भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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श्रीरासपंचाध्यायी ३५९ ही-करते श्रीरसिक विहारिणी बन जाते और वह रसिक बन जाती हैं। ये दोनों प्रेमामृतसिन्धुकी दो मूर्ति बनकर प्रकट होते हैं और उसीमें ये दोनों प्रिया- प्रियतम गोता लगाते रहते हैं। उसमें न जाने कौन कब बदल जाता है, कुछ पता नहीं रहता; क्योंकि उस प्रेमसुधासिन्धुके उन्मज्जन-निमज्जनमें यह उलट-फेर दिनमें करोड़ों बार होता है। भक्तकी दृढ़ भावनासे भगवान् भक्तके अधीन हो जाते हैं इस प्रसंगमें यह भी ज्ञातव्य है कि पहले श्रीभगवान्—भजनीयतत्त्व स्वतन्त्र और साधक परतन्त्र रहता है। भक्त भगवान्‌को हर तरह रिझानेका प्रयत्न करता है; स्तुति आदि करता फिरता है। वस्तुतः स्वातन्त्र्य ही पुंस्त्व और पारतन्त्र्य ही स्त्रीत्व है— (‘स्वातन्त्र्यमेव पुंस्त्वम्, पारतन्त्र्यमेव स्त्रीत्वम्’)। इन दृष्टियोंसे यही निश्चय होता है कि जीव परवश—पराधीन और ईश स्ववश—स्वाधीन है। श्रीगोस्वामीजीने भी कहा है—‘परबस जीव स्वबस भगवंता।’ (रा०च०मा० ७।७८।७) तरंग जलके परतन्त्र रहती हैं, जीव प्रभुके परतन्त्र रहता है। इस आशयसे ईशप्राप्तिके निमित्त सखीभावकी साधना होती है। पारतन्त्र्यसे ही पूर्णता-स्वाधीनता प्राप्त होती है। भक्तकी दृढ़ साधनासे फिर धीरे-धीरे श्रीभगवान् परतन्त्र—भक्तके अधीन होने लगते हैं और भक्त स्वतन्त्र, दुरूह वेदान्त और कोमल भक्तिरसमें समान भावसे वर्तमान। श्रीस्वामी मधुसूदन सरस्वतीके श्रीकृष्ण- तत्त्वके साक्षात्कारके लिये यहीं श्रीवृन्दावनमें चार बार श्रीगोपालसहस्रनामका पुरश्चरण किया, पर कुछ भी सिद्धि-सूत्र न मिलनेपर अन्तमें इन्होंने काशीमें श्रीकालभैरवका अनुष्ठान किया। उससे उन्हें पूर्वसंचित अपने पापोंका—प्रभुदर्शन-प्रतिबन्धका ज्ञान हुआ, हताशा भाव मिटा और श्रीकालभैरवके प्रोत्साहनसे फिर श्रीवृन्दावनमें आकर पाँचवीं बार श्रीगोपाल- सहस्रनामका पुरश्चरण उन्होंने आरम्भ किया। उसमें पूर्वपरिश्रमकी सब कसर निकल गयी। ‘क्लेशः फलेन हि पुनर्नवतां विधत्ते।’ रूप, लावण्य, माधुर्य और सुन्दरताकी सीमा श्रीमुरलीमनोहर मनमोहन उनके समक्ष प्रकट हो गये। अब श्रीस्वामीजीको मानकी सूझी, श्रीश्यामसुन्दर उनके सामने जाते हैं और वे मुँह फिराते हैं। अब भक्त स्वतन्त्र, भगवान् परतन्त्र हैं। ऐसे ही अवसरके लिये श्रीभगवान्‌ने श्रीमुखसे कहा है—‘अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज।’ मैं भक्तोंके अधीन हूँ (श्रीमद्भा० ९।४।६३)। साधवो हृदयं मह्यं साधूनां हृदयं त्वहम्। मदन्यत् ते न जानन्ति नाहं तेभ्यो मनागपि॥ (श्रीमद्भा० ९।४।६८) साधुओंका—भक्तोंका हृदय मेरा विहार-स्थल है और मेरा हृदय साधुओंका निवासस्थान। मेरे सिवा वे और कुछ नहीं जानते। ‘वशीकुर्वन्ति मां भक्त्या सत्स्त्रियः सत्पतिं यथा॥’ (श्रीमद्भा० ९।४।६६)। जैसे साध्वीसती पतिव्रता स्त्री अपने सत्पतिको वशमें कर रखती है, वैसे ही स्वाधीनभर्तृकाकी तरह मुझे सद्‌भक्त वशमें कर लेता है। तभी तो उस पूर्णतमको हाथमें माखन रख- रखकर, ताली दे-देकर गोपियोंने नचाया। मानो वे उनकी काठकी पूतरी थे—‘तद्वशो दारुयन्त्रवत्’ (श्रीमद्भा० १०।११।७) इसके अनुसार श्रीकृष्णमें गोपांगनात्व हुआ। यों ‘प्रियाः प्रियस्य प्रतिरूढमूर्तयः’ से विपरीत रतिभाव बना। श्रीकृष्ण गोपांगना हो गये और गोपांगनाएँ श्रीकृष्ण हो गयीं। इस प्रकार गोपांगनाएँ श्रीकृष्ण बनकर कहती हैं—‘असावहं त्विति’ (श्रीमद्भा० १०।३०।३) यह केवल भावना ही नहीं, वस्तुस्थिति ही ऐसी है। पहले तो प्रेमोद्रेकवश श्रीनन्दनन्दन उन व्रजांगनाओंके रोम-रोममें थे ही, दूसरे प्रतिरूढ़भावसे भी वे उनमें स्थित हुए एवं तीसरे मन, बुद्धि, चित्त, अहंकारमें विभ्रमादिसे भी वे प्रविष्ट हुए। इसके अतिरिक्त ‘कृष्ण- विहारविभ्रमाः’ (श्रीमद्भा० १०।३०।३)—का यह भी समास होता है—‘कृष्णविहारस्य विभ्रमो यासु।’ कृष्णविहारका विभ्रम जिनमें हुआ। वे गोपियाँ ‘मैं ही कृष्ण हूँ’, ऐसा परस्पर कहने लगीं। अर्थात् इन गोपांगनाओंके विहारमें कृष्णलीलाका विभ्रम हो गया। अतएव यह लौकिक लीला थी। वस्तुतः