भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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श्रीरामलीलारहस्य ३०७ अतः जिस समय प्रमाता एक वृत्ति उत्पादन करके शान्त होता है, उसके पश्चात् दूसरी वृत्ति उत्पन्न करनेसे पूर्व वह विश्राम लेता है। उस विश्रान्तिके समय ही उसके शुद्ध स्वरूपकी उपलब्धि होती है। इसलिये प्रति पल सावधान रहो। निमेषोन्मेष करना भी भूल जाओ। सदा निर्निमेष दृष्टिसे प्रभुकी बाट निहारते रहो। हमें प्रभुका निराकरण नहीं करना चाहिये और प्रभुसे प्रार्थना करनी चाहिये कि वे हमारा निराकरण न करें। इस प्रकार सारे लौकिक-वैदिक कर्मोंको प्रभुसे अभिन्न समझना ही प्रभुकी परमोत्कृष्ट भक्ति है। यह प्रभुका अनादर नहीं है। ब्रह्मज्ञानके अधिकारीका निर्णय किंतु दुराचारियोंने ब्रह्मज्ञानपर कलंक लगा दिया। जो बात सर्वोच्च कोटिकी थी, उसे वे श्रीगणेशमें ही करने लगे। जिसने भगवत्तत्त्वको प्राप्त कर लिया है, वह यदि वैदिक-स्मार्तकर्मोंको छोड़ता है तो ठीक ही है, किंतु जिसने अभी प्रभुकी ओर पदार्पण भी नहीं किया, वह यदि अपने कर्तव्य- कर्मोंको तिलांजलि देता है तो उसका कल्याण अनन्तकोटि जन्मोंमें भी नहीं होगा। जिसे सुधा- समुद्रकी प्राप्ति हो गयी है; वह यदि वापी, कूप, तड़ागादिकी अवहेलना करेगा तो प्यासा मर जायगा ! अतः पहले अपनेको भगवान्‌में समर्पित करो; पहले सबको ब्रह्मरूप देखो, पीछे अपनेको ब्रह्मरूप देखना। यह ठीक है कि अनभिज्ञ लोग ब्रह्मतत्त्वका साक्षात्कार किये बिना ही लौकिक-वैदिक कर्मोंका मिथ्यात्व मान बैठेंगे। किंतु यह उनकी अनधिकार- चेष्टा ही होगी। जिन्होंने श्रौत-स्मार्तकर्मोंका अनुष्ठान नहीं किया; जिन्हें इहामुत्रफलभोगसे वैराग्य नहीं हुआ, जो सदसद्वस्तुका विवेक करनेमें असमर्थ हैं, जिनके पास शमदमादि साधनोंका भी अभाव है और जिन्हें विषयी जनोंकी भोगेच्छाके समान तीव्र मुमुक्षा नहीं है, वे तो ब्रह्मजिज्ञासाके अधिकारी ही नहीं हैं। ऐसे लोगोंको ब्रह्मज्ञानमें प्रवृत्त होनेके लिये तो भगवान् शंकराचार्यने निषेध किया है। श्रीगोसाईंजी महाराज भी कहते हैं— 'बादि बिरति बिनु ब्रह्मबिचारू ॥' (रा०च०मा० २।१७८।४) ऐसे अनधिकारी लोग जब ब्रह्मविद्याकी ओर प्रवृत्त होते हैं, तब वे धर्म, कर्म और पाप-पुण्यादिका तो मिथ्यात्व निश्चय कर लेते हैं, किंतु भोगको सत्य ही मानते हैं। अतः निश्चय हुआ कि 'वत्सा बालाश्च क्रन्दन्ति' यह कथन ठीक ही है। इसीका उत्तर भगवान् देते हैं कि वे नहीं रोयेंगे, क्योंकि इसमें वेद-शास्त्रादिका दोष नहीं है। शास्त्रमें तो सभी प्रकारके साधनोंका निरूपण है। उसमें यह नियम नहीं है कि प्रत्येक व्यक्तिके लिये वे सभी साधन कर्तव्य हैं; उनमें जिसके लिये जो साधन उपयुक्त हो, उसे उसीका आश्रय लेना चाहिये। औषधालयमें सभी प्रकारकी ओषधियाँ रहती हैं। इस बातका निर्णय तो वैद्य ही कर सकता है कि किस रोगीको कौन-सी ओषधि देनी चाहिये। यदि वैद्यकी शरण न लेकर रोगी स्वयं ही मनमानी ओषधि लेने लगे तो इसमें वैद्य या औषधालयका क्या दोष ? यह तो उसीका अपराध है। इसी प्रकार शास्त्रोक्त कौन साधन किसके लिये उपयुक्त है, इसका निर्णय तो श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ गुरु ही कर सकते हैं। अतः आत्मकल्याणकी इच्छा रखनेवाले साधकोंको उन्हींकी शरण लेनी चाहिये। कर्म और उपासनाका समुच्चय शास्त्रमें तो जहाँ कर्मका प्रकरण है, वहाँ ज्ञानकी निन्दा की गयी है और जहाँ ज्ञानका प्रकरण है, वहाँ कर्म और उपासनाकी तुच्छता दिखलायी है। ईशावास्योपनिषद् (९)-कहती है— अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते। ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायाꣳरताः ॥ अर्थात् जो केवल कर्ममें ही तत्पर रहते हैं, वे अदर्शनात्मक अज्ञानमें प्रवेश करते हैं और जो केवल उपासनामें ही लगे हुए हैं, वे तो उनसे भी अधिक अँधेरेमें जाते हैं। किंतु यहाँ जो कर्म और उपासनाकी