भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीरासलीलारहस्य ३३१ अतः भगवान् कहते हैं कि इस प्रकार जब अज्ञ जन्तुओंका भी मेरे प्रति स्वाभाविक अनुराग है तो हे गोपिकाओ ! आप तो परम पूजनीया हैं। आपको मेरे प्रति प्रेम हुआ—इसमें तो कहना ही क्या है। आप जैसी प्रणयिनी, जो योगीन्द्रमुनीन्द्रवन्द्यपादारविन्दा हैं, यदि लौकिक-वैदिक बन्धनोंकी उपेक्षा करके हमारे प्रेमसे आकृष्ट होकर यहाँ पधारी हैं तो यह उचित ही है। इसपर गोपिकाओंकी ओरसे यह प्रश्न हो सकता है कि महाराज ! आपके प्रति तो सब प्रेम करते हैं, किंतु आप भी उनके लिये कुछ करते हैं या नहीं ? इसका उत्तर यही है कि ‘प्रीयन्ते प्रीतिमेव कुर्वन्ति न तु किञ्चिदपि मत्तोऽभिवाञ्छन्ति'—जीव मेरे प्रति केवल प्रेम ही किया करते हैं, मुझसे कुछ चाहते नहीं हैं। मेरे सम्मुख होते ही उनकी सारी कामनाएँ निवृत्त हो जाती हैं। देखो—विभीषण राज्यकी कामनासे भगवान्के सम्मुख आये थे, परंतु प्रभुका दर्शन करनेपर तो यही कहने लगे— उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही॥ (रा०च०मा० ५।४९।६) यदि कहो कि अच्छा, भक्त तो आपसे कुछ नहीं चाहते, परंतु आपको तो अपनी ओरसे उनका कुछ उपकार करना ही चाहिये। इसपर प्रभु कहते हैं— 'प्रीयन्ते मयि स्वरूपमात्रे न तु प्रत्युपकारिणी'— मुझ अपने स्वरूपमात्रमें उनका केवल प्रेम ही होता है, वे मुझमें प्रत्युपकारकी दृष्टिसे प्रीति नहीं करते, क्योंकि मुझमें तो केवल प्रेम ही है—कर्तव्य नहीं है। जिन्हें कोई कामना हो, उन्हें अन्य देवताओंकी शरण लेनी चाहिये। कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः। × × × लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान्॥ (गीता ७।२०, २२) मुझमें तो उन्हींका अनुराग होता है, जिनका अन्तःकरण समस्त कामनाओंसे निर्मुक्त होकर स्वच्छ हो गया है। येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्। ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः॥ (गीता ७।२८) किंतु ऐसी बात नहीं है कि भगवान् किसीकी कामनाएँ पूर्ण किया ही नहीं करते। यह तो उनकी नीति है। उन्होंने कामनापूर्तिका काम अन्य देवताओंको सौंप रखा है। जिस प्रकार सम्राट्के यहाँ भिन्न-भिन्न विभागोंके भिन्न-भिन्न अधिकारी होते हैं, उसी प्रकार भगवान्के यहाँ भी हैं। परंतु समय-समयपर भगवान् स्वयं भी अपने भक्तोंकी कामना पूर्ण करते ही आये हैं। जिस समय ग्राहगृहीत होनेपर गजराजने निर्विशेष रूपसे भगवान्की स्तुति की थी, उस समय और कोई देवता उसकी रक्षाके लिये उपस्थित नहीं हुआ। यद्यपि इन्द्र, वरुण, कुबेर आदि सभी देवता उसकी रक्षा करनेमें समर्थ थे; परंतु उन्होंने तो यही सोचा कि हमारा नाम लेकर थोड़े ही पुकारता है, जो हम जायँ। उस समय केवल श्रीहरिने ही प्रकट होकर उसका संकट निवृत्त किया और साथ ही यह भी सिद्ध कर दिया कि जिस निर्विशेष परब्रह्मकी गजराजने स्तुति की थी, वह मैं ही हूँ। इसी प्रकार द्रौपदीकी लाज बचानेके समय भी प्रभुने ही वस्त्रावतार लिया था। अतः ऐसी बात भी नहीं है कि प्रभु कभी किसीकी कामनापूर्ति करते ही न हों। इसीलिये— अकामः सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधीः। तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत पुरुषं परम्॥ (श्रीमद्भा० २।३।१०) —ऐसी उक्ति है। परंतु यहाँ तो व्रजांगनाओंके साथ उपहास हो रहा है। इस प्रकार यद्यपि उन्होंने व्रजांगनाओंका समाश्वासन भी कर दिया तथापि बात वही रही कि गोष्ठको जाओ, देरी मत करो। यह नियम है कि जिस समय प्रियतम अपने प्रेमीका निराकरण करता हो, उस