भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 318, कुल 778 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 318

३०८ भक्तिसुधा निन्दा की गयी है, वह कर्म या उपासनाके त्यागके लिये नहीं है, बल्कि उनके समुच्चयानुष्ठानका विधान करनेके लिये है। मीमांसकोंका मत है— 'नहि निन्दा निन्द्यं निन्दितुं प्रवर्तते अपितु विधेयं स्तोतुम्।' यदि उपर्युक्त श्रुतिका अभिप्राय कर्म और उपासनाके त्यागमें ही होता तो श्रुत्यन्तरसे जो कर्म और उपासनाका विधान सुना जाता है, वह अप्रामाणिक हो जायगा और इस प्रकार श्रुतिविरोध भी होगा। इसीसे भगवान् शंकराचार्यजी कहते हैं— 'न शास्त्रविहितं किञ्चिदप्यकर्तव्यतामियात्।' अतः इस निन्दाका अभिप्राय कर्म और उपासनाके त्यागमें नहीं, बल्कि उसके समुच्चयकी स्तुतिमें है। इसलिये केवल कर्म या केवल उपासनामें प्रवृत्त न होकर उन दोनोंका साथ-साथ अनुष्ठान करना चाहिये। यदि कर्म और उपासनासे 'अन्धं तमः' की ही प्राप्ति हुआ करती तो 'विद्यया देवलोकः कर्मणा पितृलोकः' ऐसी विधि न होती। यद्यपि कहीं-कहीं त्यागके लिये भी निन्दा की जाती है; जैसे मिथ्या-भाषणादिकी। किंतु यहाँ ऐसा नहीं हो सकता; क्योंकि यहाँ इसकी विधि पायी जाती है। श्रुतिमें ऐसा बहुत देखा जाता है कि कहीं एक वस्तुका विधान और कहीं उसीका निषेध है। आपाततः इसमें बहुत विरोध मालूम होता है। विधि धर्मके लिये होती है और निषेध पापके लिये। एक ही कर्ममें पाप और पुण्य दोनों हो नहीं सकते। किंतु ऐसा देखा जाता है कि 'अग्नीषोमीयं पशुमालभेत' और 'मा हिंस्यात्सर्वभूतानि' इत्यादि वाक्योंमेंसे एक हिंसाका विधान और दूसरा उसका निषेध करता है। इसका तात्पर्य यही समझना चाहिये कि यागोपयुक्त हिंसाका निषेध नहीं है और यागानुपयुक्त हिंसाका निषेध किया गया है। अर्थवादका आपाततः प्रतीयमान अर्थ नहीं लिया जाता। पूर्वमीमांसक तो अर्थवादका स्वार्थमें तात्पर्य ही नहीं मानते। उत्तरमीमांसकोंका विचार दूसरा है। वे अर्थवादके तीन भेद मानते हैं—भूतवाद, गुणवाद और अनुवाद। जो मानान्तर सिद्ध अर्थका प्रतिपादन करता है, उसे अनुवाद कहते हैं; जैसे—'अग्निर्हिमस्य भेषजम्।' जो मानान्तरसे विरुद्ध अर्थका प्रतिपादन करता है, उसे गुणवाद कहा जाता है; जैसे 'आदित्यो यूपः' और जो मानान्तरसे अविरुद्ध और मानान्तरसे असिद्ध अर्थका प्रतिपादन करता है, उसे भूतवाद कहते हैं; जैसे 'वज्रहस्तः पुरन्दरः।' प्रस्तुत अर्थवाद गुणवाद है; क्योंकि वह श्रुत्यन्तरसे विहित कर्म और उपासनाकी निन्दा करता है अर्थात् मानान्तरसे विरुद्ध अर्थका प्रतिपादन करता है। किंतु यहाँ जो कर्म और उपासनाके फलको अन्धंतम कहा है, वह सापेक्ष है। इस प्रसंगमें महाभारतकी एक कथाका स्मरण होता है। एक ब्राह्मण गायत्रीका जप किया करता था। उसकी प्रौढ़ जपनिष्ठासे प्रसन्न होकर गायत्रीदेवी उसके सम्मुख प्रकट हुईं। देवीने उस ब्राह्मणदेवताको वर दिया कि जापकको जिस नरककी प्राप्ति होती है, वह तुम्हें न मिले। जापकको नरक मिलता है—यह बात बड़ी कुतूहलजनक मालूम होती है। परंतु इसका तात्पर्य दूसरा है। यहाँ ब्रह्मलोकको ही 'नरक' कहा गया है; क्योंकि विशुद्ध ब्रह्मकी अपेक्षा ब्रह्मलोक निकृष्ट ही है। अतः उसे नरक कहा जाय तो अनुचित न होगा। इसी प्रकार यहाँ जो अदर्शनात्मक तम कहा है, वह मोक्षपदकी अपेक्षासे ही है। उपासनासे और भी अधिक 'अन्धं तमः' की प्राप्ति बतलायी, इसका कारण यह है कि उपासना मानस कृत्य है; सर्वसाधारणके लिये यह भी सुगम नहीं है। भला, जिन लोगोंके हस्तपादादि देहावयव भी सुसंयत नहीं हैं, वे उस मानव-व्यापारको ठीक-ठीक कैसे निभा सकेंगे? कर्म करनेसे कर्मेन्द्रियाँ और ज्ञानेन्द्रियाँ सुसंयत होती हैं; क्योंकि कर्मकाण्डमें प्रत्येक चेष्टा नियमबद्ध है। खाना, पीना, सोना, बोलना सभी नियमित रूपसे ही करना पड़ता है। वैदिक कर्मोंका अनुष्ठान करते समय जिस कर्मके लिये जैसी विधि है, उससे तनिक भी इधर-उधर होनेपर प्रायश्चित्त करना पड़ता है।