भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 309, कुल 778 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 309

श्रीरासलीलारहस्य २९९ हैं—हम तो उसे बहुत समझाती हैं; परंतु अब तो वह भी विवश है। जैसे दौड़नेवाला पुरुष यद्यपि पादसंचालनमें स्वतन्त्र होता है तथापि वेग बढ़ जानेपर वह भी उस वेगके अधीन हो जाता है; फिर उसकी गति उसके अधीन नहीं रहती। इसी प्रकार यद्यपि प्रमाता जीव स्वतन्त्र है तो भी बुद्धिसे विषय- चिन्तन करते रहनेके कारण अब उसे विवश होकर उसी प्रकारकी प्रवृत्तिमें प्रवृत्त होना पड़ता है। श्रीदुर्गासप्तशतीमें सुरथ नामक राजा और समाधि नामक वैश्यका प्रसंग आता है। सुरथ शत्रुओंसे पराजित होकर भागा था। उसका राज्य शत्रुओंके हाथमें चला गया था। अब उसमें उसका कोई स्वत्व नहीं रहा था तो भी उसे अपने सम्बन्धियों और हाथी-घोड़ोंकी स्मृति सताती थी। इसी प्रकार समाधिको उसके पुत्रादिने घरसे निकाल दिया था तो भी उसे घर और घरवालोंकी ही स्मृति बनी रहती थी। उन्होंने एक मुनिवरके पास जाकर इस अनभिमत चिन्ताका कारण पूछा। तब मुनिने कहा— ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा॥ बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति। (श्रीदुर्गासप्तशती १।५५-५६) अतः भगवान् कहते हैं—यदि तुम्हारी प्रवृत्ति नहीं होती तो 'शुश्रूषध्वं सतीः' भगवती शक्तिका समाश्रयण करो; क्योंकि— सैषा प्रसन्ना वरदा नृणां भवति मुक्तये। सा विद्या परमा मुक्तेर्हेतुभूता सनातनी॥ (श्रीदुर्गासप्तशती १।५७) क्योंकि वह सर्वात्मिका है—'या देवी सर्वभूतेषु भ्रान्तिरूपेण संस्थिता।' (श्रीदुर्गासप्तशती ५।७४) अपनेसे विमुख लोगोंके लिये वही भ्रान्तिरूपसे प्रकट होती है और अपने भक्तोंके लिये वही परम कल्याणी विद्यादेवी है। यच्च किंचित्क्वचिद्वस्तु सदसद्वाखिलात्मिके॥ तस्य सर्वस्य या शक्तिः सा त्वं किं स्तूयसे तदा। (श्रीदुर्गासप्तशती १।८२-८३) अथवा 'सती' शब्दसे सात्त्विकी वृत्ति भी विवक्षित हो सकती है। अतः इसका तात्पर्य यह है कि पहले सात्त्विक वृत्तियाँ जाग्रत् करो। भगवान्‌का नाम जप करो, प्रभुका गुणगान करो और राजस- तामस वृत्तियोंका त्याग करो। ऐसा करते-करते बादमें परब्रह्म परमात्मआकाराकारिता वृत्ति हो जायगी। इस प्रकार बुद्धियोंको भगवान्‌का यही उद्देश्य है कि तुम गोष्ठ यानी साध्यसाधनात्मक संसारकी ओर मत जाओ, बल्कि 'पतीन्'—सम्पूर्ण बुद्धियोंके साक्षी परब्रह्म परमात्माका ही आश्रय लो। बुद्धियाँ अपने चरम आश्रयभूत साक्षीका अवलम्बन न करके संसारमें प्रवृत्त होती हैं और फिर उसीमें फँस जाती हैं। अतः भगवान् उन्हें उपदेश करते हैं कि तुम संसारसे विरत होकर अधिष्ठान परमात्माकी ओर ही जाओ। वह आत्मा जाग्रदादि तीनों अवस्थाओंका साक्षी है, वह यह जानता है कि इस समय मेरी बुद्धि सात्त्विक है, इस समय राजस है और इस समय मोहग्रस्त है। इस प्रकार जो काम, संकल्प, विचिकित्सा, धी, ह्री आदि अन्तःकरणके धर्मोंको जानता है, जो जाग्रत् और स्वप्नमें प्रमाता, प्रमाण एवं प्रमेयरूप त्रिपुटीका अवभासक है और सुषुप्तिमें उनके अभावको प्रकाशित करता है, उस सर्वावभासक परमतत्त्वपर दृष्टि पहुँचनेपर यह निखिल प्रपंच सहजहीमें निवृत्त हो जाता है। किंतु यह है अत्यन्त दुर्लभ; इसीसे कहा है— कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्ष- दावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन्॥ (कठ० २।१।१) 'धीर' शब्दका अर्थ है—'धियम् ईरयति प्रेरयति इति धीरः' अर्थात् जो बुद्धि आदि कार्यकारण- संघातको अपने अधीन रखता है—स्वयं उसके अधीन नहीं होता। ऐसा कोई देहाभिमानी नहीं हो सकता। इसीलिये भगवान्‌ने कहा है— 'अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते॥' (गीता १२।५)