भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीरासपञ्चाध्यायी ३४७ ये दोनों बातें हैं, पर वे रूप और वेश आदिसे अमंगल बने हैं और कोई (विष्णु) उक्त दोनों बातोंके साथ सुमंगल भी हैं, पर वे मुझे चाहते ही नहीं। शंकर अनन्त, अखण्ड हैं, पर उनका वेश विलक्षण अमंगल है। विष्णुमें सब बातें हैं, पर वे मुझे चाहते ही नहीं। अच्छा, ये न चाहें, मैं तो इन्हें चाहती हूँ। यह निश्चय करके लक्ष्मीने श्रीविष्णुके गलेमें वरमाला पहना दी। भगवान् भक्तपराधीन हैं भगवान् भक्तपराधीन हैं। भक्त उन्हें जैसा नाच नचायें, नाचते हैं। भक्त भगवान्को वनमाला पहनाता है, वह सूख भी जाती है, पर भगवान् उसे उतारते नहीं, क्योंकि वह प्रिय भक्तकी पहनायी हुई है। यद्यपि भगवान्के अंग-संगसे कोई भी वस्तु म्लान नहीं होती तथापि यह भी एक भाव है। हाँ तो यों भगवान् अपने भक्तकी पहनायी मालाको उतारते नहीं। वह भगवान्की दक्षिणावर्त सुवर्णरोमराजिपर सूखी हो जानेसे कुरकुराती है। वक्षःस्थलके दोनों ओर वह चुभती है, तब भी भगवान् उसे उतारते नहीं— पर्युष्टया तव विभो वनमालयेयं संस्पर्धिनी भगवती प्रतिपत्निवच्छ्रीः। यः सुप्रीणतममुयार्हणमाददन्नो भूयात् सदाऽङ्घ्रिरशुभाशयधूमकेतुः॥ (श्रीमद्भा० ११।६।१२) अतः भगवान्ने निरपेक्ष होनेपर भी भक्तजन- वश्यतावश लक्ष्मीजीको स्वीकृत किया। इस प्रकार सर्वजगदधिष्ठात्री देवी लक्ष्मीने खूब परीक्षा करके भगवान्को वरा और उनके चरणोंमें ऐसी अनुरक्त हुईं कि अपनी स्वाभाविक चंचलताको छोड़कर सदाके लिये अचला हो गयीं—'चलापि यच्छ्रीर्न जहाति कर्हिचित्' (श्रीमद्भा० १।११।३३)। ऐसी लक्ष्मीको भी मुग्ध करनेवाले श्यामसुन्दरके गति-विभ्रम आदिसे व्रजदेवियाँ कैसे वश न हों? भगवान्के प्रति गोपियोंके वशीकारमें एक दूसरा यह भी हेतु है कि सर्वसौन्दर्य-माधुर्य-सम्पदधिष्ठातृ महाशक्ति श्रीरमा हैं। उसके पति-अध्यक्ष-भगवान्, उससे भी अधिक अनन्तसौन्दर्य-माधुर्य-सुधाजलनिधि हैं, अतः उनकी ललित गति आदिसे गोपांगनाओंका मन आकृष्ट हो गया। यह एक और तरहकी 'रमापति' पदकी साभिप्रायता हुई। इसके अतिरिक्त 'रमा' श्रीरासेश्वरी राधाका ही नाम है—'रमयति श्रीकृष्णं या, सा रमा' इस व्युत्पत्तिसे श्रीकृष्णचन्द्र भगवान्को रमण करानेवाली तो राधा ही हैं। लक्ष्मी विष्णुको रमण कराती हैं। यह वैकुण्ठकी बात है, व्रजरसकी नहीं। 'रासपञ्चाध्यायी' में श्रीकृष्णसे सम्बद्ध व्रजरसका वर्णन है। इस दृष्टिसे रमापति या राधापति अर्थात् श्रीराधाके प्राणधन श्रीकृष्णभगवान्की उन गति-विलासादिसे श्रीराधा, सखी आदि आक्षिप्तचेता हुईं। प्रेमप्रमत्त श्रीव्रजांगनाएँ भगवान्की इन लीला, गति, स्मित, विभ्रम, विहार आदिसे तदात्मिका हो गयीं। वे भूल गयीं कि हम कृष्णप्रणयप्रमत्त गोपांगना हैं, बल्कि उन्हें दृढ़ निश्चय हो गया कि हम कृष्ण ही हैं। फिर वे भी वैसी ही लीलाएँ करने लगीं। एक कहती है—सखि! देख, मैं कृष्ण हूँ, मेरी गति देख। यों तन्मयी होकर वे वही सब करने लगीं—'तास्ता विचेष्टा जगृहुस्तदात्मिकाः ॥' यद्यपि दासी स्वामीकी चेष्टाका अनुकरण करे, यह दोष है, ऐसा करना अनुचित है, परंतु व्रजांगनाओंका इसमें कोई दोष नहीं, क्योंकि वे प्रभु नटनागरकी इन लीलाओंसे आक्षिप्तचित्ता हैं। उन्हें पता ही नहीं कि वे कहाँ, कब, क्या कर रही हैं। जैसा-जैसा लीलाशक्ति कराती है, वैसा-वैसा वे करती हैं। भाव यह कि कहाँ तो इन व्रजदेवियोंकी यह स्थिति कि श्रीमुरलीमनोहर श्यामसुन्दरके पादारविन्दकी दिव्यनखमणिचन्द्रिकाकी एक छटाके दर्शन प्राप्त होनेसे अपनेको कृतकृत्य मानती हैं। ऐन्द्रपद, ब्राह्मपदतकके ऐश्वर्य-सुखोंको उसपर न्योछावर करती हैं और कहाँ यह स्थिति कि उन्हीं श्रीमदनमोहन भगवान्से पादसंवाहनतक करायें! यह उसी सौभगमदकी महिमाका प्रभाव था, जो कि श्रीव्रजदेवियोंको अपना दास्यभाव भूल गया और यह गर्व उत्पन्न हो आया कि वे श्रीघनश्याम हमपर मुग्ध हैं, हमारे हाथकी कठपुतली हैं, हम जो करायेंगी, सो करेंगे। यह सब उसी लीलासे उन भावोंने उन्हें वैसा करनेको प्रेरित किया।