भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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भी अद्वैतनिष्ठ महात्माको अवैदिक नहीं कहा जा सकता। वस्तुतः वेदका प्रामाण्य माननेवाला तो वही है। वैदिक तो उसीको कहना चाहिये, जो वेदार्थको अबाधित रखे। वेद कहते हैं—'एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म' (पैंगलोपनिषद् १), 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' (तैत्तिरीय० २।१) इत्यादि। अतः जो ब्रह्मको सजातीय, विजातीय एवं स्वगतभेदसे रहित मानते हैं, वे तो ब्रह्मसे भिन्न वेदकी भी सत्ता नहीं मानते। वेदकी पृथक् सत्ता माननेपर तो वेदको सजातीयादि भेदसे रहित सिद्ध नहीं किया जा सकता। अतः ऐसी अवस्थामें वेद अप्रामाणिक हो जाता है। इसलिये अपने प्रामाण्यके लिये वेद स्वतः ही अपना अभाव प्रतिपादन करते हैं— 'अत्र वेदा अवेदा ब्राह्मणा अब्राह्मणाः पुल्कसा अपुल्कसाः।' कार्य जबतक अपने कारणसे भिन्न रहता है, तभीतक उसकी पृथक् उपलब्धि होती है। कारणसे अभिन्न होनेपर उसकी पृथक् प्रतीति नहीं होती। वेद भी ब्रह्मके कार्य हैं—'अस्य महतो भूतस्य निश्श्वसितमेतद्यदृग्वेदः' (बृहदारण्यक० २।४।१०) अतः वस्तुतः वे परब्रह्मसे व्यतिरिक्त नहीं हैं। घटादि तभीतक उपलब्ध होते हैं, जबतक वे अपने कारण मृत्तिकामें नहीं मिलते। उसमें मिल जानेपर उनकी पृथक् प्रतीति नहीं होती। अतः वेदको ब्रह्मसे व्यतिरिक्त न मानना उनका तिरस्कार नहीं है; यह तो उसका सम्मान ही है। जो पुरुष वेदको ब्रह्मसे भिन्न मानता है, उसपर तो वेद कुपित होते हैं और उसे स्वार्थसे भ्रष्ट कर देते हैं। श्रुति स्वयं कहती है— वेदास्तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो वेदान् वेद.... सर्वं तं परादाद् योऽन्यत्रात्मनः सर्वं वेद॥ (बृहदारण्यक० ४।५।७) क्योंकि ब्रह्मसे वियोग होना किसीको इष्ट नहीं है। तुम भी तो परब्रह्मसे वियुक्त होनेके कारण ही तड़प रहे हो। वेदोंको भी भगवान्‌का वियोग कैसे सह्य हो सकता है? फिर तुम उन्हें भगवान्‌से व्यतिरिक्त क्यों समझते हो ? तुम यज्ञयागादि कर्मोंको भगवान्‌से भिन्न क्यों मानते हो? यदि तुम एक अणुको भी ब्रह्मसे पृथक् समझोगे तो वह अवश्य तुम्हारे लिये भय उपस्थित कर देगा। प्रेमी तो अपना भी पृथक् अस्तित्व नहीं रखना चाहता। जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं। कबिरा नगरी एकमें राजा दो न समाहिं॥ यदि हम अपनी पृथक् सत्ता रखेंगे तो ब्रह्ममें वस्तु-परिच्छेद आ जायगा तथा जिस देशमें हम रहेंगे, उसमें ब्रह्म नहीं रहेगा। इसलिये ब्रह्ममें देशपरिच्छेद भी हो जायगा। इसीसे भावुक पुरुष अपनी सत्ता प्रभुको ही समर्पित कर देते हैं; वे प्रभुसे पृथक् रहकर उनके पूर्णत्वको खण्डित करना नहीं चाहते। अतः पहले अपने धन-धान्यादि प्रभुको समर्पण करो, फिर देह समर्पित कर दो और तदनन्तर मन, बुद्धि और प्राण भी प्रभुको ही अर्पण कर दो। परिणाममें तुम भी उन्हींमें समर्पित हो जाओगे। भगवान् कहते हैं— 'निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥' (गीता १२।८) यदि घटाकाश अपनेको महाकाशसे पृथक् समझता है तो जिस देशमें वह अपनी सत्ता मानेगा, उस देशमें उसे महाकाशकी सत्ता अस्वीकार करनी पड़ेगी। इस प्रकार वह महाकाशकी पूर्णताको खण्डित कर देगा। इसीसे घटाकाश कहता है—'मैं अपनी सत्ता रखकर अपने प्रभुकी अपूर्णता नहीं करूँगा। मैं अपनेको भी उन्हें ही समर्पित कर दूँगा।' आत्मसमर्पणरूप अद्वैतदर्शन ही सच्ची पूजा और उत्कृष्टतम भक्ति है यही अद्वैतवादियोंका सिद्धान्त है। वे प्रभुको आत्मसमर्पण भी कर देते हैं। यही उनकी अद्भुत भक्ति है। वे अपने प्रियतमको अपने-आपको भी दे डालते हैं, क्योंकि आत्मा ही सबसे बढ़कर प्रिय है; इसीके लिये प्रत्येक वस्तु प्रिय हुआ करती है— 'आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति।' (बृहदारण्यक० २।४।५) अतः यदि तुम अपनेको परम प्रेमास्पदको