भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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देना हिंसा ही तो है। इन्द्रियाँ अपने परम प्रेमास्पद सर्वान्तरतम परमात्माका अनुभव नहीं कर रहीं, बल्कि नाम-रूपात्मक संसारमें ही भटक रही हैं, यही उनका वध है। अतः जबतक हमारी समस्त इन्द्रियोंकी प्रवृत्ति परब्रह्म परमात्माकी ओर नहीं होती, तबतक वे अत्यन्त व्यग्र रहती हैं। यही उनका क्रन्दन है— मन करि बिषय अनल बन जरई। होइ सुखी जौं एहिं सर परई॥ (रा०च०मा० १।३५।८) प्रायः यह देखा जाता है कि विविधविध भोग- सामग्रीसे सम्पन्न महानुभाव भी अशान्तिके चंगुलमें फँसे रहते हैं। उनकी भोगतृष्णाको जैसे-जैसे भोजन मिलता जाता है, वैसे-वैसे ही वह और भी अधिक उत्तेजित होती जाती है। जिस प्रकार विषम विषाक्त अग्निके कटाहमें पड़ा हुआ कीट तड़पता है, उसी प्रकार सांसारिक भोगोंमें फँसे हुए जीव निरन्तर बेचैन रहते हैं। परंतु किया क्या जाय, यह उनका स्वभाव ही है; जैसे शूकरको विष्ठासे ही प्रेम होता है, उसी प्रकार इन इन्द्रियोंकी प्रीति विषयोंमें ही होती है। उस अपनी वासनाके कारण जीव दुःखमें ही सुखका अनुभव कर रहे हैं। जिस प्रकार दाद खुजलानेमें सुख मालूम होता है। उसी प्रकार विषयोंमें सुख जान पड़ता है। इस व्यामोहसे निकलो और परब्रह्म परमात्माकी ओर बढ़ो। जिस समय तुम्हारी प्रवृत्ति नामरूपोपाधिनिर्मुक्त परब्रह्ममें ही होगी, उसी समय तुम्हें शान्ति प्राप्त होगी। फिर तो 'यत्र यत्र मनो याति तत्र तत्र परं पदम्' (पैङ्गलोपनिषद् ४। २१) इस उक्तिके अनुसार सर्वत्र सुखका ही भान होगा। 'आनन्दाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते।' (तैत्तिरीय० ३।६) इस श्रुतिके अनुसार यह नामरूपात्मक जगत् आनन्दात्मक परब्रह्मसे ही उत्पन्न हुआ है। इसलिये यह आनन्दमय ही है। जिस प्रकार स्वाभाविक सौगन्ध्योपहित चन्दनमें मृत्तिका एवं जलादिके योगसे अस्वाभाविक दुर्गन्धकी प्रतीति होती है अथवा पित्त बिगड़ जानेके कारण मिश्री कड़वी जान पड़ती है, उसी प्रकार अचिन्त्यानन्त सौख्यसुधासिन्धु ब्रह्ममें अज्ञानजनित उपाधिके कारण इस दुःखमय प्रपंचकी प्रतीति होती है। अधिष्ठान ब्रह्मका ज्ञान होनेपर उसकी निवृत्ति हो जाती है। अतः 'तान् पाययत दुह्यत' इन इन्द्रियोंको पान कराओ और दुहो। क्या पान कराओ? परब्रह्मामृत; क्योंकि जब बुद्धि ब्रह्माकार रहने लगेगी तो विषय दुःखमय नहीं रहेंगे, वे भी ब्रह्ममय हो जायँगे। अतः इन्द्रियोंको उस परमानन्दसुधासिन्धुमें निमज्जित करनेके लिये दृश्यमात्रको परब्रह्म-रूपमें देखो। ऊपर जो पतिव्रताकी गाथा कही है, उसमें यदि वह पतिव्रता लौकिक साधनोंसे अपने बालकको बचानेका प्रयत्न करती तो वह सदाके लिये उसकी रक्षा नहीं कर सकती थी। उसे सदाके लिये तो वह तभी सुरक्षित कर सकती थी, जब कि अग्नि शीतल हो जाय। इसके लिये तो पतिशुश्रूषण ही एकमात्र साधन था। उस परमधर्मका दृढ़तापूर्वक पालन करके ही उसने अग्निका स्वभाव बदल दिया। सांख्य, नैयायिक और वैशेषिक आदि मतावलम्बियोंकी विवेकवती बुद्धि अपने मन, बुद्धि, इन्द्रिय और इन्द्रियवृत्तिरूप बालकोंको सर्वथा सुरक्षित नहीं करती। वह अपने बालकोंको अग्निसे बचा तो लेती है, परंतु अग्निके भयका सर्वथा नाश नहीं करती; क्योंकि प्रपंचका अत्यन्ताभाव तो उस मतमें है नहीं। यह काम तो अद्वैतनिष्ठ बुद्धि ही करती है। ऐसा कहकर हम अद्वैतवादका पक्ष नहीं करते; हमारा तो केवल यही मत है कि जिनके मतमें पूर्ण सच्चिदानन्दघन परब्रह्मसे भिन्न किसी दूसरी वस्तुकी सत्ता रहती है, उनके यहाँ तो दुःखका बीज रह ही जाता है। इसी दृष्टिसे बुद्धियोंके प्रति भगवान्का यही कथन है कि 'शुश्रूषध्वं पतीन्' तुम परब्रह्माकाराकारित वृत्तिमें परिणत होकर इन्हें ब्रह्मामृतका पान कराओ और इनकी तृष्णाको शान्त करो—इनका मनोरथ पूर्ण करो। वस्तुतः विषय-सेवनसे इन्हें सुख नहीं मिल सकता। भला मृगतृष्णाका जल पीनेसे किसीकी प्यास गयी है? उसमें जल है ही कहाँ? इसी प्रकार क्या