भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 372, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ें३६२ भक्तिसुधा एक भाव और—प्रसिद्ध कवि श्रीकालिदासके खण्डकाव्य 'मेघदूत' में यक्षने मेघको दूत बनाकर अपनी प्रियाके पास भेजा है। जहाँ प्राकृत स्थलमें ऐसी स्थिति है कि चेतन-अचेतनका भेद मिट जाता है, तब इनकी तो बात ही निराली है। वे तो श्यामसुन्दरके लोकोत्तर अनुरागसागरमें सदा इतनी मग्न रहती हैं कि किसी भी तरहकी सुधबुध ही नहीं रहती। ऐसी स्थितिमें चेतन-अचेतनको भूलकर वे भी वृक्षोंसे प्रश्न करें तो कोई असंगति नहीं। व्रजांगना वृक्षोंसे पूछते समय पहले उनका गुणगान करती हैं, प्रार्थना करती हैं; फिर उनसे अपने प्रियतमका पता न पाकर उनमें दोष बताती हुई आगे चल देती हैं। वे सबसे पूछती जाती हैं—न जाने किससे पता लग जाये। अपनी कार्यसिद्धिके लिये मनुष्य सब कुछ करता है। पुत्रके लिये लोग नौ मन काँकर चालते हैं। कितने ही देवी-देवताओंको ध्याते- पूजते हैं। गरज सब कुछ करा देती है। गरजपर बड़े- बड़े नास्तिक साधुओंकी खुशामद करते हैं, उनसे सट्टा पूछते हैं। तब प्रियतम प्राणधनकी प्राप्तिके लिये क्या-क्या न किया जाये, किस-किससे न पूछा जाये? अतः व्रजांगना सबसे पूछती फिरती हैं, गाती फिरती हैं। यही उपदेश है—रागद्वेष छोड़कर तल्लीन होकर अभिलषित वस्तुका पता लो, अवश्य सफलता मिलेगी। 'गायन्त्युच्चैः' यों श्रीगोपांगनागण उच्च स्वरसे भगवान्को गाती हुई उनके अन्वेषणमें संलग्न हैं। इसमें गोपियोंका एक भाव यह भी है कि—'जैसे श्रीमुरलीमनोहरके श्रीविमुखसे विनिःसृत वेणुगीत- निनादको सुनते ही हम उनके सन्निधानमें अविलम्ब आ पहुँचीं, वैसे ही वे भी शीघ्र हमलोगोंके पास पधारें। अतः उच्चैः उनके गुणोंको गाती हुई ढूँढ़ती हैं। अपने गुणोंको—प्रशंसाको सुनकर शीघ्र आयेंगे, यह भी व्रजदेवियोंका तात्पर्य है। उपदेश तो है ही कि श्रीभगवान्की प्राप्तिका असाधारण कारण उनका गुणगान ही है, इन गोपदेवियोंके लिये उन्मत्तकवत् कहा गया है। उन्मत्तकमें 'कन्' प्रत्यय अधिकतामें है। इससे यह बतलाया गया कि—व्रजांगना मतवालोंकी तरह देह-गेहके नेह और सम्बन्धसे तथा वस्त्रानुसन्धान आदिसे शून्य हैं। उन्हें कुछ पता नहीं कि वे कहाँ क्या कर रही हैं अर्थात् अधिकाधिक उन्मादिनी गोपी उच्चस्वरसे प्राणधन घनश्यामको गाती हैं। यद्यपि इस समय श्रीभगवान् इन्हें त्यागकर दुःसह विप्रयोग दुःख दे रहे हैं। श्रीव्रजदेवियोंके श्यामविरहजन्य तीव्रातितीव्र सन्तापको देखकर लोक निरालोक हो गये, दिशा- विदिशा सन्तप्त हो उठीं, पाषाण भी द्रुत हो चले, पर वे व्रजचन्द्र तनिक नहीं पिघले, बड़े निष्ठुर— महाकठोर बने हुए हैं। फिर भी व्रजांगना अपने कार्यसे विरत नहीं हैं—वे उच्च स्वरसे उन्हें ही गा रही हैं। वे चाहे रीझें, चाहे खीझें, वे तो उन्हें ही— एकमात्र उन्हें ही गायेंगी। वे तो निश्चय लेकर बैठी हैं—'असुन्दरः सुन्दरशेखरो वा........' वे चाहे करुणार्णव हों चाहे द्वेषमहावाडवानल, ये तो भजेंगी उन्हें ही। गायेंगी उन्हें ही। अब क्या दूसरोंको गायेंगी ? 'उच्चैरमुमेव संहताः', 'एव' पद आया है। इसका भी विलक्षण स्वारस्य है। एक गोपी कहती है—'सखि, जीवितं पणीकृतं मया....' मैंने तो अब जीवनकी बाजी लगा दी है। वाह! कोई धनकी बाजी लगाता है, कोई जनकी बाजी लगाता है, कोई 'सट्टे' में सर्वस्व स्वाहा कर देता है, पर यह सब अपने जीवनकी रक्षाके लिये करते हैं। किंतु यहाँ तो जीवनकी भी कोई परवाह नहीं। ये जीवनका 'जुआ' खेलती हैं। अब इन्हें माता, पिता, पति, गुरुजन किसीका क्या डर! इससे अधिक कष्ट ही क्या होगा? इन्होंने तो दृढ़ निर्णय कर लिया—'माधवो यदि विहन्ति हन्यताम्, बान्धवो यदि जहाति त्यज्यताम्। साधवो यदि हसन्ति हस्यताम्, माधवः स्वयमूरीकृतो मया।' यदि वे श्रीश्यामसुन्दर प्राणधन वियोगदुःख देखकर तरसा-तरसाकर हमारा वध करते हैं तो बड़े शौकसे करें, हम इसके लिये तैयार हैं। यदि बान्धव- कुटुम्बी हमें छोड़ते हैं तो वे भी छोड़ दें और हमारी इस हालतपर साधुजन हँसते हैं तो भले ही हँसें, खूब हँसें, पर हमने तो उन माधव मुरली-मनोहरको सर्वस्व