भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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३०६ भक्तिसुधा करें। इस प्रार्थनाके साथ-साथ आपहीसे यह भी प्रार्थना है कि मैं आपका अनादर न करूँ। अक्रूरजी महाराज कहते हैं— सोऽहं तवाङ्घ्र्युपगतोऽस्म्यसतां दुरापं तच्चाप्यहं भवदनुग्रह ईश मन्ये। पुंसो भवेद् यर्हि संसरणापवर्ग- स्त्वय्यब्जनाभ सदुपासनया मतिः स्यात्॥ (श्रीमद्भा० १०।४०।२८) हे नाथ! आज मैं आपके चरणोंकी शरण आया हूँ, यह भी आपके अनुग्रहका फल है। जबतक प्रभु कृपा न करें, जबतक वे हाथ न लगायें, तबतक हमारी नैया किनारे नहीं लग सकती। श्रीगोसाईंजी महाराजका कथन है— ग्यान-भगति साधन अनेक, सब सत्य, झूठ कछु नाहीँ। (वि०प० ११६) प्रभुकृपाकी प्रतीक्षा करते रहना चाहिये अर्थात् ये सारे साधन हैं तथापि जबतक आपका करावलम्ब न हो, तबतक मेरे किये तो कुछ होना नहीं है। अतः ऐसी बुद्धि तो प्रभुकृपासाध्य है। हमें तो केवल प्रभुकृपाकी प्रतीक्षा करते रहना चाहिये। आखिर जाओगे कहाँ? दर-दर घूमते जन्म-जन्मान्तर बीत गये, कहीं कोई ठिकाना नहीं मिला। अब प्रभुके सिवा और आश्रय ही कहाँ है? तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्षमाणो भुञ्जान एवात्मकृतं विपाकम्। हृद्वाग्वपुर्भिर्विदधन्नमस्ते जीवेत यो मुक्तिपदे स दायभाक्॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।८) भगवान्‌की कृपा कब होती है, इसका कोई निश्चित समय नहीं है। इसलिये हर समय सावधान रहो। ऐसा न हो, तुम्हारी असावधानीमें प्रभुकृपाकी घड़ी यों ही निकल जाय और तुम उससे वंचित ही रह जाओ। मान लो, भगवान् कोई परदानशीन स्वामी हैं और तुम उनके द्वारपर बैठे हो। वे हर समय तो परदेसे बाहर आते नहीं हैं, परंतु जिस समय वे आये उस समय तुम सो गये तो इसमें प्रभुका क्या दोष है? इसलिये तुम सदा सावधान रहो। प्रभु अतिथिका अनादर कभी नहीं करते। वे दीनवत्सल हैं; उन्हें दीन बहुत प्यारे हैं। इसीसे श्रीगोसाईंजी कहते हैं— जाउँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे। काको नाम पतित-पावन जग, केहि अति दीन पियारे॥ (वि०प० १०१) इसलिये हमें प्रभुको छोड़कर कहीं अन्यत्र नहीं जाना चाहिये। धनियोंके द्वारोंपर हम बहुत भटक लिये। अब उनका मुख मत देखो। वेदान्तदेशिकाचार्यजी कहते हैं— दुरीश्वरद्वारबहिर्वितर्दिका दुरासिकायै रचितोऽयमञ्जलिः। यदञ्जनाभं निरपायमस्ति मे धनञ्जयस्यन्दनभूषणं धनम्॥ दुरीश्वरोंके द्वारकी बहिर्वितर्दिकापर दुराशाको लेकर जो बैठना है, उसके लिये मैंने हाथ जोड़ दिया; क्योंकि हमारे पास तो धनंजयके रथका अति सुन्दर भूषण अंजनाभ श्रीकृष्ण ही अनपाय धन हैं। फिर हमें औरकी क्या आवश्यकता है? परंतु सो मत जाना; सदा सावधान रहकर प्रभुकी ओर टकटकी लगाये रहना। प्रभुका प्राकट्य बहुत जल्दी-जल्दी हुआ करता है। यहाँ अध्यात्म-प्रेमियोंको तनिक ध्यान देना चाहिये। देखिये, घटाकार वृत्तिकी निवृत्ति हुई और अभी पटाकार वृत्तिका उदय नहीं हुआ। इस सन्धिमें प्रभुकी झाँकी होती है। अज्ञान और उसके कार्य प्रभुके आवरक हैं। विषयको प्रकाशित करनेवाली वृत्तिका नाम प्रमाण है, विषयको प्रमेय कहते हैं और प्रमाणके आश्रयभूत चेतनका नाम प्रमाता है। इनमें एकके न रहनेपर तीनों ही नहीं रहते। किंतु इन तीनोंका और इन तीनोंके अभावका प्रकाशक आत्मा है। इसी भावको यह श्लोक व्यक्त करता है— एकमेकतराभावे यदा नोपलभामहे। त्रितयं तत्र यो वेद स आत्मा स्वाश्रयाश्रयः॥ (श्रीमद्भा० २।१०।९)