भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीरासलीलारहस्य २९७ उसे सबका अन्तरात्मा कहकर प्रतिपादन करते हैं, अतः जो लोग भगवान्को बहिरंग समझते हैं, वे वस्तुतः उपासनाका रहस्य नहीं जानते। वह तो सर्वान्तरतम है। संसारके सारे पदार्थोंका वियोग हो सकता है, किंतु भगवान्का वियोग कभी नहीं हो सकता; वह तो हमारा परम सखा है। श्रुति कहती है— द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते। तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्य- नश्नन्नन्यो अभिचाकशीति॥ (मुण्डक० ३।१।१) वैष्णव आचार्योंका मत है कि जिस समय जीव ब्रह्मलोकको जाता है—जिन्हें कि वे वैकुण्ठ, गोलोक, साकेत तथा नित्य वृन्दावन आदि नामोंसे पुकारते हैं—उस समय उसे लिंग शरीर छोड़ देना पड़ता है। ब्रह्मलोकको वे शबल ब्रह्मका धाम नहीं मानते। वे उसे शुद्ध चिदानन्दघन भगवान्का चिन्मय धाम मानते हैं। अतः वहाँ जो जीव जाते हैं, वे विरजा नदीमें स्नान करनेपर अपना लिंग शरीर त्याग देते हैं। इस प्रकार लिंग शरीरका तो हमसे वियोग हो जाता है, किंतु भगवान्का वियोग कभी नहीं होता। अतः भगवान् हमारे नित्य सखा हैं। किंतु मैत्री सर्वदा समान और सजातीय व्यक्तियोंमें ही हुआ करती है। अतः जिस प्रकार भगवान् 'सच्चिदानन्द दिनेश' हैं, उसी प्रकार जीव भी 'चेतन अमल सहज सुखरासी' (रा०च०मा० ७।११७।२) है। इसलिये जो उनके स्वभावमें भेद मानते हैं, वे ठीक-ठीक नहीं जानते। भगवान् तभी जीवके परमप्रेमास्पद हो सकते हैं, जब कि जीवको उनका नित्य सम्बन्धी माना जाय। अतः उपासनाका ठीक रहस्य वही जानता है, जिसे उपास्य और उपासकके अभेदका निश्चय है। अन्यथा— 'अन्योऽसावन्योऽहमस्मि न स वेद यथा पशुः।' जो ऐसे अनभिज्ञ लोग हैं, वे ही सर्वमिथ्यात्व निश्चयको सुनकर 'क्रन्दति'—रोते हैं। वे अनभिज्ञ कर्मठ कहे जाते हैं। जो भगवत्प्राप्तिके लिये भगवदर्थ कर्म करते हैं, वे परम विवेकी हैं। ऐसा कर्म करनेके लिये तो भगवान् स्वयं आज्ञा दे रहे हैं— मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः। निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव॥ यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्। [L42