भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 367

श्रीरासपंचाध्यायी ३५७ हे प्रिय ! आपके चरण अत्यन्त सुकोमल हैं, उनमें कमलकी पांखुरीके भी गड़ जानेका भय रहता है। आपके उन चरणोंको हृदयके तापको दूर करनेके लिये हम अपने स्तनोंमें—हृदयमें धारण करती हैं, पर नाथ ! हम डरती हैं—आपके कमलकोमल पादोंको कर्कश-कठोर स्तनोंमें कैसे धरें, कहीं वे उनमें गड़ न जायें। हे प्राणजीवन ! आप उन्हीं कोमल चरणोंसे कण्टकाकीर्ण अरण्योंमें घूमते हो, इससे हमें और भी व्यथा होती है। हमारे तो प्राणोंके भी प्राण, जीवन आप हो। 'आपको यों घूमते देखकर हमारी बुद्धि चकरा जाती है, हम क्या करें?' कितना ध्यान है, कितनी भावुकता है; क्या यह प्राकृत विषयलोलुप कामिनियोंको होगी ? फिर आध्यात्मिकादि ताप भी तभी दूर होंगे, जब प्रभु श्रीहरिके चरण हृदयमें निहित होंगे। बात यह है कि लौकिक कामुक-कामिनी आदिमें स्वसुखसुखित्वका भाव होता है, वे सब अपने सुखके लिये प्रेम करते हैं। लोकमें पिता आदि अपने आनन्दके लिये बालकके कोमल कपोलका चुम्बन करते हैं, उसे उनकी दाढ़ी चुभती है, वह रोता है, पर इसकी परवाह किसे रहती है? वहाँ तो चुम्बनकी बौछार (परम्परा) लग जाती है। इसलिये कहा है—'....आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति....' (बृहदारण्यक० २।४।५) किंतु श्रीव्रजांगनाओंके विषयमें यह बात नहीं है, यहाँ तो तत्सुखसुखित्वका भाव है। यह श्लोक लज्जाका स्थान नहीं, जैसा कि अनभिज्ञ कह बैठते हैं। अपितु श्रीव्रजदेवियोंके विशुद्ध, गाढ़ प्रेमसे आक्षिप्त हृदयका दर्पण है, उच्च भावुकताका केन्द्र है। वे कहती हैं—क्या करें, आपके चरण हृदयोंमें धरे बिना ताप दूर नहीं होगा—यह सभी शास्त्रोंका सिद्धान्त है, पर डरती हैं हम, यह स्तन (हृदय) कठिन है, कहीं चुभ न जाय, पर आप इनसे वनमें घूमते हो, क्या इनमें तृण, गुल्म, पत्र आदि न गड़ते होंगे ? अवश्य गड़ते होंगे। फिर भी हाय ! हम जीवित हैं, परंतु हमारा कुछ वश नहीं चलता, क्योंकि हमारे प्राण विधाताने आपके हाथमें दे दिये हैं, नहीं तो ये कबके निकल गये होते। अतः 'तस्मिन्नेव आत्मा प्राणो यासान्ताः तदात्मिकाः' यह ठीक कहा गया। जबतक श्रीश्यामसुन्दर प्राणेश्वर इनके अन्तरमें विराजमान हैं, तबतक ये मर सकतीं नहीं, तीव्र ताप सहकर भी जीवित रहेंगी, डोलती-फिरतीं काम-काज करती रहेंगी। इसीसे 'रमापतेरपि आक्षिप्तं चित्तं याभिस्ताः' यह संगत है। जो श्यामसुन्दर परमसमाहितचेता योगीन्द्र मुनीन्द्रोंके चित्तको भी आकृष्ट कर लेते हैं, उनके चित्तको गोपवधूटियोंने आकृष्ट कर लिया। अतएव 'रमापतेरपि प्रकृष्टो मदो यासाम्' यह भी भाव है अर्थात् जिनका मद रमापतिसे भी बढ़कर है। तभी तो अपनी 'गति' आदिसे आप्तकाम, पूर्णकामको भी खूब मतवाला बना दिया। अथवा अपने चित्तपर आक्षेप करती हैं—'अरे चित्त ! तू शरीरमें बैठा क्या करता है ? जा, प्राणधनका अन्वेषण कर' इस तरह ('आक्षिप्तं चित्तं याभिस्ताः') चित्तको जिन्होंने बाहर निकाल दिया, वे गोपांगनाएँ श्रीश्यामसुन्दरको ढूँढ़ती हुई उनकी लीलाका अनुकरण करती हैं। उसमें ऐसी विभोर, तल्लीन हो गयी हैं कि श्रीश्यामके गति, स्मित, प्रेक्षण, भाषण आदि सबका अनुकरण करती हैं। यद्यपि अनुकर्ता नट आदिको अनुकरणीय और अनुकर्तामें भेद बना रहता है, पर इनको तो यह भेद ज्ञात ही नहीं रह गया। इनके मन, बुद्धि आदि सभी सर्वथा श्यामसुन्दरके ही सदृश हो गये। प्रेमोद्रेकमें व्यवधान सह्य नहीं होता उस समय धर्मी (श्रीकृष्ण) और धर्म (जैसे अग्निकी उष्णता आदि, वैसे श्रीकृष्णके धर्म) दोनोंका आविर्भाव हुआ। फिर विहारविभ्रमका उदय हुआ। ('विहारः—विगतो हारो यस्माद् एतादृशो विभ्रमः') अर्थात् जिस विभ्रम या विलासमें हाररहित होना पड़ता है, उस विहारविभ्रमका उदय हुआ। जिस समय व्रजांगनाएँ अपने प्रियतमसे मिलने लगती हैं, उस समय वे देश, काल और वस्तुका व्यवधान भी नहीं रहने देना चाहतीं। प्रेमोद्रेकमें व्यवधान सह्य नहीं होता। हार, कंचुकी आदि निकाल देती हैं। आनन्दोद्रेकमें रोमांचतक—जो प्रियतमालिंगनसमुत्थ है—बाधक होता