भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 356

उक्ति है— का स्त्र्यङ्ग ते कलपदायतमूर्च्छितेन संमोहितार्यचरितान चलेत्त्रिलोक्याम्। त्रैलोक्यसौभगमिदं च निरीक्ष्य रूपं यद गोद्विजद्रुममृगाः पुलकान्यबिभ्रन्॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।४०) अर्थात् नाथ! मधुर पदावलीके साथ उच्च स्वरसे गाये गये आपके स्वरालापोंको सुनकर तथा त्रिभुवनमोहन इस दिव्य रूपराशिको निहारकर दैवी, मानवी, आसुरी—त्रिलोकमें कौन वह स्त्री है, जो आर्यचरितसे चलित न हो जाय? जब कि पशु, पक्षी, हरिण और जड़ वृक्षोंतकमें रोमांच हो आता है? इस प्रकार यहाँ व्रजकी दिव्य देवियोंके प्रसंगमें केवल भावमात्र लौकिक है। वैसे तो वे प्रभु और उनकी लीला सदासे अलौकिक है। अतः व्रजांगनाओंके आकर्षणातिशय-द्योतनार्थ भी कहा—'गत्यानुराग- स्मित....।' इसमें 'प्रमदा' पद आया है। इसकी व्युत्पत्ति है—'प्रकृष्टो मदो यासान्ताः प्रमदाः।' मदमें मोहकता है। यह नारीवर्गमें स्वभावसिद्ध है। वह भी व्रजकी नारियोंमें, वह भी फिर अंगना 'प्रशस्तानि अङ्गानि यासान्ताः' वह भी श्रीकृष्णमें, उनकी ही लीलासे आक्षिप्तचित्त प्रमदाएँ। यों प्रकर्षकी पराकाष्ठा हो गयी। इसपर भी यह और विशेषता कि इनका चित्त, देह, गेह, स्वजननेहसे हटकर श्रीकृष्ण परमात्मार्यें आकृष्ट हो गया, और चाहिये ही क्या? अनृत, मायामय संसारसे चित्त हटकर उनमें फँसे, यही तो होना चाहिये। बड़े-बड़े अष्टांगयोगयुक्त योगी इसीके लिये लालायित रहते हैं। सिद्ध महात्मा जप, तप, ध्यानसे इसी एक बातको निरन्तर चाहा करते हैं। पर धन्य है, उन व्रजांगनाओंको, जिन्होंने योगसे भी दुर्लभ तत्त्वको भोगसे प्राप्त किया। श्रीश्यामसुन्दर मनमोहनकी आभामें, सौन्दर्य झलकमें उनका चित्त ऐसा उलझा कि फिर उलझा ही रह गया। अतएव वे प्रमदा भी हैं अर्थात् इसी कारण प्रकृष्ट मद- हर्षवाली होनेसे वे प्रमदा हैं। सचमुच इससे बढ़कर और हर्षका स्थान कौन होगा? औपनिषद् विज्ञान भी ऐसा है—'प्रमोद उत्तरः पक्षः' अर्थात् प्रिय, मोद, प्रमोद और आनन्द— ये आनन्दमय ब्रह्मके एक अंग हैं। ये सब योनियोंमें अनुभूत होते हैं। देवादिमें भी ये अनुभूत हैं। ये ही आनन्दसिन्धु शुद्ध ब्रह्मके चिह्न हैं। ये जहाँसे आते हैं, वहीं आनन्दसिन्धु हैं। तब आनन्दसिन्धु बलदेवबन्धुमें आक्षिप्तचित्त होकर गोपांगनाएँ प्रकृष्ट हर्ष या मोदवाली हों, इसमें कहना ही क्या? पूर्वोक्त श्रीवल्लभाचार्यजीके अभिप्रायानुसार जब लीला-शक्तिने 'ताप' को बाहर ही रोक दिया, तब वे सुतरां प्रमदा हो गयीं। यों उनका कथन भी ठीक हुआ। एक दूसरा भाव—'आक्षिप्तचित्ताः प्रमदा रमापतेः' श्रीव्रजदेवियाँ स्वयं सुन्दरी हैं, वे किसी साधारण व्यक्तिके गत्यादिसे आक्षिप्तचेता न होंगी। अतः विशेष हेतु दिया—'रमापतेः—लक्ष्मीपतेः गत्यादिभिराक्षिप्तचित्ताः' अर्थात् व्रजांगनाजनके आकृष्ट होनेमें ललित गति, मधुर आलाप आदि [L55