भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीरासलीलारहस्य ३०१
अन्तःकरणस्थ चिदाभास दोनोंके योगसे होती है, किंतु उन विषयोंकी सन्धि अर्थात् निर्विषय स्थिति केवल चेतनसे ही भासित होती है। अतः आत्मसाक्षात्कार करनेके लिये पहले हमें शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गन्धादिकी वासनाओंसे वासित अन्तःकरणद्वारा विषयोंसे हटाकर इन्द्रियोंको स्वाधीन करना होगा। फिर बुद्धिसे मनका और अहंकारसे बुद्धिका संयम करना होगा। तत्पश्चात् अपने स्वरूपभूत साक्षीसे अहंकारको पृथक् निश्चय करनेपर हम अपने शुद्ध स्वरूपका बोध प्राप्त कर सकेंगे। सबसे पहले सम्पूर्ण प्रतीयमान प्रपंचको पृथिवीमात्र चिन्तन करो; घट, पट, गृह, उद्यान आदि सभी वस्तुओंको केवल पृथिवीतत्त्व ही अनुभव करो। फिर इस पृथिवीतत्त्वका जलतत्त्वमें लय करो और सर्वत्र केवल जलतत्त्वको ही व्याप्त देखो। तत्पश्चात् जलको अग्नितत्त्वमें लीन करो तथा सब पदार्थोंको तेजोमय ही देखो। इसी प्रकार फिर उन्हें क्रमशः वायुरूप और आकाशरूप देखो। इस चिन्तनके बढ़नेके साथ क्रमशः गन्धादि विषयोंकी निवृत्ति होती जायगी। वृत्ति प्रायः तेजसे आगे नहीं बढ़ती। वायु और आकाश रूपरहित पदार्थ हैं, इसलिये उनपर दृष्टि जमना बहुत कठिन है। यदि मन वायुतत्त्वमें स्थित हो गया तो उसे अन्धकार और प्रकाशकी भी प्रतीति नहीं होगी; क्योंकि ये दोनों तो तेजके अन्तर्गत हैं। रूपकी निवृत्ति होनेपर तो सारा ही विक्षेप निवृत्त हो जाता है। अब केवल स्पर्श और शब्द रह जाते हैं, स्पर्शकी निवृत्ति होनेपर केवल शब्द ही शेष रहता है। इससे आगे बढ़कर शब्दको देखनेवाले मनमें ही स्थित हो जाओ। फिर तटस्थवृत्तिसे मनकी गतिको देखो और तत्पश्चात् उसे देखनेवालेको देखो। इस प्रकार बुद्धि तुम्हारा दृश्य हो जायगी। बुद्धिका द्रष्टा अहंकार है। इससे आगे अहंकार भी भास्य कोटिमें आ जाना चाहिये। तत्पश्चात् उसकी भी प्रतीति नहीं होगी और केवल सर्वावभासक चिदात्मा ही रह जायगा। इस प्रकार बुद्धि सबके अधिष्ठानभूत केवल आत्मामें ही स्थित हो जाती है; उस समय उसके भास्य शब्द-स्पर्शादि प्रपंचमेंसे कुछ भी प्रतीत नहीं होता। अब हम प्रकृत विषयपर आते हैं। भगवान्का उपदेश है—'शुश्रूषध्वं पतीन्' अर्थात् जो सर्वावभासक चिदात्मा जाग्रत् और स्वप्न-अवस्थाओंमें प्रतीत होनेवाले द्वैतका तथा सुषुप्तिमें अनुभव हुए अज्ञानका साक्षी है, तुम उस परम पतिका ही आश्रय लो। अतः तुम नामरूपात्मक प्रपंचकी ओर मत जाओ, बल्कि उसके अवभासक सर्वसाक्षी परमात्माका चिन्तन करो। यदि कहो कि उसमें तो हमारी गति नहीं है, हम किस प्रकार ऐसा करें तो उसके लिये 'शुश्रूषध्वं सतीः।' 'सती' शब्दका अर्थ पहले ही कहा जा चुका है। तात्पर्य यह है कि इसके लिये तुम ब्रह्मविद्यारूपिणी भगवती महामायाकी उपासना करो। देखो, गोपियोंको भी श्रीकात्यायनीदेवीकी उपासना करनेसे ही परब्रह्मस्वरूप भगवान् कृष्णकी प्राप्ति हुई थी। ऐसी ही एक गाथा उपनिषदोंमें आती है। जिस समय देवासुर-संग्राममें परब्रह्म परमात्माके प्रसादसे देवताओंको विजय प्राप्त हुई तो वे भगवान्को भूल गये और उस विजयको अपने ही पुरुषार्थका फल मानने लगे। उस समय परम दयालु भगवान् अपने मोहग्रस्त अनुचरोंका व्यामोह दूर करनेके लिये एक विचित्र रूपसे उनके सामने प्रकट हुए। भगवान्के उस विचित्र अनन्त प्रकाशमय विग्रहको देखकर देवताओंको बड़ा कुतूहल हुआ और उन्हें यह जाननेके लिये बड़ी उत्सुकता हुई कि यह यक्ष कौन है? यह बात जाननेके लिये सबसे पहले अग्निदेव गये। भगवान्ने उनसे पूछा—'तुम कौन हो?' अग्निने बड़े गर्वसे कहा—'मैं अग्नि हूँ, लोग मुझे जातवेदा कहते हैं।' भगवान्ने कहा—'तुम क्या कर सकते हो?' अग्निदेवने कहा—'संसारमें जितने पदार्थ हैं, मैं उन सभीको जला सकता हूँ।' तब यक्षभगवान्ने उनके आगे एक तृण रखकर कहा—'भला इसे तो जलाओ।' अग्निदेव