भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीरासपंचाध्यायी ३४९
आवश्यकता है। श्रीभगवान्की लीला रोम-रोममें जब स्थायीभावापन्न हो जाय, तब अनुकरण किया जाता है। भक्त भी अनुकरण कर सकता है अथवा लीला ही जब उन्हें स्वयं गृहीत कर ले, तब अनुकरण हो सकता है। भगवान्के लीलानुकरणसे गोपियाँ अपनेको 'मैं श्रीकृष्ण ही हूँ'—ऐसा मानने लगीं जैसे कहीं भक्त भगवान्को ग्रहण करता है तो कहीं भगवान् ही उसे ग्रहण करते हैं। यहाँ उन लीलाओंने गोपप्रमदाओंको गृहीत किया, इसका अधिक स्फुटीकरण इसमें है— गतिस्मितप्रेक्षणभाषणादिषु प्रियाः प्रियस्य प्रतिरूढमूर्तयः। असावहं त्वित्यबलास्तदात्मिका न्यवेदिषुः कृष्णविहारविभ्रमाः॥* (श्रीमद्भा० १०।३०।३) गोपसुन्दरियाँ उस समय अपनी गतिसे हंस, सिंह और गजेन्द्रको भी लजाने लगीं, उनका मन्दहास कामको भी विस्मय उत्पन्न करने लगा। ऐसे ही प्रेक्षण, भाषण आदि हुए। उनके स्वरूपमें गोपललनाओंके मन आदि तल्लीन हो गये। ऐसा अद्भुत अनुरागोद्रेक अन्तःकरणकी कोमलताका द्योतक है। यहाँ अन्योन्यात्मकताका वर्णन है। पहले स्मित आदि स्थिर हुए, फिर वे लीला आदिके साथ गोपरामाओंमें प्रतिबिम्बित हुए और उनका इनमें प्रतिबिम्बन हुआ। गोपांगनाओंके मन, इन्द्रियोंमें गति, स्मित आदि आरूढ़मूर्ति हुए, फिर गति, स्मित आदिमें गोपांगनाचित्त आदि प्रतिरूढ़मूर्ति हुए, परस्पर ऐक्य हुआ। यों श्रीनन्दनन्दन वंशीधर प्रभुका स्वरूप और लीला ब्रजदेवियोंके मन, बुद्धि, अन्तःकरण, रोम-रोममें प्रविष्ट हुई। मूर्ति—कार्यकारणसंघात—अन्तरात्मा प्राणोंमें प्रतिरूढ़ हुई। श्रीभगवान् और उनकी लीला श्रीब्रजदेवियोंमें और श्रीब्रजदेवियोंके मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार आदि श्रीभगवान् और उनकी लीलामें प्रतिरूढ़ हुए। एक यह भी बात है कि उस समय वहाँ श्रीगोपियोंको भगवान्का प्रत्यक्ष दर्शन अथवा उनकी लीलाका ही प्रत्यक्ष दर्शन तो है नहीं, फिर श्रीकृष्णमूर्तिमें यह सब प्रतिरूढ़ कैसे हुआ ? तब इसपर यह समझना चाहिये कि पहले श्रीकृष्ण और उनकी लीला आदि श्रीगोपरामाओंमें—उनके मन, बुद्धिमें प्रविष्ट या आरूढ़ हुए, फिर स्वान्तस्थ अथवा स्वान्तःप्रत्यक्ष श्रीकृष्ण तथा तल्लीलामें श्रीगोपांगनाएँ और तन्मनोबुद्ध्यादि प्रत्यारूढ़ हुए। तभी 'असावहं त्वित्यबलाः' यह कथन संगत हुआ। इस तरह जब अन्योन्यकी एकता हो गयी— श्रीश्यामसुन्दरकी व्रजांगनाओंसे और व्रजांगनाओंकी श्रीश्यामसुन्दरसे एकता हो गयी—अभेद हो गया, तब श्रीगोपबाला कहती हैं—'देखो सखि, हम ही कृष्ण हैं।' यह तन्मयता कैसे ? तब कहा—'अबलाः' (नारी) बलहीन हैं। श्रीमोहन मुरलीमनोहरके विरहमें शक्तिहीन हो गयीं। धैर्य रखना बलका काम है। उसके बिना धैर्य कैसा ? जरासे विप्रयोगमें भी आँख डबडबा आती है—आँसू आ जाते हैं। इतना अधैर्य यद्यपि गुण नहीं, पर यहाँका अधैर्य महागुण है। श्रीश्यामसुन्दरके वियोगमें जितनी ही व्याकुलता हो, तड़फड़ाहट हो, उतनी ही अधिक तन्मयता होती है। नारी धैर्यबलशून्य होनेसे शीघ्र व्याकुल होती है। इनका हृदय बहुत कोमल होता है। इसी कोमलताके कारण वे प्रेमकी अधिकारिणी हैं। फिर व्रजांगनाओंकी कोमलताका तो कुछ ठिकाना ही नहीं। इसी तन्मयता और कोमलताके कारण वे भेद नहीं जान सकीं। इनमें और श्रीकृष्णमें परस्पर प्रतिबिम्बसे अभेद हो गया, तब युक्त ही कहा गया—'असावहं त्वित्यबलाः'। अथवा ऐसी दुर्लभ स्थिति—श्रीकृष्ण परब्रह्मके साथ तादात्म्यापत्तिकी प्राप्ति—निर्बलतासे कैसे होगी ? यह तो बड़े बलका काम है। तब कहा—'अबलाः— अः वासुदेवः बलं यासान्ताः' अर्थात् भगवान् वासुदेव ही जिनका सबसे बड़ा बल हैं, वे व्रजांगनाएँ 'असावहम्' इत्यादि कहने लगीं। वस्तुतः जगत्के
- अपने प्रियतम श्रीकृष्णकी चाल-ढाल, हास-विलास और चितवन-बोलन आदिमें श्रीकृष्णकी प्यारी गोपियाँ उनके समान ही बन गयीं; उनके शरीरमें भी वही गति-मति, वही भाव-भंगी उतर आयी। वे अपनेको सर्वथा भूलकर श्रीकृष्ण-स्वरूप हो गयीं और उन्हींके लीला-विलासका अनुकरण करती हुईं 'मैं श्रीकृष्ण ही हूँ'—इस प्रकार कहने लगीं।