भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 315, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीरासलीलारहस्य ३०५ समर्पण न करके केवल स्त्री, धन और मन आदि ही प्रभुको अर्पण करते हो तो तुम सच्चे प्रेमी नहीं कहे जा सकते। अतः आत्मसमर्पणरूप अद्वैत दर्शन ही सच्ची पूजा है और यही उत्कृष्टतम भक्ति है। हाँ, मूर्ख पुरुषोंके लिये यह सिद्धान्त अवश्य बहुत भयावह है। इस सिद्धान्तके ब्याजसे वे देहको भी ब्रह्म मान सकते हैं। परंतु वस्तुतः यह सिद्धान्त भक्तिका घातक नहीं है। यह तो उसकी चरमावस्था है। किन्हीं महानुभावोंने कहा है कि—‘पहले उपासनाकी भावना करते-करते ऊपर-नीचे सर्वत्र ब्रह्म ही दिखायी देता है। अतः पहले ‘ब्रह्मैवाधस्ताद्ब्रह्मैवोपरिष्टात्’ यह श्रुति ही चरितार्थ होती है। पीछे एक संचारी भावविशेषका अभ्युत्थान होनेपर ऐसा होता है कि जिससे वह अपनेको ही प्रियतमरूपसे देखने लगता है। उसी अवस्थाका प्रतिपादन ‘अहमेवाधस्तादहमुपरिष्टात्’ (छान्दोग्य० ७।२५।१) इस श्रुतिने किया है।’ श्रीगोस्वामी तुलसीदासजीका कथन है— सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत। मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत॥ (रा०च०मा० ४।३) ‘श्रवन कथा, मुख नाम, हृदय हरि, ....नयननि निरखि कृपा-समुद्र हरि....।’ (विनय-पत्रिका २०५) इस प्रकार निरन्तर सर्वत्र भगवद्दर्शन ही करना चाहिये। श्रीमद्भागवत (११।२।३५)-में कहा है— यानास्थाय नरो राजन् न प्रमाद्येत कर्हिचित्। धावन् निमील्य वा नेत्रे न स्खलेन्न पतेदिह॥ यही निर्भय मार्ग है। इस मार्गमें चलनेवाला कभी किसी अन्तरायसे आक्रान्त नहीं होता। एष निष्कण्टकः पन्था यत्र सम्पूज्यते हरिः। कुपथं तं विजानीयाद् गोविन्दरहितागमम्॥ इस प्रकार सबको ब्रह्ममय देखते हुए जबतक तुम अपने आत्माको भी ब्रह्मसे अभिन्न न देखोगे, तबतक तुम अपने प्रियतम परब्रह्मकी पूर्णताकी रक्षा नहीं कर सकोगे। अतः तुम अपनेको भी प्रभुमें ही समर्पित कर दो। किंतु वह समर्पण किया कैसे जाय? उसका स्वरूप क्या है? क्या घड़ेमें बेर डालना बेरका समर्पण है? इसका नाम समर्पण नहीं है। समर्पणमें अपनी सत्ता पृथक् नहीं रहती, जिस प्रकार घटाकाशकी सत्ता महाकाशसे पृथक् नहीं है। जिस समय तरंग समुद्रमें लीन होती है, उस समय क्या समुद्रसे पृथक् उसकी उपलब्धि हो सकती है? अतः भगवान्से पृथक् अपनी सत्ता न रखना ही उनका सम्मान है। यदि तुम उनसे अपना भेद रखते हो तो तुम उनका अनादर करते हो। भला, जिस पत्नीने अपने पतिको त्याग दिया हो, उसकी कीर्ति हो सकती है? इसी प्रकार यदि जीव अपनेको परब्रह्मसे पृथक् समझे तो उसके लिये इससे बढ़कर और क्या कलंक हो सकता है? ऐसा कलंक तो उसके लिये आत्मघातके समान है; क्योंकि— ‘सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते॥’ (गीता २।३४) इसीलिये उपनिषद् पढ़नेवाले भगवान्से प्रार्थना करते हैं—‘माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोत्, अनिराकरणमस्तु’ (केनोपनिषद् शान्तिपाठ)। प्रभु दीर्घकालसे हमारा निराकरण करते आये हैं और हम प्रभुका निराकरण करते आये हैं। इसीसे हमें कीट-पतंगादि योनियोंमें भ्रमना पड़ा है। यह अनिराकरण तो प्रभुकी कृपासे ही होगा। वे ही हमें ऐसी बुद्धि प्रदान कर सकते हैं; क्योंकि ये चरण असत्पुरुषोंको अत्यन्त दुष्प्राप हैं। जिस समय पुरुषोंका संसरण समाप्त होनेको होता है, हे नाथ! तभी आपके श्रीचरणोंमें प्राणियोंको रति होती है। वस्तुतः मायामोहित जीव बरबस प्रभुको भूलकर प्रपंचमें फँसा हुआ है और प्रभुकी उपेक्षा करता है। अतएव ऋषि यही प्रार्थना करता है—हे दयामय! आप ही कृपा करें कि मैं आपका अनादर या उपेक्षा न करूँ। हे दयामय! मायामोहित होकर ही हमने आपका अनादर किया है। अपने अन्तरात्मा प्रियतम सर्वस्वका अपमान मोहसे ही हमने किया है, अतः आप मेरी उपेक्षा न