भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 413

श्रीरासपञ्चाध्यायी ४०३

इस बातकी चिन्ता तो सभीको और भी अधिक कष्ट दे रही थी, परंतु बड़े कष्टसे उन्होंने सब कुछ सहा। गोपजनके कुतूहलमें भावी कष्ट कुछ विस्मृत हुआ। बड़े समारोहसे गोपूजन हुआ। गौ, वत्स वस्त्रालंकारादिसे सजाये गये; धूप, दीप, नैवेद्यके साथ उनकी परिक्रमा, दण्डवत् प्रणाम आदि हुआ। माता यशोदाने, गोपांगनाओंने श्रीश्यामसुन्दरको पादुका पहनकर वन जानेका प्रस्ताव रखा, परंतु उन्होंने अस्वीकार किया, कहा—यह धर्मविरुद्ध है, जब हमारे उपास्य देवता गौएँ बिना पादत्राणके विचरेंगी, तब हम भी वैसे ही रहेंगे। अतएव गोपदेवियोंको चिन्ता है— चलसि यद् व्रजाच्चारयन् पशून् नलिनसुन्दरं नाथ ते पदम्। शिलतृणाङ्कुरैः सीदतीति नः कलिलतां मनः कान्त गच्छति॥* (श्रीमद्भा० १०।३१।११) और भी '····तेनाटवीमटसि तद् व्यथते न किंस्वित् कूर्पादिभिर्भ्रमति धीर्भवदायुषां नः।' (श्रीमद्भा० १०।३१।१९) यदि प्रभुके पादोंमें पादत्राण होते तो पद-पदपर काँटा आदि गड़नेकी गोपियोंको चिन्ता न होती। अतः यह सौभाग्य किसीको प्राप्त नहीं हुआ। यह तो श्रीवृन्दावनभूमिको ही प्राप्त हुआ, जिसने निरावरण केशव-चरणोंको प्राप्त किया। अतएव 'वृन्दावनं सखि भुवो वितनोति कीर्तिम्' (श्रीमद्भा० १०।२१।१०) कहा गया है। भगवच्चरणारविन्दके विषयमें गोपांगनाओंकी कई अन्तरंग भावनाएँ हैं। उन्होंने अपने प्रेष्ठ श्रीश्यामसुन्दरको कई स्थानोंमें 'देवकीसुत' कहा है, यह उनकी ओरसे प्रणयकोपमें साभिप्राय उक्ति है अर्थात् देवकीके—क्षत्राणीके—कठोरहृदयके सुत हैं, उनके शरीरमें क्षत्रियाणीका कठोर खून है, अतएव इनके पाद कठोर हैं, विप्रयोगतापसन्तप्त कठिन हृदयमें हम उनको धारण करके तापशान्ति चाहती हैं। इसी प्रकार 'न खलु गोपिकानन्दनो भवान्' (श्रीमद्भा० १०।३१।४) कहकर यह बतलाया कि 'आप कोमलहृदया गोपिका—यशोदाके सुत नहीं हैं, अन्यथा इतने कठोर न होते।' वृन्दावनधामके प्रसंगमें यह भी समझना चाहिये कि वृन्दावनधाम अलग और भूमि अलग है। नित्य वृन्दावनधामका जो व्यापी वैकुण्ठ है, यहाँ अवतार है। यह सब महत्त्व भूमिके एक देशको था, पर इतनेसे ही समस्त भूमिको बड़ा अभिमान था। परंतु किसीका भी अभिमान सदा स्थिर नहीं रहता। भगवान्‌को तो वह अच्छा ही नहीं लगता। फलतः पृथिवी एक बार गौ बनी और त्रिपादक्षीण धर्म—वृषभ। पृथिवी अपने ऊपर हो रहे अत्याचारोंसे दुःखी होकर भगवान्‌से करुण प्रार्थना कर रही थी, कलियुग दोनोंको डण्डा मारकर भगा रहा था। धर्म भूमिसे उस समय पूछ रहा था—'तुम इतनी दुःखी क्यों हो? रोती क्यों हो?' इसपर गोरूपधारिणी भूमिने कहा—'श्रीभगवान् पूर्णपुरुषोत्तम श्यामसुन्दरके साक्षात् चरणस्पर्शकी प्राप्तिसे कृतकृत्य होकर मैं महाभिमानमत्त हो गयी थी, उसीका यह फल भोग रही हूँ।' एक बार श्रीनारदने विन्ध्याचलसे पूछा—तुम बड़े हो या सुमेरु ? मैं तो समझता हूँ कि सुमेरु बड़ा है। विन्ध्याचलसे सुमेरुकी स्तुति न सही गयी, वह खड़ा हो गया। अब तो भूमि और आकाश एक हो गया, आफत मच गयी। तब देवताओंने महामुनि अगस्त्यको उसके समीप भेजा, जो उसके गुरु थे। उन्हें देखते ही विन्ध्यने साष्टांग प्रणाम किया और उनकी आज्ञा मानकर वैसे ही रह गया। लोगोंने शान्तिकी साँस ली, पर उसके हृदयमें छोटेपनका सन्ताप बना ही रहा। परंतु जब भगवान् रामचन्द्र वनवासके प्रसंगसे उसके यहाँ पधारे, तब तो सुमेरु, हिमालय आदि सभी विन्ध्यकी स्तुति करने लगे। उस समय विन्ध्याचलने बिना परिश्रमके ही बड़ाई पायी—'बिनु श्रम बिपुल बड़ाई पाई।' ऐसे ही भगवत्पादार्पणसे चित्रकूटका


  • हमारे प्यारे स्वामी ! तुम्हारे चरण कमलसे भी सुकोमल और सुन्दर हैं। जब तुम गौओंको चरानेके लिये व्रजसे निकलते हो, तब यह सोचकर कि तुम्हारे वे युगल चरण कंकड़, तिनके और कुश-काँटे गड़ जानेसे कष्ट पाते होंगे, हमारा मन बेचैन हो जाता है। हमें बड़ा दुःख होता है।