भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्ण सम्मिलनके लिये पधार रहे हैं, तब इन गतियोंका स्फुरण हुआ। 'गत्यानुराग' में गति आ अनुराग ऐसा सन्धिविच्छेद करना चाहिये। 'आ अनुराग' का आशय है 'प्रेमको सब ओरसे बटोरकर' वे प्रियतम श्रीकृष्णके स्मितादिका अनुभव करने लगीं। ऐसे एकान्त गाढ़ अनुरागसे श्रीगोपांगनाएँ श्यामसुन्दरके 'स्मित' आदिका अनुध्यान या ग्रहण करने लगीं। स्मित मन्दहासका नाम है, यह चित्तलोभक है। यह अद्भुत विभ्रम है, माया है। जिससे गोपांगना न तो अत्यन्त बहिर्मुख ही रहें और न अत्यन्त अन्तर्मुख ही, क्योंकि बहिर्मुखतासे ताप और अत्यन्त अन्तर्मुखतासे साक्षात्कार होगा, जो अभी अभीष्ट नहीं। अतः मध्यमस्थितिमें रखा। गोपांगनाओंको यह सब नाच वही भगवल्लीलाशक्ति नचा रही है। अलसवलितादिस्वरूप गोपांगनाविषयक शृंगारोद्रेकसे मनकी अनवस्थितिका नाम विभ्रम है। यह श्रीकृष्णभाव है। इस प्रकारके अवलोकसे गोपियाँ कृष्णात्मक चेष्टासे गृहीत हुईं। इन सबसे लाखकी तरह द्रुत भाव भी हो रहा है। इसके अतिरिक्त श्रीकृष्णकी प्रत्येक चेष्टासे जो मनोरम आलाप अथवा रमण करनेवाले आलाप हैं, फिर तदनुगुण विहार और विभ्रमसे तदात्मक चेष्टा ग्रहण की। विभ्रमका अर्थ पहले कहा गया है। 'मनमोहन श्यामसुन्दर सिंह-गतिसे आकर सामने खड़े हो गये।' ऐसी व्रजांगनाओंकी भावनासे उनके मानसमें पूर्णानुरागका अभिव्यंजन, हासके स्वानुकूलता-विभ्रमसे विशिष्ट भ्रमण, कटाक्ष, नेत्रतारकोंका विशिष्ट घुमाव आदि हुआ। यह सब प्राकृतोंमें भी होता है, पर उससे यह लीला अधिक स्थिर महत्त्वकी है। 'मनोरमालाप'-पर विश्वनाथ चक्रवर्तीके ये भाव हैं—श्रीव्रजदेवियोंके उस समय ये मनोरम आलाप हुए—अयि पद्मिनि ! (कमलिनि अर्थात् स्त्रीसे— नायिकासे—बात कर रही है, नायिकात्वका आरोप करके पूछ रही है) आपलोग स्थलपद्मिनी हैं, हम प्रेमपिपासार्त हैं, हम मधुपोंको मधुपान कराओ। एक गोपी कहती है—'हे पद्मिनि! अपने पति सूर्यको मधुपान देगी ? पर सूर्यको पद्मिनी मधुपान नहीं कराती।' ऐसे मनोरमालापसे एक गोपी पराजित हो गयी। दूसरा अर्थ—दूसरी कहती है—तुम्हें महादर्प- सर्पने दष्ट किया है, हम गारुडिक हैं, हम तुम्हारे अंगका विघट्टन करेंगी। तब वह कहती है—हमें सर्पने नहीं काटा। इसपर गारुडिक बनी गोपी कहती है—तुम्हारी गद्गद वाणीसे तो यह स्पष्ट हो रहा है। ऐसे मनोरमालापसे आक्षिप्तचित्ता गोपांगनाओंने श्रीकृष्णकी गत्यादि उन-उन चेष्टाओंको ग्रहण किया। इससे मनमें लौकिकता न आनी चाहिये। श्रीभगवान् परम निष्काम हैं। यहाँ भक्तपारवश्यात् प्राकृतताकी प्रतीति है। एक बार श्रीनन्दरानीको भाव हुआ कि 'ये तो ईश्वर हैं।' पर यह भाव प्राकृतलीलामें व्याघात है। ऐसा होनेपर श्रीयशोदा छड़ी कैसे दिखायें ? अतः प्रभुने उस भावको हटाया। माधुर्यभावसे वह हट गया। यहाँ प्राकृत कान्तभावसे अप्राकृत ईश्वरभावको दबाया। श्रीभगवान्का वह सौन्दर्य, माधुर्य कान्तादि भावसे गोपांगनाओंकी एकतानताका विशेषकर पोषक हुआ। मनोरमालाप, विहार आदिसे उन्हें बन्धादि उपदेश हुआ। यह सब भाव व्रजदेवियोंके रोम-रोममें समाये हुए थे। वे किसी-न-किसी भावसे प्रतिक्षण कृष्णप्रविष्टचेता रहती थीं। 'वैधी' में यह बात नहीं है, वहाँ तो संसारसे चित्त हटाकर प्रभुका ध्यान करनेपर भी वह (चित्त) वहाँ नहीं रहता। परंतु रागानुगा प्रीतिमें मन सहजहीमें प्रियतम प्राणधनके ध्यानमें लीन रहता है। श्रीश्यामसुन्दर मनमोहनका यह लोकोत्तर हास, विभ्रम, गति, सौन्दर्य प्रेमीको बलात् खींचे, हटानेपर भी न हटे, तभी सच्ची रागानुगा प्रीति है। लौकिक कामी-कामुककी भी यही स्थिति होती है। इसीलिये महात्मा श्रीतुलसीदासने चाहा कि जैसे कामीको नारी प्रिय होती है, वैसे ही मुझे भगवान् श्रीअयोध्यापति प्रिय हों— कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम। (रा०च०मा० ७।१३० ख) इसीलिये सकलसुन्दरशेखर मयूरशेखर श्रीकृष्ण ऐसे भावसे व्यक्त हुए कि उन्हें देखकर किसका मन न चल जाय ? ऐसे ही तात्पर्यकी श्रीव्रजांगनाजनकी