भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 412, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ें४०२ भक्तिसुधा
पुत्रवत्सला यशोदा अम्बाने गोचारणके लिये जाने ही क्यों दिया ? वह तो जैसे फणी अपनी मणिको छिपाकर रखे, वैसे अपने लालको अंकमें छिपाकर रखती थी, रातमें भी जाग-जागकर मस्तक सूंघती थी, जैसे रंक अपनी निधिको बराबर टटोले। फिर उसने अपने कन्हैयाको कहीं जाने ही क्यों दिया ? लक्ष्मी व्रजमें सेविका बनकर रहना चाहती थी। फिर वह लक्ष्मी रासेश्वरी विराजमान है, वह भी श्री है 'श्रीयते सर्वगुणैः।' श्री ही हैं एक लक्ष्मी, एक श्रीराधा। पहली 'श्रयते हरिमिति श्रीः' है और दूसरी 'श्रीयते हरिणा या सा श्रीः' सुन्दरता, मृदुता, कोमलता आदि उनकी सेवाके लिये लालायित रहती हैं। 'देवीभागवत' में वर्णित शोभा, शान्ति, कान्ति आदि सब गोपांगनाओंके रूपमें श्रीराधाकी सेविकाएँ हैं। उन्हींकी सरसता आदि लोकमें कणमात्र है। अनन्तकोटिब्रह्माण्डान्तर्गत मृदुता, कोमलताकी मूर्तिमती महाशक्ति, जिसके चरणोंमें प्राकृत कमलकी पंखुड़ीके भी गड़ जानेका डर है, वे अपने परम कोमल करोंसे श्रीराधाके चरण-स्पर्श करनेमें सकुचाती हैं कि कहीं आघात न लग जाय। अतः 'श्रीयते सर्वैर्गुणैर्हरिणा च या सा श्रीः' ठीक ही है। जब वृन्दावनमें निवास करें, तब धनकी कैसी कमी ? सैकड़ों नौकर लगाकर गोचारण आदि कराया जा सकता है, फिर स्वयं श्यामसुन्दर भगवान्को वह क्यों करने दिया गया ? परंतु ये तो गोपालकी लीला थी, बाललीला, वनलीला आदि उनके विनोद थे। श्रीमद्वल्लभाचार्यके सिद्धान्तानुसार जगत्के, प्रकृतिके सब तत्त्व उस प्राणप्यारेके आलिंगनके लिये उत्कट उत्कण्ठित हैं। इसके लिये वनकी देवी, वनकी शक्ति कोई दूर्वा, कोई लता, कोई पाषाण आदि बने हैं। यदि वनलीला न हो तो इनकी अभिलाषा कैसे पूर्ण हो ? भगवान् वांछाकल्पतरु कैसे कहे जायँ ? किं ते कृतं क्षिति तपो बत केशवाङ्घ्रि- स्पर्शोत्सवोत्पुलकिताङ्गरुहैर्विभासि । अप्यङ्घ्रिसम्भव उरुक्रमविक्रमाद् वा आहो वराहवपुषः परिरम्भणेन॥ (श्रीमद्भा० १०।३०।१०)
पुत्रवत्सला अम्बा यशोदाने अपने लालको गोचारण, वनगमनकी कभी अनुमति नहीं दी। हठीले श्यामसुन्दरके हठ अथवा परिस्थितिसे विवश यशोदाने वैसा होने दिया। परंतु वनगमनकी बात सुनकर नन्दरानी न जाने कितनी बार मूर्च्छित हुई। 'दिनभर कैसे कटेगा' आदि चिन्ता उसके चित्तसे क्षणभरके लिये भी शान्त न होती थी। गोचारणके लिये वन जानेके समयकी गोपालकी मूर्तिको निहारकर गोप, गोपी सब चित्रलिखे-से खड़े रहते, वे सब उनका तबतक एकटक दर्शन करते रहते, जबतक वे अपने सखाओंके साथ ओझल न हो जाते। इसके बाद भी घण्टों उनके पीछे उड़ रही धूलिका दर्शन करते रहते और अन्तमें उनकी विविध चिन्ताओंमें ही बेसुध हो जाते। वन, पक्षी, मृग, जड़, चेतन सबकी यही स्थिति थी। तब नन्दरानीकी स्थिति कैसी होगी, यह वर्णनके बाहर है। इसके साथ एक बात यह भी थी कि छोटे बछड़े श्रीश्याम और श्रीबलरामके साथ इतने मिल- जुल गये थे कि उनके बिना आँगनके बाहर पैर ही नहीं रखते थे। दोनों भैया उनकी पूँछ पकड़कर व्रजकर्दममें खेलते, वे उनको एकटक दृष्टिसे देखते, सूँघते और जिह्वासे चाटते थे। ऐसी स्थितिमें बड़े होकर भी श्रीकन्हैया और श्रीदाऊको छोड़कर डण्डाकी मार खाकर भी वे बाहर जानेका नाम न लेते। किसी समय तो वे स्वयं कृष्ण हो गये। आगे चलकर गायोंने भी बछड़ोंका ही अनुकरण किया, उन्होंने भी अपने प्रिय श्यामसुन्दरके बिना कहीं भी जाना-आना छोड़ दिया। अब तो एक समस्या उपस्थित हो गयी। इधर गोपालन निज धर्म था ही। जहाँ धर्मका सम्बन्ध आया, नन्द, यशोदा दोनों ही मूक हो गये। गर्गाचार्यकी प्रतीक्षा होने लगी। वन, लता, मृगादिके मनोरथ पूर्ण होनेका अवसर आ गया। स्मरण-समकाल ही गर्गजी पधारे और तुरंत दूसरे ही दिन गोपाष्टमीका ही मुहूर्त निकल आया, मानो प्रतीक्षामें ही बैठे थे। परंतु गोपियाँ बड़े कष्टमें पड़ गयीं। जिन्हें एक क्षण भी बिना देखे नहीं रह सकतीं, उनका अब दिनभरके लिये असह्य वियोग कैसे सहा जायगा ? दूसरे, 'इतने मधुर, सुकोमल मनमोहन कण्टकाकीर्ण वनमें कैसे विचरेंगे'