भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 313, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीरासलीलारहस्य ३०३ यथा ह्यप्रतिबुद्धस्य प्रस्वापो बह्वनर्थभृत्। स एव प्रतिबुद्धस्य न वै मोहाय कल्पते॥ (श्रीमद्भा० ३।२७।२५; ११।२८।१४) इसलिये बाल-वत्सस्थानीय अज्ञजन भी क्रन्दन नहीं करेंगे। दूसरी बात यह है कि यदि वे रोयेंगे तो यह बतलाओ कि तत्त्वज्ञान होनेसे पहले रोयेंगे या पीछे? पीछे तो रो नहीं सकते; क्योंकि उस समय तो वे अचिन्त्यानन्द-महार्णव श्रीभगवान्में अभिन्नरूपसे स्थित हो जानेके कारण प्रपंचकी अपेक्षासे ही रहित हो जाते हैं। भला अमृतके समुद्रको पाकर क्षुद्र कूप-तड़ागादिके लिये कौन व्यग्र होता है? और पहले इसलिये नहीं रो सकते कि प्रपंचका मिथ्यात्व सुनकर भी उसपर उनकी निष्ठा नहीं होगी। देखो—यह मनुष्य-शरीर कितना घृणित है? इसके ऊपर यदि चर्म न होता तो इसपर मक्खियाँ भिनकतीं। इसमें क्षणभर भी रहनेकी इच्छा न होती। इस बातको समझनेके लिये विशेष विचारकी भी आवश्यकता नहीं है। इस शरीरमें अस्थि, मांस, रक्त आदि घृणित पदार्थ ही भरे हुए हैं। यह बात बहुत साधारण बुद्धिवाले पुरुषोंको भी सुगमतासे समझायी जा सकती है तो भी हमारे-जैसे अज्ञानियोंकी तो बात ही क्या है, बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भी रम्भा-उर्वशी आदि अप्सराओंके उस अत्यन्त घृणित शरीरके ही लावण्यमें फँस गये थे। इस प्रकार सब कुछ जानकर भी उन्हें जो मोह हुआ, वह भगवती महामायाकी ही महिमा है— दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥ (गीता ७।१४) ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा॥ बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति। (श्रीदुर्गासप्तशती १।५५-५६) अतः भगवान् कहते हैं—यदि तुम संसारका मिथ्यात्व प्रतिपादन करोगी तो भी वे अज्ञजन नहीं रोयेंगे, क्योंकि उनकी तो उसमें गति ही नहीं होगी। अब यह भी सन्देह हो सकता है कि यदि अज्ञानियोंको परोक्षरूपसे भी यह निश्चय हो जायगा कि ऐन्द्रपद आदि अब मिथ्या हैं तो भी वे यज्ञ- यागादिमें प्रवृत्त नहीं होंगे। वस्तुतः ऐसे अनधिकारियोंने ही अद्वैतवादको कलंकित कर रखा है। उन्हें भले ही ब्रह्मका अपरोक्ष साक्षात्कार न हुआ हो तथापि यह तो निश्चय हो ही जाता है कि कर्म नहीं, धर्म नहीं, लोक नहीं और वर्णाश्रमाचार भी नहीं। अतः वे धर्म- कर्मादिको तिलांजलि दे देते हैं। इन अनधिकारियोंके कारण ही अद्वैतवादको कलंकित होना पड़ा है। ऊपरी दृष्टिसे देखा जाय तो अद्वैतवादी और नास्तिकोंमें कोई भेद दिखायी नहीं देगा। मुक्तावस्थामें दृश्यकी व्यर्थता तो नैयायिकोंके मतमें भी हो जाती है। यह ठीक है कि वे उसका मिथ्यात्व स्वीकार नहीं करते; तथापि मुक्त पुरुषको तो उसका विशेष ज्ञान निवृत्त हो जानेके कारण प्रपंचका भान नहीं होता। यही बात सांख्य मतके विषयमें कही जा सकती है। वस्तुतः संसारसे सम्बन्ध छूट जानेपर और प्रभुसे सम्बन्ध जुड़ जानेपर लोक-वेदकी विधि छूट ही जाती है। सब आचार्योंका ऐसा ही मत है। यदा यमनुगृह्णाति भगवान्आत्मभावितः। स जहाति मतिं लोके वेदे च परिनिष्ठिताम्॥ (श्रीमद्भा० ४।२९।४६) और यही नास्तिकोंका भी लक्षण है। देखा जाय तो तत्त्वज्ञ और व्रात्य—इन दोनोंका बाह्य रूप एक ही होता है। देखिये, जिस प्रकार यवनादि शिखा-सूत्रादिसे रहित होते हैं, उसी प्रकार एक परमहंस भी होता है। यही नहीं, भगवान् शंकरको भी 'व्रात्य' कहा गया है—'व्रात्यानां पतये नमः'। इस प्रकार देखा जाय तो एक तत्त्वज्ञका स्वरूप तो अवश्य व्रात्यके समान ही होता है; तथापि उनमें वस्तुतः बहुत अन्तर होता है। उनमेंसे एक तो साधनकोटिको पार कर गया है और दूसरेने उसमें प्रवेश भी नहीं किया। इस समय अवश्य दोनों ही साधनके संसर्गसे रहित हैं। इस प्रकार यज्ञ-यागादिका अनुष्ठान न करनेपर