भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
भगवान्के दिये हुए देह और इन्द्रियोंका सदुपयोग करो। भगवान्ने अपनी प्राप्तिके लिये ही ये देह और इन्द्रियाँ आदि दी हैं। अतः इनसे वही कार्य करो, जो भगवत्प्राप्तिमें सहायक हैं। इनकी सात्त्विकी प्रवृत्तिको प्रबल करो, राजसको निर्बल कर दो और तामस प्रवृत्ति बिलकुल मत होने दो। देखो, जिस समय हनुमान्जी लंकाको गये थे, उस समय पहले उन्हें सुरसा मिली। उसे उन्होंने अपने पुरुषार्थसे प्रसन्नकर उसका आशीर्वाद प्राप्त किया। वह देवमाता थी, अतः सात्त्विकी प्रवृत्तिरूपा होनेके कारण उसे अपने अनुकूल कर लेना ही उचित था। उसके पश्चात् छायाग्राहिणी सिंहिका राक्षसी मिली, जो समुद्रमें ऊपर उड़नेवाले प्राणियोंकी छाया पकड़कर उन्हें गिरा लेती और फिर खा जाती थी। वह तामस प्रवृत्ति की थी। उसे उन्होंने मार डाला। फिर लंकामें पहुँचनेपर उन्हें लंकिनी मिली। उसने भी उनका मार्ग रोका; किंतु उसे उन्होंने एक मुक्केसे ही ठीक कर लिया। वह राजस प्रवृत्ति थी; उसे दमनसे शिथिल कर देना ही ठीक था। इसी प्रकार हमें सात्त्विक प्रवृत्तिको बढ़ाना चाहिये, राजस प्रवृत्तिको शिथिल कर देना चाहिये और तामसका सर्वथा नाश कर देना चाहिये। वे तो पापरूपा हैं। अतः जो कर्म शास्त्रविहित हैं, उनका तो यथाशक्ति पालन करो। 'यथाशक्ति' शब्दका प्रयोग विहित कर्मोंके लिये ही हो सकता है, पापकर्मोंमें 'यथाशक्ति' शब्दकी प्रवृत्ति नहीं हो सकती। विहित कर्मोंमें भी जिनके न करनेसे प्रत्यवाय होता है, वे तो अवश्य करने चाहिये। अग्निष्टोमादि याग अत्यधिक अर्थसाध्य हैं; प्रत्येक व्यक्ति उनका अनुष्ठान करनेमें समर्थ नहीं है। इसलिये 'यथाशक्ति' शब्दका प्रयोग उन्हींके लिये किया गया है। सन्ध्या, अग्निहोत्र एवं बलिवैश्वदेव आदि कर्मोंको, जिनमें न तो विशेष परिश्रम है और न व्यय ही, अवश्य करना ही चाहिये। आजकल एक परिष्कृत सनातनधर्मका आविर्भाव हुआ है। उसके अनुयायी शास्त्रके किसी अंशको तो प्रामाणिक मानते हैं और किसीकी उपेक्षा कर देते हैं। परंतु इसे शास्त्रका प्रामाण्य स्वीकार करना नहीं कहा जा सकता। इसे तो स्वेच्छाचार ही कहा जायगा। तुम कहते हो गीता हमारा सर्वस्व है, किंतु गीता तो कहती है— यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः। न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥ (गीता १६।२३) अब देखना यह है कि शास्त्र क्या कहता है? तुम शूद्रोंको शास्त्राध्ययन कराना चाहते हो, परंतु शास्त्र तो इसकी आज्ञा नहीं देता। यही नहीं, वर्णाश्रम-धर्मका भी लोप करना चाहते हो। शूद्र और वैश्य ब्राह्मणोंका कर्म कर रहे हैं और ब्राह्मण वैश्य तथा शूद्रोंका। परंतु शास्त्र तो कहता है— 'स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥' (गीता ३।३५) अपने वर्णधर्ममें तुम्हारी प्रवृत्ति नहीं होती, उसमें तुम्हें दोष दिखायी देता है। यह तुम्हारा व्यामोह ही है। अर्जुनको भी ऐसा ही व्यामोह हुआ था। इसीसे वह युद्धमें दोषदृष्टिकर भिक्षा माँगनेके लिये तैयार हो गया था। परंतु बाह्य दृष्टिसे ऐसा दोष किस कर्ममें नहीं रहता— 'सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः॥' (गीता १८।४८) भाई, समाजका कोई भी अंग व्यर्थ नहीं है। जैसे सिर आवश्यक है, वैसे ही चरण भी है। शरीरके किसी भी अंगमें पीड़ा हो, उसके कारण सारा शरीर ही अस्वस्थ रहा करता है। अतः हम किसी भी वर्णको नगण्य और हेय नहीं समझते। हमारे विचारसे तो सभीको परधर्मकी ओर प्रवृत्त न होकर अपने ही वर्णके लिये विहित कर्मोंका यथाशक्ति अनुष्ठान करना चाहिये। इस प्रकार स्वधर्मानुष्ठान करते हुए नित्यप्रति कुछ कालके लिये अपनी इन्द्रियोंकी वृत्तियोंका
३२० भक्तिसुधा सर्वथा निरोध करनेका भी प्रयत्न करो। ऐसा करते- करते परब्रह्मका साक्षात्कार होनेपर ही इन इन्द्रियोंका क्रन्दन बन्द होगा। इन्द्रियोंको तुष्ट करनेकी चेष्टासे तृष्णा और भी अधिक बढ़ती है इसके विपरीत यदि इन इन्द्रियरूप वत्स और बालकोंको विषयरूप पयःपान कराया जायगा तो ये और भी अधिक क्रन्दन करेंगे। तुम इन्हें जितना ही तृप्त करनेका प्रयत्न करोगे, ये उतने ही अधिक अतृप्त होते जायँगे। अतः इन्हें तृप्त करनेका प्रयत्न छोड़कर तुम अपने एकमात्र परम पति शुद्ध-बुद्ध- मुक्तस्वरूप परब्रह्मकी ही ओर देखो। इसमें कोई आयास भी नहीं है; विषयदर्शनमें तो आयास भी अधिक है और परिणाममें दुःख भी है। परंतु ब्रह्मदर्शनमें तो कोई परिश्रम भी नहीं करना पड़ता और उसका परिणाम भी परम सुखमय है। परब्रह्म तो स्वयंप्रकाश है, उसे प्रकाशित करनेके लिये कोई व्यापार नहीं करना पड़ता; बल्कि उसके लिये तो व्यापारका त्याग ही कर्तव्य है। परंतु विचित्रता तो यही है कि हमसे व्यापार ही नहीं छोड़ा जाता। यदि मन, बुद्धि और इन्द्रियोंका व्यापार छूट जाय तो परब्रह्मकी उपलब्धि तत्काल हो सकती है। यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह। बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहुः परमां गतिम्॥ (कठ० २।३।१०) इसीसे भगवान् कहते हैं—'गोष्ठं मा यात'— जहाँ पशुप्राय जीव रहते हैं, उस प्रपंचकी ओर मत जाओ। ऐसा करनेसे ही उनका क्रन्दन शान्त होगा। यदि प्रतिबिम्बपर दृष्टि न ले जाकर केवल दर्पणपर ही दृष्टि जाय तो प्रतिबिम्बकी प्रतीति नहीं होगी। इसी प्रकार यदि तुम अपनी वृत्तिको अन्तर्मुख करके विषयोंतक नहीं ले जाओगी तो तुम्हें विषम विषाक्त संसारकी प्रतीति नहीं होगी। यदि कहो कि ये इन्द्रियाँ हमारे बालक हैं, हमें इनपर दया करनी ही चाहिये। इन्हें विषय प्रिय हैं, इसलिये हमें इन्हें अभिलषित विषय प्राप्त कराने ही चाहिये—तो इसपर भगवान् कहते हैं—'तान् मा दुह्यत'—तुम इनके लिये अभिलषित पदार्थ प्रस्तुत मत करो। इन्हें विषयप्राप्ति नहीं होगी तो ये स्वयं ही क्रमशः शान्त हो जायँगी। इन्हें विषय देना तो मानो विष देना है। यही बात प्रेमियोंकी आचार्यभूता व्रजांगनाओंसे भगवान् कहते हैं कि तुम व्रजमें मत जाओ। मैं ही निखिल ब्रह्माण्डका परमपति हूँ। अतः तुम मेरी ही सेवा करो। इस समय यदि तुम्हारे बाल- बच्चे क्रन्दन भी करते हों तो भी उन्हें तुम पयःपान मत कराओ और न बछड़ोंके लिये दोहन ही करो; क्योंकि वे तुम्हारे परमधर्मके विरोधी हैं। यदि भगवत्प्रेममें दया आदि धर्म विरोधी होते हों तो उनका त्याग ही करना चाहिये। भगवान्की यह विचित्र वाचोभंगी सुनकर कुछ व्रजांगनाओंकी तो अभिरुचि सुस्थिर हुई और कुछको व्यामोह हुआ। भगवान्का यह वाग्विन्यास बड़ा ही विचित्र था। इससे भिन्न-भिन्न निष्ठावाले भिन्न- भिन्न अर्थ निकाल सकते थे। कर्मियोंके लिये इसमें कर्मानुष्ठानका आदेश था, जिज्ञासुओंके लिये कर्म-संन्यासकी विधि थी, उपासकोंके लिये कर्म- समुच्चयका विधान था, गोपियोंके लिये गोष्ठको लौट जानेका आदेश था और प्रकारान्तरसे न लौटनेके लिये भी अनुमति थी। वस्तुतः रासपंचाध्यायीरूप यह अमृतसिन्धु ऐसा गम्भीर है कि हम इसके एक बिन्दु का मर्म भी यथावत् नहीं समझ सकते। वेद भगवान्की सुषुप्तिके समय उनके अज्ञात रूपसे प्रकट हुए श्वासोच्छ्वास हैं— 'अस्य महतो भूतस्य निश्वसितमेतद्यदृग्वेदः' (बृहदारण्यक० २।४।१०) किंतु उनका मर्म आकलन करनेमें भी बड़े-बड़े मनीषिजन घबराते हैं, फिर जिन वाक्योंका उच्चारण प्रभुने स्वयं लीला-विग्रह धारण करके किया, उनके
श्रीरामलीलारहस्य ३२१ भावगाम्भीर्यका तो कहना ही क्या है; उसके तो जितने अर्थ किये जायँ, थोड़े ही हैं। अब हम इस श्लोकका उपसंहारकर आगेके श्लोकपर विचार करते हैं। भगवान्ने कहा था कि हे व्रजांगनाओ! तुम जाओ। इसपर व्रजांगनाएँ सोचती हैं—ऐसी जल्दी क्या है, वनकी शोभा देखकर चली जायँगी। किंतु भगवान् कह रहे हैं—'मा चिरम्'—देरी मत करो; क्योंकि यह रात्रिकाल पतिशुश्रूषारूप परमधर्मका उपयुक्त समय है और धर्मानुष्ठानमें विलम्ब होना उचित नहीं है। इसलिये तुम जाओ और पतियोंकी तथा उनकी माता आदि सतियोंकी शुश्रूषा करो। इस प्रकार भगवान्के निराकरण करनेपर व्रजांगनाएँ बहुत खिन्न हुईं। वे सन्तप्त होकर दीर्घ निःश्वास छोड़ती हुई कुछ सोच रही हैं—यह देखकर भगवान् कहते हैं— अथवा मदभिस्नेहाद् भवत्यो यन्त्रिताशयाः। आगता ह्युपपन्नं वः प्रीयन्ते मयि जन्तवः ॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।२३) भगवान्की यह रीति है कि वे सीधे-सीधे किसीको उत्तर नहीं देते; न तो सहसा स्वीकार ही करते हैं और न अस्वीकार ही। संसारमें दो प्रकारके लोग ही सुखी होते हैं; या तो परम बोधवान् और या अत्यन्त मूढ़— यश्च मूढतमो लोके यश्च बुद्धेः परं गतः। तावुभौ सुखमेधेते क्लिश्यत्यन्तरितो जनः ॥ (श्रीमद्भा० ३।७।१७) इसलिये भगवन्मार्गमें लगे हुए प्राणी प्रायः व्याकुल ही दिखायी दिया करते हैं। वस्तुतः इस व्याकुलताकी आवश्यकता भी है। जिस समय भगवान्के सम्मिलनकी अभिलाषा क्षुधा-पिपासाके समान अत्यन्त बढ़ जाय, तभी प्राणीको समझना चाहिये कि हम ठीक मार्गपर चल रहे हैं, परंतु यह प्राणी दीर्घकालसे भगवान्से बिछुड़ा हुआ है। इसलिये इसे भगवत्- सम्मिलनकी उत्कट इच्छा होना अत्यन्त दुर्लभ है। जैसे अजीर्णके रोगीको भूख लगना अत्यन्त आनन्दका हेतु होता है, उसी प्रकार प्रपंचासक्त जीवको भगवत्प्राप्तिकी तृष्णा अत्यन्त सौभाग्यका फल है। इसीसे भगवान् शंकराचार्यने भगवत्प्राप्तिके साधनोंमें सबसे अन्तिम साधन मुमुक्षा बतलाया है। इस मुमुक्षाके पश्चात् ही जिज्ञासा होती है। यदि भगवान्के ज्ञानकी उत्कट इच्छा हो जाय तो फिर उनके मिलनेमें कुछ भी देरी न हो। सारे साधन इस जिज्ञासाके लिये ही हैं। भगवान्को जाननेकी यह उत्कट इच्छा भगवत्कृपासे ही होती है। यदि यह हमारे हाथकी चीज होती तो इस प्रकार प्रार्थना क्यों की जाती— 'माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोत्, अनिराकरणमस्तु'। (केनोपनिषद् शान्तिपाठ) यदि हम भगवान्का निराकरण न करनेमें समर्थ होते तो इसके लिये प्रार्थना क्यों की जाती ? परंतु नहीं, हम सब कुछ जानते हुए भी अनादिमायासे मोहित होकर उनका निराकरण करते हैं। हम जान-बूझकर भी अनन्तानर्थके निदानभूत संसारमें गिरते हैं। परंतु किया क्या जाय— 'केनापि देवेन हृदि स्थितेन यथा नियुक्तोऽस्मि तथा करोमि।' इसीसे महानुभाव लोग नास्तिकोंकी भी निन्दा नहीं करते; क्योंकि वे जानते हैं कि यह बात उनके वशकी नहीं है। एक व्यक्ति अपने कल्याणकी कामनासे संसारसे विरक्त होता है, परंतु पीछे मायासे मोहित होकर वह पतित हो जाता है। इसमें उसका क्या दोष है; वह तो अपना कल्याण ही चाहता है। न्यायकुसुमांजलिकार श्रीउदयनाचार्यजी नास्तिकोंके लिये कल्याण-कामना करते हुए भगवान्से प्रार्थना करते हैं— इत्येवं श्रुतिनीतिसम्प्लवजलैर्भूयोभिराक्षालिते येषां नास्पदमदधासि हृदये ते शैलसाराशयाः। किंतु प्रस्तुतविप्रतीपविधयोऽप्युच्चैर्भवच्चिन्तकाः काले कारुणिक त्वयैव कृपया ते भावनीया नराः ॥ (पञ्चमस्तबक १८)
३२२ भक्तसुधा महानुभावोंको दूसरोंको दुःखमें देखकर खेद हुआ ही करता है। इसीसे उदयनाचार्यजीने जो नास्तिकमतका खण्डन किया है, वह उन्हें भगवत्सुखसे वंचित देखकर करुणावश ही किया है—द्वेषके कारण नहीं किया। देखो महर्लोकनिवासी जीवोंको किसी प्रकारका कष्ट नहीं होता; परंतु वे जो अपनेसे नीचेके लोगोंको परमात्मसुखसे वंचित देखते हैं, इससे तो उन्हें खेद होता ही है। वस्तुतः देखा जाय तो हमलोग भी नास्तिकप्राय ही हैं। यदि भगवान्की सत्तामें हमारा पूरा विश्वास होता तो हमें लुक-छिपकर पाप करनेका साहस कैसे होता? भगवान् तो अन्तर्यामी हैं, वे तो हमारी मानसिक क्रियाको भी जानते हैं। अतः ऐसी परिस्थितिमें हमारे मनकी भी दुष्प्रवृत्ति कैसे हो सकती है? इस प्रकार यदि सच पूछा जाय तो हमसे तो नास्तिक ही अच्छे हैं। हम तो ऊपरसे आस्तिकताका दावा करते हुए वस्तुतः नास्तिक हैं, किंतु वे प्रत्यक्ष अपना दोष स्वीकार कर लेते हैं। अतः सिद्ध हुआ कि भगवान्का निराकरण करना—यह मायामोहित जीवोंका स्वभाव ही है। श्रीमद्भागवतादिमें यह प्रसिद्ध ही है कि गर्भावस्थामें जीवको भगवान्का प्रत्यक्ष ज्ञान हो जाता है। उस समय उसे अपने पूर्वजन्मोंकी भी स्मृति होती है और वह समझता है कि मैं भगवान्से विमुख रहनेके कारण ही अनन्त जन्मोंमें भटकता रहा हूँ। उस समय वह भगवान्की प्रार्थना करता है। पूर्वजन्मोंमें भी उसने इसी प्रकार सहस्रों बार प्रार्थना की थी; परंतु संसारमें पदार्पण करते ही उसे उसका कुछ भी ध्यान नहीं रहा। अतः यह देखकर कि मैं अनन्त बार प्रभुके प्रति अपनी प्रतिज्ञा भुला चुका हूँ, उसे बहुत संकोच भी होता है; तथापि प्रभुका स्वभाव समझकर वह फिर भी उनके सामने रोता ही है। यही दशा भगवान्से मिलनेके लिये वनको जाते समय भरतजीकी थी— फेरति मनहुँ मातु कृत खोरी। चलत भगति बल धीरज धोरी॥ जब समुझत रघुनाथ सुभाऊ। तब पथ परत उताइल पाऊ॥ (रा०च०मा० २।२३४।५-६) अहा! प्रभुका स्वभाव कैसा करुणामय है! उन्हें अपराधका तो स्मरण ही नहीं होता, किंतु थोड़े-से भी उपकारको वे बारम्बार स्मरण करते हैं— रहति न प्रभु चित चूक किए की। करत सुरति सय बार हिए की॥ (रा०च०मा० १।२९।५) अतः प्रभुका ऐसा स्वभाव समझकर ही जीव उस समय उनसे प्रार्थना करता है कि भगवन्! अब मैं अवश्य आपके चरणोंका समाश्रयण करूँगा। मैं आपको भूलकर बहुत भटक चुका हूँ, अब ऐसी भूल नहीं करूँगा। परंतु गर्भसे बाहर आते ही वह फिर प्रभुको भूल जाता है। यदि थोड़ी-सी विद्या या वैभव मिल गया तो फिर तो सीधे-सीधे प्रभुका निराकरण करने लगता है। परंतु भगवान् तो उनका भी अमंगल नहीं चाहते। वे जानते हैं कि 'ये अज्ञ हैं; मेरी मायासे मोहित हो रहे हैं।' इसीसे यह प्रार्थना की जाती है कि 'मैं ब्रह्मका निराकरण न करूँ और ब्रह्म मेरा निराकरण न करे।' किंतु भगवान्का निराकरण न करना अपने हाथकी बात नहीं है। यह तो भगवत्कृपासाध्य ही है। वह भगवत्कृपा तभी हो सकती है; जब हम भगवान्की आज्ञाका पालन करें और शास्त्र ही भगवान्की आज्ञा है— श्रुतिस्मृती ममैवाज्ञे यस्त उल्लंघ्य वर्तते। आज्ञाच्छेदी मम द्रोही मद्भक्तोऽपि न वैष्णवः ॥ सच्चा भगवत्प्रेमी वही है, जो शास्त्रका उल्लंघन नहीं करता अतः सच्चा भगवत्प्रेमी वही है, जो शास्त्रका उल्लंघन नहीं करता। वैष्णवधर्मका लक्षण करते हुए कहा है— 'न चलति निजवर्णधर्मतो यः सममतिरात्मसुहृद्विपक्षपक्षे।' (श्रीविष्णुपुराण ३।७।२०)
श्रीरासलीलारहस्य ३२३
वस्तुतः भगवत्कृपा तो सर्वत्र समान रूपसे विद्यमान है। उसे केवल अभिव्यक्त करना है और वह अभिव्यक्ति भगवदाज्ञा-पालनसे ही हो सकती है। श्रीगोसांईजी महाराज कहते हैं—'अग्या सम न सुसाहिब सेवा।' (रा०च०मा० २।३०१।४) जिस समय भरतजी भगवान्को लौटानेके लिये चित्रकूटपर्वतपर गये, उस समय उनका विशेष आग्रह देखकर भगवान्ने कहा कि 'भरत, तुम जैसा कहो वैसा ही करूँ।' उस समय भरतजीने यही सोचा कि मुझे अपने सुख-दुःखका विचार न करके भगवान्की आज्ञाका ही प्राधान्य रखना चाहिये; क्योंकि सेवकका धर्म तो स्वामीकी आज्ञाका पालन करना ही है। इधर व्रजांगनाओंका व्रत भी तत्सुखसुखित्व ही था। वृन्दावनसे मथुरा कुछ दूर नहीं थी; परंतु भगवान्की इच्छा न देखकर उन्होंने मरणसे भी सहस्रगुण दुःखदायिनी वियोग-व्यथा तो सहन की, किंतु वे मथुरा नहीं गयीं। अतः सेवकका प्रधान कर्तव्य तो स्वामीकी आज्ञाका पालन करना ही है। प्रभु-मिलनकी तीव्र उत्कण्ठा होना बड़े सौभाग्यकी बात है जिस समय भगवान् देखते हैं कि मेरा भक्त मुझसे मिलनेके लिये अत्यन्त उत्सुक है, उस समय वे उसे अपनी माधुरीका थोड़ा-सा रसास्वादन करा देते हैं। ऐसा वे इसीलिये करते हैं, जिससे कि उस उपासककी भगवन्मिलनकी तृष्णा और भी अधिक तीव्रतर हो जाय। इसीसे भगवान्का भजन करनेवालोंको कभी-कभी कुछ विलक्षण आनन्दका अनुभव हुआ करता है; परंतु वह स्थिर नहीं रहता। वह भजनानन्द तो प्रभु-प्रेमकी आसक्तिके लिये है। जिस प्रकार किसी कामुक पुरुषको कामिनी-सौन्दर्यका थोड़ा- सा भी व्यसन हो जानेपर फिर उसे कितना ही समझाया जाय, वह उसे छोड़ नहीं सकता, उसी प्रकार जिसे भजनानन्दकी थोड़ी-सी भी चाट लग गयी है, उसे संसारका कोई भी सुख आकर्षित नहीं कर सकता।
देखो—जिस समय नारदजीने देखा कि मेरी माताका देहावसान हो गया तो वे यह समझकर कि मेरा भगवद्भजनका एकमात्र प्रतिबन्ध नष्ट हो गया, बहुत प्रसन्न हुए और तत्काल वनको चल दिये। वहाँ इन्द्रियोंका निरोधकर दीर्घकालतक भगवद्भजन करते रहे। इसी समय एक दिन भगवान्ने उन्हें अपनी मधुरिमाका यत्किंचित् रसास्वादन कराया। परंतु वह आनन्द बहुत जल्दी तिरोहित हो गया। इससे नारदजी बड़े व्यग्र हुए। उन्होंने बहुत यत्न किया, परंतु पुनः उस रसका समास्वादन न कर सके। उन्होंने प्रभुसे बहुत अनुनय-विनय की, वे बहुत विह्वल हुए, परंतु प्रभुने फिर कृपा न की। वास्तवमें तो प्रभुकी यह कठोरता ही परम कृपा थी। भगवान्की सबसे बड़ी कृपा तो यही है कि जीव उनके लिये अत्यन्त तृषित हो जाय। यह तो परम सौभाग्य है। हमलोग स्त्री, धन आदिके लिये निरन्तर शोक- समुद्रमें डूबे रहते हैं, किंतु प्रभुके लिये हमारा अन्तःकरण कभी द्रवीभूत नहीं होता। न जाने वह समय कब आयेगा, जब प्रभुके विप्रयोगानलमें दग्ध होकर हमारा एक-एक पल एक-एक कल्पके समान व्यतीत होगा। भावुकोंकी स्थिति ऐसी ही विलक्षण हुआ करती है। अतः भगवान्ने देखा कि नारदके प्रेमका अभी शैशवकाल है। अभी इसके पनपनेकी आवश्यकता है। जिस समय जतु (तरल लाख)-के समान इसका अन्तःकरण सर्वथा द्रवीभूत हो जायगा, उसी समय यह मेरा यथावत् प्रेम प्राप्त कर सकता है। इसलिये भगवान्ने यह कठोरता धारण की थी। उनकी यह कठोरता भी कोमलता थी। प्रभुने थोड़ा-सा रसास्वादन इसीलिये कराया था, जिससे उनकी तृषा खूब बढ़ जाय; क्योंकि बिना रस-परिचयके उसमें प्रवृत्ति नहीं होती। इसी प्रकार जब भगवान् कृष्णने देखा कि मेरे उपेक्षाके वचन सुनकर गोपांगनाएँ कुछ उदास हो चली हैं, उन्हें आश्वासन देनेके लिये उन्होंने कहा—
३२४ भक्तिसुधा अथवा मदभिस्नेहाद् भवत्यो यन्त्रिताशयाः। आगता ह्युपपन्नं वः प्रीयन्ते मयि जन्तवः॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।२३) पहली उत्थानिकामें कहा जा चुका है कि जब प्राणी बहुत कालतक भगवच्चिन्तन करते रहनेपर भी भगवत्कृपासे वंचित रहता है तो उसकी लगनमें कुछ शिथिलता आ जाती है। हम रूप-रसादि शब्दोंका जितना ही अधिक सेवन करेंगे, उतनी ही उनके प्रति हमारी तृष्णा बढ़ती जायगी। शास्त्रालोचनकी भी ऐसी ही बात है। जिन्हें शास्त्रावलोकनका व्यसन हो जाता है, उनसे फिर उसके बिना रहा नहीं जाता। इसी प्रकार जो लोग निरन्तर भगवच्चरित्रोंका श्रवण- कीर्तन करते रहते हैं, उनका भी उसमें सुदृढ़ अनुराग हो जाता है। ऐसा अनुराग सनकादिमें था। आसा बसन ब्यसन यह तिन्हहीं। रघुपति चरित होइ तहँ सुनहीं॥ (रा०च०मा० ७।३२।६) किंतु यदि भगवद्भजन कुछ कालके लिये छूट जाता है तो उसका स्वारस्य भी कुण्ठित हो जाता है—उसका फिर नये सिरेसे अभ्यास करना होता है। इसीसे योगसूत्रकार महर्षि पतंजलिने कहा है—'स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमिः॥' (योगदर्शन १।१४) आप चाहे भगवच्चरित्रोंका श्रवण-मनन करें, चाहे कर्मनिष्ठाको दृढ़ करें, चाहे योगाभ्यासमें प्रवृत्त हों और चाहे वेदान्तश्रवण करें— सभीको दीर्घकालतक आदरपूर्वक सेवन करनेकी आवश्यकता है। यदि आपको खिचड़ी बनानी है तो उसके लिये जैसी और जितनी अग्निकी जितनी देरतक आवश्यकता है यदि उतनी अग्नि न देंगे अथवा बीच-बीचमें अग्निसंयोगको रोक देंगे तो खिचड़ी कभी बन ही न पायेगी। इसी प्रकार भगवद्भजनमें सफलता प्राप्त करनेके लिये भी दीर्घकालतक निरन्तर पर्याप्त अभ्यासकी अपेक्षा है। इसी तरह यदि दीर्घकालतक भगवच्चरणस्मरण और भगवत्स्वरूपानुध्यान करते रहोगे तो उसका व्यसन हो जायगा और यह व्यसन ही परम सौभाग्य है। 'पुंसो भवेद् यहिं संसरणापवर्ग- स्त्वय्यब्जनाभसदुपानया मतिः स्यात्॥' (श्रीमद्भा० १०।४०।२८) परंतु यदि दीर्घकालतक प्रियतमके सम्मिलनकी चाह लगी रहे—प्रभुसे मिलनेकी उत्कण्ठा उत्तरोत्तर बढ़ती जाय तो यह बड़े ही सौभाग्यकी बात है। ऐसी प्रीति तो चातक और मीनमें ही देखी जाती है। जग जस भाजन चातक मीना। नेम पेम निज निपुन नबीना॥ (रा०च०मा० २।२३४।३) चातकका एक ही नियम है। वह स्वाति-बूँदको छोड़कर दूसरे जलकी ओर कभी दृष्टिपात भी नहीं करता। उसके अभावमें वह निर्मल-नीर-प्रपूरित सरोवरके तटपर भी पीऊ-पीऊ रटते-रटते मर जायगा, परंतु अन्य जल कदापि ग्रहण न करेगा। अपने एकमात्र प्रियतम पयोधरको छोड़कर वह किसीसे याचना नहीं करता। परंतु वह पयोधर उसे क्या देता है? खूब गर्ज-तर्जकर ओलोंकी वर्षा करता है और बिजली भी गिरा देता है। जलदु जनम भरि सुरति बिसारउ। जाचत जलु पबि पाहन डारउ॥ (रा०च०मा० २।२०५।३) परंतु उसकी तो एक ही टेक रहती है। क्या उसे जलकी कमी है? नहीं, परंतु यदि उसे अमृत भी दिया जाय तो भी वह अपना नियम भंग नहीं कर सकता। चातकु रटनि घटें घटि जाई। बढ़ें प्रेमु सब भाँति भलाई॥ (रा०च०मा० २।२०५।४) यही दशा मीनकी है। वह तो एक क्षणके लिये भी अपने प्राणाधार जलका वियोग सहन नहीं कर सकता। इसी विषयमें कविकी उत्प्रेक्षा है— आपदिरेऽम्बरपथं परितः पतङ्गा भृङ्गा रसालमुकुलानि समाश्रयन्ति। संकोचमञ्चति सरस्त्वयि दीनदीनो मीनो नु हन्त कतमां गतिमभ्युपैतु॥ (सुभाषितरत्नभाण्डागार) 'अरे सर! इस समय तो तुममें बड़े दिव्यातिदिव्य पुष्प विद्यमान हैं। इसीसे तेरे बहुत-से साथी बने हुए
श्रीरासलीलारहस्य [३२५]
हैं। परंतु जब तू क्षीण हो जायगा, तुझमें खिले हुए कमल कुम्हला जायँगे; तब ये हंस तुझे छोड़कर गगनमण्डलमें विहार करने लगेंगे और ये भ्रमर, जो तेरे परम प्रेमी बने हुए हैं, वे भी तुझे छोड़कर रसाल- मुकुलका ही आश्रय लेंगे। परंतु बता, यह मीन कहाँ जायगा ? इसे तेरे साथ ही—नहीं, नहीं, तुझसे भी पहले सूख जाना होगा।' साधन-कार्यमें श्रद्धा (उत्साह)-की बड़ी आवश्यकता है इस प्रकार प्रेमास्वादन करनेवालोंमें प्रधान तो चातक और मीन ही हैं। अन्य प्रेमियोंमें तो इस तरहका एकांगी प्रेम प्रायः देखा नहीं जाता। लोकमें यह कहावत प्रसिद्ध ही है कि 'एक हाथसे ताली नहीं बजती' वहाँ तो प्रेमके बदलेमें प्रेम किया जाता है। अतः दोनों ओरसे प्रेमकी अपेक्षा होती है। इसलिये जब प्राणी भगवान्के सम्मिलनकी आकांक्षासे कुछ कालतक भगवच्चिन्तनमें तत्पर रहता है और फिर भी भगवान्की ओरसे उसे कोई सहारा नहीं मिलता तो उसका धैर्य भग्न हो जाता है और उसकी श्रद्धा शिथिल पड़ जाती है। साधनमार्गमें श्रद्धाकी बड़ी आवश्यकता है। योगदर्शनमें श्रद्धाका अर्थ उत्साह किया है। वहाँ बतलाया है कि वह माताके समान योगीपर अनुग्रह करता है। बिना श्रद्धा या उत्साहके साधनमार्गमें प्रवृत्ति नहीं हो सकती। अतः श्रद्धापूर्वक स्वाध्याय और अभ्यासमें तत्पर रहनेकी आवश्यकता है। भगवन्मार्गमें शीघ्रतर प्रगति होनेके लिये स्वाध्याय और योगाभ्यास दोनोंहीके क्रमिक अनुष्ठानकी अपेक्षा है। स्वाध्यायाद्योगमासीत योगात्स्वाध्यायमावसेत्। स्वाध्याययोगसम्पत्त्या परमात्मा प्रकाशते ॥ (श्रीविष्णुपुराण ६।६।२) यदि तुम निरन्तर ध्यानपरायण होकर आरम्भसे ही चार घण्टेकी समाधि लगानेका प्रयत्न करोगे तो उसमें कभी सफल न हो सकोगे। पहले-पहले केवल पाँच मिनट ध्यानका अभ्यास करो; फिर पाँच मिनट स्वाध्याय करो। इस प्रकार ध्यान और स्वाध्यायका साथ-साथ अभ्यास करते हुए क्रमशः ध्यानकालमें वृद्धि करो। ध्यानके बढ़नेपर धीरे-धीरे स्वाध्यायमें कमी कर सकते हो। उससे पहले यदि स्वाध्याय छोड़कर केवल ध्यानमें ही लगोगे तो ध्यान तो होगा नहीं, केवल मनोराज्य या तन्द्रामें समयका अपव्यय होगा। स्वाध्याय क्या है ? अपने प्रियतमके स्वरूपका परिचायक अध्ययन ही स्वाध्याय कहलाता है। यदि तुम भगवान् कृष्णका साक्षात्कार करना चाहते हो तो श्रीसूरदासजीके उन पदोंका पाठ करो, जिनमें भगवान्के दिव्यातिदिव्य स्वरूपसौष्ठवका वर्णन किया गया है अथवा श्रीमद्भागवतसे भगवान्की दिव्य-मंगलमयी मूर्तिकी स्फूर्ति करनेवाले अंशोंका परिशीलन करो। उसके मननसे जब तुम्हारी मनोवृत्ति ध्येयाकार हो जाय तो जितने काल वह स्वरूप मानस नेत्रोंके सामने रह सके, उतने समयतक ध्यान करो। फिर जब ध्यानमें शिथिलता आये तो स्वाध्याय करो। इसी प्रकार निर्गुणोपासकोंको भी 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' (तैत्तिरीय० २।१) आदि वाक्योंका मनन करते हुए ही ध्यानाभ्यासमें प्रवृत्त होना चाहिये। इस तरह स्वाध्याय और ध्यानका क्रमिक अभ्यास करनेसे ही प्रभुके स्वरूपकी स्फूर्ति जल्दी हो सकती है। जब बहुत काल अभ्यास करते रहनेपर भी भगवत्स्वरूपकी स्फूर्ति नहीं होती तो साधक बहुत निरुत्साह हो जाता है। उसका उत्साह बनाये रखनेके लिये ही स्वाध्यायकी आवश्यकता है। बहुत-से लोग भिन्न-भिन्न महात्माओंके पास जाकर साधनकी बात पूछा करते हैं। उन्हें कोई कुछ साधन बतलाता है और कोई कुछ दूसरा साधन बतला देता है। वे कुछ दिनतक साधनका अवलम्बन करते हैं और उसमें असफल होनेपर निरुत्साह हो जाते हैं। उनका हृदय विषादग्रस्त हो जाता है। किंतु विषादसे कोई लाभ नहीं होता। लाभ तो साधन- मार्गमें चलनेसे ही होगा। विषादसे शोक-मोहके
सिवा और कुछ हाथ नहीं लगता। इसलिये साधकको विषाद नहीं करना चाहिये। जिस समय तुम्हारा साधन पूरा होगा, उस समय साध्य अवश्य मिलेगा; उसके लिये उतावले क्यों होते हो ? तनिक हिरण्यकशिपुके तपकी ओर ध्यान दो। उसके शरीरको पिपीलिकाओंने छलनी कर दिया था, मांस सर्वथा सूखकर केवल अस्थि-चर्ममात्र रह गये थे; तो भी वह निरुत्साह नहीं हुआ। वह कहता है कि ‘काल नित्य है और आत्मा नित्य है; अतः यदि शरीर नष्ट भी हो जाय तो कोई चिन्ता नहीं, हम तपस्यासे पीछे नहीं हटेंगे। यह है तपस्याका उत्साह।’ देखो, वे लोग राक्षस थे, किंतु उनकी धारणा कैसी स्थिर थी। हमलोग दस दिन माला फेरते हैं और कोई आनन्दानुभव न होनेके कारण समय और मन्त्रको दोष देने लगते हैं। किंतु यह हमारी भूल है। हमें दृढ़तापूर्वक अपने साधनपर डटे रहना चाहिये। एक वैश्य व्यापारको अपना सर्वस्व समझता है। व्यापार करनेमें वह अपनी सर्वस्व रक्षा मानता है और व्यापार न करनेमें सर्वस्वका नाश समझता है। इसीसे वह धन, स्त्री, गृह और देशकी भी उपेक्षा करके विदेशमें चला जाता है तथा अपने कारोबारके लिये दिन-रात एक कर देता है। लोग कहते हैं— ‘महाराज ! भजन करते हैं तो निद्रा बहुत सताती है।’ किंतु तनिक स्टेशनमास्टर और खजांचियोंसे तो पूछो, उन्हें कितनी निद्रा आती है ? वे जानते हैं कि थोड़ा- सा भी प्रमाद होनेसे हानि होनेकी सम्भावना है। वे दो-चार रुपयेकी हानिकी आशंकासे रातभर जागते रहते हैं। इसी प्रकार तुम्हें भी यदि भजनमें ढील होनेपर हानिकी आशंका होती तो आलस्य कैसे आ सकता था ? जिसे तीव्र क्षुधा या तीव्र पिपासा होती है, उससे कब बैठा जाता है? इसी प्रकार यदि भगवत्तत्त्वके न जाननेमें अपनी हानि सुनिश्चित हो और उसके ज्ञानमें अपना परम लाभ निश्चित हो तो प्रमाद हो ही नहीं सकता। भगवती श्रुति कहती है— ‘इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः।’ (केन० २।५) याद रखें—यदि इस मनुष्यजन्ममें आप भगवान्का साक्षात्कार न कर सके तो ‘महती विनष्टिः’— सर्वस्वनाश हो जायगा; क्योंकि जब दो रुपयेकी हानिकी आशंकासे रातको नींद नहीं आती तो सर्वस्वनाशकी आशंका होनेपर कैसे आलस्य सतायेगा ? हमें जो काम करना है, उसकी आवश्यकताका अनुभव करना चाहिये। भगवद्भजनमें सर्वस्व लाभ है और उसकी उपेक्षामें सर्वनाश है—जबतक ऐसा सुदृढ़ निश्चय न होगा, भजनमें प्रगति कैसे होगी ? सामान्य रूपसे यह बात सभीको निश्चित है कि एक दिन अवश्य मरना होगा। परंतु यह निश्चय रहते हुए भी साठ-साठ वर्षके बूढ़े भी दुराचार, दम्भ और पापसे निवृत्त नहीं होते। इसमें क्या हेतु है?—मोह। मोह ही उन्हें मृत्युकी घड़ीका विस्मरण करा देता है। एक तो इस प्रकारका मृत्युका सामान्यरूपेण निश्चय और दूसरा अपने पुत्र या बन्धुकी मृत्युको देखकर होनेवाला वैराग्य—क्या ये दोनों समान हैं? हमें भी अपनी मृत्युका निश्चय है; परंतु क्या हम उसकी ओरसे निश्चिन्त नहीं हैं? किंतु यदि हमें राजाज्ञा हो जाय कि आजसे पाँचवें दिन तुम्हें फाँसी दे दी जायगी तो फिर क्या पाँच दिनतक हमें नींद आ सकती है ? अतः हमें ऐसा अभिमान न करना चाहिये कि हम परमार्थ-विषयको जानते ही हैं, हमें सत्पुरुष या सच्छास्त्रोंके संगकी क्या आवश्यकता है? यदि तुम ऐसा सोचोगे तो तुम्हारी प्रगति शिथिल पड़ जायगी। नहीं, इनका संग तो विवेक और वैराग्यको उद्दीपन करनेवाला है। इस उद्दीपनकी बहुत आवश्यकता है। हमें विचारशक्तिको निरन्तर जाग्रत् रखना चाहिये। इस प्रकार जब भजनकी आवश्यकता सुनिश्चित रहेगी तो भजनमें प्रमाद न होगा। यह कोई जादू-टोना या मन्त्र नहीं है, यह तो युक्ति और अनुभवसिद्ध बात है। उत्साह-भंग होनेसे
पुरुष निर्वीर्य हो जाता है; अतः उत्साहको स्थिर बनाये रखना चाहिये। सुनते हैं ध्रुवजीको छः महीनेमें ही भगवान्का दर्शन हो गया था। जिस समय भगवान् उनके समक्ष प्रकट हुए, ध्रुवने कहा—'भगवन्! मैं तो सुनता था, आप बड़े दुराराध्य हैं, परंतु मुझपर आपने इतनी शीघ्र कृपा कर दी।' भगवान्ने कहा—'ध्रुव, तुम यह मत समझो कि हम छः मासमें ही मिल गये हैं; आओ देखो, हमारी प्राप्तिके लिये तुम्हारे कितने शरीर शुष्क हुए हैं।' ध्रुवजीने दिव्य-दृष्टिसे देखा कि उनके सहस्रों शरीर कन्दराओंमें सूखे हुए पड़े हैं। भगवान् बुद्धकी तो प्रतिज्ञा थी— 'इहासने शुष्यतु मे शरीरम्।' भगवत्प्राप्तिका एकमात्र साधन— भगवत्सम्मिलनकी तीव्रतर अभिलाषा—एक दृष्टान्त अतः असफलतासे हताश मत हो। साधनमें लगे रहो। देखो—वायुयान आदि लौकिक पदार्थोंके आविष्कारमें भी कितने समय, धन, जन-समुदायका क्षय हुआ है। भगवत्प्राप्ति तो उसकी अपेक्षा कहीं अधिक मूल्यवान् है। बस, लगे रहो, भगवान् अवश्य कृपा करेंगे। तुमने टिट्टिभकी गाथा सुनी होगी। समुद्र उसके अण्डेको हर ले गया था। इससे कुपित होकर उसने समुद्रको सुखा डालनेका निश्चय किया। वह अपने पंजेमें बालू भरकर समुद्रमें डाल देता और चोंचसे एक बूँद पानी लेकर समुद्रसे बाहर डाल देता। उसने दृढ़ निश्चय कर लिया कि चाहे कितने ही जन्म बीत जायँ समुद्रको अवश्य सुखा डालना है। यह सब लीला देवर्षि नारदजीने भी देखी और टिट्टिभकी दुर्दशा देखकर उन्हें उसपर बड़ी दया आयी। उन्होंने यह सारा समाचार पक्षिराज गरुड़को सुनाया और उन्हें अपने सजातियोंकी सहायता करनेके लिये उत्तेजित किया। फिर क्या था? पक्षिराजके तो पर मारते ही समुद्रमें खलबली पड़ गयी; उसे तुरंत हार माननी पड़ी और टिट्टिभके अण्डे लाकर देने पड़े। यह समुद्रकी पराजय टिट्टिभके अपने प्रयत्नसे नहीं हुई थी। उसमें तो गरुड़जीकी सहायता ही कारण थी। परंतु यदि टिट्टिभ ऐसा हठ न करता तो गरुड़जी क्यों आते? इसी प्रकार जो लोग दत्तचित्त होकर तन-मनसे लग जाते हैं, उन्हींपर भगवान्की कृपा होती है और उसीसे वे भगवत्प्राप्ति करनेमें समर्थ होते हैं। भगवत्प्राप्तिका एकमात्र साधन तो भगवत्सम्मिलनकी तीव्रतर तृषा ही है; उस छटपटाहटके बिना भगवत्कृपा अत्यन्त दुर्लभ है। हठ वश शठ बहु साधन करहीं। भक्ति हीन भव सिन्धु न तरहीं॥ इस प्रकार दीर्घकालतक भगवान्के लिये सतृष्ण रहते-रहते भी जब साधकको प्रभुकी ओरसे कोई सहारा मिलता दिखायी नहीं देता तो वह श्रान्त हो जाता है, उसका हृदय कुछ अवसन्न हो उठता है। उस समय प्रभु उसपर अनुग्रह करते हैं। प्रभुके हृदयाकाशमें जो अनुग्रहरूप चन्द्र विराजमान है, प्रभुके मन्दहासके द्वारा उसकी शीतल किरणें साधकके सन्तप्त हृदयतक पहुँचकर उसे शान्त कर देती हैं। इस प्रकार प्रभुका अनुग्रह होनेपर साधकको कुछ आश्वासन प्राप्त होता है और वह चौगुने उत्साहसे साधनमें जुट जाता है। यही स्थिति यहाँ व्रजांगनाओंकी थी। वे लौकिक-वैदिक सभी प्रकारकी श्रृंखलाओंको तोड़कर भगवान्की सन्निधिमें आयी थीं; किंतु यहाँ उनका इस प्रकार तिरस्कार हुआ। जिनके लिये उन्होंने सर्वस्व त्यागकर अनेकविध विघ्नोंका सामना किया था, वे ही ऐसे निष्ठुर भावसे उनकी उपेक्षा कर रहे हैं। ऐसी स्थितिमें उनके अनाश्वासका अवकाश है या नहीं? परंतु प्रभु बड़े कृपालु हैं। उनका तात्पर्य उनके तिरस्कारमें तो था ही नहीं। वे तो 'स्थूणानिखननन्याय' से अपने प्रति उनकी निष्ठाकी परीक्षा कर रहे थे; वे तो उनकी निष्ठाको और भी सुदृढ़ करना चाहते थे। इससे यह नहीं समझना चाहिये कि व्रजांगनाओंके भावमें भी कोई न्यूनता रहनी सम्भव थी। वे तो
३२८ भक्तिसुधा प्रेममार्गकी आचार्या हैं। मीन और चातकमें जो प्रेम उपलब्ध होता है, वह तो व्रजांगनाओंके प्रेमसुधासिन्धुका एक कणमात्र है। जीव और परब्रह्ममें जो प्रेमसम्बन्ध है, उस प्रेमका तो एक अंश भी मीन और चातकमें नहीं है। 'आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति।' (बृहदारण्यक० २।४।५) किंतु हाँ, वह प्रेम तिरोहित अवश्य है तथा व्रजांगनाओंका भगवान्के प्रति जो अनुराग है, वह तो तत्त्वज्ञ महानुभावोंके आत्मप्रेमकी अपेक्षा भी कहीं बढ़कर है। हम कह चुके हैं— मुक्तानामपि सिद्धानां नारायणपरायणः। सुदुर्लभः प्रशान्तात्मा कोटिष्वपि महामुने ॥ (श्रीमद्भा० ६।१४।५) यद्यपि तत्त्वज्ञ भी प्रपंचका मिथ्यात्व निश्चय करके सजातीय, विजातीय और स्वगत-भेदशून्य परब्रह्ममें ही स्थित होते हैं तथापि चतुर्थ, पंचम और षष्ठ भूमिकावाले ज्ञानियोंका आत्मप्रेम भी उतना प्रौढ़ नहीं होता, जैसा कामुकोंका अपनी प्रेयसीके प्रति होता है। इसीसे विद्यारण्य स्वामीने जीवन्मुक्तिविवेकमें तत्त्वज्ञानके पश्चात् भी मनोनाशकी आवश्यकता बतलायी है, क्योंकि आत्मज्ञान हो जानेपर भी प्रारब्धकी प्रबलता रहनेके कारण विक्षेप बना ही रहता है। इसीसे चित्त ब्रह्मानुसन्धानसे हटकर विषयोंकी ओर चला जाया करता है। ज्ञानी लोग प्रपंचचिन्तनमें अनर्थ समझकर ही उसे उस ओरसे हटाकर पुनः ब्रह्मानुसन्धानमें जोड़ते रहते हैं। ऐसा करते हुए भी उनका चित्त कई बार आत्मानुसन्धानसे हटकर अनात्मपदार्थोंकी ओर चला जाता है। आत्मानुसन्धानमें उसकी स्वारसिक प्रवृत्ति नहीं होती। इसीके लिये योगाभ्यास किया जाता है। निरन्तर योगाभ्यास करते-करते ब्रह्मतत्त्वमें उसकी स्वारसिक प्रवृत्ति हो जाती है। ऐसा नारायण-परायण महापुरुष सुदुर्लभ है। व्रजांगनाओंकी ऐसी स्थिति स्वाभाविक थी। भगवान्के अनेक प्रकारसे तिरस्कार करनेपर भी उनकी मनोवृत्ति भगवान्से विचलित नहीं हो सकती थी। व्रजांगनाएँ तो परम सिद्ध थीं; उनके चरणकमल तो योगेश्वरोंके लिये भी वन्दनीय हैं। परंतु उन्हें लक्ष्य करके ही भगवान्ने सर्वसाधारणके कल्याणके लिये ऐसी कई बातें कही हैं, जिनकी वे पात्र नहीं थीं। हाँ, उनमें भी जो सुदृढ़ निष्ठावाली नहीं थीं, उनके लिये वे बातें उपयुक्त भी हो सकती हैं। भगवान्द्वारा व्रजांगनाओंको आश्वासन इस प्रकार कई बार भगवान्के उपेक्षा करनेपर सम्भव है व्रजांगनाओंको कुछ सन्ताप हुआ हो। अतः उन्हें अपनी अवहेलनासे कुछ खिन्न देखकर भगवान्ने उन्हें आश्वासन देनेके लिये कहा— अथवा मदभिस्नेहाद् भवत्यो यन्त्रिताशयाः। आगता ह्युपपन्नं वः प्रीयन्ते मयि जन्तवः ॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।२३) 'मैंने जो तुम्हारे विषयमें तरह-तरहके पक्षोंकी कल्पना कर रखी थी, वह व्यर्थ थी। मैं अब समझा; आप तो हमारे प्रेमसे आकृष्ट-चित्ता होकर ही हमसे मिलने आयी हैं।' व्रजांगनाएँ वस्तुतः प्रेमके प्रवाहमें बहकर ही आयी थीं; वे स्वयं अपनी इच्छासे वहाँ नहीं आयीं। भगवान्के मुखारविन्दसे वेणुनादके रूपमें निःसृत जो प्रेमतत्त्व था, उसीने उन्हें खींच लिया था। व्रजांगनाओंका अन्तःकरण तो स्वयं ही प्रेमामृतपूरित एक महासरोवरके समान था; किंतु वह अनेकविध प्रतिबन्धसे निबद्ध था। उसे लौकिक-वैदिक मर्यादारूप बहुत-से बाँधोंने मर्यादामें रोक रखा था, किंतु जब यहाँ श्यामघनने वेणुनादरूप गर्जन करते हुए दिव्यातिदिव्य रसका वर्षण किया तो उससे गोपांगनाओंके हृदयस्थ प्रेमसमुद्रका बाँध टूट गया। उसमें ऐसी बाढ़ आ गयी कि वह और अधिक काल मर्यादामें न रह सका। व्रजांगनाओंने अपनी मर्यादाकी यहाँतक रक्षा की थी कि शरीरकी सुध-बुध भूल जानेपर भी उन्होंने अपनी गोपजातिके लिये विहित लौकिक-वैदिक कृत्योंकी उपेक्षा नहीं की। वे दधिमन्थनादि गृहकृत्य करती ही रहीं। हाटमें गोरस बेचने जातीं, किंतु प्रेमविभोर होकर 'दही लो' कहनेके बदले 'श्याम लो' पुकारने लगतीं ! इससे हमलोगोंके लिये उन्होंने यही उपदेश दिया है
श्रीरासलीलारहस्य ३२९ कि हमें अपने शास्त्रोक्त स्वधर्मका पालन करते हुए ही भगवत्प्राप्तिका प्रयत्न करना चाहिये। 'दुहन्त्योऽभिययुः काश्चिद् दोहं हित्वा समुत्सुकाः।' (श्रीमद्भा० १०।२९।५) यहाँ जो सार्वत्रिक 'शतृ' प्रत्यय है, वह हेतुताका द्योतक है। अतः इसका तात्पर्य यही है कि भगवान्के वेणुनिनादसे आकर्षित होनेमें गोपियोंको गोदोहनरूप स्वधर्मानुष्ठान ही हेतु था। अतः हमारा यह बलपूर्वक कथन है कि आप किसी भी परिस्थितिमें रहें, अपने लौकिक-वैदिक कृत्योंका यथावत् पालन करते रहें। गोपांगनाओंका प्रेम अत्यन्त प्रौढ़ था; किंतु वे उसे छिपाये रहती थीं। उनका सिद्धान्त था— गुप्त प्रेम सखि सदा दुरैये। कुंजगलिन बिच अड़ये जड़ये॥ प्रेमी लोग प्रेमको सदा दुराते ही हैं। वह हठात् प्रकट हो जाय तो वशकी बात नहीं। अहा! श्रीवृषभानुनन्दिनीने तो अपने प्रेमको अन्तरतम सखियोंसे भी छिपाकर रखा था। वह उन्हें उनकी अचेतावस्थामें ही प्रकट होता था। अब, जब भगवान्ने देखा कि इनकी पूर्ण योग्यता है। ये मेरा रसास्वादन करनेकी पात्र हैं तो उन श्यामघनने वेणु-निनादसे अमृत वर्षणकर उनके हृत्समुद्रमें इतना रस भर दिया कि वह उसमें समा न सका। अहा! जिनके चरणनखसे निकली हुई श्रीगंगाजी वडवाग्निद्वारा सोखे हुए समुद्रको भरनेमें समर्थ हैं, उन्हीं श्यामघनने जब वेणुनादद्वारा प्रेममय अधर- सुधारसका वर्षण किया तो उसका प्रवाह इतना बढ़ा कि उसमें ब्रजांगनाएँ बह गयीं। यदि प्रबल प्रवाहमें पड़ी हुई नौकाको कोई नाविक रोकना चाहे तो वह रोक नहीं सकता। इसी प्रकार गोपांगनाओंको भी कोई रोक न सका। इसीसे भगवान् कहते हैं—'गोपिकाओ! अब मैं समझा। तुम तो मेरे प्रेमसे विवश होकर ही यहाँ आयी हो।' 'यन्त्रिताशयाः—वशीकृतान्तःकरणाः' अर्थात् जिनका अन्तःकरण किसीने अपने अधीन कर लिया हो। भगवान्के मधुमय वेणुनिनादरूप चौरने गोपांगनाओंके हृदय-भवनमें घुसकर उनके विवेकरूप धनको चुरा लिया था। इसीलिये उन्हें लौकिक-वैदिक मर्यादाका ज्ञान नहीं रहा। भगवान् कहते हैं—आपलोगोंने यद्यपि बड़ा प्रयत्न भी किया कि लोकमर्यादाका विच्छेद न हो; परंतु यह तो आपके वशकी बात नहीं रही थी। देखो, भ्रमर बहुत-से बन्धनोंको काट सकता है, कठोर काष्ठमें भी छिद्र कर देता है, परंतु पंकज- कोशको नहीं काट सकता। इस प्रकार आप भी प्रेमबन्धनको काटनेमें सर्वथा असमर्थ थीं। किंतु, प्रियतम! जब आप जानते हैं कि ये व्रजांगनाएँ प्रेमपाशमें बँधकर ही आपके पास आयी हैं तो आप इनपर कृपा क्यों नहीं करते? इसपर भगवान् कहते हैं—'मदभिस्नेहाद् भवत्यो यन्त्रिताशयाः' (श्रीमद्भा १०।२९।२३)—आप मेरे अभिस्नेहसे विवशचित्त हैं। 'अभितः स्नेहः अभिस्नेहः प्रीतिविशेषः' अर्थात् हे गोपांगनाओ! हम जानते हैं, आपलोग सहज स्नेहसे आयी हैं— किसी स्त्री-पुरुष-सम्बन्धिनी रतिके कारण नहीं आयीं। आपका प्रेम विशुद्ध है; उसमें कामका लेश नहीं है। मेरेमें तो केवल प्रेम है, कृति तो है नहीं। अतः वह तो हमारे दर्शनमात्रसे चरितार्थ हो गया। आपलोग यदि रमणाभिलाषासे आतीं तो अंग- संगकी आवश्यकता होती। आप यदि अंग-संगकी इच्छासे आतीं तो आपको ब्रह्मसंस्पर्श प्राप्त होता। आपका तो स्वाभाविक प्रेम है और मेरे प्रति प्रेम होना स्वाभाविक ही है; क्योंकि 'प्रीयन्ते मयि जन्तवः' मेरे प्रति जीवमात्रका प्रेम है। यह तो मेरा स्वभाव ही है; अतः इसमें कोई विशेषता नहीं है। यहाँ 'भवत्यः' शब्द पूजार्थक है। इसका तात्पर्य यह है कि आप तो प्रेमकी आचार्या और मुनिजनोंके लिये भी वन्दनीया हैं। मेरे प्रति तो स्वभावतः समस्त जीवोंका प्रेम है; फिर यदि आपका भी मेरेमें अनुराग हुआ तो इसमें विशेषता ही क्या है? इसलिये आपका प्रेम तो मेरे दर्शनमात्रसे ही
चरितार्थ हो गया। 'जन्तु' पदसे यहाँ देहमें तादात्म्याध्यासवाले पामर और अनभिज्ञ प्राणी अभिप्रेत हैं; क्योंकि आत्मा तो वस्तुतः जन्म-मरणरहित है। वह 'जन्तु' शब्दका वाच्य नहीं हो सकता। जिस समय वह देहसे अपना तादात्म्य करता है, तभी 'जन्तु' कहा जाता है। मेरे प्रति तो उन पामर प्राणियोंका भी प्रेम है; क्योंकि मैं सभीका आत्मा हूँ और आत्मा नामकी वस्तु सभीको प्रिय हुआ ही करती है। यद्यपि जीव देहादिमें ही आत्मभाव कर लेते हैं तो भी मैं तो उनका भी परम-प्रेमास्पद हूँ। कहते हैं जिस समय रामभद्र वनको पधारे, उस समय अयोध्यामें जो स्त्रियाँ पुत्रहीना थीं, उन्हें भी जब प्रभुके वनगमनान्तर पुत्र-प्राप्ति हुई तो प्रभुके वियोगके कारण उससे कुछ प्रसन्नता नहीं हुई; जिनके पति चिरकालसे विदेश गये हुए थे, उन्हें उनका आगमन होनेपर भी कोई सुख न हुआ। यहाँतक कि पशु-पक्षी और स्थावरोंकी भी दुर्दशा ही रही। नदियाँ सूख गयीं और वृक्ष एवं लताएँ पत्र- पुष्पहीन हो गये। 'अपि ते विषये म्लाना सपुष्पाङ्कुरकोरकाः।' घोड़ोंकी दशा तो श्रीगोसाईंजी महाराजने लिखी ही है— जो कह रामु लखनु बैदेही। हिंकरि हिंकरि हित हेरहिं तेही॥ जहँ असि दसा जड़न्ह कै बरनी। को कहि सकइ सचेतन करनी॥ (रा०च०मा० २।१४३।७; १।८५।३) यदि भगवान् राम कोई अन्य व्यक्ति होते तो सबको ऐसी बेचैनी क्यों होती? यद्यपि आपात दृष्टिसे यह भी कहा जाता है कि उन सबको यह ज्ञान भी नहीं था कि वे हमारे अन्तरात्मा ही हैं तथापि वस्तुस्थिति तो ऐसी ही थी। हमारी तो ऐसी भी आस्था है कि जिन्होंने भगवान् रामभद्रका दर्शन या स्पर्श किया था, उन्हें उनका अपने अन्तरात्मास्वरूपसे अवश्य ज्ञान हो गया था; क्योंकि प्रभुकी यह प्रतिज्ञा है— मम दरसन फल परम अनूपा। जीव पाव निज सहज स्वरूपा॥ (रा०च०मा० ३।३६।९) अतः जिन्हें उनका सान्निध्य प्राप्त हुआ था, उन्हें तो उस परमतत्त्वका लाभ अवश्य हो गया था, जो योगीन्द्रोंको भी दुर्लभ है। उन्हें जो स्वरूपानभिज्ञ कहा जाता है, वह लौकिकी दृष्टिको लेकर कहा जाता है। अन्यथा 'कस रे सठ हनुमान कपि' (रा०च०मा० ६।२६) भला मरुतनन्दन वीराग्रणी श्रीहनुमान्जी क्या बन्दर हैं? पक्षिराज जटायु क्या साधारण पक्षी हैं? भक्ताग्रगण्य काकभुशुण्डिजी क्या कोरे कौए ही हैं? केवल लौकिकी दृष्टिसे ही उन्हें पशु-पक्षी कहा जाता है। अहा! जिन्हें प्रभुका सान्निध्य प्राप्त हुआ था, उन कोल-किरात और भीलोंको भी प्रभुका जो परम दुर्लभ प्रेम प्राप्त हुआ था, वह क्या हमें अनायास प्राप्त हो सकता है? प्रभु कैसे प्रेमसे उनकी बातें सुनते थे!— बेद बचन मुनि मन अगम ते प्रभु करुना ऐन। बचन किरातन्ह के सुनत जिमि पितु बालक बैन॥ (रा०च०मा० २।१३६) इससे यह सिद्ध होता है कि प्रभुका स्वरूप- ज्ञान किसीको हुआ हो अथवा न हुआ हो, उनके दर्शनमात्रसे उनके प्रति प्रेमातिशयका होना तो स्वाभाविक ही था। देखो खर और दूषण कैसे क्रूर राक्षस थे? वे अपनी बहनके अपमानसे क्षुभित होकर बदला लेनेके लिये ही आये थे। तथापि जिस समय उन्होंने प्रभुका रूप-माधुर्य देखा तो कहने लगे— जद्यपि भगिनी कीन्हि कुरूपा। बध लायक नहिं पुरुष अनूपा॥ (रा०च०मा० ३।१९।५) भगवान् तो साक्षात् अपने आत्मा हैं, जिन अन्य पदार्थोंमें भी आत्मत्वका विभ्रम हो जाता है, उनके प्रति भी अपार प्रेम हो जाता है। देखो—शरीरमें आत्मत्वका केवल भ्रम ही तो है; किंतु उसके लिये मनुष्य संसारकी सारी वस्तुओंको निछावर कर देता है।
श्रीरासलीलारहस्य ३३१ अतः भगवान् कहते हैं कि इस प्रकार जब अज्ञ जन्तुओंका भी मेरे प्रति स्वाभाविक अनुराग है तो हे गोपिकाओ ! आप तो परम पूजनीया हैं। आपको मेरे प्रति प्रेम हुआ—इसमें तो कहना ही क्या है। आप जैसी प्रणयिनी, जो योगीन्द्रमुनीन्द्रवन्द्यपादारविन्दा हैं, यदि लौकिक-वैदिक बन्धनोंकी उपेक्षा करके हमारे प्रेमसे आकृष्ट होकर यहाँ पधारी हैं तो यह उचित ही है। इसपर गोपिकाओंकी ओरसे यह प्रश्न हो सकता है कि महाराज ! आपके प्रति तो सब प्रेम करते हैं, किंतु आप भी उनके लिये कुछ करते हैं या नहीं ? इसका उत्तर यही है कि ‘प्रीयन्ते प्रीतिमेव कुर्वन्ति न तु किञ्चिदपि मत्तोऽभिवाञ्छन्ति'—जीव मेरे प्रति केवल प्रेम ही किया करते हैं, मुझसे कुछ चाहते नहीं हैं। मेरे सम्मुख होते ही उनकी सारी कामनाएँ निवृत्त हो जाती हैं। देखो—विभीषण राज्यकी कामनासे भगवान्के सम्मुख आये थे, परंतु प्रभुका दर्शन करनेपर तो यही कहने लगे— उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही॥ (रा०च०मा० ५।४९।६) यदि कहो कि अच्छा, भक्त तो आपसे कुछ नहीं चाहते, परंतु आपको तो अपनी ओरसे उनका कुछ उपकार करना ही चाहिये। इसपर प्रभु कहते हैं— 'प्रीयन्ते मयि स्वरूपमात्रे न तु प्रत्युपकारिणी'— मुझ अपने स्वरूपमात्रमें उनका केवल प्रेम ही होता है, वे मुझमें प्रत्युपकारकी दृष्टिसे प्रीति नहीं करते, क्योंकि मुझमें तो केवल प्रेम ही है—कर्तव्य नहीं है। जिन्हें कोई कामना हो, उन्हें अन्य देवताओंकी शरण लेनी चाहिये। कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः। × × × लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान्॥ (गीता ७।२०, २२) मुझमें तो उन्हींका अनुराग होता है, जिनका अन्तःकरण समस्त कामनाओंसे निर्मुक्त होकर स्वच्छ हो गया है। येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्। ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः॥ (गीता ७।२८) किंतु ऐसी बात नहीं है कि भगवान् किसीकी कामनाएँ पूर्ण किया ही नहीं करते। यह तो उनकी नीति है। उन्होंने कामनापूर्तिका काम अन्य देवताओंको सौंप रखा है। जिस प्रकार सम्राट्के यहाँ भिन्न-भिन्न विभागोंके भिन्न-भिन्न अधिकारी होते हैं, उसी प्रकार भगवान्के यहाँ भी हैं। परंतु समय-समयपर भगवान् स्वयं भी अपने भक्तोंकी कामना पूर्ण करते ही आये हैं। जिस समय ग्राहगृहीत होनेपर गजराजने निर्विशेष रूपसे भगवान्की स्तुति की थी, उस समय और कोई देवता उसकी रक्षाके लिये उपस्थित नहीं हुआ। यद्यपि इन्द्र, वरुण, कुबेर आदि सभी देवता उसकी रक्षा करनेमें समर्थ थे; परंतु उन्होंने तो यही सोचा कि हमारा नाम लेकर थोड़े ही पुकारता है, जो हम जायँ। उस समय केवल श्रीहरिने ही प्रकट होकर उसका संकट निवृत्त किया और साथ ही यह भी सिद्ध कर दिया कि जिस निर्विशेष परब्रह्मकी गजराजने स्तुति की थी, वह मैं ही हूँ। इसी प्रकार द्रौपदीकी लाज बचानेके समय भी प्रभुने ही वस्त्रावतार लिया था। अतः ऐसी बात भी नहीं है कि प्रभु कभी किसीकी कामनापूर्ति करते ही न हों। इसीलिये— अकामः सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधीः। तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत पुरुषं परम्॥ (श्रीमद्भा० २।३।१०) —ऐसी उक्ति है। परंतु यहाँ तो व्रजांगनाओंके साथ उपहास हो रहा है। इस प्रकार यद्यपि उन्होंने व्रजांगनाओंका समाश्वासन भी कर दिया तथापि बात वही रही कि गोष्ठको जाओ, देरी मत करो। यह नियम है कि जिस समय प्रियतम अपने प्रेमीका निराकरण करता हो, उस
समय यदि वह मुसकाने लगे तो उसके तिरस्कारका प्रभाव नहीं पड़ता। वह बात उपहासमें सम्मिलित हो जाती है। जिस प्रकार यदि कोई पुरुष वैराग्यका उपदेश कर रहा हो और स्वयं अच्छे ठाट-बाटमें हो तथा आकृतिसे भी रागी-सा जान पड़ता हो तो उसके कथनका कोई प्रभाव नहीं होता। अतः उपदेशके समय अनुकूल आचरण और मुद्राकी भी बहुत आवश्यकता है। इसीसे जब परमानन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्रने उनका स्वागत करके फिर मन्द मुसकानपूर्वक निराकरण करना आरम्भ किया तो वे समझ गयीं कि यह केवल इनका उपहास है। ब्रजांगनाओंकी उच्चतम स्थिति अब मानिनी ब्रजांगनाओंकी स्थिति भी समझ लेनी चाहिये। उनकी स्थिति बहुत ऊँची है। मानिनी गोपांगनाएँ वे हैं, जो प्रभुपर आत्मीयताका अधिकार रखती हैं; वे उन्हें अपने अधीन समझती हैं और उनसे जो चाहें करा सकती हैं। उन्हींके विषयमें यह कहा गया है कि वे भगवान्को कठपुतलीके समान नचाती थीं— 'ताहि अहीरकी छोहरियाँ, छछियाभरि छाछपै नाच नचावैं॥' दूसरी अनभिज्ञा गोपियाँ हैं। साहित्य-दृष्टिसे वे मुग्धा नायिका हैं। वे प्रभुके अनुकूल रहकर उनका अनुग्रह प्राप्त करना चाहती हैं। वे प्रभुकी प्रार्थना करती हैं, किंतु जो मदीयत्वाभिमानवाली हैं, उनकी प्रार्थना स्वयं प्रभु करते हैं। देखो—जिस समय वृषभानुनन्दिनीजीने कहा कि महाराज, मैं तो थक गयी तो यहाँतक उनका कथन ठीक था; किंतु इसके आगे जो यह कहा कि 'नय मां यत्र ते मनः'— आपकी जहाँ इच्छा हो, वहाँ मुझे ले चलिये—यह कथन उनके अनुरूप नहीं हुआ। इसीसे भगवान् अन्तर्धान हो गये। श्रीराधिकाजी मानिनी नायिका थीं; उनको नायकके आश्रित नहीं होना चाहिये था। उन्होंने जो आश्रयत्व-व्यंजक भाव प्रकट किया— यह उनके अनुरूप नहीं था। इससे रसभंग हो गया और रासलीलाका आविर्भाव रसवृद्धिके लिये ही हुआ था। इसीसे भगवान् अन्तर्धान हो गये। गोपिकाओंने कहा था कि 'हे कृष्ण, हम आपका वेणुनिनाद सुनकर नहीं आयीं। हम तो शरच्चन्द्रकी दुग्धसदृश शुभ्र चन्द्रिकासे अत्यन्त शोभाप्राप्त इस कुसुमित वनावलीकी छटा निहारने आयी हैं। हमें यहाँ ठहरनेके लिये विशेष अवकाश ही नहीं है।' उस समय भगवान्को यही कहना पड़ा कि 'हे मानिनियो ! यह ठीक है, आप हमारी वंशी- ध्वनि सुनकर हमारे दर्शनोंके लिये तो नहीं आयीं, परंतु अब यदि हमारे सौभाग्यसे आप यहाँ पधारी हैं तो कुछ काल ठहरिये।' यही बात इस समय भगवान् कह भी रहे हैं— 'मानिनियो ! हम जानते हैं, आप ऊपरसे ही कह रही हैं कि हम वृन्दारण्यकी शोभा निहारनेके लिये आयी हैं तथापि भीतरसे तो हमारे प्रति आपका अवश्य अनुराग है। यदि कहो कि आप हम कुलांगनाओंके लिये ऐसे अननुरूप वचन क्यों कहते हैं, हम पर पुरुषमें कैसे अनुराग कर सकती हैं ? तो ऐसी बात नहीं है, मेरा तो सौभाग्यातिशय ही ऐसा है कि जो रस-रीतिसे अनभिज्ञ शुष्कहृदय पशुप्राय जीव हैं, उनका भी मुझमें अनुराग हो जाता है, फिर आप तो रसिकशिरोमणिभूता हैं। अतः मेरे प्रति आपका अनुराग होना तो सर्वथा उचित ही है। कामिनियोंके हाव- भाव कटाक्षका रहस्य तो कामुकोंको ही ज्ञात हो सकता है। आपलोग रसाभिज्ञोंमें शिरोमणिभूता हैं; अतः जिस शृंगारमूर्ति मुझ आनन्दकन्दके प्रति स्वभावतः सब जीवोंका आकर्षण होता है, उसके प्रति आपको अनुराग होना ठीक ही है।' अथवा 'अयन्त्रिताशया' ऐसा पदच्छेद किया जाय तो यह भाव होगा कि गोपिकाओ ! आप वास्तवमें पतिव्रताशिरोमणि ही हैं। मेरा रूप यद्यपि ऐसा है कि उसके प्रति सभीका आकर्षण हो जाता है तो भी आपका चित्त मेरी ओर आकर्षित नहीं हुआ—यह
श्रीरासलीलारहस्य ३३३ आपके मनोबलकी ही महिमा है अथवा भगवान् इसलिये अब आप जाओ, अपने पतिदेवोंका ही गोपिकाओंसे प्रेमकी भिक्षा माँगते हैं। वे कहते हैं कि पूजन करो। उसीसे मेरा भी पूजन हो जायगा; क्योंकि जिसमें पामर जीव भी प्रेमपाशसे बँध जाते हैं, उसे मैं सर्वान्तरात्मा हूँ। यह गोपिकाओंके उपलक्षणसे मेरे प्रति क्या आपका अब भी अनुग्रह नहीं होगा— संन्यासनिष्ठाके अनधिकारियोंको उपदेश है कि तुम अब तो मुझे अपना प्रेमदान देना ही चाहिये। अपने वर्णाश्रमधर्मका पालन करते हुए ही मुझ अथवा भगवान्की यह उक्ति अनधिकारिणी सर्वान्तरात्माकी आराधना करो। गोपांगनाओंकी निष्ठाको विचलित करनेके लिये और इसी उक्तिसे वे अधिकारिणी गोपांगनाओंसे कह अन्तरंगाओंकी निष्ठाको सुदृढ़ करनेके लिये है; रहे हैं कि ‘हे गोपियो! तुम्हें सारे बन्धनोंको काटकर क्योंकि जिन्हें उनके प्रति ऐकान्तिक प्रेम नहीं है, उन्हें अब मेरी ही आराधना करनी चाहिये; क्योंकि तो स्वधर्ममें ही परिनिष्ठित रहना चाहिये और जो ‘अभिस्नेहात्’ ‘अभितः’—सब ओरसे मुझमें ही [
यह बिनती रघुबीर गुसाईं। ते सब तुलसिदास प्रभु ही सों, होहिं सिमिटि इक ठाईं ॥ गोपियोंकी स्थिति ऐसी ही भगवन्मयी थी। वे जो कुछ देखती थीं, जो कुछ सूँघती थीं, जो कुछ स्पर्श करती थीं, सब श्याममय था—'जित देखूँ तित श्याममई है।' उनका अन्तःकरणरूप सरोवर श्याम- रंगसे रँग गया था। अन्तःकरण जिस-जिस इन्द्रियरूप प्रणालीके द्वारा निकलकर जिस-जिस विषयको व्याप्त करके प्रकाशित करता था, वही श्याममय प्रतीत होता था। अतः भगवान् कहते हैं—'अयि मानिनियो ! आपलोगोंका मेरे प्रति अभिस्नेह है। आपका चारों ओरका प्रेम पुंजीभूत होकर मुझमें ही लग गया है। अतः आप यन्त्रिताशया हैं, आपका चित्त विवश है। सो यह उपपन्न ही है। आप इसकी अनुपपत्तिकी आशंका न करें; क्योंकि जब अवान्तर धर्म सर्वात्मा श्रीहरिके स्मरणरूप परमधर्ममें बाधक होने लगते हैं तो वे त्याज्य हो ही जाते हैं। यद्यपि मेरे प्रति प्रेम तो सभीका होता है तथापि सर्वकर्म-संन्यासमें उसीका अधिकार है, जो श्रौत और स्मार्त कर्मोंका अनुष्ठान करनेसे शुद्धान्तःकरण होकर या तो निर्विशेष परब्रह्मका श्रवण, मनन और निदिध्यासनपूर्वक अपरोक्ष साक्षात्कार कर चुका हो या भगवान्के पदपद्मपरागका सुरसिक मधुकर होकर सांसारिक भोगवासनाओंसे ऊपर उठ गया हो। ऐसा महानुभाव बहुत दुर्लभ है; क्योंकि इन्द्रियोंकी स्वाभाविक प्रवृत्ति विषयोंकी ही ओर है; अतः आचार्य लोग साधनोंपर ही जोर दिया करते हैं। इधर भगवान् भी व्रजांगनाओंकी स्वरूपनिष्ठाको पुष्ट करते हुए उन्हें पतिशुश्रूषाका ही आदेश देकर सर्वसाधारणके लिये श्रौत-स्मार्त कर्मोंकी आवश्यकताका ही प्रतिपादन कर रहे हैं। भगवान्का इस सारे कथनसे क्या-क्या तात्पर्य है, सो तो वे ही जानें। हमें तो जो कुछ उन्हींके कृपाकणसे प्राप्त हुआ है, उसीका निरूपण कर रहे हैं। हम पहले कह चुके हैं कि श्यामसुन्दर श्रीहरिके वामांगमें रासेश्वरी श्रीवृषभानुनन्दिनी विराजती हैं। वे उन्हींकी आह्लादिनी शक्ति हैं; स्वरूपतः भगवान्के साथ उनका अभेद है। आरम्भमें जो ‘श्रीभगवानुवाच’ ऐसा कहा गया है, वहाँ ‘श्री’ शब्द उन्हींका द्योतक है। यह श्री ‘श्रयते हरिं या इति श्रीः'—जो हरिका आश्रय ले वह श्री नहीं है, बल्कि ‘श्रीयते इति श्रीः'—जिसका आश्रय लिया जाता है, वह श्री है। अनन्तकोटि-ब्रह्माण्डान्तर्गत सौन्दर्य-माधुर्य-सुधाकी अधिष्ठात्री जो महालक्ष्मी हैं, उनके द्वारा भी जिनके चरणकमल सेवित हैं, वे श्रीवृषभानुदुलारी ही श्री हैं। उनकी प्रसन्नताके लिये ही भगवान्ने यह लीला की थी। रासलीला एक नायिकासे नहीं होती, इसीलिये अन्य गोपांगनाओंका आवाहन किया गया था। अब यदि उन सबका आदर करते हैं तो सम्भव है श्रीराधिकाजी रुष्ट हो जायँ; क्योंकि वे मानिनी हैं न! अतः भगवान् उनका तिरस्कार करते हैं, जिसमें वे दयावश स्वयं ही कह दें कि श्यामसुन्दर ! अब आप इनका निराकरण क्यों करते हैं, आ गयी हैं तो इनकी इच्छा भी पूर्ण कीजिये। अथवा यह भी सम्भव है कि अन्य गोपियाँ तो आ गयी हों और राधिकाजी अभी न आयी हों। इसलिये भगवान् उनकी प्रतीक्षामें हों; क्योंकि इस लीलाकी अधिनायिका तो वे ही हैं। अतः वे अन्य गोपिकाओंको इसलिये सीधा-सीधा उत्तर नहीं देते, जिसमें राधिकाजीके आनेपर उनका मान रखनेके लिये यह कह सकें कि हमें आपकी प्रतीक्षा थी, इसीसे अभी कोई निश्चय नहीं हुआ। इस गोपिकायूथमें कितनी ही व्रजांगनाएँ मानिनी हैं। इसीसे भगवान् ऐसे वचन कह रहे हैं, जिनके अनुकूल और प्रतिकूल दोनों अर्थ हो सकते हैं। मानिनी नायिकाका नायकपर आधिपत्य रहता है; इसलिये उसे ऐसे वाक्य बोलने पड़ते हैं, जिनका अर्थ बदलकर वह अपनेको उनके कोपका भाजन होनेसे बचा सके।
श्रीरासलीलारहस्य ३३५
रासलीला परब्रह्मका नित्य लास्य है यह रासलीला कोई उपहास या प्राकृत लीला नहीं है। यह तो शुद्ध परब्रह्मका नित्य लास्य है। रासका स्वरूप क्या है?— 'माधवं माधवं वान्तरे अङ्गना अङ्गनामङ्गनामन्तरे माधवः।' एक-एक गोपीके अनन्तर भगवान् हैं और भगवान्की एक-एक मूर्तिके अनन्तर एक-एक व्रजांगना है। सांख्यवादियोंका कथन है—'क्षणपरिणामिनो हि भावा ऋते चितिशक्तेः।' वह चितिशक्ति ही भगवान् कृष्ण हैं। यह सम्पूर्ण प्रकृति चिद्रूप श्रीकृष्णके ही चारों ओर घूम रही है। आजकल वैज्ञानिकोंका भी मत है कि एक ग्रह दूसरे ग्रहके आश्रित होकर गति कर रहा है। इस प्रकार सारा ही ब्रह्माण्ड गतिशील है। यही प्रकृतिका नित्य नृत्य है। यदि आध्यात्मिक दृष्टिसे विचार करें तो हमारे शरीरमें भी भगवान्की यह नित्यलीला हो रही है। हमारा प्रत्येक अंग गतिशील है। हाथ, पाँव, जिह्वा, मन, प्राण सभी नृत्य कर रहे हैं। इन सबका आश्रय और आराध्य केवल शुद्ध चेतन ही है। यह सारा नृत्य उसीकी प्रसन्नताके लिये है और वही नित्य एकरस रहकर इन सबकी गति-विधिका निरीक्षण करता है। जबतक इनके बीचमें वह चैतन्यरूप कृष्ण अभिव्यक्त रहता है; तबतक तो यह रास रसमय है; किंतु उसका तिरोभाव होते ही यह विषमय हो जाता है। इसी प्रकार गोपांगनाएँ भी भगवान्के अन्तर्हित हो जानेपर व्याकुल हो गयी थीं। अतः इस संसाररूप रासक्रीड़ामें भी जिन महाभागोंको परमानन्दकन्द श्रीव्रजचन्द्रकी अनुभूति होती रहती है, उनके लिये तो यह आनन्दमय ही है। अहो! यह संसार तो अब भी प्रभुका वृन्दारण्य ही है। यहाँ वही चन्द्र छिटक रहा है, वही यमुना है और वही मन्द-सुगन्ध सुशीतल समीर बह रहा है। तथापि आज श्रीकृष्णचन्द्रके ओझल हो जानेसे इन जीवरूप गोपांगनाओंके लिये यह दुःखमय ही हो रहा है। यदि वे दीखने लगें तो फिर यही परम आनन्दमय हो जाय। जीवका परमपुरुषार्थ प्रभुकी प्राप्ति ही है देखो—इस रस-रसकी प्राप्तिके लिये गोपांगनाओंने स्वधर्मानुष्ठान करते हुए श्रीकात्यायनीदेवीकी आराधना की थी। अतः हमें भी भगवत्संयोग-सुखकी प्राप्तिके लिये स्वधर्म-पालनमें ही तत्पर रहकर भगवान्की उपासना करनी चाहिये। जबतक जीव परब्रह्म श्रीकृष्णचन्द्रसे वियुक्त रहता है, तबतक उसे शान्ति नहीं मिलती। अतः जीवका परम पुरुषार्थ प्रभुकी प्राप्ति ही है। इसके लिये हमें भगवान्के किसी भी स्वरूपकी उपासना करनी चाहिये। भगवान् विष्णु, शिव, श्रीकृष्ण, रामभद्र, दुर्गा—ये सब भगवद्विग्रह ही हैं। साम्प्रदायिक पक्षपातके कारण इनमेंसे किसीके प्रति भी द्वेष-दृष्टि नहीं करनी चाहिये। अपने इष्टदेवका प्रेमपूर्वक पूजन करो। इसके लिये उनके स्वरूप और उपासना-विधिका ज्ञान प्राप्त करो तथा यह भी मालूम करो कि उनकी उपासनामें क्या-क्या प्रतिबन्ध हैं। प्रतिबन्ध कुपथ्य रूप हैं, उनसे बचनेकी बहुत आवश्यकता है। यदि कुपथ्य करते हुए चन्द्रोदय- जैसी ओषधिका भी सेवन किया जाय तो भी लाभ होना सम्भव नहीं है। इसलिये उपासनामार्गके प्रतिबन्धोंसे सर्वदा सतर्क रहो। 'स्वधर्माचरणं शक्त्या विधर्माच्च निवर्तनम्।' (श्रीमद्भा० ३।२८।२) —इस वाक्यके अनुसार सर्वदा स्वधर्मका तो यथाशक्ति पालन करो, किंतु विधर्मका तो सर्वथा त्याग कर दो। यदि साथ-साथ विधर्मरूप कुपथ्यका त्याग और स्वधर्मरूप पथ्यका सेवन न किया जायगा तो यथेष्ट लाभ होना कदापि सम्भव नहीं है। ऐसी अवस्थामें सारी ओषधि निष्फल हो जायगी। इस प्रकार यदि कोई पुरुष स्वधर्म-पालन और विधर्म- विसर्जनपूर्वक भगवान्की उपासना करता है तो उसे ब्रह्मसंस्पर्श अवश्य प्राप्त हो जाता है।
३३६ भक्तिसुधा श्रीरासपंचाध्यायी गोपियोंके गर्वापहरणके लिये भगवान् अन्तर्धान हो गये अन्तर्हिते भगवति सहसैव व्रजाङ्गनाः। अतप्यंस्तमचक्षाणाः करिण्य इव यूथपम्॥* (श्रीमद्भा० १०।३०।१) भगवान् भक्तपराधीन हैं। वे अपनी सर्वज्ञता, सर्वशक्तिमत्ता आदिको भूलकर भक्तोंके पीछे घूमते हैं, परंतु गर्वसे उन्हें बड़ी शत्रुता है। वे अपने भक्तोंमें गर्व नहीं आने देना या नहीं रहने देना चाहते। जहाँ गर्व रहेगा, भगवान् वहाँ स्वयं न रहेंगे। भगवान्को अपने अत्यन्त अनुकूल पाकर गोपियोंको गर्व हो गया। उसे दूर करनेके लिये भगवान् अन्तर्हित हुए। गोपियोंको भगवान्के दर्शन और स्पर्शका जो बाह्य सुख मिल रहा था, वह नहीं रहा। भगवान् वहाँसे कहीं चले नहीं गये, अपितु गोपियोंके मन, बुद्धि, प्राण, अन्तःकरण आदिमें प्रविष्ट हुए। श्रीमद्वल्लभाचार्यजी कहते हैं—वे कैसे अन्तःप्रविष्ट हुए, उसका क्या प्रकार था— वह व्रजांगनाएँ जान न सकीं। वे क्यों नहीं जानती थीं; क्योंकि वे व्रजांगनाएँ थीं, अतः नहीं जानती थीं। अर्थात् जन्मसे, बाल्यकालसे ही वे भगवान्को बाह्य मूर्तिके ही रूपमें देखा करती थीं। अतः जब आज उन्हें नहीं देखा तो वे दुःखी हुईं। ब्रजवासियोंपर दया करके विषमताको मिटाकर भगवान् व्रजमें प्रकट हुए— 'तास्ताः क्षपाः प्रेष्ठतमेन नीता मयैव वृन्दावनगोचरेण।' (श्रीमद्भा० ११।१२।११) जो अनन्त अचिन्त्य अलक्ष्य अव्यपदेश्य निर्विकार तत्त्व है—वह वृन्दावनमें गोपाल, गोचारक बना। जिसे अष्टांगयोगयुक्त योगी नहीं प्राप्त कर सकते, वह यहाँ प्रकट। बात यह है कि अत्यन्त वैजात्यमें प्रीति नहीं होती। मनुष्य रूपहीन, स्पर्शहीन, रसहीन, गन्धहीन, अचिन्त्य अग्राह्यमें कैसे प्रीति करे? यद्यपि अचिन्त्य अग्राह्य निर्विकार श्रीभगवान्ने भक्तानुग्रहार्थ नृसिंह, वराह, कच्छपादि अवतार धारण किये, परंतु उनकी महामहिमा, महान् ऐश्वर्यको देखकर अपनेसे असमान होनेके कारण मानव- हृदय उनसे स्वच्छन्द अनुराग करनेमें और भी असमर्थ रहा। पहले तो अचिन्त्य, अग्राह्य आदि होनेसे ही प्रेम दुर्घट रहा, फिर कच्छपादिमें भी महामहिमा आदिके कारण वहाँ भी वह दुर्लभ ही रहा। अतः भक्तवत्सल भगवान् चतुर्भुज मानवरूपमें अवतीर्ण हुए। परंतु इस रूपमें भी चतुर्भुजरूप और ऐश्वर्यातिशयके कारण मनुष्यको कुछ संकोच ही रहा, वह पूरा-पूरा अपना हृदय उनके समक्ष न खोल सका। तब प्रभु ठीक-ठीक मानवाकार श्रीरामरूपमें अवतीर्ण हुए, परंतु यहाँ भगवान् मर्यादा- पुरुषोत्तम बन गये। अतः इस रूपमें भी मर्यादापूर्ण लोग अथवा साधारण जीव प्रीति करते डरते रहे। ऐश्वर्यमें भी संकोच बना ही है। इसलिये वह अचिन्त्यैश्वर्य जगदाधार भगवान् गोप और गोपियोंके साजात्य सम्बन्धको लेकर गोपालरूपमें अवतीर्ण हुए और सभीके निःसंकोच परप्रेमास्पद बन गये। गोपबालाओंका अन्तर्द्वन्द्व जब भगवान् कृष्ण मथुरामें आ गये, तब गोपबालाएँ अधिक वियोगसन्तप्त हुईं। किसीने कहा— 'मथुरा क्या दूर है, नहीं रहा जाता तो जाओ, वहीं दर्शन कर आओ!' सब तो नहीं, पर कुछ व्रजांगनाएँ किसी समय मथुरा भी गयीं, परंतु वहाँ श्रीमथुरानाथका वैभव देखकर; उनके शौर्य, वीर्य, ओज, तेजको देखकर उन्होंने घूँघट निकाल लिया, कहने लगीं—ये हमारे प्रभु प्राणधन श्यामसुन्दर नहीं हैं। नखसे शिखतक रत्नजटित सौवर्णाभरणधारी सम्राट् ये हमारे प्रभु नहीं हैं। हमारे तो वे मयूरपिच्छ, गुंजावतंस, पीताम्बर, लकुटीकम्बलधारी व्रजविहारी प्रभु हैं अर्थात् ऐश्वर्यमें उन्हें संकोच हुआ, वे तो अपने साजात्यमें प्रेम करती रहीं। अभिप्राय यह
- भगवान् सहसा अन्तर्धान हो गये। उन्हें न देखकर व्रजयुवतियोंकी वैसी ही दशा हो गयी, जैसे यूथपति गजराजके बिना हथिनियोंकी होती है।
कि साजात्यमें निःसंकोच प्रणय होता है, अतः भगवान् गोचारण करते प्रकटे। जीव अल्पज्ञ है, अल्पशक्ति है, अकिंचन है और प्रभु सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् हैं। ऐसे महान् अन्तरमें जीवकी कैसे गति हो, वह उन्हें कैसे प्राप्त करे? एक दीन-हीन भिक्षुकी महाराजाधिराजसे, सम्राट्से, सम्मिलनकी सम्भावना भी कैसे कर सकती है? परंतु यों निराश होना ठीक नहीं, अपितु उत्कट आशा बनाये रखनी चाहिये, तब शीघ्र ही दर्शन मिलता है। यद्यपि आशा दोष है, त्याज्य कोटिमें है, परंतु प्रभुसम्मिलनकी आशा महापुण्योंका फल है। यह आशा कल्पलता है। इसे नेहके अनुरागके जलसे सींचना चाहिये। शनैः-शनैः इसमें नाल, स्कन्ध, शाखा, उपशाखा, पत्र, पुष्प और फल अवश्य लगेगा ही। इस भावका आना कि प्रभु दुर्लभ हैं, इसे स्वयं भगवान्ने दूर किया है—श्रुति कहती है— द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते। तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्य- नश्नन्नन्यो अभिचाकशीति॥ (श्वेताश्वतर० ४।६) तुम और तुम्हारे प्रभु एक हैं, दोनों सुपर्ण हैं, दोनोंका साजात्य सम्बन्ध है, तब मिलनेमें कुछ कठिनाई नहीं। कहा जा सकता है—कहीं-कहीं साजात्यमें—भाई-भाईमें भी प्रेम नहीं रहता, इसको दूर करनेके लिये—'सखाया' कहा। जब परस्पर सख्य-सौहार्द होगा, तब मिलनेमें कोई कठिनाई न रहेगी। हाँ, यदि सखा भी दूर देशमें हो तो अवश्य विघ्न हो सकता है; जैसे चन्द्र और समुद्र। परंतु यहाँ तो यह बात भी नहीं है; क्योंकि— 'समानं वृक्षं परिषस्वजाते' शरीररूप एक ही वृक्षपर दोनोंका निवास है, सादेश्य है। फिर भी 'असङ्गो नहि सज्जते' से उस परतत्त्वको जब असंग बतलाया गया, तब उसमें प्रेम कैसे हो? इसका भी समाधान करते हुए श्रुतिने 'सयुजा' विशेषण दिया अर्थात् जीव और ब्रह्म दोनोंका घनिष्ठ सम्बन्ध है, दोनों एक ही हैं। जैसे जल और तरंग, घट और मृत्तिका, उत्पल और नैल्य एक ही हैं, इनमेंसे एक दूसरेसे अलग नहीं हो सकते। चिदचित्, भेदाभेद आदि सभी वादोंमें यह बात माननी पड़ती है। ऐसी स्थितिमें निराश होनेकी बात ही नहीं रह जाती। भगवान् तो स्वयं इस विषमताको मिटानेका प्रयत्न करते हैं, वे गोपोंके साथ प्रेम करनेके लिये ही गोपाल बने हैं। यहाँ तो 'अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति' का भेद भी '...वृन्दावनगोचराः से मिट गया। यहाँ तो उस 'अनशिता' अभोक्ताने गवाँरी ग्वालिनियोंके मक्खनकी चोरी की। निरंजनने श्रीयशोदासे अंजन लगवाया, वह अनंग (निरंग) सांग बन गया, उसने खूब व्रजदेवियोंसे उपाहृत छाकें छकीं। इसी समतामें क्रीडा होती है। तभी तो—'उवाह कृष्णो भगवान् श्रीदामानं पराजितः।' (श्रीमद्भा० १०।१८।२४) चुटिया पकड़कर श्रीदामाने भगवान्से अपना दाँव लिया, उनकी पीठपर चढ़कर टिक- टिक करके उसने सवारी साधी। यदि श्रीदामा उनमें और अपनेमें जरा भी भेद पाता तो यह कहनेकी कैसे हिम्मत करता— 'न्यारि करो हरि आपन गैया, ना हम चाकर नन्द बाबाके ना तू मोर गुसैंया, '...कहा भयो दस गैया अधिकैंया……।' इस तरह भगवान् अपनी सर्वज्ञताको भूलें, हम अपनी अल्पज्ञताको भूलें और इस तरह समानता स्थापित हो। इस समानताके रूपमें भगवान् यहाँ पधारे हैं। इस रूपमें इनपर व्रजांगना न्योछावर हो रही हैं। वे उन प्रियतम प्राणधनको—बालमुकुन्दको बालभावसे देखती हैं, बाहुलतासे वेष्टित करती हैं और उनकी बलैया लेकर फूली नहीं समातीं। ऐसी स्थितिमें वे अन्तर्हितको क्या जानें। विशेषकर वे व्रजांगना हैं, व्रजकी अंगना हैं, भोली हैं, मुग्धा हैं, वे तो साक्षात् भगवान्को ही जानती हैं। अतः 'अतप्यंस्तमचक्षाणाः करिण्य इव यूथपम्॥' (श्रीमद्भा० १०।३०।१) उन्हें न देखकर बड़ी सन्तप्त हुईं, जैसे हथिनियाँ हाथीको न देखकर
व्याकुल होती हैं। 'तमचक्षाणाः' से यह भाव बतलाया कि ये विशुद्धानुरागवती हैं, कान्तभाववती नहीं। अतः दर्शन, स्पर्श ही मुख्य है, रमण मुख्य नहीं। अतएव 'करिण्य इव यूथपम्' का उदाहरण है। करिणी स्पर्शकुशल होती हैं। एक सूक्तमें कुरंग, मातंग, पतंग, भृंग और मीनकी एक विषयकी कुशलता बतायी गयी है—'कुरङ्गमातङ्गपतङ्गभृङ्ग- मीना हताः पञ्चभिरेव पञ्च' अतः दर्शन और स्पर्शकुशला सख्यभाववती अथवा विशुद्धानुरागवती व्रजांगना श्रीश्यामसुन्दरका दर्शन न पाकर अति सन्तप्त हुईं। रासेश्वरके अन्तर्धान हो जानेपर व्रजांगनाओंकी मनोदशा साधारणतया दो प्रकारकी गोपी हैं, एक सख्यभाववती, दूसरी कान्तभाववती। चन्द्रावलीप्रभृति कान्तभाववती हैं। इन्हें स्पर्शसुखकी अधिक आकांक्षा रहती है; सख्यभाववती केवल दर्शनसे तृप्त रहती हैं। यहाँ इन्हींके लिये 'तमचक्षाणाः' पद है। गोपियाँ श्रीयुगल-सरकारके दर्शनके लिये लालायित रहती हैं। इनकी एकके दर्शनसे तृप्ति नहीं होती, वे दोनोंहीके दर्शन चाहा करती हैं। श्रीरासेश्वरी वृषभानुनन्दिनीके बिना आनन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्रके मुखचन्द्रका दर्शन और श्रीश्यामसुन्दर मदनमोहनके बिना श्रीव्रजेश्वरी महारानीका दर्शन भी उन्हें तृप्त नहीं करता, सुख- आनन्द नहीं देता। वे तो युगल-सरकारका, श्रीराधाकृष्णका, श्यामाश्यामका युगल दर्शन चाहती हैं। फिर जहाँ दोनोंमेंसे एकका भी दर्शन नहीं अथवा दोनोंका ही दर्शन नहीं, वहाँ तो सन्तापका कुछ ठिकाना ही नहीं। अतः कहा—'अतप्यंस्तमचक्षाणाः' हाय, हम हतभाग्याओंको प्रिया-प्रियतममेंसे एकके भी दर्शन नहीं! अभी प्रियतमके दर्शन हो रहे थे, उन्हें भी विधाताने ओझल कर दिया ! शारदी पूर्णिमाके स्वच्छ, शुद्ध, निष्कलंक पूर्णचन्द्र श्रीकृष्णचन्द्रके दर्शनके बिना यह चन्द्र प्रलयकालीन द्वादश आदित्योंके समान सन्ताप दे रहा है। यह आह्लादकर चन्द्र नहीं, अपितु प्रलयकालके महातापके द्वादश आदित्य एकत्र उदित हुए हैं। ये किंशुक- कुसुम और अरुण वस्त्र नहीं हैं, अपितु ये दावाग्निकी लपटें हैं। अपने प्रियतम प्राणधन मनमोहन श्यामसुन्दरको न देखकर उनके दर्शन-कालमें, संयोगके समयमें आह्लाद देनेवाली इन वस्तुओंमें अधिकाधिक तापकताकी गोपांगनाओंको प्रतीति हो रही है। कान्तभाववती तथा सख्यभाववती दोनोंकी ही यह सन्तप्त दशा है। यह ठीक ही है, प्राणीको प्राणके वियोगमें, अभीष्टके अभावमें दुःख होता ही है। फिर जो प्राणोंका भी प्राण है, मनका भी मन है, श्रोत्रका भी श्रोत्र है, चक्षुका भी चक्षु है, वाणीकी भी वाणी है, उसके विप्रयोगमें असह्य पीड़ाका होना स्वाभाविक है। श्रुति कहती है—‘प्राणस्य प्राणं...’ (बृहदारण्यक० ४।४।१८) महात्मा तुलसीदासजीने भी कहा है— प्रान प्रान के जीव के जिव सुख के सुख राम। तुम्ह तजि तात सोहात गृह तिन्हहि तिन्हहि बिधि बाम॥ (रा०च०मा० २।२९०) श्रुतिका वचन भी है—‘···“एतस्यैवानन्दस्य··· मात्रामुपजीवन्ति।’ (बृहदारण्यक० ४।३।३२) जगत्में जितने भी महान्-से-महान् आनन्द हैं, सुख हैं, वे सब इसी आनन्दके एक अंशमें--कणमें समा जाते हैं। वे सब इसीकी क्षुद्र विभूति हैं। चन्द्रमें आह्लादकता, नीरसमें सरसता, उस पूर्णतम पुरुषोत्तमसे ही है। इसके न होनेसे आह्लाद कहाँ? सरसता कहाँ? सौख्य कहाँ? फिर तो उरग-श्वासकी तरह सब विषमयं--दुःखमय होगा। ऐसे उन प्रभु प्रियतम प्राणधनके विप्रयोगसे श्रीव्रजांगनाओंको इतना दारुण सन्ताप हुआ कि वह अकथनीय ही है। उन्हें उस समय समस्त आह्लादकर वस्तुएँ दुःखद प्रतीत हुईं। श्रीमद्वल्लभाचार्यजीके कथनानुसार यह ताप पहले ऊपर-ही-ऊपर रहा, फिर अन्तरमें प्रविष्ट होने लगा, परंतु अन्तःप्रविष्ट थे—लीलारससहित श्रीकृष्ण, वे कहीं अन्यत्र नहीं गये थे। वहींसे गोपिकाओंके अन्तरसे उनकी लीलाशक्ति प्रकट हुई। तब उस लीलाक्तिकी प्रेरणासे रमापतिके गति- विभ्रम आदिसे आक्षिप्तचित्त होकर तथा तदात्मिका बनकर श्रीमती व्रजांगनाओने उन्हींकी उन-उन चेष्टाओंको ग्रहण किया।