भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजिस प्रकार अन्य ग्रन्थोंका पौरुषेयत्व प्रदर्शित किया जा सकता है, उस प्रकार वेदका पौरुषेयत्व सिद्ध नहीं किया जा सकता। यदि पूछा जाय कि इसमें प्रमाण क्या है ? तो परोक्ष वस्तुके अभावमें तो प्रमाणाभाव ही पर्याप्त प्रमाण होता है। हम तो वेदके कर्ताका अभाव बतला रहे हैं, अतः उसके लिये किसी प्रमाणकी आवश्यकता नहीं है। कहा जा सकता है कि ऐसे भी कितने ही ग्रन्थ हैं कि जिनके कर्ताका ज्ञान नहीं है; तो क्या उन्हें भी अपौरुषेय ही मानना चाहिये ? इसमें हमारा कथन यह है कि उन ग्रन्थोंकी सम्प्रदाय-परम्पराका विच्छेद देखा जाता है, इसलिये वे अपौरुषेय नहीं हो सकते। किंतु वेदोंकी सम्प्रदाय-परम्पराका विच्छेद नहीं हुआ; क्योंकि उसके विच्छेदमें कोई प्रमाण नहीं है। यदि कहा जाय कि कहीं-कहीं वेदोंकी उत्पत्ति भी तो सुनी जाती है; जैसे—'अस्य महतो भूतस्य निश्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः' (बृहदारण्यक० २।४।१०) इत्यादि वाक्योंसे ज्ञात होता है। यह कथन ठीक है, किंतु इसके साथ ही 'वाचा विरूप नित्यया', 'अनादिनिधना नित्या वागुत्सृष्टा स्वयंभुवा' आदि वाक्योंसे उनका नित्यत्व भी प्रमाणित होता है। अतः इन दोनों प्रकारके वाक्योंकी एकवाक्यता होनी चाहिये। इनका अभिप्राय केवल यही है कि पूर्व कल्पकी आनुपूर्वीके समान इस कल्पके आरम्भमें भी भगवान् स्वयम्भूसे उसी आनुपूर्वीके अनुस्मरणपूर्वक वेदोंका आविर्भाव हुआ। इसीसे भगवान् कहते हैं कि तुम अपने समुदायमें जाओ, क्योंकि मीमांसक भी परमब्रह्म परमात्माका खण्डन नहीं करते। वे केवल न्यायप्रतिपादित अनुमानसिद्ध सर्वज्ञ ईश्वरको स्वीकार नहीं करते, अपौरुषेय वेदप्रतिपादित सर्वज्ञ ईश्वरका खण्डन वे कभी नहीं करते। कर्मफल देनेवाला या कर्ममें देवतादिरूपसे ईश्वर उन्हें भी मान्य है ही, परंतु तुम स्वतन्त्र विधि निरपेक्ष अद्वैत ब्रह्ममें मत आसक्त हो। अतः तुम साध्यसाधनमय प्रपंचका ही प्रतिपादन करो, निर्विशेष परब्रह्मका प्रतिपादन करनेका प्रयत्न मत करो। इसमें 'मा चिरम्'—देरी भी नहीं होगी। इसलिये 'शुश्रूषध्वं पतीन्'—अपने-अपने प्रतिपाद्य देवताओंका ही प्रतिपादन करो। समस्त जीवोंके अधिष्ठान साक्षात् परब्रह्म भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र ही हैं यह सुनकर मानो श्रुतियोंको यह सन्देह हुआ कि यदि हम अनन्त परब्रह्मका ही प्रतिपादन करेंगी तो अन्य देवता तो उसीमें आ जायँगे; क्योंकि वे भी तो ब्रह्मसे अभिन्न ही हैं। यह नियम है कि कार्यगत सत्ता कारणमें ही रहती है, अतः समस्त कार्यका पर्यवसान कारणमें ही होता है। जिस प्रकार मृत्तिकाका प्रतिपादनकर देनेपर घटादिका भी प्रतिपादन हो ही जाता है, उसी प्रकार सबके अधिष्ठानभूत परब्रह्मका प्रतिपादन करनेपर अवान्तर देवताओंका प्रतिपादन भी हो ही जाता है। वास्तवमें तो सत्तामात्र शुद्ध ब्रह्म ही सम्पूर्ण शब्दोंका वाच्य है; क्योंकि यह निखिल प्रपंच उसीसे तो उत्पन्न हुआ है—'तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः । आकाशाद्वायुः।' (तैत्तिरीय० २।१) अतः यह ब्रह्मरूप ही है। इसलिये यदि व्रजांगनाएँ अपने प्राकृत पतियोंको छोड़कर भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके पास गयीं तो उनका पातिव्रत भंग नहीं हुआ, क्योंकि— गोपीनां तत्पतीनां च सर्वेषामेव देहिनाम्। योऽन्तश्चरति सोऽध्यक्षः क्रीडनेनेह देहभाक् ॥ (श्रीमद्भा० १०।३३।३६) जिस प्रकार तरंग समुद्रसे भिन्न नहीं होती, इसलिये यदि एक तरंगके साथ दूसरी तरंगका सम्बन्ध है तो वस्तुतः वह सम्बन्ध समुद्रके ही साथ है; क्योंकि वही समस्त तरंगोंका अधिष्ठान है, इसी प्रकार समस्त जीवोंके अधिष्ठान साक्षात् परब्रह्म भगवान् कृष्णचन्द्र ही हैं। अतः श्रुतियोंको यह विचार हुआ कि यदि हम परब्रह्मका ही प्रतिपादन करेंगी तो भी हमारा पातिव्रत भंग नहीं होगा। इसपर भगवान् कहते हैं—'सच है, मेरे साथ