भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
३६० भक्तिसुधा गोपांगनाओंके मनमें यह भाव ही नहीं था कि हम अनुकरण कर रही हैं, वे निष्कपट, निश्छल थीं। वे सच्चे ही प्रेम-समुद्रमें गोता लगाती रहती थीं। इस समुद्रकी तरंगें संयोगमें शान्त रहती हैं, पर वियोगमें खूब उठती हैं। कभी इसमें उन्माद, विभोरताका ज्वारभाटा आता है। गोपियोंकी प्रेमसमाधि भग्न होनेपर वे श्यामसुन्दरको पुकारने लगीं जब कभी उनकी यह प्रेम-समाधि भग्न होती, तल्लीनतामें कुछ कमी आती, वियोगका ज्ञान होता, तब वे पुकार उठतीं, 'हा! प्राणधन, श्यामसुन्दर, नटनागर, कहाँ हो' और ढूँढ़ने लगतीं- गायन्त्य उच्चैरमुमेव संहता विचिक्युरुन्मत्तकवद् वनाद् वनम्। पप्रच्छुराकाशवदन्तरं बहि- र्भूतेषु सन्तं पुरुषं वनस्पतीन् ॥* (श्रीमद्भा० १०।३०।४) श्रीगोपांगनाएँ अबतक बाह्यानुसन्धानसे शून्य थीं, उन्हें होश ही नहीं कि हमारा श्रीप्राणप्यारेसे इस समय असम्प्रयोग हो रहा है। बाह्यानुसन्धान होते ही 'हा श्याम ! हा प्राण कहाँ हो!' इस चिन्तासन्तान- सन्तापसे सातिशय सन्तप्त हो उठती हैं और श्रीश्यामसुन्दर नन्ददुलारेको फिर प्राप्त करनेका प्रयत्न करती हैं-सखि, चलो ढूँढ़ें। कैसे ढूँढ़ें? तो संहत- सम्मिलित होकर ढूँढ़ें। यहाँ व्रजदेवियोंके इस चरित्रसे उपदेश मिलता है कि कोई भी काम सम्मिलित होकर ही करना चाहिये, आपसकी फूटसे काम बिगड़ जाता है। इनकी तो यह नित्यलीला है। यह तो विप्रयोगका नटन हम लोगोंके लिये है। वैसे इनमें कभी ईर्ष्या भी होती थी। इनके पृथक्-पृथक् यूथ थे। इनकी ईर्ष्या स्पृहणीय है, वह भक्तिरसामृतसिन्धुकी लहरें हैं। पारा बहुत स्वच्छ-उज्ज्वल होता है। गन्धक उसके रूपमें हो जाता है, उसमें समा जाता है। चित्त जब स्वच्छ होता है, इष्ट-प्रेय तत्त्व उसमें प्रतिफलित होता है। उस समय चित्त आनन्दस्वरूप- रसस्वरूप होता है। अमृतकी सब तरंगें अमृत, रसकी सब तरंगें रस ही होती हैं। ईर्ष्यादि सब चित्तकी ही वृत्तियाँ अथवा विकार हैं। इस प्रकार श्यामप्रेमप्रमत्त बड़भागियोंकी ईर्ष्या भी प्रेम ही है। अस्तु, अब तो ढूँढ़ना है, अतः रागद्वेषहीन होकर ढूँढ़नेमें ही सुविधा रहेगी। यही उपदेश भी मिलता है। कुंज आदिकी बातोंका अर्थात् यह अमुक कुंजकी, अमुक भावकी है आदि बातोंका विचार कभी स्वस्थतामें होगा। इस समय दृष्टिकी अपेक्षा नहीं। अब तो ईर्ष्या-द्वेष सब दूर हो गया। केवल श्रीश्यामसुन्दरके अन्वेषणकी चिन्ता है। अब तो वे परस्पर कहती हैं-सखि ! यह प्रेममूर्च्छित होगी तो अपने गुलाबजल छिड़ककर इसको होशमें लायेंगी। अतः 'संहताः' कहा। 'गायन्त्य उच्चैः' गाती हुई ढूँढ़ने चल रही हैं-यदि मनमोहन दूर भी होंगे तो सुन लेंगे। फिर हम तो उनके गुण गाती चलती हैं- जिन्हें सुनकर रह न सकेंगे, जहाँ भी होंगे, अवश्य और शीघ्र ही आकर दर्शन देंगे। इस बहाने हम अपनी आर्ति-पीड़ा भी सुना देंगी। वे हमारी पीड़ा सुनकर भी प्रसन्न होते हैं। इसके अतिरिक्त उन्हें गान लगता भी बहुत अच्छा है। हम कहर्तीं- ललन! जरा पादसंवाहन करो, वेणी गूँथ दो, तब वे 'मुझे गान सुनाओ, गूँथ दूँगा' आदि कोरी गप्प मारने लगते, काम न करते। अतः हमारे उच्च स्वरसे गाये गये गीतोंको सुनकर अवश्य ही प्राणधन घनश्याम पधारेंगे। भगवान्ने स्वयं ही कहा- नाहं वसामि वैकुण्ठे योगिनां हृदये न च। मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद ॥ (आदिपुराण १९।३५) अथवा गोपियाँ प्रेमार्तिमें विह्वलतासे बेहाल हैं। उन्मादसे गान निकल रहा है। व्रजांगनाओंको किसीने
- वे सब परस्पर मिलकर ऊँचे स्वरसे उन्हींके गुणोंका गान करने लगीं और मतवाली होकर एक वनसे दूसरे वनमें, एक झाड़ीसे दूसरी झाड़ीमें जा-जाकर श्रीकृष्णको ढूँढ़ने लगीं। परीक्षित् ! भगवान् श्रीकृष्ण कहीं दूर थोड़े ही गये थे। वे तो समस्त जड-चेतन पदार्थोंमें तथा उनके बाहर भी आकाशके समान एकरस स्थित ही हैं। वे वहीं थे, उन्हींमें थे, परंतु उन्हें न देखकर गोपियाँ वनस्पतियोंसे-पेड़-पौधोंसे उनका पता पूछने लगीं।
श्रीरासपञ्चाध्यायी ३६१
समझाया—तुम क्यों उन्हींको गाती हो, जो त्यागकर चले गये। इसपर वे कहती हैं—'हाँ, हम तो उन्हींको गायेंगी, उन्हींको रिझायेंगी।' वे यह निश्चय लेकर बैठी हैं—'चाहे वे शतकोटि-अनन्तकोटि कष्ट दें, पर हम तो उन्हें ही, बाँकेबिहारीको ही गायेंगी। इनका यह 'अटल' नियम है। कितनी भी विपत्ति आनेपर, ये अन्यको न गायेंगी। वे त्रिभंग होनेपर भी ललित श्याम, चाहे कितने भी विपरीत आचरण करें, पर इनका प्रेम-प्राखर्य बढ़ता ही जायेगा। गायन उनका स्वभाव हो गया, अतः गाती ही हैं। गोपाङ्गनाओंका प्रेमविह्वल हो वृक्षों- वनस्पतियोंसे श्यामसुन्दरके विषयमें पूछना तथा उत्तर न मिलनेपर दोषानुसन्धान करना 'विचिक्युरुन्मत्तकवद् वनाद् वनम्' उन्मत्तकी तरह, जहाँ-जहाँ सम्भावना है, ढूँढ़ती हैं। एकसे एकको, निरालस होकर, दूसरे, तीसरे, चौथे, पाँचवें वनोंको ढूँढ़ डालती हैं। विश्राम ही नहीं लेतीं। जबतक प्यारे मनमोहन न मिल जायें, चैन ही नहीं। इससे भी उपदेश है—'ढूँढ़ते ही रहो।' जबतक अभिलषित कार्य सिद्ध न हो ले, विश्राम ही कैसा? फिर वे पूछती हैं—वनस्पतियोंसे। उन्हें दृढ़ आशा है कि इनसे प्राणप्यारेका पता मिलेगा ही। इससे यह भी सिद्ध हुआ कि—प्रेमी वृक्षोंतकसे पूछ सकता है; चेतनकी तो कथा ही क्या? अमुकसे पूछो, अमुकसे नहीं—यह तो उनके यहाँ विचार ही नहीं—अतएव साधारण्येन बहुवचन है—'वनस्पतीन्'। श्रीमद्वल्लभा- चार्यजीका इसपर एक भाव है—वृन्दावनके वनस्पति वैष्णव हैं, 'मूढा अपि वैष्णवाः प्रष्टव्याः'। अनुरागी चाहे विद्वान् न हों, पर वे प्रष्टव्य हैं। अतः वृक्षोंसे पूछती हैं अथवा व्रजांगनाओंको प्रेमोन्मादसे दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई, उन्हें वृक्षोंका वास्तविक स्वरूप ज्ञात हुआ। व्रजके वन, लता, तरु आदि अपने एक-एक कणसे श्रीश्यामसुन्दरके स्वरूपको प्रकट करते हैं*— अतएव भावुक व्रजधूलिको भालपर धरते हैं। एक भावुकका कहना है— सन्त्ववतारा बहवः पुष्करनाभस्य सर्वतोभद्राः। कृष्णादन्यः को वा लतास्वपि प्रेमदो भवति॥ अर्थात् भगवान् विष्णुके बहुत अवतार हुए और उत्तम-उत्तम हुए हों, परंतु श्रीकृष्णअवतारके अतिरिक्त और कौन अवतार हुआ, जिसने लताओंमें भी, जड़ोंमें भी प्रेमका गाढ संचार किया हो? 'यत्पादपांसुर्बहुजन्मकृच्छ्रतो धृतात्मभीर्योगिभिरप्यलभ्यः।' (श्रीमद्भा० १०।१२।१२) जिन श्रीभगवान्की पादधूलि बहुत जन्मोंमें भी योगीन्द्र-मुनीन्द्रोंतकको भी दुर्लभ है, उन प्रभुने अपने संचारसे व्रज-वृन्दावन-लता-तरुको अनन्त महत्त्व दिया है। श्रीवृन्दावनके वृक्षोंके प्रकाशकी एक किरण भी बिना प्रभुपादारविन्दकी अनुकम्पाके जन्म-जन्मान्तर, युगयुगान्तर और कल्पकल्पान्तरमें भी द्रष्टुमशक्य है। 'आनन्दवृन्दावनचम्पू' में कहा है—श्रीवृन्दावनधामके एक-एक वृक्ष, इन्द्रनील, पद्मराग और हरितमणि आदिके सदृश चमत्कृत, देदीप्यमान हैं, इनकी शाखा, उपशाखा, पत्र, पुष्प, फल भी वैसे ही सचिक्कण, प्रकाशमान हैं। उनपर शुक, पिक, कपोत, तित्तिर, मयूर आदि अनेक विहंगम विराजमान हैं। उनके एक-एक पल्लवका प्रकाश सहस्रों सूर्योंको लज्जित करता है। किंतु इनका दर्शन अनन्तदुर्भावनातिमिराच्छन्न इन चर्मचक्षुओंसे नहीं हो सकता। यह तो श्रीमद्भगवत्कृपैकलभ्य दिव्यदृष्टिपर ही निर्भर है। श्रीव्रजांगनाओंको यह सौभाग्य प्राप्त था। वे उन तरुओंके वास्तविक स्वरूपको देख रही थीं। अतः उनसे अपने प्रियतम-प्राणधन-आनन्दकन्द-कृष्णचन्द्र परमानन्दको पूछती हैं।
- 'वनलतास्तरव आत्मनि विष्णुं व्यञ्जयन्त्य इव पुष्पफलाढ्याः। प्रणतभारविटपा मधुधाराः प्रेमहृष्टतनवः ससृजुः स्म॥' (श्रीधरीसम्मतो 'ववृषु' रितिपाठः) (श्रीमद्भा० १०।३५।९) [युगलगोपीगीत]। भगवान् श्रीगोपाल जब वनमें गौ चराने जाते, तब कौतुकवश वेणु बजाकर चरती हुई गौओंको बुलाते। उस समय उनके वेणुरवको सुनकर वनके लता, तरु (स्त्री-पुरुष दोनों ही) भारसे झुकी शाखाओंसे प्रणत होते, पुष्प और फलकी बहुतायतसे प्रसन्नता सूचित करते, प्रेमसे रोमांचित होते। इन लक्षणोंसे अपनेमें मानो वे श्रीविष्णुको ही सूचित करते हुए मधुधारा बरसाने लगते। ये विष्णु साक्षात्कृतिके लक्षण हैं।
३६२ भक्तिसुधा एक भाव और—प्रसिद्ध कवि श्रीकालिदासके खण्डकाव्य 'मेघदूत' में यक्षने मेघको दूत बनाकर अपनी प्रियाके पास भेजा है। जहाँ प्राकृत स्थलमें ऐसी स्थिति है कि चेतन-अचेतनका भेद मिट जाता है, तब इनकी तो बात ही निराली है। वे तो श्यामसुन्दरके लोकोत्तर अनुरागसागरमें सदा इतनी मग्न रहती हैं कि किसी भी तरहकी सुधबुध ही नहीं रहती। ऐसी स्थितिमें चेतन-अचेतनको भूलकर वे भी वृक्षोंसे प्रश्न करें तो कोई असंगति नहीं। व्रजांगना वृक्षोंसे पूछते समय पहले उनका गुणगान करती हैं, प्रार्थना करती हैं; फिर उनसे अपने प्रियतमका पता न पाकर उनमें दोष बताती हुई आगे चल देती हैं। वे सबसे पूछती जाती हैं—न जाने किससे पता लग जाये। अपनी कार्यसिद्धिके लिये मनुष्य सब कुछ करता है। पुत्रके लिये लोग नौ मन काँकर चालते हैं। कितने ही देवी-देवताओंको ध्याते- पूजते हैं। गरज सब कुछ करा देती है। गरजपर बड़े- बड़े नास्तिक साधुओंकी खुशामद करते हैं, उनसे सट्टा पूछते हैं। तब प्रियतम प्राणधनकी प्राप्तिके लिये क्या-क्या न किया जाये, किस-किससे न पूछा जाये? अतः व्रजांगना सबसे पूछती फिरती हैं, गाती फिरती हैं। यही उपदेश है—रागद्वेष छोड़कर तल्लीन होकर अभिलषित वस्तुका पता लो, अवश्य सफलता मिलेगी। 'गायन्त्युच्चैः' यों श्रीगोपांगनागण उच्च स्वरसे भगवान्को गाती हुई उनके अन्वेषणमें संलग्न हैं। इसमें गोपियोंका एक भाव यह भी है कि—'जैसे श्रीमुरलीमनोहरके श्रीविमुखसे विनिःसृत वेणुगीत- निनादको सुनते ही हम उनके सन्निधानमें अविलम्ब आ पहुँचीं, वैसे ही वे भी शीघ्र हमलोगोंके पास पधारें। अतः उच्चैः उनके गुणोंको गाती हुई ढूँढ़ती हैं। अपने गुणोंको—प्रशंसाको सुनकर शीघ्र आयेंगे, यह भी व्रजदेवियोंका तात्पर्य है। उपदेश तो है ही कि श्रीभगवान्की प्राप्तिका असाधारण कारण उनका गुणगान ही है, इन गोपदेवियोंके लिये उन्मत्तकवत् कहा गया है। उन्मत्तकमें 'कन्' प्रत्यय अधिकतामें है। इससे यह बतलाया गया कि—व्रजांगना मतवालोंकी तरह देह-गेहके नेह और सम्बन्धसे तथा वस्त्रानुसन्धान आदिसे शून्य हैं। उन्हें कुछ पता नहीं कि वे कहाँ क्या कर रही हैं अर्थात् अधिकाधिक उन्मादिनी गोपी उच्चस्वरसे प्राणधन घनश्यामको गाती हैं। यद्यपि इस समय श्रीभगवान् इन्हें त्यागकर दुःसह विप्रयोग दुःख दे रहे हैं। श्रीव्रजदेवियोंके श्यामविरहजन्य तीव्रातितीव्र सन्तापको देखकर लोक निरालोक हो गये, दिशा- विदिशा सन्तप्त हो उठीं, पाषाण भी द्रुत हो चले, पर वे व्रजचन्द्र तनिक नहीं पिघले, बड़े निष्ठुर— महाकठोर बने हुए हैं। फिर भी व्रजांगना अपने कार्यसे विरत नहीं हैं—वे उच्च स्वरसे उन्हें ही गा रही हैं। वे चाहे रीझें, चाहे खीझें, वे तो उन्हें ही— एकमात्र उन्हें ही गायेंगी। वे तो निश्चय लेकर बैठी हैं—'असुन्दरः सुन्दरशेखरो वा........' वे चाहे करुणार्णव हों चाहे द्वेषमहावाडवानल, ये तो भजेंगी उन्हें ही। गायेंगी उन्हें ही। अब क्या दूसरोंको गायेंगी ? 'उच्चैरमुमेव संहताः', 'एव' पद आया है। इसका भी विलक्षण स्वारस्य है। एक गोपी कहती है—'सखि, जीवितं पणीकृतं मया....' मैंने तो अब जीवनकी बाजी लगा दी है। वाह! कोई धनकी बाजी लगाता है, कोई जनकी बाजी लगाता है, कोई 'सट्टे' में सर्वस्व स्वाहा कर देता है, पर यह सब अपने जीवनकी रक्षाके लिये करते हैं। किंतु यहाँ तो जीवनकी भी कोई परवाह नहीं। ये जीवनका 'जुआ' खेलती हैं। अब इन्हें माता, पिता, पति, गुरुजन किसीका क्या डर! इससे अधिक कष्ट ही क्या होगा? इन्होंने तो दृढ़ निर्णय कर लिया—'माधवो यदि विहन्ति हन्यताम्, बान्धवो यदि जहाति त्यज्यताम्। साधवो यदि हसन्ति हस्यताम्, माधवः स्वयमूरीकृतो मया।' यदि वे श्रीश्यामसुन्दर प्राणधन वियोगदुःख देखकर तरसा-तरसाकर हमारा वध करते हैं तो बड़े शौकसे करें, हम इसके लिये तैयार हैं। यदि बान्धव- कुटुम्बी हमें छोड़ते हैं तो वे भी छोड़ दें और हमारी इस हालतपर साधुजन हँसते हैं तो भले ही हँसें, खूब हँसें, पर हमने तो उन माधव मुरली-मनोहरको सर्वस्व
समर्पणद्वारा स्वयं स्वीकृत कर लिया, स्वयं वर लिया। यह है व्रजांगनाओंका अडिग-अडोल निश्चय। इस स्थितिमें सब तो आनन्द ले रहे हैं, पर वे व्रजबालाएँ दुःसह विरह वेदनाको सहती प्राणप्यारेको ढूँढ़ रही हैं। यद्यपि वे यशोदानन्दन आनन्दकन्द और दुःखनिकन्दन हैं, पर इन्हें विरहवाडवाग्नियोंमें जलाते हैं, झुलसाते हैं तथापि ये तो उन्हें ही (एव) गाती हैं और उच्चस्वर से गाती हैं। इसका नाम है दृढ़ प्रेम। इसके अतिरिक्त 'संहतः' इकट्ठी होकर ढूँढ़ रही हैं। श्रीमन्मोहनमें रसात्मकता है, तब भी वे नीरसोंका- सा व्यवहार कर रहे हैं, नहीं मिल रहे हैं। परंतु व्रजांगना बड़े सौहार्दसे एक वनसे दूसरे वनको, एक कुंजसे दूसरे कुंजको अन्वेषण कर रही हैं। वे इस कार्यमें बहुत व्यस्त हैं। उनके केशपाश खुल गये हैं, बाल बिखर गये हैं, वस्त्र असंयत हो गये हैं। उनकी इस दशासे प्रतीत होता है, वे निरालस होकर अन्वेषण कर रही हैं और मानो विश्रामका तो नाम ही नहीं जानतीं। ये सब भाव भी 'उन्मत्तक' पदद्योत्य हैं। इस तरह व्रजदेवियाँ अपने प्राणधन श्यामसुन्दरको खोज रही हैं। कैसे हैं और कौन हैं, वे उनके प्राणजीवन, जिनका वे गवेषण कर रही हैं? तब कहा— 'आकाशावदनन्तरं बहिर्भूतेषु सन्तं पुरुषम्' उनके अन्वेषणका विषय वह पुरुषोत्तम है, जो प्राणीमात्रमें, वस्तुमात्रमें आकाशकी तरह बाहर-भीतर सर्वत्र विराजमान है। वह तो आकाशसे भी अन्तरतम तत्त्व है। अहन्तत्त्व, अव्यक्ततत्त्व, महत्तत्त्वसे भी परेकी वस्तु है। जब उसीकी सत्तासे सत्तावान् आकाश भी सर्वत्र भरपूर है, तब क्या वह सर्वत्र भरपूर नहीं? अतएव कहा भी— सर्वेषामपि वस्तूनां भावार्थो भवति स्थितः। तस्यापि भगवान् कृष्णः किमतद् वस्तु रूप्यताम्॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।५७) कारणमेव कार्यकारेण परिणमते॥ कारण ही कार्यके आकारमें परिणत होता है, मिट्टी ही घट बन जाती है और कार्यका पर्यवसान कारणमें होता है, घट फूटकर मिट्टी हो जाता है। श्रीशुकदेवजी कहते हैं—हम किसका निर्णय करें, वह तो एक ही तत्त्व सर्वत्र भरपूर है। श्रीमद्वल्लभा- चार्यजीने कहा—श्रीशुकाचार्यजी परमसर्वज्ञ थे, वे 'आनन्दमात्रकरपादमुखोदरादि' तत्त्वको सर्वत्र प्रत्यक्ष अनुभूत करते थे। तभी कहा—'“...भूतेषु सन्तम्”।' अस्तु। तात्पर्य यही कि कार्योंमें कारण सर्वत्र व्यापक रहता है। इस दृष्टिसे जब श्रीकृष्णतत्त्व व्यापक तत्त्व ठहरता है, तब वह मधुरमूर्ति देह-गेह सर्वत्र विराजमान है, अणु-अणु और परमाणु-परमाणुमें है। केवल कुछ आवरण है, जिससे वह सबको नहीं दिखायी देता। जैसा कि—'मायाजवनिकाछन्न...' और 'नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः।' (गीता ७।२५) आदिसे यत्र-तत्र बतलाया गया है। राजा परीक्षित्के नामकरण बीजनिर्देश-प्रसंगमें कहा है— ' 'गर्भे दृष्टमनुध्यायन्...'' (श्रीमद्भा० १।१२।३०) अर्थात् गर्भमें देखे श्रीभगवान्को वही बाहर आनेपर ढूँढ़ने-सा लगा। तब क्या बहिर्देशसे उत्तराके गर्भमें परीक्षित्की रक्षाके निमित्त भगवान् गये थे? नहीं, वे पहलेहीसे वहाँ थे, वहीं रहते हैं, परंतु मायाके आवरणवश नहीं दीखते, उसके हटनेपर दीख पड़ने लगते हैं। मायाका अपसरण दो प्रकारसे होता है, एक भक्तके श्रमसे, दूसरा भगवत्कृपासे। दूसरे, इन मानवपुरियोंमें शयन करनेवाला ही पुरुष है, 'पुंसु शेते इति पुरुषः' अर्थात् समष्टि-व्यष्टिशायी ही तत्त्व पुरुष है। यों उस प्राकृत पुरुषेतर पुरुषोत्तमको व्रजांगना वृक्षोंसे पूछती हैं। कह सकते हैं, इन दृष्टियोंसे तो गोपांगनाओंके समीप भी वह तत्त्व विराजमान है ही और इनको भी उस व्यापक श्यामतत्त्वकी स्फूर्ति होती ही है, तब ये ढूँढ़ किसे रही हैं? यह ठीक है। उक्त रूपसे गोपांगनाओंको उस तत्त्वकी स्फूर्ति है ही, परंतु वह प्रत्यक्षमें नहीं प्राप्त है। प्रत्यक्षमें जैसा भाव होता है, वह इन्हें नहीं प्राप्त है—अतः उसका अन्वेषण कर रही हैं। वैसे व्रजांगनाओंके नेत्रोंमें श्यामल महोमय दीप्ति प्रतिष्ठित है, इन्हें सब ओर श्यामरूप ही दीख पड़ रहा है। परंतु वे इतनेहीसे सन्तुष्ट नहीं, इन्हें तो शब्दस्पर्शादि भी वैसे ही चाहिये। श्रीश्यामसुन्दरके महोमय शरीरमें रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, शब्द—सब विषय लोकोत्तर हैं। व्रजांगना
चाहती हैं—जैसे हमारे नेत्रोंमें उन सर्वेश्वर प्राणाधिक प्रियका सर्वातिशायी रूप बसा है, वैसे ही उनके शब्दस्पर्शादि भी प्रत्यक्ष हों, नेत्रोंमें भी वही आभा हो, स्पर्श भी वही हो। पर अपने-आप जब ये प्रवृत्त होती हैं, तब इन्हें उन सबका अभाव प्रतीत होता है, वह अनुभव ही नहीं होता। तब आकाशवद् व्याप्त पुरुषोत्तमको वनस्पतियोंसे पूछती हैं, अचेतनोंसे पूछती हैं, यह उनकी विभोरता है। यहाँ एक भाव यह भी है—दर्पीको ब्रह्म भी जड़ प्रतीत होता है, पर जो रसिकशिरोमणि हैं—जो इस सिद्धान्तके आदी हैं— तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना। अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदा हरिः॥ —वे तो इन तरुओंको सद्घन, चिद्घन, आनन्दघन समझते हैं और अपनेको जड़ समझते हैं। अतएव वे 'भूतेषु सन्तं पुरुषं वनस्पतीन् पप्रच्छुः' व्यापक पुरुषोत्तमको वृक्षोंसे पूछती हैं। पूछो, पूछो। इस अन्वेषण-प्रसंगमें यों अन्तरंगदृष्टिसे तो महत्त्व है ही, पर बाह्यदृष्टिसे भी महत्त्व है—ब्रह्मलोक, वैकुण्ठलोक, भूमण्डलमें न ढूँढ़कर, व्रजमें—गाँवोंमें ढूँढ़ो। दर्पमें मत रहो—यह एक उपदेशसूक्त है—'परमिममुपदेश- माद्रियध्वं निगमवनेषु नितान्तखेदखिन्नाः। विचिनुत भवनेषु वल्लवीनामुपनिषदर्थमुलूखले निबद्धम्॥' कोरे 'टिड्ढाणञ्द्वयसज्दघ्नञ्मात्रच्तयप्ठञ्ठकञ्क- ञ्क्वरपः' (लघुसिद्धान्तकौमुदी ४।१।१५) के घोषणसे यदि थक गये हो तो इस उपदेशका सम्मान करो। निगमागमवेद्यको निगमाटवीमें ढूँढ़ते थक गये हो तो अब उन मुग्धा गोपियोंके घरमें, आँगनमें उसे ढूँढ़ो। वह उपनिषदर्थ श्रीबालमुकुन्द वहाँ ऊखलमें बँधा है। यदि अहंकारमें रह गये—'अजी, इन गँवार गोपोंसे क्या पूछेंगे और वह सर्वोपरि विराजमान तत्त्व इनके यहाँ गाँवोंमें कहाँसे आया, उसे तो महेन्द्रादि लोकमें प्राप्त कर सकेंगे'—तब तो बस गये, वह वहाँ भी न मिलेगा। अहंकारियोंकी दृष्टिसे ब्रह्म परे ही रहता है; क्योंकि उनकी दृष्टिमें अपने सामने ब्रह्मा भी कुछ नहीं। इधर रसिकोंके यहाँ दर्पका काम ही नहीं, यहाँ तृण भी महान् है। तात्पर्य यही कि जहाँ, जैसे भी उसके मिलनेकी सम्भावना हो, ढूँढ़ो। अतएव व्रजांगना वृक्षोंसे पूछती हैं— दृष्टो वः कच्चिदश्वत्थ प्लक्ष न्यग्रोध नो मनः। नन्दसूनुर्गतो हृत्वा प्रेमहासावलोकनैः ॥* (श्रीमद्भा० १०।३०।५) अश्वत्थ, प्लक्ष, न्यग्रोध—तीनों सबसे बड़े ऊँचे वृक्ष हैं, दूरकी बात देख सकते हैं। दूरस्थ श्यामको ये जान लेंगे। अश्वत्थकी व्युत्पत्ति है—'न श्वोऽपि स्थाता।' अर्थात् कल भी—अगले क्षणमें नहीं रह सकनेवाला अनित्य यह विश्व है—ऐसा समझनेवाला ज्ञानी अश्वत्थ है। गोपांगना कहती हैं, ऐसी विश्वकी गतिको जानकर सदा परोपकारमें रत हे अश्वत्थ, हमें कृपाकर हमारे प्राणप्यारेको बताओ, क्या आपने कहीं उन्हें देखा है? वः—युष्माभिः। क्योंकि वे श्यामसुन्दर आपकी ममताके आस्पद हैं। साधारण वस्तुपर ध्यान नहीं दिया जाता, ध्यान रहता ही नहीं। पर जो अपना है, उसका पता रहता है, उसका भी आना-जाना बना रहता है। श्रीश्याम आपके परप्रेमके आस्पद हैं। आप विहारस्थलीके हैं, आप महाभाग्यवान् हैं, कृपाकर हमें उन श्यामका पता दीजिये। यह प्रशंसा हुई। ऐसे ही 'प्लक्ष' की स्तुति करती हैं—'प्रकृष्टतया क्षीयते परोपकाराय यः स प्लक्षः, रलयोरभेदः' अर्थात् जो सदा परोपकारके निमित्त ही क्षीण होता रहे, वह प्लक्ष है। 'प्लक्ष' को प्रक्ष मानकर यह अपेक्षितार्थक व्युत्पत्ति की गयी, ऐसे अवसरपर र-ल में भेद नहीं माना जाता। परोपकारके लिये अपनेको मिटा देनेमें सोत्साह हे प्लक्ष! तुम्हारा जीवन-मरण दोनों उपकारके लिये है—हमारा भी उपकार करो—जरा श्रीश्यामसुन्दरको बता दो। न्यग्रोध! याचकको जो दुत्कारना, वह हुई न्यक्कार, उसे रोकनेवाला—'न्यक् रोधयतीति न्यग्रोधः। हे न्यग्रोध! तुम बड़े उदार हो— कोई उन वंशीधरमें प्रेम माँगने आयेंगे तो उन्हें तुम न्यक्कार न करोगे। अतः हम तुमसे याचना करती हैं—श्रीश्यामसुन्दरका
- (गोपियोंने पहले बड़े-बड़े वृक्षोंसे जाकर पूछा—) हे पीपल, पाकर और बरगद! नन्दनन्दन श्यामसुन्दर अपनी प्रेमभरी मुसकान और चितवनसे हमारा मन चुराकर चले गये हैं। क्या तुमलोगोंने उन्हें देखा है?
श्रीरासपञ्चाध्यायी ३६५ पता दो, बड़ी कृपा होगी। वे 'नन्दसूनु' हमारा चित्त चुराकर ले गये हैं; हम उन्हें ढूँढ़ रही हैं, अतः हे अश्वत्थादि! तुमने कहीं देखा हो तो बता दो। गोपांगना इस समय श्रीकृष्णपर कुपित हैं, अतः बड़ोंके नामसे उनका नाम-निर्देश करती हैं—नन्दसूनु- नन्दरायके बेटा। हमारा कोई सम्बन्ध नहीं; क्योंकि हमारे यदि वे होते तो हमारे पास रहते। यदि कोई गोपांगनाओंसे पूछे कि यदि यह बात है, तब इतनी व्यग्रतासे तुम उन्हें ढूँढ़ क्यों रही हो? इसपर उनका उत्तर है—वे चोर हैं, हमारा मन चुरा ले गये हैं, चोरोंका पता बहुत जरूरी है। सखि, तुम्हारा मन तुम्हारे पास होगा, वे क्यों लेने आयेंगे और कैसे ले जायँगे तो—'प्रेमहासावलोकनैः' मन्दहास और कटाक्षपातोंसे हमारे हृदयमें प्रविष्ट होकर ले गये। कदाचित् वृक्ष कहें; देवियो! हम वृक्ष हैं—जड़ हैं, हम क्या जानें तुम्हारे चित्तचोरको। इसी प्रसंगमें 'कच्चित्' का प्रयोग है। कच्चित् प्रश्नवाचक अव्यय है। इस अर्थमें यह पहले अभी-अभी चरितार्थ हो चुका। फिर अब वृक्षोंकी उक्तिमें इससे अचित् जड़ अर्थ प्रकाशित हुआ। व्रजांगना वृक्षोंको यही उत्तर देती हैं—तुम अज्ञोंको अचित् प्रतीत होते हो, परंतु हो चेतन, आपलोग अमलात्मा महामुनीन्द्र योगीन्द्र हैं, यहाँ श्रीश्यामसुन्दरका स्पर्श प्राप्त करनेके लिये तरु, लता रूपमें प्रकटे हैं। तरु, लता बननेकी बात तो श्रीउद्धवने भी कही— 'आसामहो चरणरेणुजुषामहं स्यां वृन्दावने किमपि गुल्मलतौषधीनाम्।' (श्रीमद्भा० १०।४७।६१) व्रजांगनाको जबतक अपने प्राणधनका पता मिलनेकी आशा रही, वृक्षोंकी खूब प्रशंसा की, पर जब देखा कि अब न बतायेंगे, आशा निराशामें बदल रही है; तब उन्हें उससे असूया होने लगी। गुणोंमें दोष दीख पड़ने लगे। एक कहती है—सखि, ये चेतन चाहे हों, पर ये कच्चित् हैं, इनका चेतन, कुत्सित चेतन है—'कत्चित्—कुत्सितञ्च चेतनं येषाम्....।' अच्छा, ये अब हमको ज्ञात हुआ, तुमलोग तीर्थवासी हो, बड़े कठोर हो, अतः बतलाते नहीं अथवा इस समय राजा कलिका साम्राज्य है। वह चोरपक्षपाती है। तुम भी वृक्षो! चोरशिखामणि माखनचोर श्यामसुन्दरके पक्षपाती हो। अतएव इनका नाम 'अश्वत्थ' है, स्थिरमति नहीं, आज कुछ तो कल कुछ कहता है। फिर 'चल-पत्र' भी यह है—स्वयम् अस्थिर है, जान-बूझकर भी धोखा दे सकता है। दूसरा यह इसका साक्षी प्लक्ष भी ऐसा ही है— 'प्रकृष्टतया क्षीयते इति प्लक्षः।' यदि यह धर्मात्मा होता तो प्रकृष्ट (अधिक) क्षयी क्यों होता ? और इस न्यग्रोधकी तो बात ही मत पूछो, इसने तो अपने यहाँ दूसरोंके लिये तिरस्कारका ही भण्डार भर रखा है— 'न्यक्कारमेव रोधयति।' एक दूसरी सखी कहती है—'नहीं सखि, देख, ये भी श्रीश्यामसुन्दरके वियोगतापसे स्तब्ध हैं, ये भी दुःखी हैं, विह्वल हैं। हमारी और इनकी एक-सी ही स्थिति है।' यह वृन्दावनके पशु, पक्षी, वृक्षोंमें जो हराभरापन आनन्द—एकरसताकी स्थिति है, यह श्रीश्यामसुन्दरके दर्शनसे ही है। तब श्रीश्यामके वियोगमें भी वे हरे-भरे ही क्यों दीखते हैं ? तो यह बात दूसरी है, व्रजलीलामें ये सदा एकरस रहते हैं; क्योंकि श्रीभगवान् व्रजलीलामें श्रीवृन्दावनको छोड़कर एक पाद भी कहीं नहीं जाते—'वृन्दावनं परित्यज्य पादमेकं न गच्छति।' व्यापी वैकुण्ठमें ही पुरुषोत्तम भगवान्का प्रादुर्भाव होगा। जैसे— नेत्र, जो बाहरसे दीख रहे हैं, ये नेत्र नहीं हैं, अपितु ये नेत्रगोलक हैं। नेत्र अतीन्द्रिय इन्द्रिय है, वह इस गोलकके भीतर है। श्रीचैतन्य महाप्रभु श्रीजगन्नाथपुरीमें रहते थे तो क्या उन्हें वहाँ श्रीश्यामसुन्दरका प्राकट्य नहीं था ? था, पर वह अन्तरमें था। 'यो वेद निहितं गुहायां.... सह ब्रह्मणा विपश्चितेति॥' (तैत्तिरीय० २।१) दो ब्रह्मकी कल्पना है—एक कार्यब्रह्म, एक कारणब्रह्म। सबके ऊपर-सबसे बड़ा कारणब्रह्म है। 'शेष' का भी यही अर्थ है—'शिष्यते इति शेषः।' लयप्रक्रियासे सबके लीन होनेपर क्या बचेगा? कारणब्रह्म, वही अव्याकृत तत्त्व है और वही शेष है; उसीपर श्रीभगवान् विष्णु विराजते हैं। अतएव कहा भी—
'यत्र प्रविष्टः सकलोऽपि जन्तुरानन्दसच्चि- द्धनतामुपैति।' वह व्यापक तत्त्व है। जो महानुभाव श्रीवल्लभादि वृन्दावनसे प्रसंगवश बाहर रह गये, वे वस्तुतः बाहर नहीं रहे। वे श्रीवृन्दावनको छोड़कर बाहर कैसे रहते ? इसी उक्त युक्तिसे, वे कभी वियुक्त नहीं रहे। उनके हृदयमें श्रीवृन्दावन, श्रीनित्यनिकुंजका सदा प्राकट्य है। परंतु सर्वसाधारणका सामर्थ्य ऐसा नहीं है। आजकल बहुत-से भावोंसे दर्शनशक्ति व्यापिका हो रही है। वैसे भी— 'अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः।' (श्वेताश्वतर० ३।१९) सर्वदर्शी, सर्वश्रोता वह सबमें है, परंतु प्रकट अपने स्थानमें—गोलोकमें ही होगा। 'स भगवः कस्मिन् प्रतिष्ठितः स्वे महिम्नि···।' यह विशेषरूपमें प्राकट्य है। वे लता, भूमि सब यहीं हैं, यह ठीक है, परंतु नेत्रदोषसे वे असली रूपमें नहीं दीखतीं। दोषसे—पित्तदोषसे मिसरी भी कड़वी लगती है। ऐसे ही दोषवश व्यापक होते हुए भी श्रीश्यामसुन्दरके दर्शन नहीं होते। यहाँ श्रीवृन्दावनमें जहाँ कांचनमयी भूमि है, वहाँ तरु नीलमणिके हैं, जहाँ पद्मरागमणिकी भूमि है, वहाँ तरु हरितमणि हैं······यों नील, पीत, हरितरूपमें सब लोकोत्तर वस्तु हैं। यत्र-तत्र तथा परिवेष्ठित तरु मानो श्रीराधाकृष्ण ही विहार करते प्रतीत हो रहे हैं। परंतु ये सब असली रूपमें दीखते नहीं, तब इसे नेत्रदोष ही कहना चाहिये। इसके लिये भगवदनुकम्पा प्राप्त हो, दिव्यदृष्टि मिले तो यह सब अद्भुतता दीख पड़ने लग जाय। अन्तरंग दृष्टिसे वे वृक्षादि यह सब कह रहे हैं, पर बहिरंग दृष्टिवश हमें कुछ ज्ञात नहीं होता। सखि, व्रजलीलाके अतिरिक्त श्रीश्यामसुन्दरके विप्रयोग तापमें ये तरु, लता झुलसते क्यों नहीं, इन्होंने एक बार ही नेत्र भरके उन त्रिभुवनसुन्दरका ऐसा दर्शन पाया है कि वह रूपमाधुरी इनकी चक्षुओंमें सदाके लिये बस गयी है, ओझल ही नहीं होती। इन्हें उस कमनीयताका स्थायीभाव प्राप्त हो गया है। ये उस रूपमाधुरीकी लोकोत्तरतापर— आश्चर्यकारितापर मुग्ध हो रहे हैं—स्तब्ध हो रहे हैं। सखि, तब हमें ये क्या जवाब दें, क्या बतायें ? इस प्रकार श्रीव्रजसीमन्तिनी अपने प्राणवल्लभ श्रीश्यामबिहारीको वृक्षोंसे पूछती, वनसे वनमें भटकती फिर रही हैं। कण्टकाकीर्ण गर्तोंमें, अनुकूल-प्रतिकूल भूमिमें घूम रही हैं। उन्हें मार्ग-विमार्गका ज्ञान नहीं है। देहका अनुसन्धान नहीं है। प्रेमोन्मादमें ऊर्मिमाली समुद्रकी-सी इनकी स्थिति हो रही है। उसमें जैसे ज्वारभाटे आते हैं, इन्हें भी कभी कुछ स्मरण- अनुसन्धान हो आता है? कभी भी नहीं। परंतु श्रीभगवान्की योगमाया उनके साथ है; वह उनकी रक्षा कर रही है। उन्हें कष्टोंसे बचा रही है। उनकी सेवाके लिये वह तत्पर है। अन्तरंग दृष्टिसे भी—यह तो वृन्दावनधाम है, यहाँ कष्ट कैसा ? किंतु प्रेमियोंकी कितनी दुरवस्था होती है—यह टीकाकार कल्पना करते हैं। यह इसलिये कि साधकोंको आश्वासन मिले, सहारा मिले। साधारणोंकी कौन कहे, ये व्रजदेवियाँ प्रेमपथिकोंकी परमाचार्या हैं। ये बतलातीं हैं—देखो, प्राणधनको ढूँढनेमें कितना क्लेश है, कहीं पाषाणों, वृक्षोंसे टकराते हैं। ऐसे ही भावुक भी अपनेको जीवन-मरणके संशयमें डाले बिना अभीष्ट तत्त्व नहीं प्राप्त कर सकता— न संशयमनारुह्य नरो भद्राणि पश्यति। संशयं पुनरारुह्य यदि जीवति पश्यति॥ बड़े-बड़े सम्राट्, स्वराट्-विराट् ऐसे ही ढूँढ़नेसे मिलेंगे! कोई भी काम प्राणोंकी बाजी लगनेसे ही सिद्ध होगा। यह भाव दिखलानेके लिये ही टीकाकार इतनी बातें कहते हैं। 'आनन्दवृन्दावनचम्पू' में कहा है—जहाँ-जहाँ विषम स्थानोंमें व्रजांगना घूमती हैं, वहाँ-वहाँ उनके परमानुरागवश कठोर-तीक्ष्ण कण्टक भी कोमल-कुसुम हो जाते हैं, जैसे श्रीभगवद्दर्शनसे वज्रसे भी कठोर वस्तु कोमल हो जाती है। गोस्वामीजीने भी कहा— जिन्हहि निरखि मग साँपिनि बीछी । तजहिं बिखम बिखु तामस तीछी ॥ (रा०च०मा० २।२६२।८) नागिनी पुत्रादिनी है—अपने बच्चोंको भी खा जाती है—'पुत्रादिनी सर्पिणी' इतनी क्रूर है, वह भी भगवद्भक्तोंके सामने अपने स्वाभाविक विषको त्याग
देती है। प्रकृतिके समस्त अंग भागवतकी सेवा करते हैं। 'तस मगु भयउ न राम कहँ जस भा भरतहि जात॥' (रा०च०मा० २।२१६) पृथ्वी श्रीरामभद्रके चरणोंके नीचे अपने कोमल हृदयकमलको बिछाती थी, परंतु भरतके लिये वह इससे भी अधिक कोमल थी। अतः जहाँ वृन्दावन अपने अधीश्वरके लिये कोमल बनता है, वहाँ वह उनके प्रियके लिये कोमल क्यों न होगा ? पहले तो वहाँ कण्टक, शर्करा, कंकड़ हैं ही नहीं, वहाँ तो इन्द्रनील, पद्मरागमणि आस्तीर्ण हैं। पर '......तं सप्रपञ्चमधिरूढ......।' 'गाँठी तो बाँधे नहीं माँगतहू सकुचायँ। तिनके पीछे हरि रहें कहूँ भूखे नहिं रहि जायं ॥' यों प्रकृतिके अणु-अणु इन व्रजदेवियोंकी सेवाके लिये तत्पर हैं। स्वामीको प्रसन्न करनेके लिये पहले स्वामिनीको प्रसन्न करना चाहिये। श्रीकृष्णको प्रसन्न करनेके लिये उनकी अन्तरंगा इन व्रजदेवियोंका पहले प्रसाद प्राप्त करना चाहिये। प्रकृतमें उनका चरित्रगान और उनकी लगनका अनुकरण ही उनके प्रसादका हेतु है। अस्तु, इस तरह वे अपने मनमोहनको ढूँढ़ती फिर रही हैं। अश्वत्थादिमें और भी कल्पना—अश्वत्थ विष्णु- दैवत्य, प्लक्ष ब्रह्मदैवत्य और न्यग्रोध शिवदैवत्य हैं। अतः मानो व्रजांगना अपने प्राणधनको ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वरसे पूछती हैं। वे कहती हैं—'आपलोग साधु हैं, आपसे हम अपने चोरको पूछ रही हैं। दूसरे, आपकी शाखा-प्रशाखा दसों दिशामें फैल रही हैं— उन हमारे चितचोरको कहीं अवश्य देखा होगा।' पिप्पल चलदल है, उसे चंचल देखकर व्रजांगनाने समझा—'यह हाथ हिला रहा है, कह रहा है—हमने तुम्हारे श्यामसुन्दरको नहीं देखा। ठीक है, इसे नेत्र नहीं हैं। चलो नेत्रवालेसे पूछें ('प्रकृष्टे अक्षिणी यस्य असौ प्लक्षः') इस प्लक्षके बड़ी-बड़ी आँखें हैं, यह नेत्रवाला है। इसके जो अरुण पल्लव हैं— वे नेत्र हैं। यह ब्रह्मदैवत्य भी है। अच्छा तो तुम्हीं बताओ प्लक्ष ! तुमने कहीं हमारे प्राणको देखा ? अरे यह क्या, यह तो कुछ बोलता ही नहीं, क्या इसने मौनव्रत लिया है ? पर नहीं, इसे वागिन्द्रिय नहीं है, बेचारा कैसे बोले ? सखि ! आओ, इस न्यग्रोधसे पूछें, यह जिह्वावाला है, इसके दल जिह्वाके जैसे हैं। यों नये-नये क्रमोंसे बार-बार पूछती फिरती हैं। फिर कुछ जवाब न मिलनेसे दोषानुसन्धानकी सुध हो आती है। कहती हैं—'सखि, अब जाना, यह ऊँचा (दर्पिष्ठ) होनेसे क्षुद्र है, यह क्षुद्रफल भी है (पीपल जितना बड़ा है, फल उसके उतने ही छोटे हैं), चाहे कितना भी आराधन करें, इससे महाफल—श्याम नहीं मिलेंगे। यह अश्वत्थ है—अस्थायी है।' सहसा 'वट' पर दृष्टि चली जाती है। कहती हैं—'देखो, इसकी शाखा कितनी झुकी हैं, यह विनम्र है। ('नितराम् अग्राणि अधोभूतानि यस्य असौ') शिवदेवताक है; शिव परमवैष्णव हैं। अतः यह अवश्य बतायेगा।' परंतु उत्तरकी कोई आशा न देखनेपर कहती हैं—इसकी बड़ी-से-बड़ी भी उन्नति अवनति ही है। देखो, शाखा नीचे घुसती जा रही हैं—'नितरामग्राणि अधोभूतान्यवनतिः यस्य असौ न्यग्रोधः।' अश्वत्थ परोपकारी नहीं है, अतः 'दरिद्रा' इसमें निवास करती है। बात यह है—दरिद्रा लक्ष्मीकी बड़ी बहन हैं। उसे कोई नहीं ब्याहता था। इसीलिये लक्ष्मीका विवाह भी रुका रहा; क्योंकि छोटे भाई- बहनका विवाह पहले हो जानेसे 'परिवित्ता'— 'परिवित्ती' दोष होता है। अन्ततः बहुत कुछ समझाने- बुझानेपर अश्वत्थने दरिद्रासे विवाह किया। उसे प्रसन्न रखनेके लिये यह तय किया गया कि शनिवारके दिन श्रीनारायणसहित लक्ष्मी वहाँ आकर बसें। अतएव अन्य दिनोंमें अश्वत्थके स्पर्शका निषेध है। यह अश्वत्थ उपकारी नहीं, इसीका फल है, जो इसे दरिद्रा मिली है। श्रीमद्वल्लभाचार्यजीके कथनानुसार श्रीव्रजवनिताऔंने प्लक्षमें यह दोष देखा—'प्लक्ष अपवित्र है, देवताओंने स्वर्गकी कामनासे पशुका आलम्बन किया, उसीसे यह उत्पन्न हुआ, अतः अपवित्र है। तभी तो प्राणजीवनका पता नहीं देता।' यह सब निराश होनेपर कहा जाता है, सान्त्वनाके समय ऐसा नहीं कहा जाता। अथवा अपना मनोरथ सिद्ध न होनेपर भी वे व्रजदेवियाँ वृक्षोंसे असूया नहीं करतीं; क्योंकि वे प्रेममार्गकी आचार्या हैं। अतः कहती हैं—'कच्चित्'—
'कुत्सितश्चेतनवर्गोऽपि यस्मात्।' अर्थात् इस वृन्दावन वृक्षसमूहकी अपेक्षा चेतनवर्ग भी कुत्सित है, इन्द्रादि भी निकृष्ट हैं। ब्रह्मा, वह तो आशा लगाये बैठा है— 'वह दिन कब उदित होगा, वह ऊँचा भाग्य कब जागेगा कि जब श्रीवृन्दाटवीमें मैं कुछ—लता-पत्र- पाद-धूलि बनूँगा और किसी बड़भागी व्रजवासीके चरणसे मेरा उद्धार होगा'— तद् भूरिभाग्यमिह जन्म किमप्यटव्यां यद् गोकुलेऽपि कतमाङ्घ्रिरजोऽभिषेकम्। (श्रीमद्भा० १०।१४।३४) उद्धव भगवान्को बहुत प्रिय थे। भगवान् उन्हें अपनेसे जरा भी कम नहीं मानते थे, श्रीसंकर्षण- बलदेव और श्रीलक्ष्मी भी उद्धवसे अधिक प्रिय न थीं। उनके लिये ये भगवान्के शब्द हैं—'नोद्धवोऽण्वपि मन्यूनः•••• न च सङ्कर्षणो न श्रीः•••• यथा भवान्।' वे महाभाग्यवान् उद्धव भी श्रीवृन्दावनके तृण, गुल्म बननेके लिये तपस्या करते रहे। यह भाग्य वृन्दावनके वृक्षोंको छोड़कर संसारमें और किसका होगा? यों 'कच्चित्' से व्रजांगना वृक्षोंकी प्रशंसा ही करती हैं और कहती हैं—आप परम चेतन हो, कृपा करो, बताओ—'दृष्टो वः कच्चिदश्वत्थ••••' वृक्ष, मानो स्तुतिसे प्रसन्न हो गये। परस्पर प्रश्नोत्तर-परम्परा चलने लगी—किसको बतायें, व्रजबालाओ, तुम किसे पूछती हो? चौरको। क्या चुराया उसने? हमारा मन। चौर कौन हैं? नन्दसूनु। नहीं, वह तो विष्णु है—व्यापक है, नन्दरायने अनन्त तपस्यासे उसे प्राप्त किया है, वह चौर नहीं, आखिर उसने तुम्हारा क्या चुराया? अजी! नन्दसूनु व्यापक-विष्णु होंगे तुम्हारे घरमें, हमारे यहाँ तो वे पक्के चौर हैं, उन्होंने क्या नहीं चुराया, हमारे दहीको चुराया, नवनीतकी चोरी की और अब तो वे हमारे मनको भी चुराकर भाग गये हैं!' मुग्धा गोपी, तुम क्या कहती हो? मन! यह तो तुम्हारे ही पास होगा और दूध, दही, माखनकी तो चोरी गिनी ही नहीं जाती। नहीं-नहीं, वे हमारा मन चुरा ले गये हैं, वे हमारे चितचोर हैं। दूध, दहीकी चोरीपर तो हमने कभी उन्हें ढूँढ़ा ही नहीं। अबकी बार उन्होंने हमारी बड़ी भारी चोरी की है—हमारी मनोमंजूषाका उन्होंने हरण किया है, उसमें धैर्य, लज्जा, विवेक, विज्ञान, धर्मनिष्ठा आदि रत्न भरे रखे हैं। उसे वे ले गये, अब कुछ रह ही नहीं गया। दही, माखन जानेसे हमारी कोई क्षति नहीं थी, हम विवेकादिसे रहित नहीं थीं, पर आज हम उनसे हीन होकर बाल-बिखेरे घूम रही हैं। हाय, हमारा सर्वस्व लुट गया। बताओ, बड़ा पुण्य होगा। सखियो, तुम क्या कह रही हो? उन्होंने तुम्हारा मन कैसे चुराया? क्योंकि वह तो अन्नमय, प्राणमयके भीतर रहता है, वहाँसे कोई भी उसे कैसे ले सकता है? यह मत कहिये, 'प्रेमहासावलोकनैः' वे प्रेमसे हृदयमें प्रविष्ट हुए, मधुर हाससे उस मंजूषाको ग्रहण किया और तुरन्त उलटे पाँव लौट पड़े। प्रेमी हृदयमें घुस जाता है, वह हृदयकी बात जान जाता है। इस समय वे मोहन उदासीन, अग्राह्य, अलक्ष्य, अचिन्त्य, अव्यपदेश्य बने हैं। पर पहले इतने अनुरागी बने कि हमारे पादसंवाहन करते, वेणी गूँथ देते, नाचते, गाते, जो हम कहतीं, सब करते। इसी प्रेमसे वे हृदयमें प्रविष्ट हुए। उन प्रेमीका हास याद आता है—मालूम होता है, वे अपने उस हृदयहारी हाससे हमें पकड़े हुए हैं। ऐसे ही विभोरताके अवसरपर अवलोकन-कटाक्षोंसे बस; मन लेकर झटसे चले गये। आप कृपाकर बता दो, हम सर्वशून्य होकर उन्हें ढूँढ़ रही हैं। आप बड़े हो, राजा हो, न्याय करो। अथवा मनके तीन भाव हैं—तामस, राजस, सात्त्विक। प्रेम, हास और अवलोकन—इन तीनोंने मनोंको अपहृत किया। यहाँ अलौकिक सद्घन, चिद्घनमें तामस, राजस भाव कहाँसे आये? इसपर श्रीमद्वल्लभाचार्यजीका कहना है—यह यद्यपि लोकातीत है, परंतु यहाँ गोपी कोई तामसी, कोई राजसी आदि हैं। इनमें भी दस भेद हैं। इनमें तामसी तमसे ऊँची हैं। 'प्रेमपत्तन' आदिमें भी यह वर्णन है। जो अन्यत्र प्रधान है, वह प्रेमपन्थमें अप्रधान है। वह भी वैधी भक्तिकी अपेक्षा रागानुगा प्रीतिमें और भी अप्रधान है। वैधी प्रीतिमें सत्य आदि धर्मका ही मन्त्रिमण्डल रहता है। रागानुगामें वह बदल जाता है, वहाँ व्यसन लग जाता है। परंतु यदि भावुकका मन श्रीकृष्णपादारविन्द-
मकरन्दका मधुप बन जाय, तब तो फिर महान् वैराग्यादि भी अग्निमें 'राई-नोन' की तरह वारकर फेंक दिये जायँ ! श्रीसनकादि, शुकादि आशावसनदिगम्बर महान् विरक्त थे, पर उन्हें एक व्यसन था—जहाँ मंगलमय भगवान्का चरित्र होता; उसे वे अवश्य सुनते। अन्यत्र आशा दूषण है, कहा भी है—'आशा पिशाची परिमर्दितानाम्...' परंतु यहाँ वह भूषण है, यहाँ आशा, तृष्णा कल्पलता है। अन्य सब कुछ देकर भी इसे भावुक खरीदना चाहता है। तामस स्नेह है, वह एक गाढ़ आसक्ति है, दृढ़ अभिनिवेश है। प्रेमी इसे पाकर किसीकी नहीं सुनता। माता, पिता, वेद, शास्त्र, सज्जन, साधु उसे इस मार्गसे रोकते- रोकते परेशान हो जायँ, पर वह किसीको नहीं मानता। वह उसका प्रियव्यसन मूढ़ग्राह, औरोंकी तो क्या, साक्षात् सृष्टिकर्ता ब्रह्माकी भी बात कान नहीं करता। यह महाअग्निपुंज सूर्यदेव ठण्डा पड़ जाय, चन्द्र जल उठे, दुनिया उथल-पुथल हो जाय, परंतु यह वह प्रेम है, वह तामस स्नेह है, जो किंचिन्मात्र भी शिथिल न होगा। जैसे लौकिक कामिनीको कान्तमें अटूट अनुराग होता है, इन गोपांगनाओंको वैसे ही श्रीकृष्णमें था। वैधी प्रीतिमें इसका तिरस्कार है, परंतु रागानुगामें इसीका आदर है। इस प्रकारकी कृष्णकी तामसी मूर्तिका इन दो श्लोकोंमें वर्णन है— बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारं बिभ्रद् वासः कनककपिशं वैजयन्तीं च मालाम्। रन्ध्रान् वेणोरधरसुधया पूरयन् गोपवृन्दै- वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद् गीतकीर्तिः ॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।५) 'कर्णोत्पलालकविटङ्क०' (श्रीमद्भा० १०। ३३।१६)—'श्यामं हिरण्यपरिधिं वनमाल्यबर्ह०' (श्रीमद्भा० १०।२३।२२)। इनमें शृंगाररससारसर्वस्व उद्वेलित उद्बुद्धरूपमें संयोग, वियोग दोनोंहीके साथ वर्णित हुआ है। यहाँ संयोग तो 'अणोरणीयान्' है और वियोग ही 'महतो महीयान्'। श्रीश्यामसुन्दर वनविहारीने मस्तकपर मुकुट धारण किया है, वह मोरपंखका बना है। उसके मयूरपिच्छमें जो श्यामता है, उससे आसक्ति—तामसता निर्दिष्ट हुई—परम आसक्ति बतलायी गयी। अरुण पल्लवके समान पीताम्बरसे सरस सुकोमलता कही गयी। आम्रपल्लवके निर्देशसे यह कहा गया कि उसे भी शृंगारस्वरूपसे धारण किया है और इससे रंजनशील रागकी सूचना है। व्रजांगनाओंका अनुराग सरल, सुकोमल है। मालाके सौगन्ध्यसे 'सत्त्व' गुण कहा गया। 'सत्त्व' का अभिप्राय है—प्रकाश, 'रज' का अभिप्राय है—हलचल—क्रिया और 'तम' का अभिप्राय है—रुकावट—आवरण। यही प्रकृतिमें भी है। जहाँ 'लीला' है, वहाँ भी एक अवरोध, हलचल और प्रकाश है। पहले श्रीश्यामसुन्दर—मुरलीमनोहरका प्रकाश, फिर उनके दर्शनके लिये चंचलता, इसके बाद उससे आसक्ति—गाढ़मूढ़ता सिद्ध ही है। यह जो प्रेम है, यह तामस है। प्रेमका स्वरूप, आसक्ति— उत्कट उत्कण्ठा है। व्रजांगना कहती हैं—हे वृक्षो, श्रीश्यामसुन्दरके अनुरागसे आवरण हो गया—हमारी बुद्धिपर परदा पड़ गया, हाससे चंचलता—खलबली हो उठी और अवलोकनसे सात्त्विक भाव। उसी समय ये चौरशेखर हमारे चित्तको चुरा ले गये। अब तुम समझो, यों चुरा ले गये। अब ये कहाँ गये ? तुमने देखा हो तो जल्दी बतलाओ। अच्छा व्रजवनिताओ, यह तो बताओ, तुमने उनमें विश्वास कैसे कर लिया ? विश्वास न करनेका कोई कारण नहीं था, क्योंकि हम जिनके राजमें रहती हैं, वे उनके पुत्र हैं—'नन्दसूनु' हैं। हम क्या जानती थीं कि ये पालकके बालक ही हमारे घालक निकल पड़ेंगे। अथवा 'नन्दस्य—सर्वानन्दहेतोरयं सूनुः' हम तो समझती थीं जगदानन्दकारक नन्दके ये सुपुत्र हैं। अतएव हमने उनपर विश्वास किया। हन्त कष्टम्! हम विश्वाससे ठगी गयीं। वृक्षो, तुम बताओ, तुमने उन्हें किसी तरफ जाते देखा है ? इस प्रकार व्रजांगना श्रीकृष्णके विरहमें विह्वल हुई उनका अन्वेषण कर रही हैं और संहत होकर गान करती हुई उन्हें खोजती हैं। फिर-फिर अनुसन्धान होनेसे प्लक्षादिसे पूछती हैं—हमारे चितचोरको बताओ। वह प्रेम, हास और अवलोकनसे हमारे मनको—धैर्य, लज्जा, विवेक, विज्ञानकी मंजूषाको हर ले गये हैं।
प्रेम, हास और अवलोकनसे यहाँ सात्त्विक, राजस और तामस भाव बतलाये। प्रथम वस्तुज्ञान अवलोकन, फिर तत्प्राप्तिके लिये व्याकुलता, इसके बाद स्नेहासक्ति, मूर्च्छा हुई। यह बात अन्यत्र भी कही गयी है— 'अदर्शने दर्शनमात्रकामा दृष्ट्वा परिष्वङ्ग···' अर्थात् जबतक प्राणप्रियका दर्शन नहीं मिला, तबतक तो दर्शनकी केवल उत्कट उत्कण्ठा रही। फिर इसके पूरा होते ही आलिंगनकी अभिलाषा जाग उठी। इसके बाद एक विचित्र आसक्ति, विभोरताने वशमें कर लिया। फलतः अब वह उनमें मिल जाना चाहती है और उन्हें अपनेमें मिला लेना चाहती है—दोनों एकमेव हो जाना चाहते हैं। यद्यपि ये शृंगारके भाव हैं—रसीले भाव हैं। पर यह लौकिक शृंगारसे ऊँची वस्तु है। साथ ही इस विषयमें श्रीभरतादि नाट्याचार्योंकी सम्मति है कि ऐसे समस्त शृंगारके उदात्त भाव, भेद, प्राकृत नायक- नायिकादिमें समन्वित नहीं हो सकते, यदि हो सकते हैं तो केवल रसिकशेखर श्रीराधाकृष्णमें ही, उनके प्रेम-सुधासिन्धुके तो एक बिन्दुमें ही ये सब समा जायँगे। इन्हींके प्रसंगमें कहा गया है—'आशास्महे विग्रहयोरभेदम्' दोनों एक-दूसरेके साथ अभेद— ऐक्य चाहते हैं। परंतु ये सब भाव अन्तरंगा आह्लादिनी शक्ति और श्रीश्यामसुन्दरमें ही हैं। अस्तु, प्रकृतमें अभिप्राय यही है कि इस प्रकारसे दर्शन सात्त्विक है और उससे ज्ञान उत्पन्न होता है—'सत्त्वात् सञ्जायते ज्ञानम्' इसके अनन्तर मिलनेकी उत्कण्ठा, फिर तज्जनित गाढ़ आसक्ति—अभिनिवेश होता है। ये सत्त्वादि तीनों प्राकृत सत्त्वादिसे भिन्न हैं। गोपांगना इस 'तामस' का—आवरक अन्धकारका बड़ा आदर करती हैं। उनका कहना है—'हमारे लिये तो कृष्णपक्षके तामस-विस्तारमें अभिसरणकी सुविधा रहती है, यह पक्ष बहुत उत्तम है।' उनके यहाँ रज-गोरज-धूलिका भी बहुत आदर है—'वह ऐसा व्याप्त हो कि हमें श्रीश्यामका छिपकर दर्शन करते कोई देखे ही नहीं।' उन्हें यों परम प्यारे साँवरेके दर्शनमें 'रज' और 'तम' दोनों ही अपेक्षित हैं, दूसरे, 'रज' को ये श्यामसुन्दरके आगमनकी सूचना समझती हैं; क्योंकि सायंकाल गोचारण करके आते हुए श्रीगोपालके आगमनकी सूचना दर्शनोत्कण्ठिता व्रजबलाओंको आगे उड़ती गोधूलिसे मिलती। वैसे भी 'रज' में (गुण और धूलि दोनोंमें) क्रिया—चंचलता होती है। प्रियदर्शनपक्षमें चंचलता-विह्वलताका बहुत महत्त्व है। एक भावुकने कहा—'कृष्णभावरसभाविता मतिः क्रीयतां यदि कुतोऽपि लभ्यते' भाई, प्रेमियो! 'कृष्णभावरस- भावितामति' यदि खरीदी जा सके तो खरीद लो, चाहे वह किसी भी कीमतपर मिले। अच्छा, अगर ऐसा है तो हम खरीदेंगे, कहिये क्या दाम है? उसकी कीमत, बहुत ही सस्ती लेकिन बहुत ही महँगी भी— चंचलता एकमात्र मनकी चंचलता है। बस, प्राणप्रियके दर्शनके बिना न रह सकना, उससे व्यथित, अशान्त रहना, यही उस अमूल्य मतिका मूल्य है। यहाँ अशान्ति, बेचैनी जितनी ही बढ़े, उतनी ही अधिकाधिक मूल्यवती है—महार्घ है। यों भी 'रज' का महत्त्व है। हाँ तो अवलोकनादिसे सात्त्विक भावसे प्रकाश अर्थात् गोपांगनाओंको पहले दर्शन, फिर हासरूप राजसभावसे प्राप्तिके लिये विह्वलता, अन्तमें तामससे गाढ़ासक्ति, मूर्च्छा हुई। इन्हीं काण्डोंसे वे मन खो बैठीं। अथवा प्रेम जगन्मोहन महौषध है—बेहोश करनेकी दवा है। उन चोरशेखरके पास इसके भण्डार भरे पड़े हैं। उन्होंने यह मोहन महौषध देकर अपने दो साथियोंको भेजा। वे हैं—हास और अवलोकन— नेत्र। जब श्रीश्यामसुन्दर चौर हैं तो उनके हास, अवलोकन, नेत्र, हाथ, पाँव सब चौर हैं। चौरके साथी सब चौर, इनमें बाँके-बिहारीके बाँके नेत्र तो पक्के चोर हैं, उनसे कोई बचा ही नहीं। एक बार सरसिजसम्राट्ने विचार किया कि 'यह अलबेलो ब्रजसाँवरिया, सबनकूं ठगतो फिरे है, सबकी चोरी करै है, कहुँ मेरीउ शोभाकूं यह चुराय न ले ज्यायँ, मैं अपनो खूब पक्को बन्दोबस्त कर लऊँ।' यह निश्चयकर वह कमलाधिपति जलाशयमें उत्पन्न हुआ, वहीं बसा—'यहाँ कैसे आयेंगे श्याम? पर वे बड़े नटखटिया हैं, कहीं जलविहारके लिये ही आ निकले तो मेरी इस अद्भुत शोभाको अवश्य चुरा लेंगे, वे पक्के चोरजारशिखामणि हैं। मेरी सम्पत्ति यह
श्रीरासपञ्चाध्यायी ३७१ एकमात्र शोभा ही है। मुझे खूब सावधान रहना चाहिये।' जलविहार गर्मीमें होता है, शरदमें लोग शीतसे डरते हैं, सहसा जलमें नहीं प्रविष्ट होते। यह सोचकर वह सरोजराज शरद्ऋतुमें और तत्रापि जलमें उत्पन्न हुआ, वहीं बसा। इतनेपर भी सन्तोष न हुआ, उसने अपनी रक्षाके लिये चारों ओर बहादुर कमलोंको पहरेदार खड़ा किया, कितनोंहीको अपने पास बसाया- यदि उन्हें चोरी करना ही इष्ट होगा तो इन्हींकी सम्पत्ति हरके अपनी आदत पूरी कर लेंगे, मुझतक नौबत न आयेगी, पर इसके बाद भी डरके मारे उसने शतपत्रोंको द्वारपाल बनाया। उनके भी चारों ओर काँटे लगाये, स्वयं सबके बीचमें रहा। अब रक्षाके बाह्य प्रयत्न-प्रबन्धसे वह निश्चिन्त हुआ। किंतु अब भी उसका भय गया नहीं। वह सोचता रहा-'उनकी चोरी बड़ी अद्भुत है, वे आँखसे काजल निकाल लेते हैं।' अतः अब अपनी शोभाकी रक्षाके लिये उसने आभ्यन्तर प्रयत्न किया-उस छवि-सम्पत्तिको अपने अन्तरतम कोषमें छिपाकर रखा। फिर भी सचमुच महान् आश्चर्य कि श्रीश्यामबिहारीके उन नेत्रारविन्दोंने- निरुपम नेत्रोंने सरसिजसम्राट्की श्रीको-सम्पत्तिको चुरा ही लिया और किसीने देखताक नहीं- 'कब चुराया?' श्रीगोपीगीतके इस श्लोकमें यह बात कही गयी है- शरदुदाशये साधुजातसत्सरसिजोदरश्रीमूषा दृशा। (श्रीमद्भा० १०।३१।२) ऐसे चौर्यकुशल अपने साथी नेत्र-चौरोंको अवलोकनको श्रीश्यामसुन्दरने व्रजसीमन्तिनियोंकी चोरी करने भेजा-'जाओ, गोपियोंके मनोरत्नको- धैर्यलज्जादि रत्नोंको चुरा लाओ।' साथमें मोहन- औषध दिया, जिसके प्रयोगसे वे जागती भी सो जायें। उन रूपशेखर श्यामके हास और अवलोकन ही इस कार्यके लिये पर्याप्त थे, इनमें प्रेम-सम्मोहन और मिल गया-अब कहना ही क्या था? हे महावृक्षो! इस प्रकार प्रेमहासावलोकनसे उन्होंने हमारा सब कुछ चुरा लिया, हम उन्हें पूछ रही हैं, बताओ, वे किस ओर गये हैं? गोपियो, तुम सचमुच भोली हो, पर अपने रत्नोंकी-सर्वस्वकी रक्षामें इतनी ग़फ़लत क्यों तुमने की? सज्जनो, यह तुम्हारा कहना ठीक है, पर हम तो यही विश्वास करती रहीं, ये श्रीनन्दसूनू हैं- आनन्ददायी हैं, हमें क्या ज्ञान था कि इनसे प्रेम करके ऐसे सन्ताप उठाना पड़ेगा। यों व्रजांगना अपने ही प्रश्नोत्तर करती पूछती-फिरती हैं। जबतक उन्हें उत्तरकी आशा रहती है, विविध भाँति पूछती हैं। निराश होनेपर उनमें दोषानुसन्धान करती हैं-सखि, इसने मौनव्रत लिया है। नहीं, यह गूँगा है। यह भी बात नहीं, इसे तो प्रियतमके दरस-परससे-गाढ़ प्रेमसे स्तब्धता हो गयी है। हाँ हाँ, यह कह सकते कि बीमारीमें आ गया है, हमारी सुनता ही नहीं। मेरी समझमें तो सखि, ये उनकी विभूति हैं, इन्हें श्रीश्यामका अधिक सहयोग प्राप्त हुआ है। ये उनके साथी होनेसे उनके पक्षपाती हैं, कभी पता न देंगे। यह सब कुछ नहीं, असल बात यह है कि ये सब महत्त्वाभिमानी हैं। सोचते हैं-'इन गँवारी ग्वालिनोंसे क्या बोलें।' यही समझकर ये हमारी उपेक्षा कर रहे हैं। अतएव इनमें कोई गुण नहीं। चलो अब आगे चलें, उस 'कुरबक' से पूछें*— गोपांगनाओंका कुरबक-अशोक आदिसे श्यामसुन्दरके विषयमें पूछना देखो सखि! इसमें सुमनस (पुष्प) भी लगे हैं। यह अच्छे मनवाला है, इससे पूछना चाहिये। इसके स्वरूपसे भी प्रतीत होता है, इसे श्रीश्यामसुन्दरके अवश्य दर्शन हुए हैं। तभी यह प्रसन्न हो रहा है। इसके अम्लान पुष्प विकसित हो रहे हैं। यह अपने सौरभसे मनको, दिग्दिगन्तको आमोदित कर रहा है। इसका अन्तःकरण पवित्र है। दूसरे, फूलोंका फूलना, यह तो प्यारेके दर्शनके बिना सम्भव नहीं-हृदयका फूल उसके बिना खिलता नहीं। यह इसका आमोद भी तभी है, जब यह स्वयं दर्शनका आनन्द ले चुका
- कच्चित् कुरबकाशोकनागपुन्नागचम्पकाः । रामानुजो मानिनीनामितो दर्पहरस्मितः ॥ (श्रीमद्भा० १०।३०।६) कुरबक, अशोक, नागकेशर, पुन्नाग और चम्पा ! बलरामजीके छोटे भाई, जिनकी मुसकानमात्रसे बड़ी-बड़ी मानिनियोंका मानमर्दन हो जाता है, इधर आये थे क्या ?
है। सखि, इसका सहवास करेंगी, इससे प्रश्न करेंगी तो हमारा भी मन खिलेगा, हमें भी मंगलमय अंगकी प्राप्ति होगी। अहो, इसका तो नाम भी बड़ा अच्छा है—'कौ पृथिव्यां यशसो रवो यस्य सः एव 'कुरवकः' : अखण्ड भूमण्डलमें इसका यश व्याप्त है। यह श्रीश्यामके ही समान है। इसके वे सखा हैं, अपने समान नाम-रूपवाले हैं। अतः इससे पूछो। इससे पता चलेगा। कुरबक ! तुम बड़े अच्छे हो, तुमने कहीं श्यामसुन्दरको देखा हो तो बताओ, वे हमारा मन चुराके भाग आये हैं। कुरबककी ओरसे शंका करके कहती हैं—सखि, यह तो कह रहा है— व्रजांगनाओ, तुम्हारे ही दोषसे—गर्वसे श्याम चले गये हैं, अब तुम क्यों रोती हो ? तो कहती हैं—श्यामसुन्दर तो 'दर्पहरस्मितः' हैं। माना, हमारे ही दोषसे वे गये, पर वे अन्तर्हित क्यों हो गये? क्योंकि उनके तो स्मितमात्रसे ही हमारा दर्प दूर हो सकता था। अमृतसे लाभ होनेकी जगह विषका प्रयोग कौन करेगा ?— व्रजजनार्तिहन् वीर योषितां निजजनस्मयध्वंसनस्मित । (श्रीमद्भा० १०।३१।६) जिनकी मधुर मनोहर मुसकान अनन्त कन्दर्पके दर्पको दलित कर देती है, कामिनीके काम-मदका मर्दन कर देती है, वे—'रामानुजो मानिनीनाम्' (श्रीमद्भा० १०।३०।६) मानिनीके मानका मर्दन करनेके लिये इस अरण्यमें क्यों घूम रहे हैं? कहो कुरबक ! अरे, हम इतना अनुनय कर रही हैं और यह बोलतातक नहीं ? सखि ( 'कुत्सितो रवो यस्य सः, अथवा कुत्सितात् रवात् कं सुखं यस्य स कुरवकः') जिसे दूसरोंके रोनेसे सुख मिले, यह तो वह है। हमारे रोनेसे यह प्रसन्न हो रहा है। देखो, फूल खिले हैं, सौरभ फैल रहा है। सचमें यह भी निष्ठुर श्रीश्यामकी तरह ही है, उन्हें भी हमारा रोना ही अच्छा लगता है। गोपियो ! योगीन्द्र-मुनीन्द्रवन्दितपादारविन्दसे तुम पादसंवाहन कराओ—यह क्या उचित है? इसी तुम्हारे दर्पको दूर करनेके लिये वे अन्तर्हित हो गये हैं। नहीं, यह काम तो 'स्मित' से ही चल जाता, पर वे तो हमारे रोनेसे खुश होते हैं, अतः अन्तर्हित हुए हैं। मृगयु (व्याध) हरिणियोंको वीणावादन करके मोहित कर लेता है। फिर उन्हें जालमें फँसाकर उनके रोनेसे प्रसन्न होता है। हम हरिणाक्षियोंको अपने कटाक्षशरसे विद्ध और वंशीरवसे मुग्ध करके अब रोती देखकर वे श्यामसुन्दर प्रसन्न हो रहे हैं। इस तरह वे भी कुत्सित रवसे प्रसन्न होनेवाले कुरवक ही हैं। आगे अशोकसे पूछती हैं। पहले उसकी स्तुति करती हैं—सखि! यह बहुत सुन्दर वृक्ष है, इसके पास जानेसे ही शोक मिट जाता है—'नास्ति शोको यस्य स अशोकः ।' वह है आत्मवित्, क्योंकि— 'तरति शोकमात्मवित्।' आत्मा कौन है? श्रीकृष्ण, उनको जान लेनेसे सब शोक-मोह दूर हो जाते हैं— 'तत्र को मोहः कः शोकः....।' अशोकके मिले बिना शोक मिटता नहीं। अशोकके संगसे अशोक हो जाता है। अतः हे अशोक! हम तुमसे पूछती हैं, बतलाओ, वे चितचोर मोहन कहाँ गये ? जैसे चन्दन अपने पासके वृक्षोंको चन्दन बना देता है—सुगन्धित बना देता है, वैसे ही तुम्हारे पास आयी हमको श्यामका पता देकर अशोक बनाओ, बड़ी कृपा होगी। अरे! यह भी कुछ नहीं बोलता। बोले क्या, जिसे स्वयं दुःखका अनुभव नहीं, वह दूसरेकी पीड़ाको क्या जाने ?—'यथा कण्टकविद्धाङ्गो......' (श्रीमद्भा० १०।१०।१४), 'जाके पाँव न फटी बिवाई। सो क्या जाने पीर पराई॥' हमारे विरहकष्टको यह जानता ही नहीं, कैसे दूर करेगा। यह तो एक अशोक है, श्रीजानकीजी तो अशोकवाटिकामें टिकी थीं। वे बहुत भी एकका शोक दूर न कर सके। यह भी मोहनका ही साथी है। आगे चलो। 'नागपुन्नागचम्पकाः' (श्रीमद्भा० १०।३०। ६) सखि, नागकेशरको देखो 'न अगः साधारणो वृक्षो यस्याः सा......' यह पुमान् नाग है। ये दोनों गजेन्द्रगति श्रीमोहनकी गतिको जानते हैं। हे चम्पक! तुम्हारा वर्ण हमारे श्यामके शरीरपर विराजमान हैं, तुम उन्हींकी तरह चपल ('चपि चापल्ये') भी हो। तुम्हीं लोग हमारे प्राणधनका परिचय दो। यहाँ व्रजांगनाओंमें—मुग्धा, मध्या, प्रगल्भा, मानिनी बहुत भेद हैं। उनमेंसे मानवती व्रजांगना कहती हैं—
श्रीरासपञ्चाध्यायी ३७३ 'नागपुन्नागचम्पकाः।' 'तुम हमारे चोरको बताओ।' मानवती यह चाहती हैं कि श्रीनन्दनन्दनको यह पता न चले कि 'हम उन्हें ढूँढ़ रही हैं' '...नेति नेति वचनामृत बोलत...' ये स्वप्नमें भी यह प्रकट न होने देंगी कि हम उन छबीले श्यामपर मुग्ध होकर उन्हें ढूँढ़ रही हैं। इसलिये ये ब्रजयुवतियाँ यों पूछ रही हैं—'हे नागपुन्नागचम्पकाः' हमें उन श्यामसे कोई गर्ज नहीं, केवल वे हमारी चीज चुराकर ले गये, अतः 'सोऽस्याभिर्भर्तव्यः' हम उन्हें पकड़ेंगी। कदाचित् 'पुन्नाग' कहे—'अरी ब्रजांगनाओ, तुम अबला हो और वह बलवान् है, तुम उसे कैसे धरोगी ? इसपर कहती हैं, आखिर वे हैं तो 'रामानुज' श्रीबलरामके छोटे भाई ही, क्योंकि—'बलाधिक्याद् बलं विदुः।' (श्रीमद्भा० १०।८।१२) वह तो हमसे कम बलवान् ही हैं।' इसी सम्बन्धमें गोपांगना नागसे पूछती हैं—हे नाग, तुम साधारण अग (वृक्ष) नहीं हो। तुम श्यामसुन्दरके सदृश हो। उन नागसदृश भुजदण्डवाले श्यामको बतलाओ, तुमने कहीं उन्हें देखा है ? 'अहो अमी देववरामरार्चितं × × × × तमोऽपहत्यै तरुजन्म यत्कृतम्॥' (श्रीमद्भा० १०।१५।५) श्रीभगवान्ने स्वयं श्रीमुखसे इन वृक्षोंकी स्तुति की है। ये साधारण वृक्ष नहीं हैं, ये योगीन्द्र-मुनीन्द्र- वन्दित वृक्ष हैं। ये सुमन और फलका उपहार लेकर अपने शाखारूप शिखाग्रभागसे भगवद्वन्दन करते हैं। ये इसलिये प्रणाम करते हैं कि 'तम मिटे'। परंतु यह बात जँचती नहीं; क्योंकि जब श्रीउद्धव, श्रीब्रह्मा- जैसे श्रीवृन्दावनके 'तरु, गुल्म' होना चाहते हैं, तब इनमें 'तम' कैसा ? इससे तो इनकी महिमा सिद्ध होती है। यद्यपि यह ठीक है, परंतु इसमें वृक्षोंका भाव दूसरा है। वृक्ष सोचते हैं—'ये पक्षी, ग्वालबाल, गैया, जहाँ-जहाँ श्रीश्याम कन्हैया पधारते हैं, वहाँ-वहाँ पहुँच जाते हैं, परंतु हम तो ऐसा नहीं कर सकते। हमें तो श्रीश्यामसुन्दर स्वयं ही पधारकर आलिंगन, स्पर्श दें, तब हमारी इच्छा पूर्ण हो। अतः इस 'तम' को दूर करनेके लिये यह इनका यत्न है; क्योंकि ये बड़े हैं—दिव्य हैं—उदार हैं, निःस्वार्थ भावसे परोपकार करना महानुभावोंका स्वभाव होता है। परंतु यह इनकी दिव्यता सर्वसाधारणको नहीं ज्ञात है, जैसे भगवान् श्रीकृष्णका ईश्वरत्व सब नहीं जान सके; वैसे ही इनका वास्तविक स्वरूप अप्रकट है। इनका दिव्य स्वरूप, श्रीयमुनाका मणि-हीरक-रचित तट और वहाँ दुग्धधाराप्रवाह यदि साधारण जनवेद्य हो जाय तो तुरन्त पहरा बैठ जाय, परंतु किन्हीं महानुभावोंको यह सब सदा साक्षात् रहता है। ऐसे ही एक महानुभावने एक अभिमानी सम्राट्को यहाँका एक पत्थरका टुकड़ा बतलाया, जो बहुत मूल्यवान् हीरकखण्ड था; सम्राट्का समस्त साम्राज्य भी उस टुकड़ेके बराबर नहीं निकला। हाँ तो इस दृष्टिसे 'तमोऽपहत्यै' प्रकाश करनेके लिये, लोगोंको बोध देनेके लिये 'तरु जन्म' है। जिस समय अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक अप्रकट—गुप्त रहकर लीला करते हैं, उनके परिकर भी छिपकर लीलामें सम्मिलित होते हैं। ब्रजांगना कहती हैं, हे तरुओ! उसी स्वरूपमें आप वृक्ष हो, आपने हमारे प्राणप्यारेको इधर कहीं जाते देखा हो तो कहो। हम आपका बड़ा अनुग्रह मानेंगी। ब्रजांगनाओंकी बहुत मिन्नत-आरजू करनेपर भी जब आशा पूर्ण न हुई, तब वही निन्दामें बदल गयी—'सखि! रूप और गुणकी बात तो दूर रही, पहले इसका नाम ही देखो कैसा डरावना है— 'नाग-सर्प!' श्रीश्यामसुन्दरने भी प्रेमहालाहलसे हम सबको वियोगमें विमोहित किया और ये भी उसी प्रकार कष्ट दे रहे हैं। इसके अतिरिक्त यह पुन्नाग है, पुरुष जाति बड़ी कठोर होती है, वह हम अबलाओंके कष्ट नहीं जानती। चलो सखि, ये नहीं बतलायेंगे।' यों जब ब्रजांगना निराश होती हैं, तब उनसे असूया करती हैं। भाव यह है कि जिससे श्रीश्यामसुन्दरका पता मिले, उसकी स्तुति है। जो श्रीकृष्णतत्त्वको नहीं बतला सकते, उनकी स्तुति ही क्या ? एक मुग्धा अनभिज्ञा नायिकाने प्रश्न किया— 'आखिर सखि! श्यामसुन्दर चले क्यों गये?' इसपर एकने उत्तर दिया—'इसलिये कि अकेले श्रीघनश्यामको
तुम अनेकोंने घेर लिया, इससे वे डरकर भाग गये।' दूसरी कहने लगी—'अरे नहीं, वे तो परम बलवान् हैं,—'रामानुजो मानिनीनाम्' श्रीबलरामके अनुज हैं, स्वयं भी बलवान् फिर भाईका भी बल, कहीं उनसे कह दें तो एक मुशल-प्रहारमें ही वारा-न्यारा हो जाय। इसलिये सखि, उन्हें हमसे कैसा डर? अतः यह बात नहीं, वस्तुतः वे हमारे मानापनोदनार्थ कहीं छिप गये हैं।' यह रासलीला श्रीरासेश्वरीके मनको आमोदित करनेके लिये हुई। उनकी यह इच्छा हुई कि 'श्रीगोपीजनवल्लभ आकर समस्त गोपियोंके साथ कैसे विहार कर सकते हैं' यह देखें। वैसे ही श्रीवृषभानुनन्दिनीके एक-एक अंगसे अनेक-अनेक गोपांगनाओंका प्राकट्य हुआ है। अवान्तर प्रयोजन यह भी कि श्रुतिरूपा, मुनिरूपा गोपियोंको भी प्रसन्न किया जाय। उत्तम लीला तब बने, जब सब सख्यभावापन्न हों; परंतु यहाँ सबमें समान भाव हो गया—'हम भी श्यामसे वेणी गुँथायेंगी, हम भी पादसंवाहन करायेंगी' और होना चाहिये था यह भाव केवल एक श्रीराधाजूमें ही। श्रीश्यामसुन्दर तो अपनी अभिन्नात्मा एक श्रीवृषभानुललीके प्राकट्यपर ही रास कर सकते थे; उन्होंने एक उन्हें ही महत्त्व देकर उन्हें ही प्रसन्न करनेके लिये रास चाहा था, पर जब सबमें समान भाव आ गया, तब वे भाग गये। 'बह्व्यः सपत्न्य इव गेहपतिं लुनन्ति॥' (श्रीमद्भा० ७।९।४०) वाली बात वे कैसे सहते? परंतु इसका भी समाधान हुआ—अनन्तसमुद्रतरंग महासमुद्रके परतन्त्र हैं। इसी आशयसे श्रीभगवच्छंकरपादने भी कहा है— 'सत्यपि भेदापगमे, नाथ! तवाहम्, न मामकीनस्त्वम्। सामुद्रो हि तरङ्गः क्वचन समुद्रो न तारङ्गः।' भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र पूर्णपुरुषोत्तम हैं, महानायक हैं; अनेक गोपियोंसे डरकर वे भाग नहीं सकते। गोपांगना अनेक रहें, अनन्त रहें, कोई बात नहीं; परंतु वहाँ जो मान, ईर्ष्या, असूया आदिकी सृष्टि हो गयी, यही ठीक नहीं हुआ। भगवान् वहाँ नहीं विराजते जहाँ ईर्ष्या आदि हों। यदि इन भावोंसे गोपांगनाएँ महाराससौख्यरसास्वादमें विघ्न हो गयीं तो ये इनके मान-दर्प आदि तो भगवान्के एक स्मितमात्रसे दूर हो जाते हैं। उन्हें श्रीशुकदेवजीके कविनिबद्व वक्तृप्रौढोक्तिद्वारा 'दर्पहरस्मित' कहा है। ऐसी स्थितिमें भगवान् अन्तर्हित क्यों हुए? ये सब व्रजांगनाओंके उक्तिवैचित्र्य हैं। पहले एक नायिकाकी शिकायत थी, 'वे चोर हैं, मनोरत्नमंजूषाको चुरा ले गये।' अब मानवतियोंकी शिकायत है, 'वे दर्प-मान चुरा ले गये, हमारा सर्वस्व लूट ले गये, हाय! हम अब क्या करें? श्यामसुन्दरने अपने 'स्मित' से हमारा मान चुरा लिया, हमें निर्धन बना दिया। अतः हम अपना मान खोजने जा रही हैं। बतलाओ, हे पुन्नाग! बतलाओ, वे कहाँ गये?' 'अबला बालाओ! तुम उन्हें कैसे धरोगी?' इसपर कहती हैं—'रामानुजो मानिनीनाम्' श्रीबलरामसे हम जरा लज्जा करती हैं, वे तो उनके छोटे भाई हैं और छोटे होनेसे ही निर्बल। हम उन्हें बाहुलतासे वेष्टित और नयनशरसे विद्ध करके आँचलसे बाँधकर रखेंगी। फिर वे निर्बल हैं, तभी तो भाग गये। यों इस प्रसंगमें मुग्धा, मध्या, प्रगल्भा आदि नायिकाभावापन्न गोपांगनाओंके भाव हैं। लोकमें जब भावुक अपनेको अभीष्टपूर्ति- प्रसंगमें समर्थ नहीं पाता, तब वह आश्रय लेता है महान्का, देवका। उसमें स्त्रीहृदय-मातृहृदय कोमल होता है, परदुःखसे सत्वर द्रुत होता है। भावुकशेखर श्रीगोस्वामीजीने अपनी 'विनय-पत्रिका' के ४१वें पदमें 'श्रीरघुनाथजी मेरी सुध लें' इसके लिये श्रीजनकनन्दिनीजीसे प्रार्थना की है—'कबहुँक अंब, अवसर पाइ। मेरिऔ सुधि द्याइबी, कछु करुन- कथा चलाइ॥' वस्तुतः श्रीश्यामसुन्दर कृष्णतत्त्वका— निर्गुण निराकारका सम्मिलन अधिगति शक्तितत्त्वकी आराधना भी ब्रह्मविद्याद्वारा ही होती है। 'केनोपनिषद्' में एक कथा है—इन्द्र, वायु, यम, वरुणादि देवोंको गर्व हो गया। उसे दूर करनेके लिये तेजःपुंज रूपमें 'ब्रह्म' प्रकट हुआ। उसे देवता नहीं पहचान सके— 'यह कौन है?' उसका पता लेने एक-एक देवता गये। अग्निदेव पहले उसकी परीक्षा लेने गये, पर जाज्वल्यमान उस तेजोराशिको देखकर बोलनेकी
श्रीरामपञ्चाध्यायी ३७५ हिम्मत न पड़ी। तब उस तेजःपुंज यक्षने कहा- तुम कौन हो, तुम्हारा क्या सामर्थ्य है? अग्निने उत्तर दिया-'मैं अग्नि हूँ। सबको क्षणभरमें जला सकता हूँ।' यक्षने उसके सामने एक तृणखण्ड रख दिया। कहा- 'इसको जला दो।' बहुत जोर लगानेपर भी अग्नि उसे नहीं जला सका। लज्जित होकर लौट आया। इसी प्रकार क्रमसे वायु, वरुण सब गये, पर उस तिनकेको न वायु उड़ा सका, न जल गला सका, सब हतप्रभ होकर लौट आये। अन्तमें इन्द्र गये। इस अवसरपर वह तेजःपुंज अन्तर्हित हो गया। इन्द्रको इससे बड़ा पश्चात्ताप हुआ-'हा, मुझे तो उस तत्त्वके दर्शनतक न हुए।' फिर इन्द्रने ब्रह्मविद्याकी आराधनासे उसकी सहायतासे उस तत्त्वका ज्ञान प्राप्त किया। देवताओंका दर्प मिट गया। भगवान् श्रीरामके उपासक श्रीजानकीमाताकी स्नेहभरी अनुकम्पासे श्रीरामतत्त्वके साक्षात्कारमें सफलप्रयत्न होते हैं। भगवान्की अन्तरंग शक्ति उनकी अपेक्षा कोमल मानी जाती है। स्तुतिकुसुमांजलिकार श्रीजगद्धरभट्टने अपनी स्तुतिमें सरस्वतीसे कहा- मातः सरस्वति ! आप व्याकुल, हताश न होओ, धैर्य धारण करो, अवश्य भगवान् शिव आपकी सुध लेंगे, आप गुणगान करती चलो। फिर, उस दरबारमें आपका पक्ष समर्थन करनेवाली, श्रीगंगा, चन्द्रकला और पार्वती उपस्थित हैं। वे प्रसंग पड़नेपर आपका पक्ष समर्थित करेंगी; क्योंकि स्त्री अपनी स्त्री जातिका अवश्य पक्षपात करती है। यदि भगवान् कठोर हैं तो वे उन्हें कोमल बना देंगी— मात: सरस्वति बधान धृतिं त्वदीयां विज्ञप्तिमार्त्तिविधुरां विभवे निवेद्य। देवी शिवा शशिकला गगनापगा च कुर्वन्त्यवश्यमबलाजनपक्षपातम् ॥ (स्तोत्र ११, श्लोक २४) अगले श्लोकमें कहा-हे सरस्वति ! यदि आप यह समझती हो कि 'चन्द्रलेखा' स्वभावसे ही कुटिल है-टेढ़ी है और गंगा नित्य तरंगिता-अनिश्चित बुद्धिवाली है, इनसे सहायताकी सम्भावना नहीं; तब भी कोई चिन्ता नहीं; क्योंकि भगवती जगदम्बा पार्वती तो वहाँ विराजमान हैं ही, वे शैलराजकी पुत्री हैं-सद्वंशकी सन्तान हैं, कुलीन हैं। अतएव दयार्द्रहृदया हैं, पराये दुःखसे अकारण ही उनका हृदय पिघल जाता है। वे अवश्य आपको मदद देंगी— एषा निसर्गकुटिला यदि चन्द्रलेखा स्वर्गापगा च यदि नित्यतरङ्गितेयम्। देवी दयार्द्रहृदया तु नगेन्द्रकन्या धन्या करिष्यति न ते निबिडामवज्ञाम् ॥ (स्तोत्र ११, श्लोक २५) सारांश यह कि काम न चलनेपर सबको अबलाओंकी शरण लेनी पड़ी है। यहाँ गोपीजनने भी यही निश्चय किया-ये वृक्ष-पुरुष हमारी पीड़ा नहीं जानते। चलो, इस तुलसीसे पूछें, ये परम अन्तरंगा हैं। गोपांगनाओंका तुलसी आदिसे श्यामसुन्दरके विषयमें पूछना कच्चित्तुलसि कल्याणि गोविन्दचरणप्रिये। सह त्वालिकुलैर्बिभ्रद् दृष्टस्तेऽतिप्रियोऽच्युतः ॥* (श्रीमद्भा० १०।३०।७) हे तुलसि ! आपकी तुलना जगत्में नहीं है। एक बार श्रीनारदजी कल्पवृक्षका पुष्प लाये, उसे श्रीकृष्णको समर्पित किया। उन्होंने श्रीरुक्मिणीको दे दिया। नारदजीको अवसर मिला, नारदविद्या करनेका। उन्होंने झट श्रीसत्यभामासे जाकर कहा-'आप कहती थीं, 'मैं भगवान्को अति प्रिय हूँ।' पर वह पुष्प तो उन्होंने आपको नहीं दिया।' नारदजीका मन्त्र चल गया। श्रीसत्यभामा मान करके बैठ गयीं। श्रीकृष्णको यह सब ज्ञात हुआ। वे श्रीसत्यभामाके पास गये। उनको समझाया-'हम तुम्हें कल्पवृक्ष ही ला देंगे' और ला भी दिया। घूमते-घामते श्रीनारद फिर वहाँ आ निकले। सत्यभामाने उन्हें अपना सौभाग्य बतलाया। उन्होंने दानके गीत गाकर कल्पवृक्षके सहित श्रीकृष्णको दान
- (अब उन्होंने स्त्रीजातिके पौधोंसे कहा-) 'बहन तुलसि ! तुम्हारा हृदय तो बड़ा कोमल है, तुम तो सभी लोगोंका कल्याण चाहती हो। भगवान्के चरणोंमें तुम्हारा प्रेम तो है ही, वे भी तुमसे बहुत प्यार करते हैं। तभी तो भौंरोंके मँडराते रहनेपर भी वे तुम्हारी माला नहीं उतारते, सर्वदा पहने रहते हैं। क्या तुमने अपने परम प्रियतम श्यामसुन्दरको देखा है?'
३७६ भक्तिसुधा कर देनेकी सलाह दी। इस दान लेनेके अधिकारीकी खोज होनेपर स्वयं नारद दानपात्र बने। श्रीसत्यभामाने श्रीकृष्णसे कहा—'नाथ, जन्मजन्मान्तरमें मैं आपकी ही दासी बनूँ, आप ही मुझे मिलें, एतदर्थ मैं आपको दान कर देना चाहती हूँ।' दान हो गया। अब श्रीकृष्णसे नारदजीने कहा—चलिये, आप मेरा कमण्डलु उठाइये। मुझे आप महादानमें मिले हैं। श्रीकृष्ण नारदके साथ चल पड़े। अब तो बड़ी आफत मची। श्रीसत्यभामाने स्वप्नमें भी यह नहीं विचारा था कि इस दानसे उन्हें श्रीकृष्णसे वियुक्त होना पड़ेगा। अन्ततोगत्वा श्रीनारद किसी तरह मनाये गये। श्रीकृष्णके बदलेमें उनके बराबर हीरे, माणिक्य, जवाहरात सब तराजूमें चढ़ाये गये, पर श्रीकृष्णका पलड़ा हिलातक नहीं। श्रीसत्यभामा परेशान थीं, किंकर्तव्यविमूढ़ थीं। उधर श्रीरुक्मिणीको इस काण्डका पता लगा, वे आयीं। उन्होंने एक प्रकार निकाला, कहा—बहन, यह सब हीरेकी हारें उतार दो, इनकी जगह एक तुलसीदल, केवल एक तुलसीदल रखो। ऐसा ही हुआ। श्रीकृष्णका पलड़ा ऊपर उठ गया। यह है तुलसीका महत्त्व। अतएव तुलसीदलपर श्रीकृष्ण अपनेको बेचते हैं, जिसकी इच्छा हो, खरीद ले—'तुलसीदलमात्रेण जलस्य चुलुकेन च। विक्रीणीते स्वमात्मानं........' इन दृष्टियोंसे गोपांगनाओंने कहा—गोविन्दचरणप्रिये— हे तुलसि! आप परम सौभाग्यवती हो, कल्याणी हो। हम तो श्रीश्यामविप्रयोगसे अति तप्त हैं, पर आपका उनसे कभी विच्छेद होता ही नहीं। आपको श्रीगोविन्दके चरण अतिप्रिय हैं। वैसे वैजयन्तीमालाके साथ भगवान्के वक्षःस्थलमें भी तुलसी विराजमान है, पर उसे उनके श्रीचरणोंसे ही अनुराग है। जैसे तुलसीको भगवान् प्रिय हैं, तुलसी भी भगवान्को वैसे ही प्रिय हैं। कहा है— 'तेऽतिप्रियोऽच्युतः.....' इस अच्युतसे यह बतलाया गया है कि तुलसीका भगवत्पादारविन्दसे कभी विश्लेषण होता ही नहीं, उसका अविघटित सम्बन्ध है। यहाँ 'गोविन्दचरणप्रिये।' (श्रीमद्भा० १०।३०।७) इस पदमें 'चरण' से पूज्यता ली गयी है; क्योंकि आगे गोपियोंने कहा—श्रीतुलसीकी माला मोहनके वक्षःस्थलपर विराजमान है, उसके मकरन्दरसामृतके लोभी भ्रमर भी उसे घेरे हैं। यदि चरण ही प्रिय होता तो 'सह त्वालिकुलैर्बिभ्रद् दृष्टस्तेऽतिप्रियोऽच्युतः॥' (श्रीमद्भा० १०।३०।७) आदि कैसे कहा जाता? अस्तु। यहाँ व्रजांगना तुलसीका भाग्य सराह रही हैं—सखि तुलसि, देखो! एक हमारा भाग्य है और एक आपका। हमें वे श्यामविहारी दर्शन देनेसे भी जी लुका रहे हैं, हम कोई भार नहीं, हम चरणस्पर्शमात्र चाहती हैं। आप तो उनके विशाल वक्षःस्थलपर विराजमान हो। हमें तो वह अति दुर्लभ है, रंककी साम्राज्य-कामना है। हमने सब कुछ छोड़ा; गुरुजनलज्जा आदि सबको तिलांजलि दी। तब जन्म-जन्मकी तपस्यासे वह प्राणाधार आज प्राप्त हुए थे, परंतु हम प्राप्त न कर सकीं। देखो सखि! तुलसि! हमारे साथ कोई उपद्रव नहीं और आपके साथ ये भौंरेके झुण्ड मँडरा रहे हैं, इतनेपर भी यह आपका ही सौभाग्य है, जो इन सबके साथ वे देवकीसुत आपको धारण किये रहते हैं। हम तो अलिकुल-मालासे व्याप्त नहीं हैं—अलिकुलसंकुल नहीं हैं, फिर भी दर्शनतक नहीं देते, छिपते फिरते हैं। आप अति प्रिय हो। प्रिय लक्ष्मी भी है। उनके वामवक्षपर वामावर्त सुवर्णरोमराजी भी लक्ष्मी ही है। 'हारहास उरसि स्थिरविद्युत्।' (श्रीमद्भा० १०।३५। ४) वह वहाँ लताकी तरह विराजमान है। परंतु सखि, आप उनसे भी बढ़कर हो, आप सर्वांगव्यापिनी हो— दोनों वक्षःस्थलोंपर विराजती हो, वह भी भौरोंके साथ। इससे लक्ष्मी अवश्य नाराज होती होंगी—'मेरी छातीपर सौत बिठा दी।' सो यहाँ तो साक्षात् ही तुम्हें धारण करके सौत बैठा दी। देवकृत भगवत्स्तुतिसे भी प्रसंग पुष्ट होता है— पर्युष्टया तव विभो वनमालयेयं संस्पर्धिनी भगवती प्रतिपत्नीवच्छ्रीः। यः सुप्रीतममुयार्हणमाददन्नो भूयात् सदाङ्घ्रिशुभाशयधूमकेतुः॥ (श्रीमद्भा० ११।६।१२) श्रीलक्ष्मीके लिये सापत्न्यभावके विषयवाली उस सूखी वनमालासे सम्पादित भक्तके पूजनको सुसम्पादित बहुत उत्तम माननेवाले हे प्रभो! आपका
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श्रीरासपंचाध्यायी ३७७ चरणारविन्द हमारे पापोंको नष्ट करे। वनमाला पतिदेवके दर्शनकी लालसा अथवा व्रजवासियोंकी वन्यपुष्पस्तवकोंकी बनी है, उसमें तुलसी मिश्रित है— सेवाके निमित्त व्रजमें सदा रहती हैं। यहाँ 'श्रयते' तुलसीकुन्दमन्दारपारिजातसरोरुहैः। यह आत्मनेपद है। इसका अभिप्राय यह कि यहाँ पञ्चभिर्ग्रथिता माला वनमाला प्रकीर्तिता ॥* श्रयणका फल कर्तृगामी, आत्मगामी है अर्थात् श्रीरमा वह इस समय बासी हो चुकी, कुरकुराती है, अपनेको सौभाग्यशालिनी बनानेके लिये व्रजमें नित्य चुभती भी है, परंतु वह भक्तकी पहनायी हुई है, उसे ही निवास करती हैं। वैकुण्ठमें श्रीनारायणके समीप जबतक भक्त नहीं उतार दे, प्रभु नहीं उतारते। लक्ष्मी तो वह 'श्रयते' सेव्या है। यहाँ सेविका है। इन उससे प्रतिस्पर्द्धा करती है—'संस्पर्धिनी भगवती भावोंसे यह स्पष्ट है कि श्रीराधा तथा उनके प्रतिपत्निवच्छ्रीः।' भगवान् लक्ष्मीकी नाराजगीकी लोमकूपोंसे उत्पन्न नित्यसिद्धा आदि सखी लक्ष्मीसे परवाह न करके उसे धारण किये हैं। 'पर्युष्टया'— कहीं अधिक बढ़कर हैं, पर वे इस समय अपनेको पर्युषितया (इडभावश्छान्दसः) 'वशकान्तौ' से बना भूलकर वैसा कह रही हैं। हाँ तो व्रजांगना तुलसीसे है। यह तुलसीमाला सर्वांगमें कान्तिमती बनकर कहती हैं—आप लक्ष्मीसे भी बढ़कर हो, आपको विराजती है। व्रजांगना कहती हैं—अतः तुम अतिप्रिया श्यामसुन्दरने अपना समस्त वक्षःस्थल समर्पित कर हो तुलसि! वैसे सर्वाधिकसौभाग्य श्रीरासेश्वरीज्यू दिया। 'गोविन्दचरणप्रिये' पदमें चरणका अर्थ आदिका ही है, पर इस समय अपने सौभाग्यको आचरण—चेष्टा या लीला है 'गोविन्दस्य चरणम्- भूलकर साधारणके प्रेमको सिहाती है। पीछे भी आचरणम्, चेष्टा, लीला वा प्रिया यस्या सा कहा—'पूर्णाः पुलिन्द्य उरुगायपदाब्जरागश्रीकुङ्कुमेन तत्सम्बुद्धौ' जिसका आशय यह हुआ कि हे तुलसि! दयितास्तनमण्डितेन।' (श्रीमद्भा० १०।२१।१७) आपको श्रीगोविन्दकी लीला अत्यन्त प्रिय है। आपको सखि, हम तो अपूर्ण हैं, 'पुलिन्द्यः पूर्णाः' सापत्न्यभाव भी है। श्रीश्यामसुन्दरके कम्बुकण्ठमें दयितास्तनमण्डितकुंकुमसंलग्न पादसे प्राणधन दूर्वामें विराजमान मुक्तावैजयन्ती आदि किसी (माला)-से घूमे, इससे वह कुंकुम दूर्वामें लग गया, उसे सुन्दर आपको द्वेष भी नहीं है। आप कल्याणी हैं। आप पाकर पुलिन्दियोंने अपने शरीरमें लपेट लिया। वे श्यामप्रिया हैं। हमें बताओ, आपने उन्हें कहीं इधर कृतकृत्य हो गयीं। परंतु इससे उनके मनमें स्मरका देखा है? ('स्मरणं स्मरः') उद्रेक हुआ। पुनः उसी कुंकुमको हे तुलसि! आप स्वयं मंगलमयी हो, अपने लगाकर उन्होंने उसे दूर किया। अतः वे धन्य हैं। हम आराधकको—भक्तको भी मांगल्य प्रदान करती हो। तो अनन्त कालसे उसका सेवन कर रही हैं, फिर भी जो भक्त आपको श्रीकृष्णभगवान्के श्रीकण्ठमें, श्रीचरणमें कृतकृत्य न हुईं।' इस प्रकार ये सब गोपांगना समर्पित करते हैं, उन्हें आप उनसे मिला देती हो, आप अपनेको भूलकर प्रेमविभोर बनी ऐसा कह रही हैं। कल्याणी हो। हमें भी बतलाओ, श्रीश्यामसुन्दर किस इसपर एक प्रसंग और भी है— तरफ निकल गये हैं? हे सखि! आपको श्रीगोविन्दके 'जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः चरण और आचरण, लीलादि भी अति प्रिय हैं। हम श्रयत इन्दिरा शश्वदत्र हि।' सबको भी वे श्रीगोकुलेन्द्र गोविन्दचरण तो अवश्य (श्रीमद्भा० १०।३१।१) प्रिय हैं, परंतु यह उनका आचरण प्रिय नहीं है—जो आपके जन्मसे व्रजका सौभाग्य खूब बढ़ा, वह हमें वियोगिनी बनाकर छिप गये हैं। सखि! आपको सर्वदेशशिरोमणि माना गया। श्रीलक्ष्मी यहाँ श्रीश्यामरूपमें उनके वियोगका कभी अवसर ही नहीं आया। कारण अवतीर्ण श्रीविष्णुदर्शनार्थ ही केवल नहीं आयीं, कि आप सौभाग्यवश अनुकूल आचरणमें ही रहीं। जब अपितु वे शाश्वत नित्य यहाँ रहती हैं। वे अपने आप वृन्दा थीं, तब भी अनुकूल आचरणमें रहीं। हम * तुलसी, कुन्द, मन्दार, पारिजात तथा कमल—इन पाँच पुष्पोंसे गूँथी हुई माला वनमाला कहलाती है।
३७८ भक्तिसुधा तो आर्यधर्मादिको त्यागकर उन्हें चाहती हैं, तब वे मिलते नहीं, पर आप नहीं चाहती थीं, तब भी जालन्धर-वेशसे उन्होंने आपको ग्रहण किया। अन्तमें वर भी दिया—'कभी विप्रयोग न होगा।' भोग लगनेके समय और सब हट जायें, भोग-रागमें कमी हो जाये, पर आप नहीं हट सकतीं, आपकी कमी नहीं हो सकती। आपके बिना भोग ही नहीं लग सकता। देखो सखि तुलसि ! आपको मकरन्दलोभी भ्रमरोंसे संकुलित होनेपर भी भ्रमरोंकी गुनगुनाहट और लक्ष्मीकी नाराजगीकी परवाह न करके भी उन्होंने धारण किया है। एतावता यह भी बतलाया कि 'आप बहुवल्लभा हैं— 'बहवो वल्लभा यस्याः', तब भी वे आपको धारण किये हैं। पहले 'वृन्दा' रूपमें जालन्धर तुम्हारा वल्लभ था। अब ये मधुलम्पट मिलिन्दवृन्द मकरन्दपानके लिये आपको घेरे हैं, फिर भी सखि, आपको श्रीश्यामसुन्दर धारण किये हैं। हम तो हे तुलसि ! एक वल्लभा हैं, लोकधर्म, कुलधर्म—सब कुछ त्यागकर अपना सर्वस्व उनपर न्योछावर करके उन्हें, केवल उन्हें ही स्वीकार कर चुकी हैं, पर फिर भी वे हमें दर्शनतक नहीं देते। इससे तो उनका सब आचरण आपके अनुकूल पाया जाता है। अतः आप अच्युतकी परमप्रेयसी हो। अतएव वे आपसे सदा अच्युत (अविश्लिष्ट) रहते हैं। अतएव जाना जाता है, आपका बहुत शुद्ध और गाढ़ प्रेम है।' अथवा 'गोविन्दचरणप्रिये' श्रीगोविन्दका चरण ही प्रिय है जिन्हें, ऐसी आप हो। हे तुलसि ! आपने प्रथमसे ही दैन्यभावका आश्रय लिया—श्रीश्यामसुन्दरके श्रीचरणको अंगीकृत किया—दास्यभावसे, दासी होकर, मानिनी या कान्ता बनकर नहीं। आपमें किसी भावका गर्व नहीं, औद्धत्य नहीं, अतएव 'तेऽतिप्रियोऽच्युतः।' कभी उनसे आपका विश्लेष नहीं। हममें तो सखि तुलसि ! 'मान' है और यह बड़ा दोष है। यह इसीका फल है, जो हमें आज असह्य विप्रयोग हो रहा है। आप गोविन्दचरणप्रिया हो। जिन्हें श्रीचरण प्रिय होते हैं, उन्हें कभी वियोग नहीं होता। यही विशेषता है। यही दास्यभावकी महिमा है। श्रीमद्वल्लभाचार्यजीका कथन है—श्रीचरणरजसे ही भक्त बनते हैं। अतः उनका श्रीभगवान्से विश्लेष नहीं होता। यह उस रजमें खास बात है। अतएव कहा भी है— श्रीर्यत्पदाम्बुजरजश्चकमे तुलस्या लब्ध्वापि वक्षसि पदं किल भृत्यजुष्टम्। यस्याः स्ववीक्षणकृतेऽन्यसुरप्रयास- स्तद्वद् वयं च तव पादरजः प्रपन्नाः॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।३७) कृपा करके श्रीभगवान्ने लक्ष्मीको अपने वक्षःस्थलपर स्थान दिया। यह नायिकाका परम सौभाग्य है, पर लक्ष्मी डरती रही। वह जानती थी— श्रीचरणाम्बुजरजके बिना वियोग हो जाता है। अतः इतना ऊँचा स्थान पाकर भी उसने चरणरज ही चाहा, इसके लिये उसने तपस्या की—'यद्वाञ्छया श्रीर्ललनाचरत्तपः...।' (श्रीमद्भा० १०।१६।३६) पहले भी श्रीलक्ष्मीका ऊँचा ही स्थान था, ब्रह्मादि- स्तम्बपर्यन्त उसके अपांगमोक्षकी—जरा-सा देख देनेभरकी कामना किया करते थे। इसपर भी उसे सन्तोष नहीं था। अपने कमलोंके कोमल भवनको छोड़कर श्रीभगवान्के पाद-पंकजरजको ही उसने उत्तम आश्रय समझा— ब्रह्मादयो बहुतिथं यदपाङ्गमोक्ष- कामास्तपः समचरन् भगवत्प्रपन्नाः। सा श्रीः स्ववासमरविन्दवनं विहाय यत्पादसौभगमलं भजतेऽनुरक्ता॥ इस प्रकार श्रीमन्नारायणके विशाल वक्षको— निःसपत्न स्थानको पाकर भी श्रीलक्ष्मी उनके सपत्न स्थान श्रीचरणोंको ही चाहती रहीं। श्रीभगवान्के चरणारविन्दकी महिमा ही ऐसी है। उनके चरणोंमें विराजमान वनमालाके गुच्छ आदिसे उत्थित, मकरन्दसे मिश्रित वायुका झोंका सनकादिके नासाविवरमें जाते ही उनके चित्त और तनु दोनोंमें क्षोभ उत्पन्न कर देता है। बरबस ब्रह्मचिन्तनसे उनका मन चंचल हो जाता है— तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द- किञ्जल्कमिश्रतुलसीमकरन्दवायुः । अन्तर्गतः स्वविवरेण चकार तेषां सङ्क्षोभमक्षरजुषामपि चित्ततन्वोः ॥ (श्रीमद्भा० ३।१५।४३) उसी महत्त्वको समझकर श्रीमहालक्ष्मी तुलसीके
श्रीरासपंचाध्यायी ३७९ साथ—सपत्नीके साथ भी श्रीभगवान्के चरणरजको ही चाहती हैं। अतएव तुलसी, दीर्घदर्शिनी तुलसी पहलेसे ही उस महामहिमपदाम्बुजको ग्रहण किये रहती है; क्योंकि लक्ष्मीको सदा यह भय रहता है कि कोई श्रीमद्भगवच्चरणरज-उपासक महातपस्वी मुझे अपने वशमें न कर ले। इसलिये श्रीमद्भगवद्विप्रयोगसे बचे रहनेके लिये वह निरन्तर उनके पादाम्बुजरजमें संलग्न रहती है। तुलसी इस बातको समझती है, अतः वह पहलेहीसे उन चरणोंमें लिपटी रहती है। तभी श्रीश्यामसुन्दर उसके लिये अच्युत हैं। इस प्रकार जो चरणप्रिया है, वही प्रियतमके वक्षःस्थलपर स्थान पाती है। इसी प्रसंगपर एक दूसरी दृष्टिसे व्रजांगनोक्ति है—सखि तुलसि! ये मधुव्रत जो गुंजारव कर रहे हैं, यह वस्तुतः आपका यशोगान कर रहे हैं। सखि! आपको तो क्या, आपके कारण आपके अनुरागी भौंरोंतकको भगवान् श्यामसुन्दर नहीं हटाते अथवा ये भ्रमर क्या हैं? ये उनकी मूर्तिमती अभिलाषा हैं; क्योंकि वे श्यामल हैं, अतः ये भी श्यामल हैं। हे तुलसि ! आपने उन्हें ऐसा वशमें किया है कि वे अपने मनोरथोंको मूर्तिमान् बनाकर उनके द्वारा आपका यशोगान किया करते हैं और आपका मकरन्द पान किया करते हैं। आप धन्य-धन्य हो। सखि! हमें भी उनसे मिला दो—गोविन्दचरणप्रिये! हम तो श्रीमुखचन्द्रकी अधरसुधाकी पिपासु हुईं, मानिनी हुईं, अतः भटक रही हैं। सखि! आप चतुर हो। अथवा— कच्चित्तुलसि कल्याणि गोविन्दचरणप्रिये। सह त्वालिकुलैर्बिभ्रद् दृष्टस्तेऽतिप्रियोऽच्युतः॥ (श्रीमद्भा० १०।३०।७) हे तुलसि ! हमलोग तो ऐसी हतभागिनी हैं कि हमपर श्रीश्यामसुन्दर सदा 'अच्युत' रहते हैं—कभी भी कृपासे—प्रेमसे—द्रवीभूत नहीं होते। आप बड़ी सौभाग्यशालिनी हो। अनुकम्पा करके हमें बतलाओ, आपने उन प्राणजीवनको इधर कहीं देखा है? अथवा 'गोविन्दचरण' में 'चरण' पद आदरार्थक है, जैसे— गुरुचरण, पितृचरण; इसके अनुसार—परम आदरणीय गोविन्द गोकुलेन्द्र जिसे प्रिय हैं, वह तुलसी उनकी अतिप्रिया है। अतः कभी भी उनसे उसका वियोग नहीं है। अथवा—'गोभिः श्रुतिभिः विन्द्यते— प्राप्यते यः स गोविन्दः' अर्थात् जो वेदके द्वारा प्राप्त किया जा सके, वह हुआ गोविन्द, कहा भी है— 'वेदान्तवेद्यचरणेन मयैव गीतम्' अर्थात् वेदशास्त्रके महातात्पर्यका विषय ही अत्यन्त प्रिय है जिसे, ऐसी हे तुलसि ! आपने यहाँ कहीं उन मनमोहनको देखा हो, बताओ। आपको उनसे बड़ा प्रेम है। देखो, अभी-अभी उन्होंने अपनी वनमालामें आपको नोंचकर लगाया है। अभी इधर गये हों, बता दो। यहाँ जिससे वे पूछ रही हैं, वह तो तुलसीका क्षुप है और यह यहाँ लगा है। इससे इस समय श्रीकृष्णका कोई सम्बन्ध नहीं। व्रजांगना भी इस बातको जान रही हैं, तब उनकी यह सब प्रश्न-परम्परा श्रीचरणधृत तुलसीसे होगी। परंतु वह तो उन्हें दीखती ही नहीं; तब प्रश्न वे किससे कर रही थीं? ऐसे संशयपर यह समाधान समझना चाहिये कि जंगलमें खड़ी तुलसीकी सजातीय श्रीचरणधृत तुलसीसे गोपांगनाओँने प्रश्न किया। श्रीकृष्ण इधरसे निकले तो उनके साथ वर्तमान तुलसी इस तुलसीसे मिलती गयी, इससे इस वनस्थ तुलसीको यह भी मालूम हो गया कि श्रीश्याम इधर पधारे हैं। अब वह गोपांगनाओंको उत्तर दे, न दे, यह बात दूसरी है। परंतु इन दृष्टियोंसे प्रष्टव्यता उसमें अवश्य है। अब तुलसीसे मानिनी गोपांगना पूछती हैं— 'हे सखि! उन अतिप्रिय श्यामको तुमने इधर कहीं देखा हो तो बतलाओ। हाँ, वे अतिप्रिय हैं, हमारे- जैसी परप्रेयसियोंका अतिक्रमण करके आ गये हैं। वे तुमपर मुग्ध हैं, विभोर हैं। ऐसे मुग्ध कि संसारकी समस्त वस्तुओंका, प्रिय वस्तुओंका अतिलंघन उन्होंने कर डाला और मधुर मधुपमूर्ति बनकर तुम्हारे पास चले आये। सखि! तुमने उनके चित्तको खूब आकृष्ट किया।' इस प्रकार यहाँ मानिनी उक्तिप्रसंगमें 'अतिप्रिय' पदमें एक ही समासको भिन्नार्थक करके दो चमत्कारिक अर्थोंकी सृष्टि है—'अतिक्रान्ताः प्रियाः अस्मादृशोऽपि येन सः तथा अतिक्रान्तं प्रियं जगद्वस्तुमात्रं येन