भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०२ भक्तिसुधा अपना सारा पुरुषार्थ लगाकर हार गये, किंतु वे उसे जलानेमें समर्थ न हुए और इस प्रकार मान-मर्दन हो जानेसे चुपचाप लौट आये। उनके पीछे वायुदेवता गये। किंतु उनकी भी वही गति हुई। वे भी एक क्षुद्र तृणमात्रको उड़ानेमें समर्थ न हुए। इस प्रकार अग्नि और वायुके विफलमनोरथ होकर लौट आनेपर स्वयं देवराज इन्द्र उस यक्षका परिचय प्राप्त करनेके लिये चले। देवराजको देखते ही यक्षभगवान् अन्तर्धान हो गये। इससे इन्द्रको बड़ा परिताप हुआ। वे सोचने लगे—'अहो! मुझे सन्निधानसे उनके दर्शन और सम्भाषणका भी सौभाग्य प्राप्त न हो सका।' जिस समय जीवको भगवद्विरहके कारण परिताप होता है, उसी समय उसे भगवत्साक्षात्कारकी योग्यता प्राप्त होती है। वह क्षण बड़े सौभाग्यसे प्राप्त होता है, जिसमें प्राणी अपने प्रियतमकी विरह- वेदनासे तड़पने लगता है और उसका रोम-रोम भगवद्दर्शनके लिये उत्कण्ठित हो उठता है। देखिये, जिस समय भगवान्के साथ व्रजांगनाओंका संयोग था, उस समय उनकी उपासना उतनी प्रबल नहीं थी; किंतु जब उन्हें भगवान्का वियोग हुआ, तब उनकी लगन इतनी बढ़ी कि उस विरहाग्निने उन्हें केवल इसीलिये नहीं जलाया; क्योंकि उनके हृदयमें भगवान्की प्रेममयी मूर्ति विराजमान थी। उस आनन्द-सुधासिन्धुके कारण ही उनकी रक्षा हुई। इसी भावका वर्णन करते हुए श्रीवल्लभाचार्यजीने यह श्रुति कही है— 'को ह्येवान्यात्कः प्राण्याद् यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्।' (तैत्तिरीय० २।७) अर्थात् यदि सहृदय प्रेमियोंके अन्तःकरणोंमें प्रेमानन्दरूप सुधा न होती तो अपने प्रियतमके वियोगमें उनमेंसे कौन चेष्टा करता और कौन प्राण धारण करता ? वे तो तत्काल उस विरहानलमें भस्म हो जाते। अतः यदि भगवान्के वियोगका सन्ताप न हुआ तो यह जीवन व्यर्थ है; भगवान् वाल्मीकि कहते हैं— यश्च रामं न पश्येत्तु यं च रामो न पश्यति। निन्दितः सर्वलोकेषु स्वात्माप्येनं विगर्हते ॥ (वा०रा० २।१७।१४) वस्तुतः यह भगवदर्थ सन्ताप ही परम तप है। इस प्रकार जब इन्द्रने इस सन्ताप-रूप तपसे अपना मनोमल भस्म कर दिया तो उमादेवीका आविर्भाव हुआ। उसीने उन्हें भगवान्का परिचय दिया। अतः स्मरण रखना चाहिये कि यह महावाक्यजनित ब्रह्माकारवृत्तिरूपा उमा ही प्रकट होकर जीवको परब्रह्मके पास ले जाती हैं। अतः हे बुद्धियो! यदि तुम मुझ परब्रह्मके पास आना चाहती हो तो 'शुश्रूषध्वं सतीः' भगवती शक्तिकी उपासना करो अथवा जैसा हम पहले कह चुके हैं, सात्त्विक वृत्तियाँ ही सतियाँ हैं, उन्हें उद्बुद्ध करो। उनके उद्बुद्ध होनेसे जब तुम्हारी राजस-तामस वृत्तियाँ नष्ट हो जायँगी, तभी तुम उन्हें प्राप्त कर सकोगी। अब यदि श्रुतियाँ कहें कि महाराज ठीक है, परंतु यदि हम संसारको छोड़कर अपने परम प्रियतम परब्रह्मका ही अवलम्बन करें, प्रपंचका आश्रयण करना छोड़ दें तो उस अस्पर्शयोगको सुनकर जो बाल-वत्सस्थानीय अज्ञजन हैं, वे रोने लगेंगे; क्योंकि उनके लिये तो संसार ही सब कुछ है। वे तो पुत्र- कलत्र और धन-धामादिको ही अपना सर्वस्व समझते हैं। इसपर भगवान् कहते हैं—'वत्सा बालाश्च क्रन्दन्ति मा' अर्थात् ये वत्स और बालक भी क्रन्दन नहीं करेंगे। क्यों नहीं करेंगे? क्योंकि विवेकीके लिये संसार असत् होनेपर भी उन अविवेकियोंकी दृष्टिमें तो वह सत्य ही रहेगा। 'नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वात्' देखो—स्वप्नप्रपंच तो उसीका निवृत्त होगा, जो जागेगा। जो जगा नहीं है, उसके लिये तो स्वप्नका सारा व्यापार सत्य ही होता है। इसी प्रकार यह दृश्य-प्रपंच भी उसीके लिये मिथ्या होगा जो अपने शुद्ध स्वरूपमें जागेगा, उसे तो इसकी निवृत्ति इष्ट ही है। इसके विपरीत अप्रबुद्धके लिये इसकी निवृत्ति होगी नहीं।' भगवान्ने कहा है—