भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२९८ भक्तिसुधा
उन्हें ही तृप्त करो और उनके लिये अभीष्ट फलरूप दुग्ध दुहो। यह उनके प्रति तुम्हारी करुणा होगी। यद्यपि परब्रह्मकी ही उपासना करनेसे तुम्हारा पातिव्रत भग्न नहीं होगा; क्योंकि—'तमेतं···ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसानाशकेन' (बृहदारण्यक० ४।४।२२)इस श्रुतिके अनुसार विचारवानोंके सारे जप-तपका परम लाभ ब्रह्मज्ञान ही है; तथापि दया तो करनी ही चाहिये। महानुभाव तो सर्वदा 'सर्वभूतहिते रताः' (गीता ५।२५; १२।४) ही हुआ करते हैं; अतः तुम भी उन्हें अभीष्ट वस्तु देकर उनका आप्यायन करो। परमात्मप्रभुका आश्रय लेनेसे प्रपंचकी सहज ही निवृत्ति हो जाती है इस श्लोकका तात्पर्य यह भी हो सकता है कि समस्त प्राणियोंकी बुद्धियाँ ही व्रजांगनाएँ हैं और भगवान् कृष्ण उनके साक्षी हैं। अतः 'तद्यात गोष्ठं मा' ऐसा पदच्छेद करके यह तात्पर्य समझना चाहिये कि अब तुम गोष्ठको मत जाओ अर्थात् साध्यसाधनात्मक प्रपंचका प्रतिपादन मत करो, बल्कि 'शुश्रूषध्वं पतीन्।' यहाँ 'पतीन्' इस पदमें बहुवचन गौरवार्थ है अर्थात् उपक्रम, उपसंहार, अपूर्वता आदि षड्विध लिंगोंसे मेरेमें ही अपना तात्पर्य निश्चय करो। 'त्रैगुण्यविषया वेदा' (गीता २।४५) यह भगवान्का कथन अविवेकियोंकी ही दृष्टिसे है। विचारवानोंका तो यही कथन है कि 'वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो····।' (गीता १५।१५) अतः त्रिगुणमय संसारके साथ संसर्ग करना ही अमंगल है। परब्रह्म परमात्माका अनुस्मरण ही एकमात्र कल्याणका मूल है। अतः श्रुति प्रपंचपरक है—ऐसा प्रसिद्ध होनेसे तुम कलंकित हो जाओगी और यदि त्रिगुणातीत शुद्ध परब्रह्मका प्रतिपादन करोगी तो तुम भी गुणातीत हो जाओगी और इससे तुम्हें महत्ता प्राप्त होगी। परंतु यह होगा कैसे ? इसके लिये तुम 'शुश्रूषध्वं सतीः' अर्थात् 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' (तैत्तिरीय० २।१) आदि जो श्रुतियाँ परब्रह्मका प्रतिपादन करती हैं, उन्हींके सिद्धान्तका अनुसरण करो। यहाँ अपनेमें बुद्धियोंका निश्चय दृढ़ करना है; इसलिये मानो बुद्धियोंके प्रति भगवान् कहते हैं कि 'पतीन् शुश्रूषध्वम्' यहाँ उपाधिभेदके कारण बुद्धियोंके अनेक पति उपपन्न हो सकते हैं। बुद्धि स्वभावसे ही नामरूपात्मक दृश्यकी ओर जाती है। इसीसे भगवान् कहते हैं—'तद्यात मा चिरं गोष्ठम्' अर्थात् अब तुम और अधिक काल दृश्यकी ओर मत जाओ। बल्कि दृश्यकी ओरसे निवृत्त होकर अपने अवभासक समस्त बुद्धियोंके साक्षी सर्वान्तर्यामी परब्रह्मका ही चिन्तन करो। परंतु ऐसा कोई-कोई ही कर पाता है; क्योंकि— पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भू- स्तस्मात्पराङ्पश्यति नान्तरात्मन्। (कठ० २।१।१) इसलिये— कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्ष- दावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ॥ (कठ० २।१।१) अहा! भगवान्का वह सौन्दर्यसुधासिन्धु कितना महान् है। भगवत्पाद भगवान् शंकराचार्य प्रबोधसुधाकरमें लिखते हैं—'अरी बुद्धि, तू तराजूके एक पलड़ेमें सारे संसारका सुख और दूसरेमें परमानन्दकन्द भगवान् कृष्णके सौन्दर्यसुधाका एक कण रख, तब तू देखेगी कि भगवान्का सौन्दर्यकण ही भारी है। अतः तू सांसारिक विषयोंको छोड़कर भगवान् कृष्णकी सौन्दर्यसुधाका पान किया कर।' इसीसे भगवान् कहते हैं—'अरी बुद्धियो ! अब तुम गोष्ठप्रपंचमें मत जाओ, वहाँ बहुत रह चुकीं। उस स्थानमें तो पशु रहा करते हैं; तुम तो अपने परम प्रियतम मुझ परब्रह्मका ही आश्रय लो।' यदि कहो कि हम स्वतन्त्र नहीं हैं, हम कैसे आपकी ओर आयें! तो भगवान् कहते हैं—तुम अवश्य पराधीन हो, क्योंकि तुम करण हो और करण अपनी प्रवृत्तिके लिये कर्ताके अधीन हुआ करता है; अतः तुम प्रमाताको समझाओ। इसपर श्रुति कहती