भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४४ भक्तिसुधा हुआ है। ऐसी स्थितिमें इसका अपनोदन क्यों हो ? इसपर वे कहते हैं—जो मान हुआ, वह असामयिक है, वह रस-विच्छेदक होगा। अतः उसे दूर करनेके लिये भगवान् अन्तर्हित हुए। फिर भी अन्तर्हित न होना चाहिये; क्योंकि मानवतीका मान मनाकर अपनोदन करना ही रसमर्यादा है। इसपर कहते हैं— मान आन्तर वस्तु है, बहिरंग नहीं। अतः उनका अपनोदन अन्तर्निहित होकर ही हो सकता है, अतएव भगवान् अन्तर्हित हुए। उन्होंने लीलाविशेषसे विशिष्ट होकर अन्तर्हितताके साथ मानापनोदन किया। अथवा मान हुआ श्रीवृषभानुनन्दिनीको, वह भी सहसा। वे करुणामयी हैं। उनके प्रसाद-लेशसे श्रीश्यामसुन्दरका दर्शन सम्भव है। उनके बिना कृष्णतत्त्वका प्राकट्य ही नहीं। 'आत्मरति' में आत्मा श्रीरासेश्वरी हैं। जैसे गुण और गुणीका तादात्म्य है, वैसे ही श्रीराधा-कृष्ण तत्त्वका तादात्म्य है। कर्पूरमेंसे सौगन्ध निकल जाय तो कर्पूर कुछ नहीं रह जाता। श्रीवृषभानुनन्दिनी जलमें माधुर्यस्थानीया हैं। श्रीश्यामसुन्दरतत्त्वमेंसे माधुर्य निकल जाय तो फिर वह कुछ है ही नहीं। श्रीनन्दनन्दनका आन्तररमण श्रीरासेश्वरीमें ही होता है। बाहरका रमण बहिरंगोंमें है। किसी भावुकके मतसे तो सौगन्धका पृथक् होना और उसके ग्राहक घ्राणका अलग होना, यह बड़ा व्यवधान है, असह्य है। पूरा आनन्द तो तब है, जब पुष्पमें ही घ्राण हो। यह यहीं सम्भव है। उनकी शक्ति उनमें और उनकी शक्ति उनमें रहती है। अतः 'सर्वं वाक्यं सावधारणं भवति'— जहाँ कहीं आत्माका संचार होगा, जहाँ श्रीरासेश्वरीके स्वरूपका संचार होगा, वहीं रमण होगा। श्रीललिता, विशाखा आदिमें रसोदय उनसे सम्बन्ध जुड़नेपर होगा। उनका अनुगमन इसकी तरह हुए बिना रसोदय या रमण नहीं होगा। श्रीरासेश्वरीकी कृपाके बिना श्रीकृष्णको भी रसास्वाद या रमण सम्भव नहीं, अतः दोनोंका तादात्म्य-ऐकात्म्य स्वीकृत हुआ है। फिर श्रीरासेश्वरी परम करुणामयी हैं, इसी बलपर वे कृतकृत्य हुए। जो सखियोंके प्रति यदा-कदा उनमें ईर्ष्यादि दीख पड़ती है, वह सब लीला रससंचारार्थ है। सूक्ष्म विचार करनेपर तो नित्य निकुंजमें मान आदिका प्रवेश ही नहीं। परंतु इन स्थूल मान आदिका ही वहाँ संचार नहीं, सूक्ष्म मान आदि तो रसपोषार्थ वहाँ भी है ही। वहाँ सर्वाधिक सम्प्रयोग है, कभी विप्रयोग होता ही नहीं। तथापि रसकी सब अवस्था प्रकट होती रहती है। नेत्रके उन्मीलन-निमीलनमात्रसे विप्रयोग आदि हो जाते हैं। अस्तु, इसी दृष्टिसे श्रीब्रजेश्वरी रासेश्वरीमें ईर्ष्याका संचार हुआ और मेरे प्रभु, मेरे ही प्राणधन अन्योंको भी ऐसा मान देते हैं, इस तरहका मान उत्पन्न हुआ तथा अन्योंमें गर्वका उदय हुआ। अतः 'प्रशमाय प्रसादाय तत्रैवान्त- रधीयत'। अहो ! प्रभुकी भक्तवश्यता ? जो प्रभु केशव हैं, 'कश्च ईश्च केशौ तावपि वशयतीति सः' अर्थात् ब्रह्मा तथा रुद्रको भी जो वशमें रखनेवाले हैं, वे भगवान् गोपीगर्वापहारार्थ अन्तर्धान हुए, परंतु यह ऐश्वर्य श्रीरासेश्वरीका मान दूर करनेमें कैसे समर्थ होगा ? वहाँके माधुर्य-साम्राज्यमें इसका प्रवेश भी कहाँ ? इसलिये वहाँ तो भगवान् श्रीराधारानीकी 'वेणुगूंथन' सेवा करके उनका मान मनायेंगे। इस पक्षमें 'केशव' की व्युत्पत्ति होगी—'केशान् वयते संस्करोतीति केशवः।' भगवान् अपनी योगमायासे ही अन्तर्हित हुए। श्रीव्रजदेवियोंके हृदयमें वे अकेले नहीं, किंतु अपनी लीलाके साथ अन्तर्निहित हुए। अतः लीलादेवी श्रीव्रजांगनाओंके व्रजांगना-मानसमें प्रविष्ट थीं, अतः वहींसे प्रकट होने लगीं। उसीको कहते हैं— गत्यानुरागस्मितविभ्रमेक्षितै- र्मनोरमालापविहारविभ्रमैः । आक्षिप्तचित्ताः प्रमदा रमापते- स्तास्ता विचेष्टा जगृहुस्तदात्मिकाः ॥ (श्रीमद्भा० १०।३०।२) कायिकी, वाचिनिकी, मानसिकी तीन प्रकारकी लीलाएँ साधारणतया मानी गयी हैं। उनमें पहले कायिकी गतिका वर्णन करते हैं, श्रीव्रजांगना विहार करते समय गतिका अनुभव कर रही थीं। हंस, गज और सिंह-सी गति उनके मानसमें उदित हुई। जब उनके मनमें यह भावना हुई कि हमारे प्राणधन