भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०० भक्तिसुधा इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहंकार — सभीका अवभासक सर्वसाक्षी परमात्मा ही है वह बुद्धिका प्रेरक नील-पीतादि किसी रूपवाला नहीं है। वह तो अत्यन्त सूक्ष्म है। देखो—इन नील- पीतादिका प्रकाशक पहले तो सूर्यका प्रकाश देखा जाता है। जिस प्रकार नील-पीतादि रूपवान् हैं, उसी प्रकार उन्हें प्रकाशित करनेवाले सूर्य एवं अग्नि आदिके आलोक भी रूपवान् हैं; परंतु अपने प्रकाश्य नील-पीतादिकी अपेक्षा उनमें बहुत सूक्ष्म है। उस सौर आलोकका प्रकाशन चाक्षुष-ज्योतिसे होता है; वह रूपरहित है। इस प्रकार रूपरहित तत्त्व रूपवान्को प्रकाशित कर रहा है। यह भी अनुभवमें आता है कि जो नेत्रज्योति निर्दोष होती है, वह आलोकको ठीक- ठीक प्रकाशित कर सकती है और जो सदोष होती है, वह उसका ठीक-ठीक प्रकाशन नहीं कर सकती। किंतु यह कौन जानता है कि नेत्र सदोष है या निर्दोष? इस बातको मन जानता है; चक्षुके पाटवापाटवका ज्ञाता मन है। मनमें भी रूप नहीं है। इसी प्रकार मनके चांचल्यादिको जाननेवाली बुद्धि है और बुद्धि अपना कार्य अहंकारपूर्वक करती है; जैसे कि यह कहा जाता है कि 'मैं' अपनी बुद्धिद्वारा मनका निरोध करूँगा। इस प्रकार हम देखते हैं कि बुद्धि इस 'मैं' का कारण है। यह 'मैं' अत्यन्त सूक्ष्म है। यदि हम कुछ काल बुद्धि आदिसे रहित केवल 'मैं' का ही चिन्तन करें तो हमारे सामने 'मैं' और 'मैं' के साक्षीका भेद सुस्पष्ट हो जायगा। इस समय तो 'मैं' और चिदात्माका अन्योन्याध्यास हो रहा है। जिस प्रकार तपे हुए लोहपिण्डमें अग्निरहित लोहपिण्ड और लोहपिण्डरहित अग्निका भान नहीं हो सकता, उसी प्रकार इस समय हमें 'मैं' से रहित चेतन और चेतनरहित 'मैं' की प्रतीति नहीं हो सकती। सुषुप्तिमें 'मैं' का अभाव रहता है। उस समय चिदात्मा 'मैं' के अभावका प्रकाशक है। इस प्रकार वह स्पष्टतया 'मैं' के भाव और अभाव दोनोंहीका प्रकाशक प्रतीत हो रहा है। इसी क्रमसे हम उसे शब्द, स्पर्श, रस और गन्धके चरम अवभासकरूपसे भी निश्चय कर सकते हैं। अतः विषयोंकी अवभासक पंच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं, इन्द्रियोंका अवभासक मन है, मनकी प्रकाशिका बुद्धि है, बुद्धिका प्रेरक अहंकार है और इन मन, बुद्धि, अहंकार सभीका भासक चिदात्मा है। व्यवहारमें देखते हैं कि गन्धाकाराकारितवृत्ति, रूपाकाराकारितवृत्ति, रसाकाराकारितवृत्ति, स्पर्शाकारा- कारितवृत्ति और शब्दाकाराकारितवृत्ति — इन सबमें परस्पर भेद है। इसी प्रकार इनको ग्रहण करनेवाली इन्द्रियोंमें भी भेद है। इनके भेद और अभेदका विवेक करो। इनमें जो भेद है, वही प्रपंच है और जो अभेद है, वही परमार्थ है। उत्पन्न तथा नष्ट होनेवाली गन्धवृत्ति, रसवृत्ति, स्पर्शवृत्ति आदि पृथक् हैं, परंतु उन वृत्तियोंकी उत्पत्ति, स्थिति, नाश तथा उनके स्वरूपोंका भासन करनेवाला अखण्ड बोध या निर्विकार भान सदा एकरस तथा एक ही है। जिस प्रकार नील-पीत-रहित आदि रूपोंका अवभासक सौर आलोक एक ही है, किंतु उसके प्रकाश्य भिन्न हैं, उसी प्रकार दृश्य अनेक हैं और द्रष्टा एक ही है, किंतु नील-पीतादि दृश्योंको प्रकाशित करते समय उनका अवभासक सौर आलोक तद्रूप हो जाता है; उन नील-पीतादिकी सन्धिमें जो उसका निर्विशेष रूप रहता है, वही उसका शुद्ध स्वरूप है। इसी बातको पंचदशीकारने एक अन्य दृष्टान्तद्वारा इस प्रकार स्पष्ट किया है — खादित्यदीपिते कुड्ये दर्पणादित्यदीप्तिवत् । कूटस्थभासितो देहो धीस्थजीवेन भास्यते ॥ (पंचदशी ८।१) एक स्थानपर कई दर्पण रखे हुए हैं। उनमें सूर्यकी किरणें पड़कर फिर समीपस्थ भित्तिपर प्रतिफलित हो रही हैं। वे दर्पणालोक और उनकी सन्धियाँ ये दोनों ही सौर आलोकसे प्रकाशित हैं; किंतु सन्धियाँ केवल सौरलोकसे प्रकाशित हैं और दर्पणालोक दर्पणमें पड़े हुए सौरलोकके आभाससे भी प्रकाशित हैं। इसी प्रकार विषयोंकी स्फूर्ति तो चेतन तथा