भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसम्बन्ध करनेसे तुम्हारा पातिव्रत तो भंग नहीं होगा तथापि 'क्रन्दन्ति वत्सा बालाश्च' (श्रीमद्भा० १०।२९।२२)—ये बालक और बछड़े तो रो रहे हैं। इसपर दया करनी चाहिये। ये अज्ञानी हैं, अपने अधिष्ठानभूत मुझ परब्रह्मको नहीं जानते, इसलिये बाल हैं तथा इनकी प्रवृत्ति अनात्म पदार्थोंमें है, इस पाशविक प्रवृत्तिके ही कारण ये वत्स हैं। तुम्हें चाहिये कि इनपर दया करके इन्हें इनके इष्ट पदार्थ सोमादिका प्रदान करो।' यदि विचार किया जाय तो उपास्य-उपासनाका पर्यवसान तो प्रेमातिशयमें होता है। उसके लिये उपासना साधन है। 'भक्ति' शब्दके भी दो अर्थ हैं—'भज्यते सेव्यते भगवदाकारमन्तःकरणं क्रियतेऽनया सा भक्तिः' अर्थात् जिसके द्वारा भगवदाकार वृत्ति की जाय उसे भक्ति कहते हैं और दूसरा 'भजनं भक्तिः' भगवदाकार वृत्ति ही भक्ति है। इस प्रकार भक्ति साध्य भी है और साधन भी। इस प्रकार 'उपासना' शब्दका भी तात्पर्य यह है—'लक्ष्यमुपेत्य यद्दीर्घकालं नैरन्तर्येणादरपूर्वकमासनं तदुपासनम्' अर्थात् अपने लक्ष्यतक पहुँचकर जो दीर्घ कालतक अव्यवहित रूपसे उसकी सन्निधिमें रहता है, उसका नाम उपासना है। इस तरह यदि हम अपने ध्येयका दीर्घकालतक सेवन करेंगे तो उसके प्रति हमारे हृदयमें राग उत्पन्न होगा। 'ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।' (गीता २।६२) भगवान्की इस उक्ति के अनुसार यदि हम विषय-चिन्तन करते-करते विषयासक्त हो जाते हैं तो दीर्घकालतक भगवच्चिन्तन करनेपर उनमें भी हमारा राग हो ही जाना चाहिये। प्रेम आरम्भमें ही नहीं होता; वह तो दीर्घकालतक सत्कारपूर्वक अपने प्रियतमका निरन्तर चिन्तन करते रहनेपर ही होता है। जिस समय भगवान्में हमारा प्रेम होगा, उस समय हमें उनकी प्राप्तिकी उत्कट अभिलाषा हो जायगी। प्रेमकी अभिवृद्धि प्रेमास्पदमें ही होती है एक बात और ध्यान देनेकी है, प्रेमकी अभिवृद्धि प्रेमास्पदमें ही हुआ करती है। जो प्रेम करनेयोग्य नहीं होता, उसका दीर्घकालतक चिन्तन किया जाय, तब भी उसमें प्रेम नहीं हो सकता। व्याघ्र और सर्पादिका जन्मभर चिन्तन करते रहो, उनमें प्रेम कभी नहीं होगा। उनमें तो द्वेषकी ही वृद्धि होगी, प्रेम तो प्रेमास्पदमें ही हो सकता है। चिन्तनसे केवल योग्यता मिलती है। प्रेमास्पदका चिन्तन करनेसे प्रेम बढ़ता है और द्वेषका चिन्तन करनेसे द्वेषकी वृद्धि होती है। विषय भी सुखके साधन हैं, इसलिये उनमें भी प्रेम हो जाया करता है। प्रेम दोमें ही होता है—सुखमें तथा सुखके साधनमें। सुखके साधनमें जो प्रेम होता है वह स्थायी नहीं होता, जबतक वह पदार्थ सुखप्रद रहता है, तभीतक उसमें प्रेम रहता है। देखो, जल तभीतक प्रिय लगता है, जबतक हमें तृषा रहती है। परंतु सुख तो सदा ही प्रेमास्पद है। अतः निरतिशय प्रेम सुखमें ही हो सकता। केवल सुखस्वरूप तो एकमात्र श्रीभगवान् ही हैं, इसलिये हमें उन्हींमें प्रेम करना चाहिये। प्रेमके इन दो भेदोंको शास्त्रमें सोपाधिक और निरुपाधिक प्रेम भी कहा है। प्रेमके विषयमें यह नियम है कि अत्यन्त नीच परिस्थितिमें रहनेवाला पुरुष भी उसीको अधिकाधिक प्रेमास्पद समझता है, जो जितना उसका अधिक आन्तरिक होता है। जो देहात्मवादी हैं, जिन्हें विविध प्रकारके सौख्योपभोग ही इष्ट हैं, उनका प्रेम भी आधिकाधिक अन्तरंगमें ही होता है। देखिये, पुत्रादिकी अपेक्षा शरीर अधिक प्रिय है, शरीरकी अपेक्षा मन अधिक प्रिय है; इसीसे मन उद्विग्न होनेपर उसे शान्त करनेके लिये आत्महत्यातक कर लेते हैं। मन भी जब चंचलताके कारण अशान्तिका हेतु दिखायी देने लगता है तो उसके भी नाशका प्रयत्न किया जाता है। यहाँतक कि अन्तमें अभ्यासी लोग बुद्धिका भी निरोध करते हैं। इससे ज्ञात होता है कि जो बुद्धिसे लेकर स्थूल प्रपंचपर्यन्त सम्पूर्ण दृश्यवर्गका प्रकाशक है, वह सर्वान्तरतम आत्मा ही निरुपाधिक परमप्रेमका आस्पद है। हमारा परमाराध्य प्रभु बहिरंग नहीं है। वेद-शास्त्र