भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 370, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ें३६० भक्तिसुधा गोपांगनाओंके मनमें यह भाव ही नहीं था कि हम अनुकरण कर रही हैं, वे निष्कपट, निश्छल थीं। वे सच्चे ही प्रेम-समुद्रमें गोता लगाती रहती थीं। इस समुद्रकी तरंगें संयोगमें शान्त रहती हैं, पर वियोगमें खूब उठती हैं। कभी इसमें उन्माद, विभोरताका ज्वारभाटा आता है। गोपियोंकी प्रेमसमाधि भग्न होनेपर वे श्यामसुन्दरको पुकारने लगीं जब कभी उनकी यह प्रेम-समाधि भग्न होती, तल्लीनतामें कुछ कमी आती, वियोगका ज्ञान होता, तब वे पुकार उठतीं, 'हा! प्राणधन, श्यामसुन्दर, नटनागर, कहाँ हो' और ढूँढ़ने लगतीं- गायन्त्य उच्चैरमुमेव संहता विचिक्युरुन्मत्तकवद् वनाद् वनम्। पप्रच्छुराकाशवदन्तरं बहि- र्भूतेषु सन्तं पुरुषं वनस्पतीन् ॥* (श्रीमद्भा० १०।३०।४) श्रीगोपांगनाएँ अबतक बाह्यानुसन्धानसे शून्य थीं, उन्हें होश ही नहीं कि हमारा श्रीप्राणप्यारेसे इस समय असम्प्रयोग हो रहा है। बाह्यानुसन्धान होते ही 'हा श्याम ! हा प्राण कहाँ हो!' इस चिन्तासन्तान- सन्तापसे सातिशय सन्तप्त हो उठती हैं और श्रीश्यामसुन्दर नन्ददुलारेको फिर प्राप्त करनेका प्रयत्न करती हैं-सखि, चलो ढूँढ़ें। कैसे ढूँढ़ें? तो संहत- सम्मिलित होकर ढूँढ़ें। यहाँ व्रजदेवियोंके इस चरित्रसे उपदेश मिलता है कि कोई भी काम सम्मिलित होकर ही करना चाहिये, आपसकी फूटसे काम बिगड़ जाता है। इनकी तो यह नित्यलीला है। यह तो विप्रयोगका नटन हम लोगोंके लिये है। वैसे इनमें कभी ईर्ष्या भी होती थी। इनके पृथक्-पृथक् यूथ थे। इनकी ईर्ष्या स्पृहणीय है, वह भक्तिरसामृतसिन्धुकी लहरें हैं। पारा बहुत स्वच्छ-उज्ज्वल होता है। गन्धक उसके रूपमें हो जाता है, उसमें समा जाता है। चित्त जब स्वच्छ होता है, इष्ट-प्रेय तत्त्व उसमें प्रतिफलित होता है। उस समय चित्त आनन्दस्वरूप- रसस्वरूप होता है। अमृतकी सब तरंगें अमृत, रसकी सब तरंगें रस ही होती हैं। ईर्ष्यादि सब चित्तकी ही वृत्तियाँ अथवा विकार हैं। इस प्रकार श्यामप्रेमप्रमत्त बड़भागियोंकी ईर्ष्या भी प्रेम ही है। अस्तु, अब तो ढूँढ़ना है, अतः रागद्वेषहीन होकर ढूँढ़नेमें ही सुविधा रहेगी। यही उपदेश भी मिलता है। कुंज आदिकी बातोंका अर्थात् यह अमुक कुंजकी, अमुक भावकी है आदि बातोंका विचार कभी स्वस्थतामें होगा। इस समय दृष्टिकी अपेक्षा नहीं। अब तो ईर्ष्या-द्वेष सब दूर हो गया। केवल श्रीश्यामसुन्दरके अन्वेषणकी चिन्ता है। अब तो वे परस्पर कहती हैं-सखि ! यह प्रेममूर्च्छित होगी तो अपने गुलाबजल छिड़ककर इसको होशमें लायेंगी। अतः 'संहताः' कहा। 'गायन्त्य उच्चैः' गाती हुई ढूँढ़ने चल रही हैं-यदि मनमोहन दूर भी होंगे तो सुन लेंगे। फिर हम तो उनके गुण गाती चलती हैं- जिन्हें सुनकर रह न सकेंगे, जहाँ भी होंगे, अवश्य और शीघ्र ही आकर दर्शन देंगे। इस बहाने हम अपनी आर्ति-पीड़ा भी सुना देंगी। वे हमारी पीड़ा सुनकर भी प्रसन्न होते हैं। इसके अतिरिक्त उन्हें गान लगता भी बहुत अच्छा है। हम कहर्तीं- ललन! जरा पादसंवाहन करो, वेणी गूँथ दो, तब वे 'मुझे गान सुनाओ, गूँथ दूँगा' आदि कोरी गप्प मारने लगते, काम न करते। अतः हमारे उच्च स्वरसे गाये गये गीतोंको सुनकर अवश्य ही प्राणधन घनश्याम पधारेंगे। भगवान्ने स्वयं ही कहा- नाहं वसामि वैकुण्ठे योगिनां हृदये न च। मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद ॥ (आदिपुराण १९।३५) अथवा गोपियाँ प्रेमार्तिमें विह्वलतासे बेहाल हैं। उन्मादसे गान निकल रहा है। व्रजांगनाओंको किसीने
- वे सब परस्पर मिलकर ऊँचे स्वरसे उन्हींके गुणोंका गान करने लगीं और मतवाली होकर एक वनसे दूसरे वनमें, एक झाड़ीसे दूसरी झाड़ीमें जा-जाकर श्रीकृष्णको ढूँढ़ने लगीं। परीक्षित् ! भगवान् श्रीकृष्ण कहीं दूर थोड़े ही गये थे। वे तो समस्त जड-चेतन पदार्थोंमें तथा उनके बाहर भी आकाशके समान एकरस स्थित ही हैं। वे वहीं थे, उन्हींमें थे, परंतु उन्हें न देखकर गोपियाँ वनस्पतियोंसे-पेड़-पौधोंसे उनका पता पूछने लगीं।