भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीरासलीलारहस्य ३०९
इसलिए कर्मानुष्ठानसे इन्द्रियोंकी प्रवृत्ति सर्वथा सुसंयत हो जाती है। इन्द्रियोंके संयत होनेपर उपासनामें प्रवृत्त होना सम्भव है। इसीसे उपासकको कर्ममें भी प्रवृत्त करनेके लिये यह श्रुति केवल उपासनामें भय प्रदर्शित करती है। कर्मकाण्डीको जो 'अन्धं तमः' की प्राप्ति बतलायी, वह इसलिये है कि उसे केवल कर्ममें ही न रह जाना चाहिये। यदि वह कर्मजड़ हो गया तो उपासनासाध्य उत्कृष्ट फलसे वंचित रह जायगा; अतः कर्मके साथ-साथ उसे उपासनाका भी अनुष्ठान करना चाहिये। फिर जिस समय कर्म और उपासनासे ऊपर उठे हुए जिज्ञासुको श्रुति तत्त्वज्ञानका उपदेश करती है, उस समय कर्मादिसे उसकी प्रवृत्ति हटानेके लिये वह कर्मकी निन्दा करती है। उस समय वह कहती है—'प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञरूपा' (मुण्डक० १।२।७) परंतु कर्मकाण्डका प्रतिपादन करते समय वह ऐसा कभी नहीं कह सकती। अतः भगवान् कहते हैं—'हे श्रुतियो! यदि तुम मुझमें अपना तात्पर्य निश्चय करोगी और इससे अज्ञानी लोग क्रन्दन करेंगे तो इसमें तुम्हारा दोष नहीं होगा। इसके लिये तो वे ही उत्तरदायी होंगे। उन्हें चाहिये कि वे किसी विज्ञकी शरणमें जाकर श्रुत्यर्थका अनुशीलन करें।' वस्तुतः यह पद्धति है कि जो जिस निष्ठावाला हो, उसे उसी निष्ठावालोंका संग करना चाहिये। कर्मी कर्मीका, भक्त भक्तका और ज्ञानी ज्ञानियोंका संग करें। शास्त्रका तात्पर्य समझनेके लिये भी शास्त्रज्ञ गुरुकी शरणमें ही जाना चाहिये, शास्त्रका मर्म विज्ञ पुरुष ही खोल सकते हैं। अतः भगवान् कहते हैं—'तान् पाययत दुह्यत च न'—तुम उन्हें पयपान मत कराओ और उनके लिये कर्मफल दुहनेकी चेष्टा भी मत करो। तुम तो मेरा ही प्रतिपादन करो; क्योंकि महातात्पर्यका प्रतिपादन होनेपर अवान्तर तात्पर्य तो उसीमें आ जाते हैं। यह नियम है कि किसी उत्कृष्ट धर्मका निर्वाह करनेमें निकृष्ट धर्मका अपवाद भी हो जाय तो कोई दोष नहीं होता। अतः 'पतीन् शुश्रूषध्वम्'—अपने परमतात्पर्य परब्रह्मका ही प्रतिपादन करो। एक पतिव्रता अपने पतिदेवकी चरणसेवा कर रही थी। पतिदेव सोये हुए थे। इसी समय उसका पुत्र अग्निकी ओर जाने लगा। उसके चित्तमें उसे उधर जानेसे रोकनेका विचार हुआ, परंतु ऐसा करनेके लिये उसे पतिसेवा छोड़नी पड़ती। इसलिये उसने पतिसेवाको ही अपना परम कर्तव्य समझकर बच्चेको बचानेका कोई प्रयत्न नहीं किया। इस उत्कृष्ट धर्मके प्रतापसे अग्निदेव शीतल हो गये और बालकका बाल भी बाँका नहीं हुआ। इसीसे भगवान् कहते हैं— हे श्रुतियो! जबतक तुम अपने परमतात्पर्यका विषय शुद्ध बुद्ध मुक्त परब्रह्मका प्रतिपादन करनेमें प्रवृत्त नहीं हुई थीं, तबतक तो कर्म और उपासनाका पोषण करके उन अज्ञ जनोंको पयपान करा सकती थीं, परंतु अब, जबकि तुम इस ओर आयी हो, तुम उनके लिये कर्मफलरूप दुग्धका दोहन करनेकी चेष्टा मत करो। इधर बुद्धियोंकी दृष्टिसे देखें तो उन्हें भगवान् यही उपदेश देते हैं कि 'मा यात गोष्ठम्'—घट- पटादि अनात्म विषयोंकी ओर मत जाओ; बल्कि 'शुश्रूषध्वं पतीन्' अपने अवभासक और अधिष्ठानभूत परब्रह्मकी ओर देखो। इस प्रसंगमें 'क्रन्दन्ति वत्सा बालाश्च' (श्रीमद्भा० १०।२९।२२)—इसका यह तात्पर्य है कि जबतक परब्रह्मकी अनुभूति नहीं होती, तबतक अन्तःकरण और इन्द्रियाँ घबराये रहते हैं। उनकी जो बाह्य-प्रवृत्ति है, वह उनके दुःखका ही कारण है। श्रुति कहती है— 'पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भूः' (कठ० २।१।१) यहाँ 'व्यतृणत्' शब्दपर विशेष रूपसे विचार करना है। भगवान् भाष्यकारने 'व्यतृणत्' का पर्याय 'हिंसितवान्' लिखा है अर्थात् स्वयम्भू परमात्माने इन्द्रियोंको बहिर्मुख करके हिंसित कर दिया है। बहिर्मुख होनेमें इन्द्रियोंकी हिंसा कैसे मानी गयी? इसमें यही कहना है कि अपने प्रियतमसे विमुख कर