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भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 414

४०४ भक्तिसुधा महत्त्व माना गया और इस एक देशके महत्त्वसे समस्त भूमिकामहत्त्व माना गया। इसी प्रकार 'वृन्दावनं सखि भुवो वितनोति कीर्तिम्' की बात है। अतः व्रजरजकी महिमा महान् है। व्रजदेवियोंने अपने शरीरकी वृन्दावनसे तुलना की है। वृन्दावनमें श्रीयमुना बहती हैं। व्रजांगना कहती हैं—हमारे शरीरमें श्रीकृष्णप्रेमधारा निरन्तर प्रवाहित है। हमारा हृदय ही श्रीगोवर्द्धनपर्वत है और ये वृन्दावनकी लताएँ हमारी रोमराजि हैं। पर हाय, तब भी प्यारे श्यामसुन्दर वृन्दावनमें साक्षात् विहार करते हैं, उसे सदा अलंकृत करते हैं और हमें दर्शनतक नहीं देते। वृन्दावनमें स्थल-स्थलपर झरने झरते हैं, व्रजांगना उनकी समानता अपने प्रेमद्रव, मूर्च्छा, स्वेद आदि आठ सात्त्विक भावोंसे करती हैं। वृन्दावनमें लतादिकी अलौकिकता है, जो सर्वथा लोकोत्तर है। अतः अब व्रजदेवियाँ वृन्दावनकी भूमिसे ही पूछती हैं— 'किं ते कृतं क्षिति तपो बत केशवाङ्घ्रि- स्पर्शोत्सवोत्पुलकिताङ्गरुहैर्विभासि ।' 'हे सखि भूमि ! बतलाओ, छिपाओ नहीं— तुमने कौन-सी तपस्यासे यह लोकोत्तरता प्राप्त की है।' भूमि बोलती नहीं, तब अपने ही आप कल्पना करती हैं—मालूम होता है इसकी कोई उग्र तपस्या है, आत्मसन्तापन, पीड़न भी एक तप है। जब भगवान् श्रीवामनने महाविराट् रूपमें अपने चरणसे तुम्हारा स्पर्श किया, उस समय तुम दबी, तुम्हारा उत्पीड़न हुआ। यह एक तपस्या हुई। यह आनन्दोद्रेकका रोमाँचोद्गम साधारण तपका फल नहीं, अपितु श्रीवामनभारसे है अथवा उतनेसे न होगा। श्रीवामनका स्पर्श ऐश्वर्यवाला है, यहाँ माधुर्य है, ऐश्वर्यमें माधुर्य सम्भव नहीं, वह तो तपसे ही सम्भव है, अतः श्रीवामनस्पर्शरूप तपसे यह मिला होगा अथवा वराह भगवान्‌के द्वारा निपीडनरूप तपका फल होगा, जो श्रीश्यामसुन्दरके स्पर्शोत्सवसे तुम अति पुलकित हो रही हो। किं ते कृतं क्षिति तपो बत केशवाङ्घ्रि- स्पर्शोत्सवोत्पुलकिताङ्गरुहैर्विभासि । अप्यङ्घ्रिसम्भव उरुक्रमविक्रमाद् वा आहो वराहवपुषः परिरम्भणेन ॥ (श्रीमद्भा० १०।३०।१०) इस प्रकार व्रजांगनाएँ अपने प्राणाधिकप्रिय श्रीश्यामसुन्दरका अन्वेषण करती हुई वृक्षादिकोंसे कुछ उत्तर न पाकर भूमिसे पूछती हैं और विविध भावमय कल्पनाओंसे पुष्ट अनुमानद्वारा उसे श्रीकृष्ण- सम्पर्कवती जानकर उसके प्रति विमुग्ध हो जाती हैं और उनकी कल्पनाओंका प्रवाह बढ़ता ही जाता है। निवास और गत्यर्थक 'क्षि' धातुसे ('क्षि निवास गत्योः') 'क्षिति' शब्द निष्पन्न हुआ है। उसका अर्थ है सर्वनिवास और गमनकी आधारभूता। संसारके सभी प्राणियोंकी स्थिति, गति भूमिके ही आधारपर है। व्रजांगनाएँ प्रार्थना करती हैं—'हे सर्वाधारभूते भूमि ! तुम परोपकारिणी हो, बड़ी दयामयी हो, श्रीश्यामसुन्दरका पता बतलाकर हमपर दया दिखाओ। सखि ! सच- सच बतलाओ, तुम्हारी किस तपस्याका यह फल है, जो श्रीश्यामचरण तुम्हें प्राप्त हुआ है? श्रीकेशवाङ्घ्रिस्पर्श तुम्हें मिला है? यह तो स्पष्ट है कि तुम्हें उन प्रभुका चरणस्पर्श अवश्य मिला है; क्योंकि उसके बिना तुम्हारा यह लता, झरनारूप अंगरुह, यह हर्षोद्रेक, यह लोकोत्तर उत्सव कभी सम्भव नहीं। अब जानना यह है कि यह तुम्हें भगवान्‌के किस स्वरूपसे प्राप्त हुआ? यदि महाविराटका रूप धारण करते समय भगवान् वामनसे तो यह हम मान सकतीं नहीं; क्योंकि उनके द्वारा इतना उत्सव मिलना असम्भव है। यह तो हमारे श्रीश्यामसुन्दरके चरण-सम्मिलनका ही महाफल हो सकता है। आहोस्वित् रसातलसे तुम्हारा उद्धार करते समय भगवान् वराहके परिरम्भणका यह फल है। परंतु जड़-चेतन सबमें रसका संचार कर देनेवाली यह विशेषता तो उन मुरलीमनोहरमें ही है। वामन या वाराहकी तो यह बात कहीं भी प्रसिद्ध नहीं। यह तो उन्हींकी महिमा है, जो अमृतमय निज मुखचन्द्रसे विनिर्गत वेणुगीत-पीयूषके पानसे स्थावर जंगम और जंगम स्थावर हो जाते हैं, वृक्ष भी हृष्यत्त्वक्- रोमांचवाले हो जाते हैं। यह तुम्हारा लोकोत्तर उत्पुलोत्सव अवश्य उन्हींकी कृपाका प्रसाद है।

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