतम पुरुषोत्तमकी ओर संसार छोड़कर मन ऐसा प्रवाहित हो, जैसा सावन-भादोंकी गंगा आदि नदियाँ समुद्रकी ओर प्रवाहित होती हैं। मनमें प्रभुस्वरूप प्रकट हो जाय। ध्यान करने बैठें, मन नहीं लगता, भजनके समय कामिनी, शिशु और भी अत्यन्त सुन्दर वस्तुओंका स्मरण हो आता है। परंतु, क्या कोई भी वस्तु उन त्रिभुवन-मोहन श्यामसे अधिक सुन्दर है? फिर क्या बात है, उनके देवदुर्लभ चरणारविन्दको छोड़कर वह अन्यत्र क्यों भटकता है? कारण स्पष्ट है, उसमें प्रभुकी मूर्ति अंकित नहीं हुई—मानसी मूर्ति नहीं बन पायी। 'स्वमूर्त्या लोकलावण्यनिर्मुुक्त्या लोचनं नृणाम्।' (श्रीमद्भा० ११।१।६) ('लोकेभ्यो लावण्यस्य निर्मुक्तिर्यया सा') प्रभुकी मंगलमयी मूर्तिके एक-एक रोममें अनन्त सौन्दर्यामृत-माधुर्यामृत- सिन्धु समाये हैं, सारे संसारमें उसका एक कण बँटा है। जब सब सौन्दर्य-विश्वमोहन कन्दर्प भी जिसकी नखमणिचन्द्रिकासे व्यामुग्ध हो जाता है, उसकी यदि मनोमयी मूर्ति बन जाय तो यह शिकायत न रह जाय कि मन नहीं लगता। प्रभुने देखा कि जीवोंके चित्त माधुर्यादिकी तरफ खिंचते हैं, पर वे नरक ले जानेवाले हैं—'ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते।' (गीता ५।२२) आद्यन्तवन्त हैं, क्षणभंगुर हैं, बुध इनमें नहीं रमते। पर ये जो हमारे शब्द, रूपादि, माधुर्यादि हैं, इनको हम ऐसे रूपमें प्रकट करें कि सबका चित्त एक बार ही उधर आकृष्ट हो जाय। प्राणियोंके चित्तका परिचय अदृश्य, अग्राद्य, अलक्षण, अरूप, अचिन्त्य, अव्यपदेश्य, अशब्दसे नहीं हुआ, इसीलिये वह लौकिक शब्दादिके लिये मचलता है। यही सब विचारकर प्रभुने अपना ऐसा रूप बनाया कि सनकादि, शुकादि भी उसपर विमुग्ध हो गये। श्रीश्यामसुन्दर पूर्णतम पुरुषोत्तमका ही एक रामरूप है, जिसे देखकर दण्डकारण्यवासी तपस्वी मुग्ध हो गये। श्रीकृष्णका रूप तो जरा और ठाटका है, कहीं

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