भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीरासपञ्चाध्यायी ३६१
समझाया—तुम क्यों उन्हींको गाती हो, जो त्यागकर चले गये। इसपर वे कहती हैं—'हाँ, हम तो उन्हींको गायेंगी, उन्हींको रिझायेंगी।' वे यह निश्चय लेकर बैठी हैं—'चाहे वे शतकोटि-अनन्तकोटि कष्ट दें, पर हम तो उन्हें ही, बाँकेबिहारीको ही गायेंगी। इनका यह 'अटल' नियम है। कितनी भी विपत्ति आनेपर, ये अन्यको न गायेंगी। वे त्रिभंग होनेपर भी ललित श्याम, चाहे कितने भी विपरीत आचरण करें, पर इनका प्रेम-प्राखर्य बढ़ता ही जायेगा। गायन उनका स्वभाव हो गया, अतः गाती ही हैं। गोपाङ्गनाओंका प्रेमविह्वल हो वृक्षों- वनस्पतियोंसे श्यामसुन्दरके विषयमें पूछना तथा उत्तर न मिलनेपर दोषानुसन्धान करना 'विचिक्युरुन्मत्तकवद् वनाद् वनम्' उन्मत्तकी तरह, जहाँ-जहाँ सम्भावना है, ढूँढ़ती हैं। एकसे एकको, निरालस होकर, दूसरे, तीसरे, चौथे, पाँचवें वनोंको ढूँढ़ डालती हैं। विश्राम ही नहीं लेतीं। जबतक प्यारे मनमोहन न मिल जायें, चैन ही नहीं। इससे भी उपदेश है—'ढूँढ़ते ही रहो।' जबतक अभिलषित कार्य सिद्ध न हो ले, विश्राम ही कैसा? फिर वे पूछती हैं—वनस्पतियोंसे। उन्हें दृढ़ आशा है कि इनसे प्राणप्यारेका पता मिलेगा ही। इससे यह भी सिद्ध हुआ कि—प्रेमी वृक्षोंतकसे पूछ सकता है; चेतनकी तो कथा ही क्या? अमुकसे पूछो, अमुकसे नहीं—यह तो उनके यहाँ विचार ही नहीं—अतएव साधारण्येन बहुवचन है—'वनस्पतीन्'। श्रीमद्वल्लभा- चार्यजीका इसपर एक भाव है—वृन्दावनके वनस्पति वैष्णव हैं, 'मूढा अपि वैष्णवाः प्रष्टव्याः'। अनुरागी चाहे विद्वान् न हों, पर वे प्रष्टव्य हैं। अतः वृक्षोंसे पूछती हैं अथवा व्रजांगनाओंको प्रेमोन्मादसे दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई, उन्हें वृक्षोंका वास्तविक स्वरूप ज्ञात हुआ। व्रजके वन, लता, तरु आदि अपने एक-एक कणसे श्रीश्यामसुन्दरके स्वरूपको प्रकट करते हैं*— अतएव भावुक व्रजधूलिको भालपर धरते हैं। एक भावुकका कहना है— सन्त्ववतारा बहवः पुष्करनाभस्य सर्वतोभद्राः। कृष्णादन्यः को वा लतास्वपि प्रेमदो भवति॥ अर्थात् भगवान् विष्णुके बहुत अवतार हुए और उत्तम-उत्तम हुए हों, परंतु श्रीकृष्णअवतारके अतिरिक्त और कौन अवतार हुआ, जिसने लताओंमें भी, जड़ोंमें भी प्रेमका गाढ संचार किया हो? 'यत्पादपांसुर्बहुजन्मकृच्छ्रतो धृतात्मभीर्योगिभिरप्यलभ्यः।' (श्रीमद्भा० १०।१२।१२) जिन श्रीभगवान्की पादधूलि बहुत जन्मोंमें भी योगीन्द्र-मुनीन्द्रोंतकको भी दुर्लभ है, उन प्रभुने अपने संचारसे व्रज-वृन्दावन-लता-तरुको अनन्त महत्त्व दिया है। श्रीवृन्दावनके वृक्षोंके प्रकाशकी एक किरण भी बिना प्रभुपादारविन्दकी अनुकम्पाके जन्म-जन्मान्तर, युगयुगान्तर और कल्पकल्पान्तरमें भी द्रष्टुमशक्य है। 'आनन्दवृन्दावनचम्पू' में कहा है—श्रीवृन्दावनधामके एक-एक वृक्ष, इन्द्रनील, पद्मराग और हरितमणि आदिके सदृश चमत्कृत, देदीप्यमान हैं, इनकी शाखा, उपशाखा, पत्र, पुष्प, फल भी वैसे ही सचिक्कण, प्रकाशमान हैं। उनपर शुक, पिक, कपोत, तित्तिर, मयूर आदि अनेक विहंगम विराजमान हैं। उनके एक-एक पल्लवका प्रकाश सहस्रों सूर्योंको लज्जित करता है। किंतु इनका दर्शन अनन्तदुर्भावनातिमिराच्छन्न इन चर्मचक्षुओंसे नहीं हो सकता। यह तो श्रीमद्भगवत्कृपैकलभ्य दिव्यदृष्टिपर ही निर्भर है। श्रीव्रजांगनाओंको यह सौभाग्य प्राप्त था। वे उन तरुओंके वास्तविक स्वरूपको देख रही थीं। अतः उनसे अपने प्रियतम-प्राणधन-आनन्दकन्द-कृष्णचन्द्र परमानन्दको पूछती हैं।
- 'वनलतास्तरव आत्मनि विष्णुं व्यञ्जयन्त्य इव पुष्पफलाढ्याः। प्रणतभारविटपा मधुधाराः प्रेमहृष्टतनवः ससृजुः स्म॥' (श्रीधरीसम्मतो 'ववृषु' रितिपाठः) (श्रीमद्भा० १०।३५।९) [युगलगोपीगीत]। भगवान् श्रीगोपाल जब वनमें गौ चराने जाते, तब कौतुकवश वेणु बजाकर चरती हुई गौओंको बुलाते। उस समय उनके वेणुरवको सुनकर वनके लता, तरु (स्त्री-पुरुष दोनों ही) भारसे झुकी शाखाओंसे प्रणत होते, पुष्प और फलकी बहुतायतसे प्रसन्नता सूचित करते, प्रेमसे रोमांचित होते। इन लक्षणोंसे अपनेमें मानो वे श्रीविष्णुको ही सूचित करते हुए मधुधारा बरसाने लगते। ये विष्णु साक्षात्कृतिके लक्षण हैं।