भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५८ भक्तिसुधा है, फिर हारकी तो बात ही क्या? अतः 'विहार' ('विगतो हारः') कहा। ऐसे विलासका वे अनुभव करने लगीं। द्वारकाकी श्रीकृष्णकी पटरानियोंका भी एक ऐसा ही प्रसंग है। एक बार श्रीकृष्ण इन्द्रप्रस्थके प्रवाससे आये तो उनकी महिषियाँ उनसे मिलनेके लिये—' "उत्तस्थूराश्रात् सहसासनाशायात्' (श्रीमद्भा० १।११।३१) आसनसे उठीं और आशयसे भी उठीं। देशव्यवधानको दूर करनेके लिये आसनसे उठीं। पर उन्हें इतनेसे सन्तोष नहीं हुआ। उन्होंने सोचा—क्या हम उन प्राणेश्वरसे पाँच-पाँच कोषके कंचुकको पहने हुए मिलें, जहाँ एक कंचुकमात्र भी बाधक होता है, अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय कोषके कंचुकोंको पहनकर मिलनेमें स्वाद ही कुछ नहीं। इन प्राणधनसे तो निरावरण होकर सम्मिलनमें आनन्द है। अतः आशयसे उठकर मिलीं अर्थात् आशयोपलक्षित पंचकोषके आवरणको हटाकर श्रीकृष्ण परमात्मासे मिलीं। परंतु श्रीव्रजदेवियोंके यहाँ इन कोषोंकी चर्चा नहीं, वे तो नवघनश्याम मुरलीमनोहर मनमोहनकी निरन्तर चिन्तासे तदात्मिका-रसात्मिका हो रही हैं और श्रीवृषभानुनन्दिनी उस रसकी मधुरिमास्थानीया हैं। इस प्रसंगपर श्रीनन्ददासजीने कहा है—'तरंगन वारि ज्यों।' श्रीउद्धव भगवान् कृष्णके सन्देशको गोकुलमें व्रजबालाओंके निकट पहुँचाकर जब वापस आये, तब श्यामके विप्रयोगमें व्याकुल उन गोपदेवियोंका उन्होंने श्रीकृष्णके सामने दयनीय चित्र खींचा और कहा—वे आपके बिना मरी जा रही हैं और आप यहाँ मौज ले रहे हो। उत्तरमें श्रीभगवान्ने सहास स्वरमें कहा—उद्धव ! व्रजमें इतने दिन रहकर उन व्रजांगनाओंसे क्या सीख आये हो? और तब उन्होंने दिखाया 'तरंग ज्यों।' श्रीगोपांगनाओंके रोम-रोममें, प्राण-प्राणमें श्यामसुन्दर विराजमान हैं। श्रीउद्धव यह देखकर और चकित रह गये। ऐसी स्थितिमें गोपियों और श्रीकृष्णमें छिपाव ही क्या है? लोग व्यर्थ शंका करते हैं—श्रीकृष्णने गोपांगनाओंको नग्न कराया, हाथ बँधाकर बुलाया, चीरहरण-लीला की। पर क्या वे नग्न होकर जलमें नहीं नहायी थीं? क्या वे कृष्ण परमात्मा जलसे भी बहिरंग हैं? वस्तु- स्थिति तो यह है कि— सर्वेषामपि वस्तूनां भावार्थो भवति स्थितः। तस्यापि भगवान् कृष्णः किमतद् वस्तु रूप्यताम्॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।५७) सभी वस्तुओंका भावार्थ परिणामीमें स्थित होता है अर्थात् सभी वस्तुएँ अपने कारणरूपमें स्थित होती हैं। उस कारणके भी कारण भगवान् कृष्ण हैं। उनसे भिन्न और है ही क्या वस्तु, जिसका निरूपण किया जाय? अन्तमें सतत्त्व श्रीकृष्ण ही ठहरते हैं। इतना भीतरी श्रीकृष्णतत्त्व है। उसके समक्ष क्या कोई वस्त्रपरिधान करेगा, हाँ तो प्रकृतमें—जलमें तरंगकी तरह गोपांगना हैं। वे एक तरहसे जल ही हैं, परंतु जलगता मधुरिमाकी अपेक्षा तरंग बहिरंग हैं। मधुरिमा अन्तरंग है, वह श्रीराधा हैं। अस्तु, इस प्रकार 'कृष्णविहार-विभ्रमा' व्रजांगनाएँ आपसमें एक-दूसरीसे कहती हैं—हे अबलाओ, तुम कहाँ श्यामसुन्दरको ढूँढ़ती-फिरती हो, वह अशेष विहार नागर कृष्ण तो हम ही हैं, लो हमें ग्रहण करो। इस प्रकार वे मनमोहनस्वरूप ही हो रही हैं। बाहर, भीतर, मध्यमें उनके श्याम-ही-श्याम भरपूर हैं। वही आत्मा, मन, बुद्धि, प्राण सब कुछ हो गये हैं। यों वे 'तदात्मिकाः' ('स एव आत्मा प्राणादिर्यासान्ताः') हो गयी हैं। प्रकृत श्लोकके 'प्रियाः प्रियस्य प्रतिरूढमूर्तयः।' अंशपर पहले कुछ कहा गया है। अब एक भाव और कहा जाता है—'प्रियाः प्रियस्य प्रतिरूढमूर्तयः।' विष्णुदैवतसमें 'क्वचित् स्त्रियः पुरुषायिता भवन्ति' से विपरीत रतिका एक पक्ष है अर्थात् शृंगारोद्रेकमें नायक नायिका बन जाता है और नायिका नायक बन जाती है। यहाँ 'गति, स्मित...' आदि लीला में 'स्वयं स्त्रियः सत्यः प्रतिरूढमूर्तयः' हुए। श्रीव्रजांगना श्यामसुन्दर बन गयीं और व्रजचन्द्र श्रीकृष्णचन्द्र व्रजांगना बन गये। श्रीराधा श्याम हो गयीं और श्रीश्याम राधा हो गये। प्राकृत-लौकिक शृंगारमें वस्तुतः नायिका नायक नहीं होती और नायक नायिका नहीं होता। पर यहाँ तो प्रभु साक्षात् काम और सत्यसंकल्प हैं। एक-दूसरेका चिन्तन करते-