भारतकोश
संग्रह पर लौटें

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

३०२ भक्तिसुधा अपना सारा पुरुषार्थ लगाकर हार गये, किंतु वे उसे जलानेमें समर्थ न हुए और इस प्रकार मान-मर्दन हो जानेसे चुपचाप लौट आये। उनके पीछे वायुदेवता गये। किंतु उनकी भी वही गति हुई। वे भी एक क्षुद्र तृणमात्रको उड़ानेमें समर्थ न हुए। इस प्रकार अग्नि और वायुके विफलमनोरथ होकर लौट आनेपर स्वयं देवराज इन्द्र उस यक्षका परिचय प्राप्त करनेके लिये चले। देवराजको देखते ही यक्षभगवान् अन्तर्धान हो गये। इससे इन्द्रको बड़ा परिताप हुआ। वे सोचने लगे—'अहो! मुझे सन्निधानसे उनके दर्शन और सम्भाषणका भी सौभाग्य प्राप्त न हो सका।' जिस समय जीवको भगवद्विरहके कारण परिताप होता है, उसी समय उसे भगवत्साक्षात्कारकी योग्यता प्राप्त होती है। वह क्षण बड़े सौभाग्यसे प्राप्त होता है, जिसमें प्राणी अपने प्रियतमकी विरह- वेदनासे तड़पने लगता है और उसका रोम-रोम भगवद्दर्शनके लिये उत्कण्ठित हो उठता है। देखिये, जिस समय भगवान्के साथ व्रजांगनाओंका संयोग था, उस समय उनकी उपासना उतनी प्रबल नहीं थी; किंतु जब उन्हें भगवान्का वियोग हुआ, तब उनकी लगन इतनी बढ़ी कि उस विरहाग्निने उन्हें केवल इसीलिये नहीं जलाया; क्योंकि उनके हृदयमें भगवान्की प्रेममयी मूर्ति विराजमान थी। उस आनन्द-सुधासिन्धुके कारण ही उनकी रक्षा हुई। इसी भावका वर्णन करते हुए श्रीवल्लभाचार्यजीने यह श्रुति कही है— 'को ह्येवान्यात्कः प्राण्याद् यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्।' (तैत्तिरीय० २।७) अर्थात् यदि सहृदय प्रेमियोंके अन्तःकरणोंमें प्रेमानन्दरूप सुधा न होती तो अपने प्रियतमके वियोगमें उनमेंसे कौन चेष्टा करता और कौन प्राण धारण करता ? वे तो तत्काल उस विरहानलमें भस्म हो जाते। अतः यदि भगवान्के वियोगका सन्ताप न हुआ तो यह जीवन व्यर्थ है; भगवान् वाल्मीकि कहते हैं— यश्च रामं न पश्येत्तु यं च रामो न पश्यति। निन्दितः सर्वलोकेषु स्वात्माप्येनं विगर्हते ॥ (वा०रा० २।१७।१४) वस्तुतः यह भगवदर्थ सन्ताप ही परम तप है। इस प्रकार जब इन्द्रने इस सन्ताप-रूप तपसे अपना मनोमल भस्म कर दिया तो उमादेवीका आविर्भाव हुआ। उसीने उन्हें भगवान्का परिचय दिया। अतः स्मरण रखना चाहिये कि यह महावाक्यजनित ब्रह्माकारवृत्तिरूपा उमा ही प्रकट होकर जीवको परब्रह्मके पास ले जाती हैं। अतः हे बुद्धियो! यदि तुम मुझ परब्रह्मके पास आना चाहती हो तो 'शुश्रूषध्वं सतीः' भगवती शक्तिकी उपासना करो अथवा जैसा हम पहले कह चुके हैं, सात्त्विक वृत्तियाँ ही सतियाँ हैं, उन्हें उद्बुद्ध करो। उनके उद्बुद्ध होनेसे जब तुम्हारी राजस-तामस वृत्तियाँ नष्ट हो जायँगी, तभी तुम उन्हें प्राप्त कर सकोगी। अब यदि श्रुतियाँ कहें कि महाराज ठीक है, परंतु यदि हम संसारको छोड़कर अपने परम प्रियतम परब्रह्मका ही अवलम्बन करें, प्रपंचका आश्रयण करना छोड़ दें तो उस अस्पर्शयोगको सुनकर जो बाल-वत्सस्थानीय अज्ञजन हैं, वे रोने लगेंगे; क्योंकि उनके लिये तो संसार ही सब कुछ है। वे तो पुत्र- कलत्र और धन-धामादिको ही अपना सर्वस्व समझते हैं। इसपर भगवान् कहते हैं—'वत्सा बालाश्च क्रन्दन्ति मा' अर्थात् ये वत्स और बालक भी क्रन्दन नहीं करेंगे। क्यों नहीं करेंगे? क्योंकि विवेकीके लिये संसार असत् होनेपर भी उन अविवेकियोंकी दृष्टिमें तो वह सत्य ही रहेगा। 'नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वात्' देखो—स्वप्नप्रपंच तो उसीका निवृत्त होगा, जो जागेगा। जो जगा नहीं है, उसके लिये तो स्वप्नका सारा व्यापार सत्य ही होता है। इसी प्रकार यह दृश्य-प्रपंच भी उसीके लिये मिथ्या होगा जो अपने शुद्ध स्वरूपमें जागेगा, उसे तो इसकी निवृत्ति इष्ट ही है। इसके विपरीत अप्रबुद्धके लिये इसकी निवृत्ति होगी नहीं।' भगवान्ने कहा है—

श्रीरासलीलारहस्य ३०३ यथा ह्यप्रतिबुद्धस्य प्रस्वापो बह्वनर्थभृत्। स एव प्रतिबुद्धस्य न वै मोहाय कल्पते॥ (श्रीमद्भा० ३।२७।२५; ११।२८।१४) इसलिये बाल-वत्सस्थानीय अज्ञजन भी क्रन्दन नहीं करेंगे। दूसरी बात यह है कि यदि वे रोयेंगे तो यह बतलाओ कि तत्त्वज्ञान होनेसे पहले रोयेंगे या पीछे? पीछे तो रो नहीं सकते; क्योंकि उस समय तो वे अचिन्त्यानन्द-महार्णव श्रीभगवान्में अभिन्नरूपसे स्थित हो जानेके कारण प्रपंचकी अपेक्षासे ही रहित हो जाते हैं। भला अमृतके समुद्रको पाकर क्षुद्र कूप-तड़ागादिके लिये कौन व्यग्र होता है? और पहले इसलिये नहीं रो सकते कि प्रपंचका मिथ्यात्व सुनकर भी उसपर उनकी निष्ठा नहीं होगी। देखो—यह मनुष्य-शरीर कितना घृणित है? इसके ऊपर यदि चर्म न होता तो इसपर मक्खियाँ भिनकतीं। इसमें क्षणभर भी रहनेकी इच्छा न होती। इस बातको समझनेके लिये विशेष विचारकी भी आवश्यकता नहीं है। इस शरीरमें अस्थि, मांस, रक्त आदि घृणित पदार्थ ही भरे हुए हैं। यह बात बहुत साधारण बुद्धिवाले पुरुषोंको भी सुगमतासे समझायी जा सकती है तो भी हमारे-जैसे अज्ञानियोंकी तो बात ही क्या है, बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भी रम्भा-उर्वशी आदि अप्सराओंके उस अत्यन्त घृणित शरीरके ही लावण्यमें फँस गये थे। इस प्रकार सब कुछ जानकर भी उन्हें जो मोह हुआ, वह भगवती महामायाकी ही महिमा है— दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥ (गीता ७।१४) ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा॥ बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति। (श्रीदुर्गासप्तशती १।५५-५६) अतः भगवान् कहते हैं—यदि तुम संसारका मिथ्यात्व प्रतिपादन करोगी तो भी वे अज्ञजन नहीं रोयेंगे, क्योंकि उनकी तो उसमें गति ही नहीं होगी। अब यह भी सन्देह हो सकता है कि यदि अज्ञानियोंको परोक्षरूपसे भी यह निश्चय हो जायगा कि ऐन्द्रपद आदि अब मिथ्या हैं तो भी वे यज्ञ- यागादिमें प्रवृत्त नहीं होंगे। वस्तुतः ऐसे अनधिकारियोंने ही अद्वैतवादको कलंकित कर रखा है। उन्हें भले ही ब्रह्मका अपरोक्ष साक्षात्कार न हुआ हो तथापि यह तो निश्चय हो ही जाता है कि कर्म नहीं, धर्म नहीं, लोक नहीं और वर्णाश्रमाचार भी नहीं। अतः वे धर्म- कर्मादिको तिलांजलि दे देते हैं। इन अनधिकारियोंके कारण ही अद्वैतवादको कलंकित होना पड़ा है। ऊपरी दृष्टिसे देखा जाय तो अद्वैतवादी और नास्तिकोंमें कोई भेद दिखायी नहीं देगा। मुक्तावस्थामें दृश्यकी व्यर्थता तो नैयायिकोंके मतमें भी हो जाती है। यह ठीक है कि वे उसका मिथ्यात्व स्वीकार नहीं करते; तथापि मुक्त पुरुषको तो उसका विशेष ज्ञान निवृत्त हो जानेके कारण प्रपंचका भान नहीं होता। यही बात सांख्य मतके विषयमें कही जा सकती है। वस्तुतः संसारसे सम्बन्ध छूट जानेपर और प्रभुसे सम्बन्ध जुड़ जानेपर लोक-वेदकी विधि छूट ही जाती है। सब आचार्योंका ऐसा ही मत है। यदा यमनुगृह्णाति भगवान्आत्मभावितः। स जहाति मतिं लोके वेदे च परिनिष्ठिताम्॥ (श्रीमद्भा० ४।२९।४६) और यही नास्तिकोंका भी लक्षण है। देखा जाय तो तत्त्वज्ञ और व्रात्य—इन दोनोंका बाह्य रूप एक ही होता है। देखिये, जिस प्रकार यवनादि शिखा-सूत्रादिसे रहित होते हैं, उसी प्रकार एक परमहंस भी होता है। यही नहीं, भगवान् शंकरको भी 'व्रात्य' कहा गया है—'व्रात्यानां पतये नमः'। इस प्रकार देखा जाय तो एक तत्त्वज्ञका स्वरूप तो अवश्य व्रात्यके समान ही होता है; तथापि उनमें वस्तुतः बहुत अन्तर होता है। उनमेंसे एक तो साधनकोटिको पार कर गया है और दूसरेने उसमें प्रवेश भी नहीं किया। इस समय अवश्य दोनों ही साधनके संसर्गसे रहित हैं। इस प्रकार यज्ञ-यागादिका अनुष्ठान न करनेपर

भी अद्वैतनिष्ठ महात्माको अवैदिक नहीं कहा जा सकता। वस्तुतः वेदका प्रामाण्य माननेवाला तो वही है। वैदिक तो उसीको कहना चाहिये, जो वेदार्थको अबाधित रखे। वेद कहते हैं—'एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म' (पैंगलोपनिषद् १), 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' (तैत्तिरीय० २।१) इत्यादि। अतः जो ब्रह्मको सजातीय, विजातीय एवं स्वगतभेदसे रहित मानते हैं, वे तो ब्रह्मसे भिन्न वेदकी भी सत्ता नहीं मानते। वेदकी पृथक् सत्ता माननेपर तो वेदको सजातीयादि भेदसे रहित सिद्ध नहीं किया जा सकता। अतः ऐसी अवस्थामें वेद अप्रामाणिक हो जाता है। इसलिये अपने प्रामाण्यके लिये वेद स्वतः ही अपना अभाव प्रतिपादन करते हैं— 'अत्र वेदा अवेदा ब्राह्मणा अब्राह्मणाः पुल्कसा अपुल्कसाः।' कार्य जबतक अपने कारणसे भिन्न रहता है, तभीतक उसकी पृथक् उपलब्धि होती है। कारणसे अभिन्न होनेपर उसकी पृथक् प्रतीति नहीं होती। वेद भी ब्रह्मके कार्य हैं—'अस्य महतो भूतस्य निश्श्वसितमेतद्यदृग्वेदः' (बृहदारण्यक० २।४।१०) अतः वस्तुतः वे परब्रह्मसे व्यतिरिक्त नहीं हैं। घटादि तभीतक उपलब्ध होते हैं, जबतक वे अपने कारण मृत्तिकामें नहीं मिलते। उसमें मिल जानेपर उनकी पृथक् प्रतीति नहीं होती। अतः वेदको ब्रह्मसे व्यतिरिक्त न मानना उनका तिरस्कार नहीं है; यह तो उसका सम्मान ही है। जो पुरुष वेदको ब्रह्मसे भिन्न मानता है, उसपर तो वेद कुपित होते हैं और उसे स्वार्थसे भ्रष्ट कर देते हैं। श्रुति स्वयं कहती है— वेदास्तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो वेदान् वेद.... सर्वं तं परादाद् योऽन्यत्रात्मनः सर्वं वेद॥ (बृहदारण्यक० ४।५।७) क्योंकि ब्रह्मसे वियोग होना किसीको इष्ट नहीं है। तुम भी तो परब्रह्मसे वियुक्त होनेके कारण ही तड़प रहे हो। वेदोंको भी भगवान्‌का वियोग कैसे सह्य हो सकता है? फिर तुम उन्हें भगवान्‌से व्यतिरिक्त क्यों समझते हो ? तुम यज्ञयागादि कर्मोंको भगवान्‌से भिन्न क्यों मानते हो? यदि तुम एक अणुको भी ब्रह्मसे पृथक् समझोगे तो वह अवश्य तुम्हारे लिये भय उपस्थित कर देगा। प्रेमी तो अपना भी पृथक् अस्तित्व नहीं रखना चाहता। जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं। कबिरा नगरी एकमें राजा दो न समाहिं॥ यदि हम अपनी पृथक् सत्ता रखेंगे तो ब्रह्ममें वस्तु-परिच्छेद आ जायगा तथा जिस देशमें हम रहेंगे, उसमें ब्रह्म नहीं रहेगा। इसलिये ब्रह्ममें देशपरिच्छेद भी हो जायगा। इसीसे भावुक पुरुष अपनी सत्ता प्रभुको ही समर्पित कर देते हैं; वे प्रभुसे पृथक् रहकर उनके पूर्णत्वको खण्डित करना नहीं चाहते। अतः पहले अपने धन-धान्यादि प्रभुको समर्पण करो, फिर देह समर्पित कर दो और तदनन्तर मन, बुद्धि और प्राण भी प्रभुको ही अर्पण कर दो। परिणाममें तुम भी उन्हींमें समर्पित हो जाओगे। भगवान् कहते हैं— 'निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥' (गीता १२।८) यदि घटाकाश अपनेको महाकाशसे पृथक् समझता है तो जिस देशमें वह अपनी सत्ता मानेगा, उस देशमें उसे महाकाशकी सत्ता अस्वीकार करनी पड़ेगी। इस प्रकार वह महाकाशकी पूर्णताको खण्डित कर देगा। इसीसे घटाकाश कहता है—'मैं अपनी सत्ता रखकर अपने प्रभुकी अपूर्णता नहीं करूँगा। मैं अपनेको भी उन्हें ही समर्पित कर दूँगा।' आत्मसमर्पणरूप अद्वैतदर्शन ही सच्ची पूजा और उत्कृष्टतम भक्ति है यही अद्वैतवादियोंका सिद्धान्त है। वे प्रभुको आत्मसमर्पण भी कर देते हैं। यही उनकी अद्भुत भक्ति है। वे अपने प्रियतमको अपने-आपको भी दे डालते हैं, क्योंकि आत्मा ही सबसे बढ़कर प्रिय है; इसीके लिये प्रत्येक वस्तु प्रिय हुआ करती है— 'आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति।' (बृहदारण्यक० २।४।५) अतः यदि तुम अपनेको परम प्रेमास्पदको

श्रीरासलीलारहस्य ३०५ समर्पण न करके केवल स्त्री, धन और मन आदि ही प्रभुको अर्पण करते हो तो तुम सच्चे प्रेमी नहीं कहे जा सकते। अतः आत्मसमर्पणरूप अद्वैत दर्शन ही सच्ची पूजा है और यही उत्कृष्टतम भक्ति है। हाँ, मूर्ख पुरुषोंके लिये यह सिद्धान्त अवश्य बहुत भयावह है। इस सिद्धान्तके ब्याजसे वे देहको भी ब्रह्म मान सकते हैं। परंतु वस्तुतः यह सिद्धान्त भक्तिका घातक नहीं है। यह तो उसकी चरमावस्था है। किन्हीं महानुभावोंने कहा है कि—‘पहले उपासनाकी भावना करते-करते ऊपर-नीचे सर्वत्र ब्रह्म ही दिखायी देता है। अतः पहले ‘ब्रह्मैवाधस्ताद्ब्रह्मैवोपरिष्टात्’ यह श्रुति ही चरितार्थ होती है। पीछे एक संचारी भावविशेषका अभ्युत्थान होनेपर ऐसा होता है कि जिससे वह अपनेको ही प्रियतमरूपसे देखने लगता है। उसी अवस्थाका प्रतिपादन ‘अहमेवाधस्तादहमुपरिष्टात्’ (छान्दोग्य० ७।२५।१) इस श्रुतिने किया है।’ श्रीगोस्वामी तुलसीदासजीका कथन है— सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत। मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत॥ (रा०च०मा० ४।३) ‘श्रवन कथा, मुख नाम, हृदय हरि, ....नयननि निरखि कृपा-समुद्र हरि....।’ (विनय-पत्रिका २०५) इस प्रकार निरन्तर सर्वत्र भगवद्दर्शन ही करना चाहिये। श्रीमद्भागवत (११।२।३५)-में कहा है— यानास्थाय नरो राजन् न प्रमाद्येत कर्हिचित्। धावन् निमील्य वा नेत्रे न स्खलेन्न पतेदिह॥ यही निर्भय मार्ग है। इस मार्गमें चलनेवाला कभी किसी अन्तरायसे आक्रान्त नहीं होता। एष निष्कण्टकः पन्था यत्र सम्पूज्यते हरिः। कुपथं तं विजानीयाद् गोविन्दरहितागमम्॥ इस प्रकार सबको ब्रह्ममय देखते हुए जबतक तुम अपने आत्माको भी ब्रह्मसे अभिन्न न देखोगे, तबतक तुम अपने प्रियतम परब्रह्मकी पूर्णताकी रक्षा नहीं कर सकोगे। अतः तुम अपनेको भी प्रभुमें ही समर्पित कर दो। किंतु वह समर्पण किया कैसे जाय? उसका स्वरूप क्या है? क्या घड़ेमें बेर डालना बेरका समर्पण है? इसका नाम समर्पण नहीं है। समर्पणमें अपनी सत्ता पृथक् नहीं रहती, जिस प्रकार घटाकाशकी सत्ता महाकाशसे पृथक् नहीं है। जिस समय तरंग समुद्रमें लीन होती है, उस समय क्या समुद्रसे पृथक् उसकी उपलब्धि हो सकती है? अतः भगवान्‌से पृथक् अपनी सत्ता न रखना ही उनका सम्मान है। यदि तुम उनसे अपना भेद रखते हो तो तुम उनका अनादर करते हो। भला, जिस पत्नीने अपने पतिको त्याग दिया हो, उसकी कीर्ति हो सकती है? इसी प्रकार यदि जीव अपनेको परब्रह्मसे पृथक् समझे तो उसके लिये इससे बढ़कर और क्या कलंक हो सकता है? ऐसा कलंक तो उसके लिये आत्मघातके समान है; क्योंकि— ‘सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते॥’ (गीता २।३४) इसीलिये उपनिषद् पढ़नेवाले भगवान्‌से प्रार्थना करते हैं—‘माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोत्, अनिराकरणमस्तु’ (केनोपनिषद् शान्तिपाठ)। प्रभु दीर्घकालसे हमारा निराकरण करते आये हैं और हम प्रभुका निराकरण करते आये हैं। इसीसे हमें कीट-पतंगादि योनियोंमें भ्रमना पड़ा है। यह अनिराकरण तो प्रभुकी कृपासे ही होगा। वे ही हमें ऐसी बुद्धि प्रदान कर सकते हैं; क्योंकि ये चरण असत्पुरुषोंको अत्यन्त दुष्प्राप हैं। जिस समय पुरुषोंका संसरण समाप्त होनेको होता है, हे नाथ! तभी आपके श्रीचरणोंमें प्राणियोंको रति होती है। वस्तुतः मायामोहित जीव बरबस प्रभुको भूलकर प्रपंचमें फँसा हुआ है और प्रभुकी उपेक्षा करता है। अतएव ऋषि यही प्रार्थना करता है—हे दयामय! आप ही कृपा करें कि मैं आपका अनादर या उपेक्षा न करूँ। हे दयामय! मायामोहित होकर ही हमने आपका अनादर किया है। अपने अन्तरात्मा प्रियतम सर्वस्वका अपमान मोहसे ही हमने किया है, अतः आप मेरी उपेक्षा न

३०६ भक्तिसुधा करें। इस प्रार्थनाके साथ-साथ आपहीसे यह भी प्रार्थना है कि मैं आपका अनादर न करूँ। अक्रूरजी महाराज कहते हैं— सोऽहं तवाङ्घ्र्युपगतोऽस्म्यसतां दुरापं तच्चाप्यहं भवदनुग्रह ईश मन्ये। पुंसो भवेद् यर्हि संसरणापवर्ग- स्त्वय्यब्जनाभ सदुपासनया मतिः स्यात्॥ (श्रीमद्भा० १०।४०।२८) हे नाथ! आज मैं आपके चरणोंकी शरण आया हूँ, यह भी आपके अनुग्रहका फल है। जबतक प्रभु कृपा न करें, जबतक वे हाथ न लगायें, तबतक हमारी नैया किनारे नहीं लग सकती। श्रीगोसाईंजी महाराजका कथन है— ग्यान-भगति साधन अनेक, सब सत्य, झूठ कछु नाहीँ। (वि०प० ११६) प्रभुकृपाकी प्रतीक्षा करते रहना चाहिये अर्थात् ये सारे साधन हैं तथापि जबतक आपका करावलम्ब न हो, तबतक मेरे किये तो कुछ होना नहीं है। अतः ऐसी बुद्धि तो प्रभुकृपासाध्य है। हमें तो केवल प्रभुकृपाकी प्रतीक्षा करते रहना चाहिये। आखिर जाओगे कहाँ? दर-दर घूमते जन्म-जन्मान्तर बीत गये, कहीं कोई ठिकाना नहीं मिला। अब प्रभुके सिवा और आश्रय ही कहाँ है? तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्षमाणो भुञ्जान एवात्मकृतं विपाकम्। हृद्वाग्वपुर्भिर्विदधन्नमस्ते जीवेत यो मुक्तिपदे स दायभाक्॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।८) भगवान्‌की कृपा कब होती है, इसका कोई निश्चित समय नहीं है। इसलिये हर समय सावधान रहो। ऐसा न हो, तुम्हारी असावधानीमें प्रभुकृपाकी घड़ी यों ही निकल जाय और तुम उससे वंचित ही रह जाओ। मान लो, भगवान् कोई परदानशीन स्वामी हैं और तुम उनके द्वारपर बैठे हो। वे हर समय तो परदेसे बाहर आते नहीं हैं, परंतु जिस समय वे आये उस समय तुम सो गये तो इसमें प्रभुका क्या दोष है? इसलिये तुम सदा सावधान रहो। प्रभु अतिथिका अनादर कभी नहीं करते। वे दीनवत्सल हैं; उन्हें दीन बहुत प्यारे हैं। इसीसे श्रीगोसाईंजी कहते हैं— जाउँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे। काको नाम पतित-पावन जग, केहि अति दीन पियारे॥ (वि०प० १०१) इसलिये हमें प्रभुको छोड़कर कहीं अन्यत्र नहीं जाना चाहिये। धनियोंके द्वारोंपर हम बहुत भटक लिये। अब उनका मुख मत देखो। वेदान्तदेशिकाचार्यजी कहते हैं— दुरीश्वरद्वारबहिर्वितर्दिका दुरासिकायै रचितोऽयमञ्जलिः। यदञ्जनाभं निरपायमस्ति मे धनञ्जयस्यन्दनभूषणं धनम्॥ दुरीश्वरोंके द्वारकी बहिर्वितर्दिकापर दुराशाको लेकर जो बैठना है, उसके लिये मैंने हाथ जोड़ दिया; क्योंकि हमारे पास तो धनंजयके रथका अति सुन्दर भूषण अंजनाभ श्रीकृष्ण ही अनपाय धन हैं। फिर हमें औरकी क्या आवश्यकता है? परंतु सो मत जाना; सदा सावधान रहकर प्रभुकी ओर टकटकी लगाये रहना। प्रभुका प्राकट्य बहुत जल्दी-जल्दी हुआ करता है। यहाँ अध्यात्म-प्रेमियोंको तनिक ध्यान देना चाहिये। देखिये, घटाकार वृत्तिकी निवृत्ति हुई और अभी पटाकार वृत्तिका उदय नहीं हुआ। इस सन्धिमें प्रभुकी झाँकी होती है। अज्ञान और उसके कार्य प्रभुके आवरक हैं। विषयको प्रकाशित करनेवाली वृत्तिका नाम प्रमाण है, विषयको प्रमेय कहते हैं और प्रमाणके आश्रयभूत चेतनका नाम प्रमाता है। इनमें एकके न रहनेपर तीनों ही नहीं रहते। किंतु इन तीनोंका और इन तीनोंके अभावका प्रकाशक आत्मा है। इसी भावको यह श्लोक व्यक्त करता है— एकमेकतराभावे यदा नोपलभामहे। त्रितयं तत्र यो वेद स आत्मा स्वाश्रयाश्रयः॥ (श्रीमद्भा० २।१०।९)

श्रीरामलीलारहस्य ३०७ अतः जिस समय प्रमाता एक वृत्ति उत्पादन करके शान्त होता है, उसके पश्चात् दूसरी वृत्ति उत्पन्न करनेसे पूर्व वह विश्राम लेता है। उस विश्रान्तिके समय ही उसके शुद्ध स्वरूपकी उपलब्धि होती है। इसलिये प्रति पल सावधान रहो। निमेषोन्मेष करना भी भूल जाओ। सदा निर्निमेष दृष्टिसे प्रभुकी बाट निहारते रहो। हमें प्रभुका निराकरण नहीं करना चाहिये और प्रभुसे प्रार्थना करनी चाहिये कि वे हमारा निराकरण न करें। इस प्रकार सारे लौकिक-वैदिक कर्मोंको प्रभुसे अभिन्न समझना ही प्रभुकी परमोत्कृष्ट भक्ति है। यह प्रभुका अनादर नहीं है। ब्रह्मज्ञानके अधिकारीका निर्णय किंतु दुराचारियोंने ब्रह्मज्ञानपर कलंक लगा दिया। जो बात सर्वोच्च कोटिकी थी, उसे वे श्रीगणेशमें ही करने लगे। जिसने भगवत्तत्त्वको प्राप्त कर लिया है, वह यदि वैदिक-स्मार्तकर्मोंको छोड़ता है तो ठीक ही है, किंतु जिसने अभी प्रभुकी ओर पदार्पण भी नहीं किया, वह यदि अपने कर्तव्य- कर्मोंको तिलांजलि देता है तो उसका कल्याण अनन्तकोटि जन्मोंमें भी नहीं होगा। जिसे सुधा- समुद्रकी प्राप्ति हो गयी है; वह यदि वापी, कूप, तड़ागादिकी अवहेलना करेगा तो प्यासा मर जायगा ! अतः पहले अपनेको भगवान्‌में समर्पित करो; पहले सबको ब्रह्मरूप देखो, पीछे अपनेको ब्रह्मरूप देखना। यह ठीक है कि अनभिज्ञ लोग ब्रह्मतत्त्वका साक्षात्कार किये बिना ही लौकिक-वैदिक कर्मोंका मिथ्यात्व मान बैठेंगे। किंतु यह उनकी अनधिकार- चेष्टा ही होगी। जिन्होंने श्रौत-स्मार्तकर्मोंका अनुष्ठान नहीं किया; जिन्हें इहामुत्रफलभोगसे वैराग्य नहीं हुआ, जो सदसद्वस्तुका विवेक करनेमें असमर्थ हैं, जिनके पास शमदमादि साधनोंका भी अभाव है और जिन्हें विषयी जनोंकी भोगेच्छाके समान तीव्र मुमुक्षा नहीं है, वे तो ब्रह्मजिज्ञासाके अधिकारी ही नहीं हैं। ऐसे लोगोंको ब्रह्मज्ञानमें प्रवृत्त होनेके लिये तो भगवान् शंकराचार्यने निषेध किया है। श्रीगोसाईंजी महाराज भी कहते हैं— 'बादि बिरति बिनु ब्रह्मबिचारू ॥' (रा०च०मा० २।१७८।४) ऐसे अनधिकारी लोग जब ब्रह्मविद्याकी ओर प्रवृत्त होते हैं, तब वे धर्म, कर्म और पाप-पुण्यादिका तो मिथ्यात्व निश्चय कर लेते हैं, किंतु भोगको सत्य ही मानते हैं। अतः निश्चय हुआ कि 'वत्सा बालाश्च क्रन्दन्ति' यह कथन ठीक ही है। इसीका उत्तर भगवान् देते हैं कि वे नहीं रोयेंगे, क्योंकि इसमें वेद-शास्त्रादिका दोष नहीं है। शास्त्रमें तो सभी प्रकारके साधनोंका निरूपण है। उसमें यह नियम नहीं है कि प्रत्येक व्यक्तिके लिये वे सभी साधन कर्तव्य हैं; उनमें जिसके लिये जो साधन उपयुक्त हो, उसे उसीका आश्रय लेना चाहिये। औषधालयमें सभी प्रकारकी ओषधियाँ रहती हैं। इस बातका निर्णय तो वैद्य ही कर सकता है कि किस रोगीको कौन-सी ओषधि देनी चाहिये। यदि वैद्यकी शरण न लेकर रोगी स्वयं ही मनमानी ओषधि लेने लगे तो इसमें वैद्य या औषधालयका क्या दोष ? यह तो उसीका अपराध है। इसी प्रकार शास्त्रोक्त कौन साधन किसके लिये उपयुक्त है, इसका निर्णय तो श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ गुरु ही कर सकते हैं। अतः आत्मकल्याणकी इच्छा रखनेवाले साधकोंको उन्हींकी शरण लेनी चाहिये। कर्म और उपासनाका समुच्चय शास्त्रमें तो जहाँ कर्मका प्रकरण है, वहाँ ज्ञानकी निन्दा की गयी है और जहाँ ज्ञानका प्रकरण है, वहाँ कर्म और उपासनाकी तुच्छता दिखलायी है। ईशावास्योपनिषद् (९)-कहती है— अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते। ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायाꣳरताः ॥ अर्थात् जो केवल कर्ममें ही तत्पर रहते हैं, वे अदर्शनात्मक अज्ञानमें प्रवेश करते हैं और जो केवल उपासनामें ही लगे हुए हैं, वे तो उनसे भी अधिक अँधेरेमें जाते हैं। किंतु यहाँ जो कर्म और उपासनाकी

३०८ भक्तिसुधा निन्दा की गयी है, वह कर्म या उपासनाके त्यागके लिये नहीं है, बल्कि उनके समुच्चयानुष्ठानका विधान करनेके लिये है। मीमांसकोंका मत है— 'नहि निन्दा निन्द्यं निन्दितुं प्रवर्तते अपितु विधेयं स्तोतुम्।' यदि उपर्युक्त श्रुतिका अभिप्राय कर्म और उपासनाके त्यागमें ही होता तो श्रुत्यन्तरसे जो कर्म और उपासनाका विधान सुना जाता है, वह अप्रामाणिक हो जायगा और इस प्रकार श्रुतिविरोध भी होगा। इसीसे भगवान् शंकराचार्यजी कहते हैं— 'न शास्त्रविहितं किञ्चिदप्यकर्तव्यतामियात्।' अतः इस निन्दाका अभिप्राय कर्म और उपासनाके त्यागमें नहीं, बल्कि उसके समुच्चयकी स्तुतिमें है। इसलिये केवल कर्म या केवल उपासनामें प्रवृत्त न होकर उन दोनोंका साथ-साथ अनुष्ठान करना चाहिये। यदि कर्म और उपासनासे 'अन्धं तमः' की ही प्राप्ति हुआ करती तो 'विद्यया देवलोकः कर्मणा पितृलोकः' ऐसी विधि न होती। यद्यपि कहीं-कहीं त्यागके लिये भी निन्दा की जाती है; जैसे मिथ्या-भाषणादिकी। किंतु यहाँ ऐसा नहीं हो सकता; क्योंकि यहाँ इसकी विधि पायी जाती है। श्रुतिमें ऐसा बहुत देखा जाता है कि कहीं एक वस्तुका विधान और कहीं उसीका निषेध है। आपाततः इसमें बहुत विरोध मालूम होता है। विधि धर्मके लिये होती है और निषेध पापके लिये। एक ही कर्ममें पाप और पुण्य दोनों हो नहीं सकते। किंतु ऐसा देखा जाता है कि 'अग्नीषोमीयं पशुमालभेत' और 'मा हिंस्यात्सर्वभूतानि' इत्यादि वाक्योंमेंसे एक हिंसाका विधान और दूसरा उसका निषेध करता है। इसका तात्पर्य यही समझना चाहिये कि यागोपयुक्त हिंसाका निषेध नहीं है और यागानुपयुक्त हिंसाका निषेध किया गया है। अर्थवादका आपाततः प्रतीयमान अर्थ नहीं लिया जाता। पूर्वमीमांसक तो अर्थवादका स्वार्थमें तात्पर्य ही नहीं मानते। उत्तरमीमांसकोंका विचार दूसरा है। वे अर्थवादके तीन भेद मानते हैं—भूतवाद, गुणवाद और अनुवाद। जो मानान्तर सिद्ध अर्थका प्रतिपादन करता है, उसे अनुवाद कहते हैं; जैसे—'अग्निर्हिमस्य भेषजम्।' जो मानान्तरसे विरुद्ध अर्थका प्रतिपादन करता है, उसे गुणवाद कहा जाता है; जैसे 'आदित्यो यूपः' और जो मानान्तरसे अविरुद्ध और मानान्तरसे असिद्ध अर्थका प्रतिपादन करता है, उसे भूतवाद कहते हैं; जैसे 'वज्रहस्तः पुरन्दरः।' प्रस्तुत अर्थवाद गुणवाद है; क्योंकि वह श्रुत्यन्तरसे विहित कर्म और उपासनाकी निन्दा करता है अर्थात् मानान्तरसे विरुद्ध अर्थका प्रतिपादन करता है। किंतु यहाँ जो कर्म और उपासनाके फलको अन्धंतम कहा है, वह सापेक्ष है। इस प्रसंगमें महाभारतकी एक कथाका स्मरण होता है। एक ब्राह्मण गायत्रीका जप किया करता था। उसकी प्रौढ़ जपनिष्ठासे प्रसन्न होकर गायत्रीदेवी उसके सम्मुख प्रकट हुईं। देवीने उस ब्राह्मणदेवताको वर दिया कि जापकको जिस नरककी प्राप्ति होती है, वह तुम्हें न मिले। जापकको नरक मिलता है—यह बात बड़ी कुतूहलजनक मालूम होती है। परंतु इसका तात्पर्य दूसरा है। यहाँ ब्रह्मलोकको ही 'नरक' कहा गया है; क्योंकि विशुद्ध ब्रह्मकी अपेक्षा ब्रह्मलोक निकृष्ट ही है। अतः उसे नरक कहा जाय तो अनुचित न होगा। इसी प्रकार यहाँ जो अदर्शनात्मक तम कहा है, वह मोक्षपदकी अपेक्षासे ही है। उपासनासे और भी अधिक 'अन्धं तमः' की प्राप्ति बतलायी, इसका कारण यह है कि उपासना मानस कृत्य है; सर्वसाधारणके लिये यह भी सुगम नहीं है। भला, जिन लोगोंके हस्तपादादि देहावयव भी सुसंयत नहीं हैं, वे उस मानव-व्यापारको ठीक-ठीक कैसे निभा सकेंगे? कर्म करनेसे कर्मेन्द्रियाँ और ज्ञानेन्द्रियाँ सुसंयत होती हैं; क्योंकि कर्मकाण्डमें प्रत्येक चेष्टा नियमबद्ध है। खाना, पीना, सोना, बोलना सभी नियमित रूपसे ही करना पड़ता है। वैदिक कर्मोंका अनुष्ठान करते समय जिस कर्मके लिये जैसी विधि है, उससे तनिक भी इधर-उधर होनेपर प्रायश्चित्त करना पड़ता है।

श्रीरासलीलारहस्य ३०९

इसलिए कर्मानुष्ठानसे इन्द्रियोंकी प्रवृत्ति सर्वथा सुसंयत हो जाती है। इन्द्रियोंके संयत होनेपर उपासनामें प्रवृत्त होना सम्भव है। इसीसे उपासकको कर्ममें भी प्रवृत्त करनेके लिये यह श्रुति केवल उपासनामें भय प्रदर्शित करती है। कर्मकाण्डीको जो 'अन्धं तमः' की प्राप्ति बतलायी, वह इसलिये है कि उसे केवल कर्ममें ही न रह जाना चाहिये। यदि वह कर्मजड़ हो गया तो उपासनासाध्य उत्कृष्ट फलसे वंचित रह जायगा; अतः कर्मके साथ-साथ उसे उपासनाका भी अनुष्ठान करना चाहिये। फिर जिस समय कर्म और उपासनासे ऊपर उठे हुए जिज्ञासुको श्रुति तत्त्वज्ञानका उपदेश करती है, उस समय कर्मादिसे उसकी प्रवृत्ति हटानेके लिये वह कर्मकी निन्दा करती है। उस समय वह कहती है—'प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञरूपा' (मुण्डक० १।२।७) परंतु कर्मकाण्डका प्रतिपादन करते समय वह ऐसा कभी नहीं कह सकती। अतः भगवान् कहते हैं—'हे श्रुतियो! यदि तुम मुझमें अपना तात्पर्य निश्चय करोगी और इससे अज्ञानी लोग क्रन्दन करेंगे तो इसमें तुम्हारा दोष नहीं होगा। इसके लिये तो वे ही उत्तरदायी होंगे। उन्हें चाहिये कि वे किसी विज्ञकी शरणमें जाकर श्रुत्यर्थका अनुशीलन करें।' वस्तुतः यह पद्धति है कि जो जिस निष्ठावाला हो, उसे उसी निष्ठावालोंका संग करना चाहिये। कर्मी कर्मीका, भक्त भक्तका और ज्ञानी ज्ञानियोंका संग करें। शास्त्रका तात्पर्य समझनेके लिये भी शास्त्रज्ञ गुरुकी शरणमें ही जाना चाहिये, शास्त्रका मर्म विज्ञ पुरुष ही खोल सकते हैं। अतः भगवान् कहते हैं—'तान् पाययत दुह्यत च न'—तुम उन्हें पयपान मत कराओ और उनके लिये कर्मफल दुहनेकी चेष्टा भी मत करो। तुम तो मेरा ही प्रतिपादन करो; क्योंकि महातात्पर्यका प्रतिपादन होनेपर अवान्तर तात्पर्य तो उसीमें आ जाते हैं। यह नियम है कि किसी उत्कृष्ट धर्मका निर्वाह करनेमें निकृष्ट धर्मका अपवाद भी हो जाय तो कोई दोष नहीं होता। अतः 'पतीन् शुश्रूषध्वम्'—अपने परमतात्पर्य परब्रह्मका ही प्रतिपादन करो। एक पतिव्रता अपने पतिदेवकी चरणसेवा कर रही थी। पतिदेव सोये हुए थे। इसी समय उसका पुत्र अग्निकी ओर जाने लगा। उसके चित्तमें उसे उधर जानेसे रोकनेका विचार हुआ, परंतु ऐसा करनेके लिये उसे पतिसेवा छोड़नी पड़ती। इसलिये उसने पतिसेवाको ही अपना परम कर्तव्य समझकर बच्चेको बचानेका कोई प्रयत्न नहीं किया। इस उत्कृष्ट धर्मके प्रतापसे अग्निदेव शीतल हो गये और बालकका बाल भी बाँका नहीं हुआ। इसीसे भगवान् कहते हैं— हे श्रुतियो! जबतक तुम अपने परमतात्पर्यका विषय शुद्ध बुद्ध मुक्त परब्रह्मका प्रतिपादन करनेमें प्रवृत्त नहीं हुई थीं, तबतक तो कर्म और उपासनाका पोषण करके उन अज्ञ जनोंको पयपान करा सकती थीं, परंतु अब, जबकि तुम इस ओर आयी हो, तुम उनके लिये कर्मफलरूप दुग्धका दोहन करनेकी चेष्टा मत करो। इधर बुद्धियोंकी दृष्टिसे देखें तो उन्हें भगवान् यही उपदेश देते हैं कि 'मा यात गोष्ठम्'—घट- पटादि अनात्म विषयोंकी ओर मत जाओ; बल्कि 'शुश्रूषध्वं पतीन्' अपने अवभासक और अधिष्ठानभूत परब्रह्मकी ओर देखो। इस प्रसंगमें 'क्रन्दन्ति वत्सा बालाश्च' (श्रीमद्भा० १०।२९।२२)—इसका यह तात्पर्य है कि जबतक परब्रह्मकी अनुभूति नहीं होती, तबतक अन्तःकरण और इन्द्रियाँ घबराये रहते हैं। उनकी जो बाह्य-प्रवृत्ति है, वह उनके दुःखका ही कारण है। श्रुति कहती है— 'पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भूः' (कठ० २।१।१) यहाँ 'व्यतृणत्' शब्दपर विशेष रूपसे विचार करना है। भगवान् भाष्यकारने 'व्यतृणत्' का पर्याय 'हिंसितवान्' लिखा है अर्थात् स्वयम्भू परमात्माने इन्द्रियोंको बहिर्मुख करके हिंसित कर दिया है। बहिर्मुख होनेमें इन्द्रियोंकी हिंसा कैसे मानी गयी? इसमें यही कहना है कि अपने प्रियतमसे विमुख कर

देना हिंसा ही तो है। इन्द्रियाँ अपने परम प्रेमास्पद सर्वान्तरतम परमात्माका अनुभव नहीं कर रहीं, बल्कि नाम-रूपात्मक संसारमें ही भटक रही हैं, यही उनका वध है। अतः जबतक हमारी समस्त इन्द्रियोंकी प्रवृत्ति परब्रह्म परमात्माकी ओर नहीं होती, तबतक वे अत्यन्त व्यग्र रहती हैं। यही उनका क्रन्दन है— मन करि बिषय अनल बन जरई। होइ सुखी जौं एहिं सर परई॥ (रा०च०मा० १।३५।८) प्रायः यह देखा जाता है कि विविधविध भोग- सामग्रीसे सम्पन्न महानुभाव भी अशान्तिके चंगुलमें फँसे रहते हैं। उनकी भोगतृष्णाको जैसे-जैसे भोजन मिलता जाता है, वैसे-वैसे ही वह और भी अधिक उत्तेजित होती जाती है। जिस प्रकार विषम विषाक्त अग्निके कटाहमें पड़ा हुआ कीट तड़पता है, उसी प्रकार सांसारिक भोगोंमें फँसे हुए जीव निरन्तर बेचैन रहते हैं। परंतु किया क्या जाय, यह उनका स्वभाव ही है; जैसे शूकरको विष्ठासे ही प्रेम होता है, उसी प्रकार इन इन्द्रियोंकी प्रीति विषयोंमें ही होती है। उस अपनी वासनाके कारण जीव दुःखमें ही सुखका अनुभव कर रहे हैं। जिस प्रकार दाद खुजलानेमें सुख मालूम होता है। उसी प्रकार विषयोंमें सुख जान पड़ता है। इस व्यामोहसे निकलो और परब्रह्म परमात्माकी ओर बढ़ो। जिस समय तुम्हारी प्रवृत्ति नामरूपोपाधिनिर्मुक्त परब्रह्ममें ही होगी, उसी समय तुम्हें शान्ति प्राप्त होगी। फिर तो 'यत्र यत्र मनो याति तत्र तत्र परं पदम्' (पैङ्गलोपनिषद् ४। २१) इस उक्तिके अनुसार सर्वत्र सुखका ही भान होगा। 'आनन्दाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते।' (तैत्तिरीय० ३।६) इस श्रुतिके अनुसार यह नामरूपात्मक जगत् आनन्दात्मक परब्रह्मसे ही उत्पन्न हुआ है। इसलिये यह आनन्दमय ही है। जिस प्रकार स्वाभाविक सौगन्ध्योपहित चन्दनमें मृत्तिका एवं जलादिके योगसे अस्वाभाविक दुर्गन्धकी प्रतीति होती है अथवा पित्त बिगड़ जानेके कारण मिश्री कड़वी जान पड़ती है, उसी प्रकार अचिन्त्यानन्त सौख्यसुधासिन्धु ब्रह्ममें अज्ञानजनित उपाधिके कारण इस दुःखमय प्रपंचकी प्रतीति होती है। अधिष्ठान ब्रह्मका ज्ञान होनेपर उसकी निवृत्ति हो जाती है। अतः 'तान् पाययत दुह्यत' इन इन्द्रियोंको पान कराओ और दुहो। क्या पान कराओ? परब्रह्मामृत; क्योंकि जब बुद्धि ब्रह्माकार रहने लगेगी तो विषय दुःखमय नहीं रहेंगे, वे भी ब्रह्ममय हो जायँगे। अतः इन्द्रियोंको उस परमानन्दसुधासिन्धुमें निमज्जित करनेके लिये दृश्यमात्रको परब्रह्म-रूपमें देखो। ऊपर जो पतिव्रताकी गाथा कही है, उसमें यदि वह पतिव्रता लौकिक साधनोंसे अपने बालकको बचानेका प्रयत्न करती तो वह सदाके लिये उसकी रक्षा नहीं कर सकती थी। उसे सदाके लिये तो वह तभी सुरक्षित कर सकती थी, जब कि अग्नि शीतल हो जाय। इसके लिये तो पतिशुश्रूषण ही एकमात्र साधन था। उस परमधर्मका दृढ़तापूर्वक पालन करके ही उसने अग्निका स्वभाव बदल दिया। सांख्य, नैयायिक और वैशेषिक आदि मतावलम्बियोंकी विवेकवती बुद्धि अपने मन, बुद्धि, इन्द्रिय और इन्द्रियवृत्तिरूप बालकोंको सर्वथा सुरक्षित नहीं करती। वह अपने बालकोंको अग्निसे बचा तो लेती है, परंतु अग्निके भयका सर्वथा नाश नहीं करती; क्योंकि प्रपंचका अत्यन्ताभाव तो उस मतमें है नहीं। यह काम तो अद्वैतनिष्ठ बुद्धि ही करती है। ऐसा कहकर हम अद्वैतवादका पक्ष नहीं करते; हमारा तो केवल यही मत है कि जिनके मतमें पूर्ण सच्चिदानन्दघन परब्रह्मसे भिन्न किसी दूसरी वस्तुकी सत्ता रहती है, उनके यहाँ तो दुःखका बीज रह ही जाता है। इसी दृष्टिसे बुद्धियोंके प्रति भगवान्का यही कथन है कि 'शुश्रूषध्वं पतीन्' तुम परब्रह्माकाराकारित वृत्तिमें परिणत होकर इन्हें ब्रह्मामृतका पान कराओ और इनकी तृष्णाको शान्त करो—इनका मनोरथ पूर्ण करो। वस्तुतः विषय-सेवनसे इन्हें सुख नहीं मिल सकता। भला मृगतृष्णाका जल पीनेसे किसीकी प्यास गयी है? उसमें जल है ही कहाँ? इसी प्रकार क्या

श्रीरासलीलारहस्य ३११ विषय-भोग-जन्य सुखोंसे इन्द्रिय और इन्द्रियवृत्तियोंको शान्ति मिल सकती है? नहीं, क्योंकि विषय और विषय-सुख तो हैं ही नहीं। अतः तुम सच्चिदानन्दघन परब्रह्मका ही अनुसन्धान करो। इससे यह नामरूपात्मक प्रपंच निवृत्त हो जायगा; फिर तो एकमात्र अचिन्त्यानन्दसौख्य-सुधा-सिन्धु परमात्मा ही रह जायगा और फिर ये उसीकी माधुरीका पान करेंगी। वस्तुतः इन्द्रियोंसे विषयोंका स्फुरण नहीं होता, बल्कि विषयावच्छिन्न चेतनका ही होता है। सबका अधिष्ठानभूत चेतन ही सत्य वस्तु है। उसके सिवा अन्य वस्तुकी सत्ता ही कहाँ है? यहाँ यह सन्देह हो सकता है कि ब्रह्म इन्द्रियोंका विषय कैसे होगा, वह तो अशब्द, अस्पर्श और मन एवं इन्द्रिय आदिका अविषय है। इसमें कहना यह है कि वस्तुतः ब्रह्म ही सारी इन्द्रियोंका विषय हो सकता है। प्रमाणका प्रामाण्य अज्ञात वस्तुका ज्ञान करानेमें ही है। अज्ञानकी दो शक्तियाँ हैं—आवरण और विक्षेप। इनमें आवरणके भी दो भेद हैं—असत्त्वापादक और अभानापादक। ये असत्त्वापादक और अभानापादक आवरक किसी स्वतः सत्ता और स्फूर्तिवाली वस्तुका ही आवरण करेंगे। ऐसी वस्तु ब्रह्म ही है। अतः वही अज्ञानका विषय हो सकता है। इसीसे संक्षेपशारीरककारका कथन है— आश्रयत्वविषयत्वभागिनी निर्भागचितिरेव केवला। पूर्वसिद्धतमसो हि पश्चिमो नाश्रयो भवति नापि गोचरः॥ मिथ्या वस्तुकी तो अज्ञात सत्ता-स्फूर्ति हुआ ही नहीं करती। इसलिये वह प्रमाणका विषय हो ही नहीं सकती। समस्त इन्द्रियोंका विषय एकमात्र परब्रह्म ही हो सकता है, अतः इन्हें उस ब्रह्मानन्द-सुधा-सिन्धुके अमृतका ही पान कराओ। विषयचिन्तनसे दुःखकी प्राप्ति मन एवं समस्त इन्द्रियाँ जबतक विषयचिन्तन करती रहेंगी, तबतक दुःख ही पायेंगी। इन्हें क्या करना चाहिये? केवल ब्रह्माभ्यास। ब्रह्माभ्यासका लक्षण इस प्रकार है— तच्चिन्तनं तत्कथनमन्योन्यं तत्प्रबोधनम्। एतदेकपरत्वं च ब्रह्माभ्यासं विदुर्बुधाः॥ यह बात निश्चित है कि हम जैसा चिन्तन करेंगे, वैसे ही बन जायँगे। इसीसे श्रुति कहती है— 'यत्क्रतुर्भवति तत् कर्म कुरुते यत् कर्म कुरुते तदभिसम्पद्यते॥' (बृहदारण्यक० ४।४।५) जिनके श्रोत्र भगवत्कथाश्रवणमें संलग्न हैं, जिनके चरण भगवद्धामोंकी यात्रा करते हैं, जिनके हाथ निरन्तर भगवत्सेवामें ही लगे रहते हैं, जिनकी घ्राणेन्द्रिय प्रभुके पादपद्मसे संलग्न तुलसिकाका ही आघ्राण करती है तथा जिनके अंग भगवद्भक्तोंके सहवासका अद्भुत आनन्द लूटते हैं, उनके लिये यह संसार संसार ही नहीं रहता। देखिये—नारद, शुकदेव, व्यास एवं वसिष्ठादिके लिये भी तो यही संसार है। वे बारम्बार देह धारण करके यहाँ आते हैं। उनके लिये यह आनन्दस्वरूप है और हमारे लिये यही विषम विषाक्त अग्निपूर्ण कटाह हो रहा है। जिनकी बुद्धिने श्रीकृष्णचन्द्ररूप परमपतिकी शुश्रूषा की है, उनके लिये यह भगवद्रूप हो गया है। इसीसे वे प्रभुके लीलाविग्रहका आस्वादन करनेके लिये सब कुछ जानकर भी थोड़ा-सा भेद स्वीकार करते हैं। शुद्ध परब्रह्म आनन्दरूप है, किंतु उसका सगुण रूप आनन्दकन्द है—वह आनन्दका ही घनीभूत रूप है। जिस प्रकार इक्षुरस मिष्ट है, किंतु शर्करा और मिश्रीमें जो माधुरी है, वह कुछ और ही है, इसी प्रकार भगवान्के दिव्यमंगल विग्रहका सुख विचित्र ही है। उनके कर, चरण, नख, अधर, भूषण, आयुध सभी परम दिव्य हैं; उनके एक-एक अवयवपर कोटि- कोटि कामदेव निछावर किये जा सकते हैं। उनकी उस परमानन्दमयी मूर्तिका सुखास्वादन करनेके लिये ही वे नित्यमुक्त महर्षिगण इस लोकमें अवतरित होते हैं और स्वरूपतः सर्वथा अभिन्न होनेपर भी प्रभुका

३१२ भक्तिसुधा

आनन्द भोगनेके लिये भेद स्वीकार करते हैं; क्योंकि बिना भेदके भोग नहीं हो सकता। यही भगवल्लीलाका निगूढ़ रहस्य है। ऊपर कहा जा चुका है कि बुद्धियोंके प्रति भगवान्‌का कथन है कि तुम संसारकी ओर मत जाओ, अपने परमपति परमात्माका ही अनुसन्धान करो। यहाँ 'क्रन्दन्ति वत्सा बालाश्च' का तात्पर्य यह है कि जबतक तुमलोग परब्रह्म परमात्माका अनुसन्धान न करोगी, तबतक इन्द्रिय और इन्द्रियवृत्तिरूप बालक तथा बछड़े क्रन्दन करते रहेंगे; क्योंकि ब्रह्मानुसन्धान न करनेपर तो प्रपंचकी प्रतीति बनी ही रहेगी। वस्तुतः इस संसारकी सत्ता मनकी चंचलता रहनेतक ही है, उस चंचलताका निरोध होनेपर फिर प्रपंचकी प्रतीति नहीं होती। 'मनसो ह्युन्मनीभावे द्वैतं नैवोपलभ्यते॥' (पैङ्गोपनिषद् ४।२०) अतः प्रपंचकी प्रतीति और उसके कारण इन्द्रियोंके क्रन्दनका हेतु तुम्हीं हो। जिस प्रकार महासमुद्रमें वायुके योगसे कुछ हलचल होनेपर ही तरंगमालाका प्रादुर्भाव होता है, उसी प्रकार बुद्धिके स्फुरणसे ही चित्समुद्रमें कुछ हलचल होती है। इसीका नाम मन है। योगवासिष्ठमें कहा है— स आत्मा सर्वगो राम नित्योदितवपुर्महान्। यन्मनाक् मननीं शक्तिं धत्ते तन्मन उच्यते॥ अतः थोड़ी-सी मननी शक्तिको धारण करनेपर परब्रह्म ही मनरूपसे प्रादुर्भूत होता है। किंतु मनकी वह मननी शक्ति क्या है? यदि हम इस बातका विचार करें कि तरंग क्या है तो यही निश्चय होगा कि वस्तुतः वह समुद्र ही है। वायुके कारण ही उसकी पृथक् प्रतीति होती है। इसी प्रकार मन भी मायाशक्तिके कारण ही अपने अधिष्ठानरूप परब्रह्मसे पृथक् प्रतीत होता है। अतः चित्तका जगत्- सम्बन्ध-स्फुरण ही मननी शक्ति है, वस्तुतः व्यावहारिक जगत्‌में स्फुरण ही चित्‌का चित्त्व है, वही सृष्टिका बीज है, उसीको भगवान्‌का ईक्षण, संकल्प अथवा आदिसंवेदन कहकर भी पुकारा जाता है। मन साक्षीभास्य माना जाता है। उसकी कभी अज्ञात सत्ता नहीं रहती। जिस प्रकार समुद्रके बिना तरंगकी सत्ता नहीं होती, उसी प्रकार शुद्ध चेतनसे भिन्न मन नहीं है। यदि मननी शक्तिका निरोध हो जाय तो चित्त चित् हो जाता है। वस्तुतः चित् तकाररहित चित्त ही है। योगवासिष्ठमें कहा है— 'चित्तं चिद्विजानीयात्तकाररहितं यदा।' यह तकार ही चंचलता है। इस चंचलताके कारण ही नित्य-शुद्ध-बुद्ध निर्विकार ब्रह्ममें प्रपंचकी प्रतीति हुई है। इसकी निवृत्ति होनेपर तो मनका मनस्त्व ही नहीं रहता। फिर तो यह प्रपंच ब्रह्म ही हो जाता है; क्योंकि वास्तवमें तो अन्वय-व्यतिरेकसे ब्रह्म ही है—ब्रह्मकी सत्तासे ही इसकी सत्ता है, ब्रह्मको छोड़कर तो इसकी सत्ता ही नहीं है। माया या अज्ञान भी अधिष्ठानसे भिन्न नहीं है। श्रीगोसाईं तुलसीदासजी कहते हैं—जिस प्रकार काष्ठमें अनेकों पुतलियाँ और कपासमें तरह-तरहके वस्त्र निहित हैं, उसी प्रकार चित्तमें ही सारा प्रपंच है। यदि चित्त स्वाधीन हो जाय तो भले ही संसारके सारे पदार्थ बने रहें, उनसे अपना क्या हानि-लाभ होता है? चित्तमें ही सारा प्रपंच है—योगवासिष्ठका एक दृष्टान्त इस विषयमें एक गाथा है—एक राजा अश्वमेध- यज्ञ कर रहा था। यज्ञीय अश्व छोड़ा गया, बहुत- से सैनिक अश्वकी रक्षा करने चले। उस अश्वको एक मुनिकुमारने पकड़ लिया और उस सारी सेनाको जीतकर वह उसे लेकर एक शिलामें घुस गया। यह अद्भुत व्यापार देखकर बचे-खुचे सैनिकोंको बड़ा आश्चर्य हुआ और उन्होंने जाकर सारा हाल राजाको सुना दिया। राजाने उस अश्वको लानेके लिये कुछ आदमियोंके साथ अपने भाईको भेजा। वह राजकुमार जब उस स्थानपर पहुँचा तो एक शिलाके सिवा वहाँ और उसे कुछ भी न मिला। उसने सोचा कि यहाँ

अवश्य कुछ मुनिश्रेष्ठ होंगे; उन्हींसे इस लीलाका रहस्य खुल सकेगा। इधर-उधर खोजनेपर उसे एक महात्मा दिखायी दिये। महात्मा समाधिस्थ थे। राजकुमार तन-मनसे उनकी सेवा-शुश्रूषा करने लगा। परंतु उनका समाधिसे उत्थान न हुआ। कुछ काल पश्चात् उसकी सच्ची लगन देखकर वही मुनिकुमार प्रकट हुआ और उसे वह यज्ञीय घोड़ा दे दिया। राजकुमारने वह अश्व दूसरे मनुष्योंके साथ राजधानीको भेज दिया और स्वयं वहीं रह गया। तब मुनिकुमारने पूछा—'राजन्! तुम क्या चाहते हो?' राजकुमारने कहा—'भगवन्! मेरी यही इच्छा है कि इन मुनिश्रेष्ठका समाधिसे व्युत्थान हो।' इसपर मुनिकुमारने कहा—'ऐसा होना तो बहुत कठिन है; क्योंकि इस समय ये स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों शरीरोंका अतिक्रमणकर केवल सत्तामात्र परब्रह्मके साथ एकीभावसे स्थित हैं। तथापि मैं प्रयत्न करता हूँ'— ऐसा कहकर मुनिकुमार समाधिस्थ हो गया। उसने तीनों शरीरोंसे सम्बन्ध छोड़कर सन्मात्रमें स्थित हो मुनिवरके सन्मात्र तत्त्वमें स्थित आत्माको उद्बुद्ध किया। इससे मुनिकी समाधि खुल गयी। मुनिवरने राजकुमार और समाधिस्थ मुनिकुमारको देखा तथा योगबलसे सारा रहस्य जानकर मुनिकुमारको उद्बुद्ध किया। फिर राजकुमारने मुनिवरसे प्रार्थना की—'भगवन्! आप मुझे अपना परिचय देकर कृतार्थ करें और ये मुनिकुमार हमारा अश्व लेकर किस प्रकार इस शिलामें घुस गये थे, यह सब रहस्य बतलानेकी कृपा करें।' मुनिने कहा—'राजन्! पूर्वकालमें मैं एक राजा था। संसारसे निर्वेद होनेपर मैं अपना राज्य छोड़कर सपत्नीक यहाँ तपस्या करने चला आया। एक दिन जब कि मैं समाधिस्थ था, दैववश मेरी रानीकी वृत्ति कुछ चंचल हो गयी और उसने संकल्पसे ही मेरे साथ मैथुन किया। उससे वह गर्भवती हो गयी और यथासमय उससे यह पुत्र उत्पन्न हुआ। पुत्र-प्रसवके पश्चात् उसने तो शरीर छोड़ दिया, फिर मैंने ही इसका लालन-पालन किया। कुछ वयस्क होनेपर इसकी इच्छा राज्य भोगनेकी हुई। तब मैंने इसे योगाभ्यासमें लगाया, उसमें सिद्धि प्राप्त करनेपर इसने संकल्पसे ही इस शिलामें एक ब्रह्माण्ड रच लिया है। यह उस ब्रह्माण्डका ईश्वर है। तुम्हारे अश्वको भी यह वहीं ले गया था।' यह सब वृत्तान्त सुनकर कुतूहलवश राजकुमारको उस मुनिकुमारके संकल्पित ब्रह्माण्डको देखनेकी इच्छा हुई। तब मुनिकुमारने कहा—'अच्छा, तुम मेरे साथ चलो।' किंतु जब राजकुमारने उसके साथ शिलामें प्रवेश करनेका प्रयत्न किया तो वह सफल न हुआ। तब मुनिकुमारने अपने योगबलसे उसे अपने साथ ले लिया। उस शिलामें प्रवेश करनेपर उसे इस ब्रह्माण्डकी अपेक्षा भी अधिक विस्तृत ब्रह्माण्ड दिखायी दिया। वहाँ उसने ऐसा ही आकाश देखा तथा वहाँके ब्रह्मलोक, इन्द्रलोक, वैकुण्ठ, पाताल और रसातलादिमें जाकर ब्रह्मा, विष्णु आदि सब देवताओंका भी दर्शन किया। उसने यह भी देखा कि वहाँ वह मुनिकुमार ही सबसे अधिक पूजनीय है; वहाँके देवगण भी उसे अपना ईश्वर समझते हैं। इस प्रकार केवल एक दिनमें ही उसने वह सारा ब्रह्माण्ड देख लिया। तब उसे फिर इस लोकमें आनेकी इच्छा हुई। उसके कहनेसे मुनिकुमार उसे बाहर ले आया; किंतु उसने देखा कि वहाँका सारा ही रंग-ढंग बदला हुआ है। जहाँ पर्वत था, वह विस्तृत समतल भूमि है, जहाँ नदी थी, वहाँ मरुभूमि दिखायी देती है और जहाँ वन था, वहाँ नगर बसे हुए हैं। यह देखकर उसने मुनिकुमारसे इसका कारण पूछा। मुनिकुमारने कहा—'तुम्हें मेरे ब्रह्माण्डमें तो एक ही दिन व्यतीत हुआ जान पड़ा था; किंतु उतने ही समयमें यहाँ कई युग बीत गये हैं। इसलिये अब यहाँ सब कुछ बदल गया है। तुम्हारे कुलमें भी अब बहुत-सी पीढ़ियाँ बीत चुकी हैं; तुम्हारे सामने जितने मनुष्य थे, उनमें तो केवल तुम ही रह गये हो।' यह सुनकर राजाको बड़ा विस्मय और विषाद हुआ। फिर उसने मुनिकुमारसे इसका रहस्य पूछा।

मुनिकुमार बोला—'राजन्! वस्तुतः यह प्रपंच संकल्पमात्र है। साधारण लोगोंके संकल्प शुद्ध नहीं होते, उनमें कई संकल्पोंका सांकर्य रहता है; इसलिये वे सिद्ध भी नहीं होते। यदि हमारा संकल्प सिद्ध हो जाय और उसमें अन्य संकल्पोंका मेल न रहे तो हम उसे प्रत्यक्ष व्यावहारिक रूपमें देख सकते हैं। जिस संकल्पकी पूर्वकोटि और परकोटि ज्ञात होती है, वह तो कल्पना ही है, वह सिद्ध संकल्प नहीं है। यदि हमारा संकल्प ऐसा हो जाय कि उसकी पूर्वकोटिका [अर्थात् वह कब और किस प्रकार आरम्भ हुआ था—इस बातका] भान न रहे तो वह अवश्य प्रत्यक्ष हो जायगा। मेरा संकल्प सिद्ध हो गया है। उस संकल्प-शक्तिसे ही मैंने इस शिलामें ब्रह्माण्डकी भावना कर ली है। मेरा ब्रह्माण्ड इस ब्रह्माण्डकी अपेक्षा बृहत्तर है। जितने समयमें मैंने वहाँ एक दिनकी भावना की थी, उतने समयमें इस ब्रह्माण्डके ब्रह्माने कई युगोंकी भावना की। अतः वहाँ केवल एक दिन हुआ और यहाँ कई युग बीत गये। वस्तुतः सारा प्रपंच भगवान्‌का संकल्प ही है। जो शक्ति भगवान्‌में है, वही योगियोंमें भी हो जाती है। वे यदि घटको पट कहें तो उसे पट होना पड़ेगा। ब्रह्मादिका संकल्प भी ऐसा ही है। इसीसे उनके संकल्पित पदार्थ उन्हें भी प्रतीत होते हैं और हमें भी। अन्य पुरुषोंके संकल्प ऐसे नहीं होते, उन्हें अपने संकल्पोंकी पूर्वकोटि ज्ञात रहती है; अतः उनके संकल्पित पदार्थ केवल उन्हें ही प्रतीत होते हैं, दूसरोंको नहीं।' इसीसे पहले कहा गया है—'मनसो ह्युन्मनीभावे द्वैतं नैवोपलभ्यते ॥' क्योंकि प्रपंचकी प्रतीति मनकी चंचलतामें ही होती है, उसकी स्थिरतामें नहीं। अतः भगवान् बुद्धियोंसे कहते हैं—'अरी बुद्धियो! जबतक तुम स्थिर होकर अपने परम प्रेमास्पद परब्रह्म परमात्माका सुखास्वादन न करोगी, तबतक तुम्हारा श्रम निवृत्त न होगा। श्रमकी निवृत्ति परमप्रेमास्पदके सुखास्वादनसे ही होती है; क्योंकि जिस समय प्राणी प्रेमविह्वल होता है, उस समय उसकी इन्द्रियाँ और मन शिथिल पड़ जाते हैं। जिस समय कोई प्रेमी दीर्घकालके प्रवासके अनन्तर अपनी प्रियतमासे मिलता है और उन दोनोंका परस्पर आलिंगन होता है, उस समय उन्हें बाहर- भीतरका कुछ भी ज्ञान नहीं रहता। यह दशा प्राकृत प्रेमियोंकी है, फिर परमानन्द-सौख्य-सुधासिन्धु श्रीश्यामसुन्दरका संयोग होनेपर उनके दिव्य रूप, दिव्य स्पर्श एवं दिव्य गन्धका समास्वादन करनेपर जो विलक्षण स्थिति होती है, उसका तो कहना ही क्या है? श्रुति कहती है—उस समय तो न बाह्य जगत्‌का ज्ञान रहता है और न आन्तरका—'नान्तरं किञ्चन वेद न बाह्यम्।' उस समय उसका चित्त भी अपने अधिष्ठानभूत चिदात्मामें लीन हो जाता है— 'तच्चापि चित्तवडिशं शनकैर्वियुङ्क्ते।' लीलाके विकासके लिये नित्य अभिन्न श्रीवृषभानुदुलारी और रासेश्वर श्रीकृष्णका द्वैधीभाव जिस समय जीवको अपने एकमात्र प्रियतम परमानन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्रका आश्लेष होता है, उस समय जो आनन्दातिरेक होता है, उसमें उसके मन और इन्द्रिय आदि ऐसे परिप्लुत हो जाते हैं कि उसे अपना भी भान नहीं रहता। उस स्थितिमें भक्त और भगवान्‌का सर्वथा अभेद हो जाता है। भगवान्‌की नित्यनिकुंज- लीलामें श्रीवृषभानुदुलारीके साथ उनका नित्य संयोग रहता है। वहाँ उनका कभी विप्रयोग नहीं होता, क्योंकि भगवान् कृष्ण अचिन्त्यानन्द-सुधासिन्धु हैं और श्रीरासेश्वरीजी उनकी मधुरिमा हैं। वस्तुतः वे एक ही तत्त्व हैं, केवल रसानुभूतिके लिये ही उनके दिव्यमंगल विग्रहोंका प्रादुर्भाव हुआ है। वे यद्यपि सर्वदा एकरूप हैं तथापि लीलाविशेषोपयुक्त रसाभिव्यक्तिके लिये उनका विप्रयोग आवश्यक है। अतः लीलाविशेषके विकासके लिये ही उनका द्वैधीभाव होता है। उस समय जितने भावोंकी अपेक्षा है, उन सभीका प्रादुर्भाव होता है। यह ठीक है कि उस नित्य लीलामें उनका कायिक और ऐन्द्रियक विप्रयोग कभी नहीं होता। उनके मन, प्राण, नेत्र तथा

श्रीरासलीलारहस्य ३१५ प्रत्येक अंग-प्रत्यंग परस्पर संश्लिष्ट हैं। तथापि उस संश्लेषसे प्रेमातिशयके कारण उनमें जो विह्वलता आती है, उससे श्रीवृषभानुनन्दिनीका मन कृष्णसुखका अनुभव नहीं करता और श्रीकृष्णचन्द्रका विह्वल मन श्रीनिकुंजेश्वरीजीकी माधुर्यसुधाका आस्वादन करना भूल जाता है। यहाँ केवल इतना ही विप्रयोग होता है। अब इधर अध्यात्ममें आइये। यह बुद्धिरूपा प्रमदा सुषुप्तिमें थोड़ा-सा उस ब्रह्मसुखका रसास्वादन करती है। इसीसे उस समय इसे आत्मविस्मृति हो जाती है। बस, जिस समय बुद्धि अपनेको भूली कि उसे प्रपंचका भान ही नहीं रहता। फिर तो बुद्धि बुद्धि नहीं रहती, मन मन नहीं रहता और प्राण प्राण नहीं रहते। वे सब केवल चिन्मात्र हो जाते हैं। इसीसे भगवान्ने कहा है कि 'हे बुद्धियो! जबतक तुम मुझमें ही स्थित न होगी, तबतक तुम्हारे बाल-बच्चेरूप ये इन्द्रियाँ और मन आदि रोते ही रहेंगे।' परंतु करें क्या ? बहुत कुछ विचार भी करते हैं, तब भी विषय हमें अपनी ओर आकर्षित कर ही लेते हैं। हम स्वयं उनकी ओर जानेका संकल्प नहीं करते तथापि जिस समय कोई असाधारण रूप हमारे सामने आता है, उस समय नेत्र उसकी ओर खिंच जाते हैं; जिस समय कोई सुमधुर शब्द सुनायी देता है, कान वहाँसे हटना नहीं चाहते; जब कोई दिव्य गन्ध मालूम होती है तो घ्राणेन्द्रिय उसमें फँस ही जाती है तथा जब कोई सुस्वादु पदार्थ सामने आता है तो रसनेन्द्रिय उसका रस लेने ही लगती है। ये सब हठात् हमें अपनी ओर खींच लेते हैं। यह सब उस महामायाका ही प्रभाव है। ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा॥ बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति। (श्रीदुर्गासप्तशती १।५५-५६) यह देवी भगवती कौन है? विषय-रूपमें परिणत हुई प्रकृति ही वह महामाया है। उसके कारण बड़े-बड़े ज्ञानी, तपस्वी और जितेन्द्रिय भी अपनी- अपनी निष्ठासे विचलित हो जाते हैं। नारद, विश्वामित्र और ब्रह्मादिको भी उसने नहीं छोड़ा, फिर हम-जैसे साधारण पुरुषोंकी तो बात ही क्या है? अतः महापुरुषोंका यही उपदेश है कि कोई कैसा ही विवेकी हो, उसे सर्वदा विषयोंसे दूर ही रहना चाहिये; वहाँ उसे अपनी पण्डिताईका भरोसा नहीं करना चाहिये। भगवान् शंकराचार्य कहते हैं- 'आरूढयोगोऽपि निपात्यतेऽधः सङ्गेन योगी किमुताल्पसिद्धिः।' अतः विषयोंके रहते हुए ये बाल-बच्चे तो रोते ही रहेंगे। यदि तुम इनका रोना बन्द करना चाहती हो तो तुम अपने पतिदेव अचिन्त्यानन्द-सुधासिन्धु परब्रह्मका चिन्तन करो। उसमें निश्चल हो जानेपर विषयोंकी सत्ता ही नहीं रहेगी। इस प्रकार जब विषय ही न रहेंगे तो रोयेंगे किसके लिये ? इन्द्रियोंको विषय-सेवन मत कराओ वास्तवमें तो इन्द्रियाँ और इन्द्रियवृत्तियाँ परब्रह्मकी ही ओर जाना चाहती हैं, विषयोंकी ओर जाना इन्हें अभीष्ट नहीं है। परंतु करें क्या, विषयरूप चुम्बक बलात् अपनी ओर खींच लेता है। इसीसे बृहदारण्यकोपनिषद्में इन्द्रियोंको ग्रह बतलाया है और विषयोंको अतिग्रह। इन्द्रियाँ और मन प्राणीको इसी प्रकार ग्रहण किये हुए हैं, जैसे ग्रह अर्थात् भूत। उन ग्रहोंसे गृहीत होकर यह जीव रोता-चिल्लाता है। इन ग्रहोंसे छूटनेके लिये उसे श्रीकृष्णरूप ग्रहकी शरण लेनी चाहिये। जिस समय यह कृष्ण-ग्रह- गृहीतात्मा हो जायगा, उस समय वे क्षुद्र ग्रह इसका कुछ भी न बिगाड़ सकेंगे। किंतु विषय अतिग्रह हैं। आत्मापर मनरूप ग्रह चढ़ा हुआ है, उसपर इन्द्रियरूप दस भूत सवार हैं और उनपर भी विषयरूप विकट भूत लगे हुए हैं। इन अतिग्रहोंसे गृहीत होनेपर भला इन्द्रियोंकी आत्माकी ओर कैसे प्रवृत्ति हो सकती है ? पहले हम कह चुके हैं कि स्वयम्भू भगवान्ने इन्द्रियोंकी बहिर्मुख करके हिंसित कर दिया है। हिंसा किसे कहते हैं ? अनभिमत कर्म करना पड़े-यही हिंसा है। इन्द्रियाँ विषयोंकी ओर जाना नहीं चाहतीं,

३१६ | भक्तिसुधा


भगवान्ने इन्द्रियोंको बहिर्मुख कर दिया। इससे उन्हें बलात्कार उनकी ओर जाना पड़ा। यही उनकी हिंसा है। अतः भगवान् कहते हैं—'हे बुद्धियो! ये इन्द्रियरूप बालक विषयोंकी ओर जानेसे रो रहे हैं और परमानन्द-सुधाका पान नहीं कर पाते। इसमें कारण तुम्हीं हो, क्योंकि यदि तुम चंचलता छोड़ दो तो इन विषयोंकी सत्ता ही न रहे। उस समय ये इन्द्रियाँ जायँगी ही कहाँ? तब तो ये ब्रह्मानन्द-सुधाका ही पान करेंगी। अतः इन्हें शान्त और तृप्त करनेके लिये भी तुम मेरा ही चिन्तन करो।' इन्द्रिय और इन्द्रियवृत्तियाँ बुद्धिकी ही अवस्था- विशेष हैं। इसलिये ये उसके बालक ही हैं। जिस प्रकार दर्पणके भीतर अनेक प्रकारके पदार्थ प्रतिबिम्बित होते हैं, उसी प्रकार शुद्ध चैतन्य-रूप दर्पणमें समस्त प्रपंच प्रतिबिम्बित हैं। दर्पणमें जो आकाशकी प्रतीति होती है, वह वस्तुतः निरवकाशमें ही अवकाशकी प्रतीति है। दर्पणके अवयव इतने सघन हैं कि उनमें किसी पदार्थका प्रवेश होना सम्भव ही नहीं है। अतः उसमें जितने समुद्र, नदी, पर्वत एवं वन आदि प्रतीत होते हैं, वे सब असत् ही हैं। इसी प्रकार शुद्ध चैतन्यरूप दर्पणमें अनेकविध प्रपंच प्रतीत हो रहा है। परंतु वस्तुतः वह सब केवल स्वयं-प्रकाश शुद्ध चेतन ही है। परंतु उनकी प्रतीति क्यों होती है ? यहाँ दो बातें ध्यान देनेकी हैं—(१) जिस समय आप दर्पणके शुद्ध स्वरूपपर दृष्टि ले जायँगे, उस समय आपको उसमें प्रतिबिम्बित पदार्थ दिखायी नहीं देंगे और जिस समय आप प्रतिबिम्बित पदार्थ देखेंगे, उस समय दर्पणका शुद्ध स्वरूप नहीं देख सकेंगे। यही बात परब्रह्मके विषयमें भी है। परब्रह्मको ग्रहण करनेवाली वृत्ति प्रपंचको ग्रहण नहीं कर सकती और प्रपंचको ग्रहण करनेवाली वृत्ति परब्रह्मको ग्रहण नहीं कर सकती। (२) यह भी निश्चित बात है कि प्रतिबिम्बित पदार्थोंकी सत्ता दर्पणके ही अधीन है और वस्तुतः दर्पणको ग्रहण किये बिना हम प्रतिबिम्बितको ग्रहण भी नहीं कर सकते। यह कभी सम्भव नहीं है कि हम तरंगको तो देख लें और जलको न देखें तथा हमें सौरलोक या चन्द्रालोककी प्रतीति तो न हो, किंतु उनसे प्रकाश्य पदार्थोंकी प्रतीति हो जाय। इसी प्रकार हमें पहले ब्रह्मका ग्रहण होता है और पीछे प्रपंचका; क्योंकि सारे पदार्थ उसीके प्रकाशसे प्रकाशित हैं— 'तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥' (श्वेताश्वतर० ६।१४) किंतु इस समय जो ब्रह्मका ग्रहण होता है, वह उसके शबल रूपका होता है। उसके शुद्ध स्वरूपका ग्रहण तो प्रपंचकी उपेक्षा करते-करते उसकी अप्रतीति होनेपर ही होगा; जिस प्रकार कि शुद्ध दर्पणका ग्रहण तभी हो सकता है जब कि प्रतिबिम्बका ग्रहण न किया जाय। जिस समय बुद्धि प्रपंचको ग्रहण करती है, उस समय वह बहुत घबराती है; क्योंकि इसमें सिंह- व्याघ्रादि बड़े-बड़े भयानक पदार्थ भी हैं। लोकमें प्रतिबिम्बसे भय होना प्रसिद्ध है। माता बालकको अपनी परछाईं नहीं देखने देती, क्योंकि उसे भय है कि वह उसे वेताल समझकर डर जायगा। स्वकल्पित मिथ्या वेतालसे भी मृत्यु हो जाती है। इसी प्रकार यह प्रपंच चिद्रूप दर्पणमें प्रतिबिम्बित परछाईं है। अतः विवेकवती बुद्धिरूप माताको उचित है कि वह इन्द्रिय और इन्द्रियवृत्तिरूप अपने बालकोंको उनके कल्याणके लिये यह प्रपंचरूप परछाईं न देखने दे और केवल दर्पणस्थानीय ब्रह्मको ही देखे। यहाँ यह शंका न करनी चाहिये कि प्रतिबिम्ब तो किसी बिम्बका हुआ करता है; अतः परब्रह्ममें जो प्रपंच प्रतिफलित होता है, उसका भी कोई बिम्ब होना चाहिये। दर्पणादि परिच्छिन्न पदार्थ हैं, इसलिये उनमें जो प्रतिबिम्ब पड़ता है, वह बिम्बके ही कारण होता है; किंतु ब्रह्म तो अपरिच्छिन्न है, उससे पृथक् और स्थान ही कहाँ है, जहाँ उसमें प्रतिफलित होनेवाला बिम्ब रहेगा। बिम्बभूत जो कोई भी पदार्थ होगा, वह

श्रीरामलीलारहस्य ३१७ देश, काल और वस्तुके अन्तर्गत ही होगा। किंतु देश, काल और वस्तु तो प्रतिबिम्बके ही अन्तर्गत हैं। यदि कहो कि अनुमानसे तो कोई-न-कोई बिम्ब मानना ही होगा; क्योंकि लोकमें बिना बिम्बका कोई प्रतिबिम्ब देखनेमें नहीं आता। किंतु अनुमान भी तो एक ज्ञान ही है; अतः यह भी ज्ञानस्वरूप ब्रह्मसे बाहर नहीं हो सकता, फिर उसमें ज्ञेय पदार्थ तो ब्रह्मके बाहर हो ही कैसे सकता है ? अतः ब्रह्ममें जो प्रतिबिम्ब है, वह बिम्बरहित है। यह इस दर्पणकी विलक्षणता है। यही इसकी अनिर्वचनीया शक्तिरूपा माया है। यही माया सबको मोहित किये हुए है। किंतु यह इसका स्वभाव अवश्य है कि यदि तुम इसमें प्रतिबिम्बित प्रपंचको देखना छोड़ दो तो तुम्हें शुद्ध ब्रह्मका साक्षात्कार हो जायगा और साक्षात्कार होते ही माया और उसका प्रपंच सदाके लिये मिट जायगा। इसीसे भगवान् बुद्धियोंसे कहते हैं—'मा यात गोष्ठम्' —तुम विषयोंकी ओर मत जाओ; बल्कि इन इन्द्रियोंके विषयरूप हाऊकी निवृत्तिके लिये तुम केवल शुद्ध परब्रह्मको ही देखो। तुम भास्यवर्गको मत देखो, केवल भानको ही देखो। ऐसा करनेके लिये भगवान् क्यों कहते हैं ? क्योंकि 'क्रन्दन्ति वत्सा बालाश्च' —ये इन्द्रियाँ रो रही हैं। अतः न तो तुम्हीं प्रपंचको देखो और न इन्हींको दिखाओ अन्यथा इनकी मृत्यु हो जायगी। देखो—जिस समय तुम इस प्रपंचको देखती हो, उस समय तुम्हारे ये बालक भी उसे ही देखने लगते हैं। अतः तुम उसे मत देखो और 'तान् मा पाययत मा दुह्यत च' अर्थात् इन इन्द्रियोंको विषय-सेवन मत कराओ और न इनके सामने विषयोंको ही आने दो; क्योंकि इन्हें विषयरूप पयःपान कराना तो विष ही पिलाना है। इन्हें वह प्रिय अवश्य है, परंतु उसके सेवनसे इनका अनिष्ट ही होगा। रोगी बालक कुपथ्य करना चाहा ही करता है, परंतु माता उसे करने थोड़े ही देती है। उनके सेवनसे इन्हें शान्ति या तृप्ति भी नहीं हो सकती। विषय-सेवनसे तो इनकी विषयाभिलाषा और भी बढ़ जायगी— 'भोगमनुविवर्धत इन्द्रियाणां कौशलम्।' अतः इनके हितके लिये इन्हें विषय-सेवन मत करने दो। विषय-सेवन न करनेसे इन्द्रियोंकी भोग- वासना निर्बल पड़ जायगी। यह ठीक है कि इन्द्रियोंके निग्रहसे उनकी बाह्य प्रवृत्ति मन्द पड़ जाती है तथापि उनकी आन्तरिक शक्ति बढ़ जाती है। एक व्यक्ति कुछ काल मौन रहता है। इससे वागिन्द्रिय अवश्य मन्द पड़ जाती है। वह अधिक बोल नहीं सकता। परंतु वह जो कुछ कहता है, वही हो जाता है। यदि वह वटवृक्षको नीमका वृक्ष बतला दे तो उसे निम्बवृक्ष हो जाना पड़ता है। योगदर्शनमें मौनसे वाक्सिद्धि मानी गयी है। इसी प्रकार जो बालब्रह्मचारी है, वह एकाएक कामाहत नहीं होता। अत्यन्त रूपवती स्त्रियोंको देखकर भी उसका चित्त विचलित नहीं होता। एक बार महर्षि नारद तप कर रहे थे। उन्हें तपोभ्रष्ट करनेके लिये इन्द्रने कुछ अप्सराएँ भेजीं, परंतु उनके सारे हाव- भाव कटाक्ष उन्हें विचलित करनेमें समर्थ न हो सके। करते कैसे! इस समय श्रीनारदजीकी मनोवृत्ति तो एकमात्र भगवत्तत्त्वमें ही स्थित थी, उसे तो उनका भान भी नहीं हुआ। इस समय भगवान्‌की उनपर पूर्ण कृपा थी। भला जिनके ऊपर भगवान्‌की कृपा है, उनका कोई क्या बिगाड़ सकता है ? सीम कि चाँपि सकइ कोउ तासू। बड़ रखवार रमापति जासू॥ (रा०च०मा० १।१२६।८) भगवान् कृष्णने भी उद्धवको यही उपदेश किया है कि हे उद्धव! ये इन्द्रियाँ मनुष्यको ठगनेवाली हैं। ये उसे असदभिनिवेशमें ग्रस्त कर देती हैं; अतः तुम इनसे विषयसेवन मत करो। तस्मादुद्धव मा भुङ्क्ष्व विषयानसदिन्द्रियैः। आत्माग्रहणनिर्भातं पश्य वैकल्पिकं भ्रमम्॥ (श्रीमद्भा० ११।२२।५६) भगवान् शंकराचार्यजीने भी यही कहा है कि शम, दम, उपरति, तितिक्षा आदि साधनोंसे सम्पन्न होकर ही ब्रह्मविचार करना चाहिये। यदि इन्द्रियोंको

३१८ भक्तिसुधा स्वाधीन न किया जायगा तो वेदान्त-चर्चा केवल तोतेकी कहानी ही होगी।* उससे तुम्हारा कल्याण नहीं हो सकता। अतः यदि तुम वास्तवमें अपना कल्याण चाहते हो तो विषयोंको त्यागो। रसनाको रसास्वादनसे रोको, श्रोत्रोंसे शब्द-ग्रहण मत करो और घ्राणेन्द्रियसे गन्ध मत सूँघो। सारी इन्द्रियोंका निरोध कर दो। मुक्तिमिच्छसि चेत्तात विषयान् विषवत्त्यज। क्षमार्जवदयातोषसत्यं पीयूषवद्भज॥ आत्मलाभका यही उपाय है। इसीसे भगवान्ने कहा है— यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञान आत्मनि। ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्यच्छेच्छान्त आत्मनि॥ (कठ०१।३।१३) पहले अपनी इन्द्रियोंकी प्रवृत्तिको शास्त्रीय करो। इससे उनकी उच्छृंखलता शान्त हो जायगी। फिर धीरे- धीरे अभ्यासद्वारा उनसे विषय ग्रहण करना छोड़ दो। श्रीमधुसूदन सरस्वतीने अपनी गीताकी टीकामें कहा है—यदि घरमें चोर घुस रहे हों तो सबसे पहले दरवाजा बन्द कर लेना चाहिये; पीछे कोई और उपाय करो। इसी प्रकार विषयोंपर विजय प्राप्त करनेके लिये पहले इन्द्रियोंको उनके विषयोंसे निवृत्त करो। यदि अन्तःकरणमें भोगवासना बनी हुई हो तो भी इन्द्रियोंसे अन्य विषयोंको तो ग्रहण मत करो। अब जो विषयरूप चोर तुम्हारे अन्तःकरणरूप घरमें घुस आये हैं, उनकी परब्रह्मरूप राजाके यहाँ रिपोर्ट करो, वह अवश्य इनका प्रबन्ध कर देंगे। श्रीगोसाईंजी महाराज कहते हैं— मम हृदय भवन प्रभु तोरा। तहँ बसे आइ बहु चोरा॥ अति कठिन करहिं बरजोरा। मानहिं नहिं बिनय निहोरा॥ × × × कह तुलसिदास सुनु रामा। लूटहिं तसकर तव धामा॥ चिंता यह मोहिं अपारा। अपजस नहिं होइ तुम्हारा॥ (वि०प० १२५) अतः भगवन्, आप उन्हें निकालिये, नहीं तो आपका अपयश अवश्य होगा; क्योंकि— ममता तरुन तमी अँधिआरी। राग द्वेष उलूक सुखकारी॥ तब लगि बसति जीव मन माहीं। जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं॥ (रा०च०मा० ५।४७।३-४) वास्तवमें जिस राजाके राज्यमें चोर प्रजाका धन अपहरण करते हैं, उस राजाके लिये वह कलंक ही है; क्योंकि प्रजा तो राजाका सर्वस्व है। 'प्रजायन्त इति प्रजाः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार 'प्रजा' शब्दका अर्थ ही पुत्र है। अतः राजाका यह परम कर्तव्य है कि वह प्रजाके हितकी रक्षा करे। प्रभुको एकमात्र आश्रय बना लेनेपर सारे विकार निवृत्त हो जाते हैं इस प्रकार जिस समय यह जीव प्रभुको ही अपना एकमात्र आश्रय बना लेता है, उस समय उसके सारे विकार निवृत्त हो जाते हैं। जब वह स्वयंप्रकाश श्रीहरिके सम्मुख होता है, तब उसके हृदय-भवनका कल्मषरूप अन्धकार तत्काल निवृत्त हो जाता है। अतः भगवान्‌का भी बुद्धियोंके प्रति यही कथन है कि तुम इन इन्द्रियवृत्तियोंको पयःपान मत कराओ। यह बात ठीक है कि इन्द्रियोंके व्यापारका सर्वथा निरोध नहीं किया जा सकता। शरीर-रक्षाके लिये भोजनादि भी करना ही होगा। अतः आवश्यकता इसी बातकी है कि अपनी प्रवृत्तियोंको शास्त्रीय करो। नित्य-नैमित्तिक कर्मोंका अनुष्ठान करो। उन्हीं विषयोंको ग्रहण करो, जिनके बिना तुम्हारा निर्वाह न हो सके। * एक बार एक व्यक्तिको यह देखकर बड़ी करुणा हुई कि बेचारे निरीह तोते व्यर्थ मनुष्योंके चंगुलमें फँसते हैं। इसलिये उसने सोचा कि इन्हें कोई ऐसा पाठ पढ़ा दिया जाय जिससे ये उसमें न फँसें। उसने एक तोतेको यह बात सिखला दी—'तोते! सावधान रहना। नलीके ऊपर मत बैठना और अगर बैठ जाओ तो उसे छोड़ देना। उसे तुम्हींने पकड़ रखा है, उसने तुम्हें नहीं पकड़ा।' उस तोतेसे सुनकर यह पाठ उस प्रान्तके सब तोतोंनें सीख लिया। सब इसी प्रकार कहने लगे। परंतु उस व्यक्तिने देखा कि एक तोता नलीमें फँसा हुआ है और मुँहसे यही बात कह रहा है। यही दशा साधनहीन वेदान्तियोंकी होती है। वे मुखसे तो अपनेको शुद्ध-बुद्ध-मुक्त कहते रहते हैं; किंतु वस्तुतः रहते विषयोंमें आसक्त ही हैं। इस प्रकारके ज्ञानसे कोई लाभ नहीं हो सकता।

भगवान्‌के दिये हुए देह और इन्द्रियोंका सदुपयोग करो। भगवान्‌ने अपनी प्राप्तिके लिये ही ये देह और इन्द्रियाँ आदि दी हैं। अतः इनसे वही कार्य करो, जो भगवत्प्राप्तिमें सहायक हैं। इनकी सात्त्विकी प्रवृत्तिको प्रबल करो, राजसको निर्बल कर दो और तामस प्रवृत्ति बिलकुल मत होने दो। देखो, जिस समय हनुमान्‌जी लंकाको गये थे, उस समय पहले उन्हें सुरसा मिली। उसे उन्होंने अपने पुरुषार्थसे प्रसन्नकर उसका आशीर्वाद प्राप्त किया। वह देवमाता थी, अतः सात्त्विकी प्रवृत्तिरूपा होनेके कारण उसे अपने अनुकूल कर लेना ही उचित था। उसके पश्चात् छायाग्राहिणी सिंहिका राक्षसी मिली, जो समुद्रमें ऊपर उड़नेवाले प्राणियोंकी छाया पकड़कर उन्हें गिरा लेती और फिर खा जाती थी। वह तामस प्रवृत्ति की थी। उसे उन्होंने मार डाला। फिर लंकामें पहुँचनेपर उन्हें लंकिनी मिली। उसने भी उनका मार्ग रोका; किंतु उसे उन्होंने एक मुक्केसे ही ठीक कर लिया। वह राजस प्रवृत्ति थी; उसे दमनसे शिथिल कर देना ही ठीक था। इसी प्रकार हमें सात्त्विक प्रवृत्तिको बढ़ाना चाहिये, राजस प्रवृत्तिको शिथिल कर देना चाहिये और तामसका सर्वथा नाश कर देना चाहिये। वे तो पापरूपा हैं। अतः जो कर्म शास्त्रविहित हैं, उनका तो यथाशक्ति पालन करो। 'यथाशक्ति' शब्दका प्रयोग विहित कर्मोंके लिये ही हो सकता है, पापकर्मोंमें 'यथाशक्ति' शब्दकी प्रवृत्ति नहीं हो सकती। विहित कर्मोंमें भी जिनके न करनेसे प्रत्यवाय होता है, वे तो अवश्य करने चाहिये। अग्निष्टोमादि याग अत्यधिक अर्थसाध्य हैं; प्रत्येक व्यक्ति उनका अनुष्ठान करनेमें समर्थ नहीं है। इसलिये 'यथाशक्ति' शब्दका प्रयोग उन्हींके लिये किया गया है। सन्ध्या, अग्निहोत्र एवं बलिवैश्वदेव आदि कर्मोंको, जिनमें न तो विशेष परिश्रम है और न व्यय ही, अवश्य करना ही चाहिये। आजकल एक परिष्कृत सनातनधर्मका आविर्भाव हुआ है। उसके अनुयायी शास्त्रके किसी अंशको तो प्रामाणिक मानते हैं और किसीकी उपेक्षा कर देते हैं। परंतु इसे शास्त्रका प्रामाण्य स्वीकार करना नहीं कहा जा सकता। इसे तो स्वेच्छाचार ही कहा जायगा। तुम कहते हो गीता हमारा सर्वस्व है, किंतु गीता तो कहती है— यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः। न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥ (गीता १६।२३) अब देखना यह है कि शास्त्र क्या कहता है? तुम शूद्रोंको शास्त्राध्ययन कराना चाहते हो, परंतु शास्त्र तो इसकी आज्ञा नहीं देता। यही नहीं, वर्णाश्रम-धर्मका भी लोप करना चाहते हो। शूद्र और वैश्य ब्राह्मणोंका कर्म कर रहे हैं और ब्राह्मण वैश्य तथा शूद्रोंका। परंतु शास्त्र तो कहता है— 'स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥' (गीता ३।३५) अपने वर्णधर्ममें तुम्हारी प्रवृत्ति नहीं होती, उसमें तुम्हें दोष दिखायी देता है। यह तुम्हारा व्यामोह ही है। अर्जुनको भी ऐसा ही व्यामोह हुआ था। इसीसे वह युद्धमें दोषदृष्टिकर भिक्षा माँगनेके लिये तैयार हो गया था। परंतु बाह्य दृष्टिसे ऐसा दोष किस कर्ममें नहीं रहता— 'सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः॥' (गीता १८।४८) भाई, समाजका कोई भी अंग व्यर्थ नहीं है। जैसे सिर आवश्यक है, वैसे ही चरण भी है। शरीरके किसी भी अंगमें पीड़ा हो, उसके कारण सारा शरीर ही अस्वस्थ रहा करता है। अतः हम किसी भी वर्णको नगण्य और हेय नहीं समझते। हमारे विचारसे तो सभीको परधर्मकी ओर प्रवृत्त न होकर अपने ही वर्णके लिये विहित कर्मोंका यथाशक्ति अनुष्ठान करना चाहिये। इस प्रकार स्वधर्मानुष्ठान करते हुए नित्यप्रति कुछ कालके लिये अपनी इन्द्रियोंकी वृत्तियोंका

३२० भक्तिसुधा सर्वथा निरोध करनेका भी प्रयत्न करो। ऐसा करते- करते परब्रह्मका साक्षात्कार होनेपर ही इन इन्द्रियोंका क्रन्दन बन्द होगा। इन्द्रियोंको तुष्ट करनेकी चेष्टासे तृष्णा और भी अधिक बढ़ती है इसके विपरीत यदि इन इन्द्रियरूप वत्स और बालकोंको विषयरूप पयःपान कराया जायगा तो ये और भी अधिक क्रन्दन करेंगे। तुम इन्हें जितना ही तृप्त करनेका प्रयत्न करोगे, ये उतने ही अधिक अतृप्त होते जायँगे। अतः इन्हें तृप्त करनेका प्रयत्न छोड़कर तुम अपने एकमात्र परम पति शुद्ध-बुद्ध- मुक्तस्वरूप परब्रह्मकी ही ओर देखो। इसमें कोई आयास भी नहीं है; विषयदर्शनमें तो आयास भी अधिक है और परिणाममें दुःख भी है। परंतु ब्रह्मदर्शनमें तो कोई परिश्रम भी नहीं करना पड़ता और उसका परिणाम भी परम सुखमय है। परब्रह्म तो स्वयंप्रकाश है, उसे प्रकाशित करनेके लिये कोई व्यापार नहीं करना पड़ता; बल्कि उसके लिये तो व्यापारका त्याग ही कर्तव्य है। परंतु विचित्रता तो यही है कि हमसे व्यापार ही नहीं छोड़ा जाता। यदि मन, बुद्धि और इन्द्रियोंका व्यापार छूट जाय तो परब्रह्मकी उपलब्धि तत्काल हो सकती है। यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह। बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहुः परमां गतिम्॥ (कठ० २।३।१०) इसीसे भगवान् कहते हैं—'गोष्ठं मा यात'— जहाँ पशुप्राय जीव रहते हैं, उस प्रपंचकी ओर मत जाओ। ऐसा करनेसे ही उनका क्रन्दन शान्त होगा। यदि प्रतिबिम्बपर दृष्टि न ले जाकर केवल दर्पणपर ही दृष्टि जाय तो प्रतिबिम्बकी प्रतीति नहीं होगी। इसी प्रकार यदि तुम अपनी वृत्तिको अन्तर्मुख करके विषयोंतक नहीं ले जाओगी तो तुम्हें विषम विषाक्त संसारकी प्रतीति नहीं होगी। यदि कहो कि ये इन्द्रियाँ हमारे बालक हैं, हमें इनपर दया करनी ही चाहिये। इन्हें विषय प्रिय हैं, इसलिये हमें इन्हें अभिलषित विषय प्राप्त कराने ही चाहिये—तो इसपर भगवान् कहते हैं—'तान् मा दुह्यत'—तुम इनके लिये अभिलषित पदार्थ प्रस्तुत मत करो। इन्हें विषयप्राप्ति नहीं होगी तो ये स्वयं ही क्रमशः शान्त हो जायँगी। इन्हें विषय देना तो मानो विष देना है। यही बात प्रेमियोंकी आचार्यभूता व्रजांगनाओंसे भगवान् कहते हैं कि तुम व्रजमें मत जाओ। मैं ही निखिल ब्रह्माण्डका परमपति हूँ। अतः तुम मेरी ही सेवा करो। इस समय यदि तुम्हारे बाल- बच्चे क्रन्दन भी करते हों तो भी उन्हें तुम पयःपान मत कराओ और न बछड़ोंके लिये दोहन ही करो; क्योंकि वे तुम्हारे परमधर्मके विरोधी हैं। यदि भगवत्प्रेममें दया आदि धर्म विरोधी होते हों तो उनका त्याग ही करना चाहिये। भगवान्‌की यह विचित्र वाचोभंगी सुनकर कुछ व्रजांगनाओंकी तो अभिरुचि सुस्थिर हुई और कुछको व्यामोह हुआ। भगवान्‌का यह वाग्विन्यास बड़ा ही विचित्र था। इससे भिन्न-भिन्न निष्ठावाले भिन्न- भिन्न अर्थ निकाल सकते थे। कर्मियोंके लिये इसमें कर्मानुष्ठानका आदेश था, जिज्ञासुओंके लिये कर्म-संन्यासकी विधि थी, उपासकोंके लिये कर्म- समुच्चयका विधान था, गोपियोंके लिये गोष्ठको लौट जानेका आदेश था और प्रकारान्तरसे न लौटनेके लिये भी अनुमति थी। वस्तुतः रासपंचाध्यायीरूप यह अमृतसिन्धु ऐसा गम्भीर है कि हम इसके एक बिन्दु का मर्म भी यथावत् नहीं समझ सकते। वेद भगवान्‌की सुषुप्तिके समय उनके अज्ञात रूपसे प्रकट हुए श्वासोच्छ्वास हैं— 'अस्य महतो भूतस्य निश्वसितमेतद्यदृग्वेदः' (बृहदारण्यक० २।४।१०) किंतु उनका मर्म आकलन करनेमें भी बड़े-बड़े मनीषिजन घबराते हैं, फिर जिन वाक्योंका उच्चारण प्रभुने स्वयं लीला-विग्रह धारण करके किया, उनके

श्रीरामलीलारहस्य ३२१ भावगाम्भीर्यका तो कहना ही क्या है; उसके तो जितने अर्थ किये जायँ, थोड़े ही हैं। अब हम इस श्लोकका उपसंहारकर आगेके श्लोकपर विचार करते हैं। भगवान्ने कहा था कि हे व्रजांगनाओ! तुम जाओ। इसपर व्रजांगनाएँ सोचती हैं—ऐसी जल्दी क्या है, वनकी शोभा देखकर चली जायँगी। किंतु भगवान् कह रहे हैं—'मा चिरम्'—देरी मत करो; क्योंकि यह रात्रिकाल पतिशुश्रूषारूप परमधर्मका उपयुक्त समय है और धर्मानुष्ठानमें विलम्ब होना उचित नहीं है। इसलिये तुम जाओ और पतियोंकी तथा उनकी माता आदि सतियोंकी शुश्रूषा करो। इस प्रकार भगवान्के निराकरण करनेपर व्रजांगनाएँ बहुत खिन्न हुईं। वे सन्तप्त होकर दीर्घ निःश्वास छोड़ती हुई कुछ सोच रही हैं—यह देखकर भगवान् कहते हैं— अथवा मदभिस्नेहाद् भवत्यो यन्त्रिताशयाः। आगता ह्युपपन्नं वः प्रीयन्ते मयि जन्तवः ॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।२३) भगवान्की यह रीति है कि वे सीधे-सीधे किसीको उत्तर नहीं देते; न तो सहसा स्वीकार ही करते हैं और न अस्वीकार ही। संसारमें दो प्रकारके लोग ही सुखी होते हैं; या तो परम बोधवान् और या अत्यन्त मूढ़— यश्च मूढतमो लोके यश्च बुद्धेः परं गतः। तावुभौ सुखमेधेते क्लिश्यत्यन्तरितो जनः ॥ (श्रीमद्भा० ३।७।१७) इसलिये भगवन्मार्गमें लगे हुए प्राणी प्रायः व्याकुल ही दिखायी दिया करते हैं। वस्तुतः इस व्याकुलताकी आवश्यकता भी है। जिस समय भगवान्के सम्मिलनकी अभिलाषा क्षुधा-पिपासाके समान अत्यन्त बढ़ जाय, तभी प्राणीको समझना चाहिये कि हम ठीक मार्गपर चल रहे हैं, परंतु यह प्राणी दीर्घकालसे भगवान्से बिछुड़ा हुआ है। इसलिये इसे भगवत्- सम्मिलनकी उत्कट इच्छा होना अत्यन्त दुर्लभ है। जैसे अजीर्णके रोगीको भूख लगना अत्यन्त आनन्दका हेतु होता है, उसी प्रकार प्रपंचासक्त जीवको भगवत्प्राप्तिकी तृष्णा अत्यन्त सौभाग्यका फल है। इसीसे भगवान् शंकराचार्यने भगवत्प्राप्तिके साधनोंमें सबसे अन्तिम साधन मुमुक्षा बतलाया है। इस मुमुक्षाके पश्चात् ही जिज्ञासा होती है। यदि भगवान्के ज्ञानकी उत्कट इच्छा हो जाय तो फिर उनके मिलनेमें कुछ भी देरी न हो। सारे साधन इस जिज्ञासाके लिये ही हैं। भगवान्को जाननेकी यह उत्कट इच्छा भगवत्कृपासे ही होती है। यदि यह हमारे हाथकी चीज होती तो इस प्रकार प्रार्थना क्यों की जाती— 'माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोत्, अनिराकरणमस्तु'। (केनोपनिषद् शान्तिपाठ) यदि हम भगवान्का निराकरण न करनेमें समर्थ होते तो इसके लिये प्रार्थना क्यों की जाती ? परंतु नहीं, हम सब कुछ जानते हुए भी अनादिमायासे मोहित होकर उनका निराकरण करते हैं। हम जान-बूझकर भी अनन्तानर्थके निदानभूत संसारमें गिरते हैं। परंतु किया क्या जाय— 'केनापि देवेन हृदि स्थितेन यथा नियुक्तोऽस्मि तथा करोमि।' इसीसे महानुभाव लोग नास्तिकोंकी भी निन्दा नहीं करते; क्योंकि वे जानते हैं कि यह बात उनके वशकी नहीं है। एक व्यक्ति अपने कल्याणकी कामनासे संसारसे विरक्त होता है, परंतु पीछे मायासे मोहित होकर वह पतित हो जाता है। इसमें उसका क्या दोष है; वह तो अपना कल्याण ही चाहता है। न्यायकुसुमांजलिकार श्रीउदयनाचार्यजी नास्तिकोंके लिये कल्याण-कामना करते हुए भगवान्से प्रार्थना करते हैं— इत्येवं श्रुतिनीतिसम्प्लवजलैर्भूयोभिराक्षालिते येषां नास्पदमदधासि हृदये ते शैलसाराशयाः। किंतु प्रस्तुतविप्रतीपविधयोऽप्युच्चैर्भवच्चिन्तकाः काले कारुणिक त्वयैव कृपया ते भावनीया नराः ॥ (पञ्चमस्तबक १८)