भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
श्रीरासलीलारहस्य ३०९
इसलिए कर्मानुष्ठानसे इन्द्रियोंकी प्रवृत्ति सर्वथा सुसंयत हो जाती है। इन्द्रियोंके संयत होनेपर उपासनामें प्रवृत्त होना सम्भव है। इसीसे उपासकको कर्ममें भी प्रवृत्त करनेके लिये यह श्रुति केवल उपासनामें भय प्रदर्शित करती है। कर्मकाण्डीको जो 'अन्धं तमः' की प्राप्ति बतलायी, वह इसलिये है कि उसे केवल कर्ममें ही न रह जाना चाहिये। यदि वह कर्मजड़ हो गया तो उपासनासाध्य उत्कृष्ट फलसे वंचित रह जायगा; अतः कर्मके साथ-साथ उसे उपासनाका भी अनुष्ठान करना चाहिये। फिर जिस समय कर्म और उपासनासे ऊपर उठे हुए जिज्ञासुको श्रुति तत्त्वज्ञानका उपदेश करती है, उस समय कर्मादिसे उसकी प्रवृत्ति हटानेके लिये वह कर्मकी निन्दा करती है। उस समय वह कहती है—'प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञरूपा' (मुण्डक० १।२।७) परंतु कर्मकाण्डका प्रतिपादन करते समय वह ऐसा कभी नहीं कह सकती। अतः भगवान् कहते हैं—'हे श्रुतियो! यदि तुम मुझमें अपना तात्पर्य निश्चय करोगी और इससे अज्ञानी लोग क्रन्दन करेंगे तो इसमें तुम्हारा दोष नहीं होगा। इसके लिये तो वे ही उत्तरदायी होंगे। उन्हें चाहिये कि वे किसी विज्ञकी शरणमें जाकर श्रुत्यर्थका अनुशीलन करें।' वस्तुतः यह पद्धति है कि जो जिस निष्ठावाला हो, उसे उसी निष्ठावालोंका संग करना चाहिये। कर्मी कर्मीका, भक्त भक्तका और ज्ञानी ज्ञानियोंका संग करें। शास्त्रका तात्पर्य समझनेके लिये भी शास्त्रज्ञ गुरुकी शरणमें ही जाना चाहिये, शास्त्रका मर्म विज्ञ पुरुष ही खोल सकते हैं। अतः भगवान् कहते हैं—'तान् पाययत दुह्यत च न'—तुम उन्हें पयपान मत कराओ और उनके लिये कर्मफल दुहनेकी चेष्टा भी मत करो। तुम तो मेरा ही प्रतिपादन करो; क्योंकि महातात्पर्यका प्रतिपादन होनेपर अवान्तर तात्पर्य तो उसीमें आ जाते हैं। यह नियम है कि किसी उत्कृष्ट धर्मका निर्वाह करनेमें निकृष्ट धर्मका अपवाद भी हो जाय तो कोई दोष नहीं होता। अतः 'पतीन् शुश्रूषध्वम्'—अपने परमतात्पर्य परब्रह्मका ही प्रतिपादन करो। एक पतिव्रता अपने पतिदेवकी चरणसेवा कर रही थी। पतिदेव सोये हुए थे। इसी समय उसका पुत्र अग्निकी ओर जाने लगा। उसके चित्तमें उसे उधर जानेसे रोकनेका विचार हुआ, परंतु ऐसा करनेके लिये उसे पतिसेवा छोड़नी पड़ती। इसलिये उसने पतिसेवाको ही अपना परम कर्तव्य समझकर बच्चेको बचानेका कोई प्रयत्न नहीं किया। इस उत्कृष्ट धर्मके प्रतापसे अग्निदेव शीतल हो गये और बालकका बाल भी बाँका नहीं हुआ। इसीसे भगवान् कहते हैं— हे श्रुतियो! जबतक तुम अपने परमतात्पर्यका विषय शुद्ध बुद्ध मुक्त परब्रह्मका प्रतिपादन करनेमें प्रवृत्त नहीं हुई थीं, तबतक तो कर्म और उपासनाका पोषण करके उन अज्ञ जनोंको पयपान करा सकती थीं, परंतु अब, जबकि तुम इस ओर आयी हो, तुम उनके लिये कर्मफलरूप दुग्धका दोहन करनेकी चेष्टा मत करो। इधर बुद्धियोंकी दृष्टिसे देखें तो उन्हें भगवान् यही उपदेश देते हैं कि 'मा यात गोष्ठम्'—घट- पटादि अनात्म विषयोंकी ओर मत जाओ; बल्कि 'शुश्रूषध्वं पतीन्' अपने अवभासक और अधिष्ठानभूत परब्रह्मकी ओर देखो। इस प्रसंगमें 'क्रन्दन्ति वत्सा बालाश्च' (श्रीमद्भा० १०।२९।२२)—इसका यह तात्पर्य है कि जबतक परब्रह्मकी अनुभूति नहीं होती, तबतक अन्तःकरण और इन्द्रियाँ घबराये रहते हैं। उनकी जो बाह्य-प्रवृत्ति है, वह उनके दुःखका ही कारण है। श्रुति कहती है— 'पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भूः' (कठ० २।१।१) यहाँ 'व्यतृणत्' शब्दपर विशेष रूपसे विचार करना है। भगवान् भाष्यकारने 'व्यतृणत्' का पर्याय 'हिंसितवान्' लिखा है अर्थात् स्वयम्भू परमात्माने इन्द्रियोंको बहिर्मुख करके हिंसित कर दिया है। बहिर्मुख होनेमें इन्द्रियोंकी हिंसा कैसे मानी गयी? इसमें यही कहना है कि अपने प्रियतमसे विमुख कर
देना हिंसा ही तो है। इन्द्रियाँ अपने परम प्रेमास्पद सर्वान्तरतम परमात्माका अनुभव नहीं कर रहीं, बल्कि नाम-रूपात्मक संसारमें ही भटक रही हैं, यही उनका वध है। अतः जबतक हमारी समस्त इन्द्रियोंकी प्रवृत्ति परब्रह्म परमात्माकी ओर नहीं होती, तबतक वे अत्यन्त व्यग्र रहती हैं। यही उनका क्रन्दन है— मन करि बिषय अनल बन जरई। होइ सुखी जौं एहिं सर परई॥ (रा०च०मा० १।३५।८) प्रायः यह देखा जाता है कि विविधविध भोग- सामग्रीसे सम्पन्न महानुभाव भी अशान्तिके चंगुलमें फँसे रहते हैं। उनकी भोगतृष्णाको जैसे-जैसे भोजन मिलता जाता है, वैसे-वैसे ही वह और भी अधिक उत्तेजित होती जाती है। जिस प्रकार विषम विषाक्त अग्निके कटाहमें पड़ा हुआ कीट तड़पता है, उसी प्रकार सांसारिक भोगोंमें फँसे हुए जीव निरन्तर बेचैन रहते हैं। परंतु किया क्या जाय, यह उनका स्वभाव ही है; जैसे शूकरको विष्ठासे ही प्रेम होता है, उसी प्रकार इन इन्द्रियोंकी प्रीति विषयोंमें ही होती है। उस अपनी वासनाके कारण जीव दुःखमें ही सुखका अनुभव कर रहे हैं। जिस प्रकार दाद खुजलानेमें सुख मालूम होता है। उसी प्रकार विषयोंमें सुख जान पड़ता है। इस व्यामोहसे निकलो और परब्रह्म परमात्माकी ओर बढ़ो। जिस समय तुम्हारी प्रवृत्ति नामरूपोपाधिनिर्मुक्त परब्रह्ममें ही होगी, उसी समय तुम्हें शान्ति प्राप्त होगी। फिर तो 'यत्र यत्र मनो याति तत्र तत्र परं पदम्' (पैङ्गलोपनिषद् ४। २१) इस उक्तिके अनुसार सर्वत्र सुखका ही भान होगा। 'आनन्दाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते।' (तैत्तिरीय० ३।६) इस श्रुतिके अनुसार यह नामरूपात्मक जगत् आनन्दात्मक परब्रह्मसे ही उत्पन्न हुआ है। इसलिये यह आनन्दमय ही है। जिस प्रकार स्वाभाविक सौगन्ध्योपहित चन्दनमें मृत्तिका एवं जलादिके योगसे अस्वाभाविक दुर्गन्धकी प्रतीति होती है अथवा पित्त बिगड़ जानेके कारण मिश्री कड़वी जान पड़ती है, उसी प्रकार अचिन्त्यानन्त सौख्यसुधासिन्धु ब्रह्ममें अज्ञानजनित उपाधिके कारण इस दुःखमय प्रपंचकी प्रतीति होती है। अधिष्ठान ब्रह्मका ज्ञान होनेपर उसकी निवृत्ति हो जाती है। अतः 'तान् पाययत दुह्यत' इन इन्द्रियोंको पान कराओ और दुहो। क्या पान कराओ? परब्रह्मामृत; क्योंकि जब बुद्धि ब्रह्माकार रहने लगेगी तो विषय दुःखमय नहीं रहेंगे, वे भी ब्रह्ममय हो जायँगे। अतः इन्द्रियोंको उस परमानन्दसुधासिन्धुमें निमज्जित करनेके लिये दृश्यमात्रको परब्रह्म-रूपमें देखो। ऊपर जो पतिव्रताकी गाथा कही है, उसमें यदि वह पतिव्रता लौकिक साधनोंसे अपने बालकको बचानेका प्रयत्न करती तो वह सदाके लिये उसकी रक्षा नहीं कर सकती थी। उसे सदाके लिये तो वह तभी सुरक्षित कर सकती थी, जब कि अग्नि शीतल हो जाय। इसके लिये तो पतिशुश्रूषण ही एकमात्र साधन था। उस परमधर्मका दृढ़तापूर्वक पालन करके ही उसने अग्निका स्वभाव बदल दिया। सांख्य, नैयायिक और वैशेषिक आदि मतावलम्बियोंकी विवेकवती बुद्धि अपने मन, बुद्धि, इन्द्रिय और इन्द्रियवृत्तिरूप बालकोंको सर्वथा सुरक्षित नहीं करती। वह अपने बालकोंको अग्निसे बचा तो लेती है, परंतु अग्निके भयका सर्वथा नाश नहीं करती; क्योंकि प्रपंचका अत्यन्ताभाव तो उस मतमें है नहीं। यह काम तो अद्वैतनिष्ठ बुद्धि ही करती है। ऐसा कहकर हम अद्वैतवादका पक्ष नहीं करते; हमारा तो केवल यही मत है कि जिनके मतमें पूर्ण सच्चिदानन्दघन परब्रह्मसे भिन्न किसी दूसरी वस्तुकी सत्ता रहती है, उनके यहाँ तो दुःखका बीज रह ही जाता है। इसी दृष्टिसे बुद्धियोंके प्रति भगवान्का यही कथन है कि 'शुश्रूषध्वं पतीन्' तुम परब्रह्माकाराकारित वृत्तिमें परिणत होकर इन्हें ब्रह्मामृतका पान कराओ और इनकी तृष्णाको शान्त करो—इनका मनोरथ पूर्ण करो। वस्तुतः विषय-सेवनसे इन्हें सुख नहीं मिल सकता। भला मृगतृष्णाका जल पीनेसे किसीकी प्यास गयी है? उसमें जल है ही कहाँ? इसी प्रकार क्या
श्रीरासलीलारहस्य ३११ विषय-भोग-जन्य सुखोंसे इन्द्रिय और इन्द्रियवृत्तियोंको शान्ति मिल सकती है? नहीं, क्योंकि विषय और विषय-सुख तो हैं ही नहीं। अतः तुम सच्चिदानन्दघन परब्रह्मका ही अनुसन्धान करो। इससे यह नामरूपात्मक प्रपंच निवृत्त हो जायगा; फिर तो एकमात्र अचिन्त्यानन्दसौख्य-सुधा-सिन्धु परमात्मा ही रह जायगा और फिर ये उसीकी माधुरीका पान करेंगी। वस्तुतः इन्द्रियोंसे विषयोंका स्फुरण नहीं होता, बल्कि विषयावच्छिन्न चेतनका ही होता है। सबका अधिष्ठानभूत चेतन ही सत्य वस्तु है। उसके सिवा अन्य वस्तुकी सत्ता ही कहाँ है? यहाँ यह सन्देह हो सकता है कि ब्रह्म इन्द्रियोंका विषय कैसे होगा, वह तो अशब्द, अस्पर्श और मन एवं इन्द्रिय आदिका अविषय है। इसमें कहना यह है कि वस्तुतः ब्रह्म ही सारी इन्द्रियोंका विषय हो सकता है। प्रमाणका प्रामाण्य अज्ञात वस्तुका ज्ञान करानेमें ही है। अज्ञानकी दो शक्तियाँ हैं—आवरण और विक्षेप। इनमें आवरणके भी दो भेद हैं—असत्त्वापादक और अभानापादक। ये असत्त्वापादक और अभानापादक आवरक किसी स्वतः सत्ता और स्फूर्तिवाली वस्तुका ही आवरण करेंगे। ऐसी वस्तु ब्रह्म ही है। अतः वही अज्ञानका विषय हो सकता है। इसीसे संक्षेपशारीरककारका कथन है— आश्रयत्वविषयत्वभागिनी निर्भागचितिरेव केवला। पूर्वसिद्धतमसो हि पश्चिमो नाश्रयो भवति नापि गोचरः॥ मिथ्या वस्तुकी तो अज्ञात सत्ता-स्फूर्ति हुआ ही नहीं करती। इसलिये वह प्रमाणका विषय हो ही नहीं सकती। समस्त इन्द्रियोंका विषय एकमात्र परब्रह्म ही हो सकता है, अतः इन्हें उस ब्रह्मानन्द-सुधा-सिन्धुके अमृतका ही पान कराओ। विषयचिन्तनसे दुःखकी प्राप्ति मन एवं समस्त इन्द्रियाँ जबतक विषयचिन्तन करती रहेंगी, तबतक दुःख ही पायेंगी। इन्हें क्या करना चाहिये? केवल ब्रह्माभ्यास। ब्रह्माभ्यासका लक्षण इस प्रकार है— तच्चिन्तनं तत्कथनमन्योन्यं तत्प्रबोधनम्। एतदेकपरत्वं च ब्रह्माभ्यासं विदुर्बुधाः॥ यह बात निश्चित है कि हम जैसा चिन्तन करेंगे, वैसे ही बन जायँगे। इसीसे श्रुति कहती है— 'यत्क्रतुर्भवति तत् कर्म कुरुते यत् कर्म कुरुते तदभिसम्पद्यते॥' (बृहदारण्यक० ४।४।५) जिनके श्रोत्र भगवत्कथाश्रवणमें संलग्न हैं, जिनके चरण भगवद्धामोंकी यात्रा करते हैं, जिनके हाथ निरन्तर भगवत्सेवामें ही लगे रहते हैं, जिनकी घ्राणेन्द्रिय प्रभुके पादपद्मसे संलग्न तुलसिकाका ही आघ्राण करती है तथा जिनके अंग भगवद्भक्तोंके सहवासका अद्भुत आनन्द लूटते हैं, उनके लिये यह संसार संसार ही नहीं रहता। देखिये—नारद, शुकदेव, व्यास एवं वसिष्ठादिके लिये भी तो यही संसार है। वे बारम्बार देह धारण करके यहाँ आते हैं। उनके लिये यह आनन्दस्वरूप है और हमारे लिये यही विषम विषाक्त अग्निपूर्ण कटाह हो रहा है। जिनकी बुद्धिने श्रीकृष्णचन्द्ररूप परमपतिकी शुश्रूषा की है, उनके लिये यह भगवद्रूप हो गया है। इसीसे वे प्रभुके लीलाविग्रहका आस्वादन करनेके लिये सब कुछ जानकर भी थोड़ा-सा भेद स्वीकार करते हैं। शुद्ध परब्रह्म आनन्दरूप है, किंतु उसका सगुण रूप आनन्दकन्द है—वह आनन्दका ही घनीभूत रूप है। जिस प्रकार इक्षुरस मिष्ट है, किंतु शर्करा और मिश्रीमें जो माधुरी है, वह कुछ और ही है, इसी प्रकार भगवान्के दिव्यमंगल विग्रहका सुख विचित्र ही है। उनके कर, चरण, नख, अधर, भूषण, आयुध सभी परम दिव्य हैं; उनके एक-एक अवयवपर कोटि- कोटि कामदेव निछावर किये जा सकते हैं। उनकी उस परमानन्दमयी मूर्तिका सुखास्वादन करनेके लिये ही वे नित्यमुक्त महर्षिगण इस लोकमें अवतरित होते हैं और स्वरूपतः सर्वथा अभिन्न होनेपर भी प्रभुका
३१२ भक्तिसुधा
आनन्द भोगनेके लिये भेद स्वीकार करते हैं; क्योंकि बिना भेदके भोग नहीं हो सकता। यही भगवल्लीलाका निगूढ़ रहस्य है। ऊपर कहा जा चुका है कि बुद्धियोंके प्रति भगवान्का कथन है कि तुम संसारकी ओर मत जाओ, अपने परमपति परमात्माका ही अनुसन्धान करो। यहाँ 'क्रन्दन्ति वत्सा बालाश्च' का तात्पर्य यह है कि जबतक तुमलोग परब्रह्म परमात्माका अनुसन्धान न करोगी, तबतक इन्द्रिय और इन्द्रियवृत्तिरूप बालक तथा बछड़े क्रन्दन करते रहेंगे; क्योंकि ब्रह्मानुसन्धान न करनेपर तो प्रपंचकी प्रतीति बनी ही रहेगी। वस्तुतः इस संसारकी सत्ता मनकी चंचलता रहनेतक ही है, उस चंचलताका निरोध होनेपर फिर प्रपंचकी प्रतीति नहीं होती। 'मनसो ह्युन्मनीभावे द्वैतं नैवोपलभ्यते॥' (पैङ्गोपनिषद् ४।२०) अतः प्रपंचकी प्रतीति और उसके कारण इन्द्रियोंके क्रन्दनका हेतु तुम्हीं हो। जिस प्रकार महासमुद्रमें वायुके योगसे कुछ हलचल होनेपर ही तरंगमालाका प्रादुर्भाव होता है, उसी प्रकार बुद्धिके स्फुरणसे ही चित्समुद्रमें कुछ हलचल होती है। इसीका नाम मन है। योगवासिष्ठमें कहा है— स आत्मा सर्वगो राम नित्योदितवपुर्महान्। यन्मनाक् मननीं शक्तिं धत्ते तन्मन उच्यते॥ अतः थोड़ी-सी मननी शक्तिको धारण करनेपर परब्रह्म ही मनरूपसे प्रादुर्भूत होता है। किंतु मनकी वह मननी शक्ति क्या है? यदि हम इस बातका विचार करें कि तरंग क्या है तो यही निश्चय होगा कि वस्तुतः वह समुद्र ही है। वायुके कारण ही उसकी पृथक् प्रतीति होती है। इसी प्रकार मन भी मायाशक्तिके कारण ही अपने अधिष्ठानरूप परब्रह्मसे पृथक् प्रतीत होता है। अतः चित्तका जगत्- सम्बन्ध-स्फुरण ही मननी शक्ति है, वस्तुतः व्यावहारिक जगत्में स्फुरण ही चित्का चित्त्व है, वही सृष्टिका बीज है, उसीको भगवान्का ईक्षण, संकल्प अथवा आदिसंवेदन कहकर भी पुकारा जाता है। मन साक्षीभास्य माना जाता है। उसकी कभी अज्ञात सत्ता नहीं रहती। जिस प्रकार समुद्रके बिना तरंगकी सत्ता नहीं होती, उसी प्रकार शुद्ध चेतनसे भिन्न मन नहीं है। यदि मननी शक्तिका निरोध हो जाय तो चित्त चित् हो जाता है। वस्तुतः चित् तकाररहित चित्त ही है। योगवासिष्ठमें कहा है— 'चित्तं चिद्विजानीयात्तकाररहितं यदा।' यह तकार ही चंचलता है। इस चंचलताके कारण ही नित्य-शुद्ध-बुद्ध निर्विकार ब्रह्ममें प्रपंचकी प्रतीति हुई है। इसकी निवृत्ति होनेपर तो मनका मनस्त्व ही नहीं रहता। फिर तो यह प्रपंच ब्रह्म ही हो जाता है; क्योंकि वास्तवमें तो अन्वय-व्यतिरेकसे ब्रह्म ही है—ब्रह्मकी सत्तासे ही इसकी सत्ता है, ब्रह्मको छोड़कर तो इसकी सत्ता ही नहीं है। माया या अज्ञान भी अधिष्ठानसे भिन्न नहीं है। श्रीगोसाईं तुलसीदासजी कहते हैं—जिस प्रकार काष्ठमें अनेकों पुतलियाँ और कपासमें तरह-तरहके वस्त्र निहित हैं, उसी प्रकार चित्तमें ही सारा प्रपंच है। यदि चित्त स्वाधीन हो जाय तो भले ही संसारके सारे पदार्थ बने रहें, उनसे अपना क्या हानि-लाभ होता है? चित्तमें ही सारा प्रपंच है—योगवासिष्ठका एक दृष्टान्त इस विषयमें एक गाथा है—एक राजा अश्वमेध- यज्ञ कर रहा था। यज्ञीय अश्व छोड़ा गया, बहुत- से सैनिक अश्वकी रक्षा करने चले। उस अश्वको एक मुनिकुमारने पकड़ लिया और उस सारी सेनाको जीतकर वह उसे लेकर एक शिलामें घुस गया। यह अद्भुत व्यापार देखकर बचे-खुचे सैनिकोंको बड़ा आश्चर्य हुआ और उन्होंने जाकर सारा हाल राजाको सुना दिया। राजाने उस अश्वको लानेके लिये कुछ आदमियोंके साथ अपने भाईको भेजा। वह राजकुमार जब उस स्थानपर पहुँचा तो एक शिलाके सिवा वहाँ और उसे कुछ भी न मिला। उसने सोचा कि यहाँ
अवश्य कुछ मुनिश्रेष्ठ होंगे; उन्हींसे इस लीलाका रहस्य खुल सकेगा। इधर-उधर खोजनेपर उसे एक महात्मा दिखायी दिये। महात्मा समाधिस्थ थे। राजकुमार तन-मनसे उनकी सेवा-शुश्रूषा करने लगा। परंतु उनका समाधिसे उत्थान न हुआ। कुछ काल पश्चात् उसकी सच्ची लगन देखकर वही मुनिकुमार प्रकट हुआ और उसे वह यज्ञीय घोड़ा दे दिया। राजकुमारने वह अश्व दूसरे मनुष्योंके साथ राजधानीको भेज दिया और स्वयं वहीं रह गया। तब मुनिकुमारने पूछा—'राजन्! तुम क्या चाहते हो?' राजकुमारने कहा—'भगवन्! मेरी यही इच्छा है कि इन मुनिश्रेष्ठका समाधिसे व्युत्थान हो।' इसपर मुनिकुमारने कहा—'ऐसा होना तो बहुत कठिन है; क्योंकि इस समय ये स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों शरीरोंका अतिक्रमणकर केवल सत्तामात्र परब्रह्मके साथ एकीभावसे स्थित हैं। तथापि मैं प्रयत्न करता हूँ'— ऐसा कहकर मुनिकुमार समाधिस्थ हो गया। उसने तीनों शरीरोंसे सम्बन्ध छोड़कर सन्मात्रमें स्थित हो मुनिवरके सन्मात्र तत्त्वमें स्थित आत्माको उद्बुद्ध किया। इससे मुनिकी समाधि खुल गयी। मुनिवरने राजकुमार और समाधिस्थ मुनिकुमारको देखा तथा योगबलसे सारा रहस्य जानकर मुनिकुमारको उद्बुद्ध किया। फिर राजकुमारने मुनिवरसे प्रार्थना की—'भगवन्! आप मुझे अपना परिचय देकर कृतार्थ करें और ये मुनिकुमार हमारा अश्व लेकर किस प्रकार इस शिलामें घुस गये थे, यह सब रहस्य बतलानेकी कृपा करें।' मुनिने कहा—'राजन्! पूर्वकालमें मैं एक राजा था। संसारसे निर्वेद होनेपर मैं अपना राज्य छोड़कर सपत्नीक यहाँ तपस्या करने चला आया। एक दिन जब कि मैं समाधिस्थ था, दैववश मेरी रानीकी वृत्ति कुछ चंचल हो गयी और उसने संकल्पसे ही मेरे साथ मैथुन किया। उससे वह गर्भवती हो गयी और यथासमय उससे यह पुत्र उत्पन्न हुआ। पुत्र-प्रसवके पश्चात् उसने तो शरीर छोड़ दिया, फिर मैंने ही इसका लालन-पालन किया। कुछ वयस्क होनेपर इसकी इच्छा राज्य भोगनेकी हुई। तब मैंने इसे योगाभ्यासमें लगाया, उसमें सिद्धि प्राप्त करनेपर इसने संकल्पसे ही इस शिलामें एक ब्रह्माण्ड रच लिया है। यह उस ब्रह्माण्डका ईश्वर है। तुम्हारे अश्वको भी यह वहीं ले गया था।' यह सब वृत्तान्त सुनकर कुतूहलवश राजकुमारको उस मुनिकुमारके संकल्पित ब्रह्माण्डको देखनेकी इच्छा हुई। तब मुनिकुमारने कहा—'अच्छा, तुम मेरे साथ चलो।' किंतु जब राजकुमारने उसके साथ शिलामें प्रवेश करनेका प्रयत्न किया तो वह सफल न हुआ। तब मुनिकुमारने अपने योगबलसे उसे अपने साथ ले लिया। उस शिलामें प्रवेश करनेपर उसे इस ब्रह्माण्डकी अपेक्षा भी अधिक विस्तृत ब्रह्माण्ड दिखायी दिया। वहाँ उसने ऐसा ही आकाश देखा तथा वहाँके ब्रह्मलोक, इन्द्रलोक, वैकुण्ठ, पाताल और रसातलादिमें जाकर ब्रह्मा, विष्णु आदि सब देवताओंका भी दर्शन किया। उसने यह भी देखा कि वहाँ वह मुनिकुमार ही सबसे अधिक पूजनीय है; वहाँके देवगण भी उसे अपना ईश्वर समझते हैं। इस प्रकार केवल एक दिनमें ही उसने वह सारा ब्रह्माण्ड देख लिया। तब उसे फिर इस लोकमें आनेकी इच्छा हुई। उसके कहनेसे मुनिकुमार उसे बाहर ले आया; किंतु उसने देखा कि वहाँका सारा ही रंग-ढंग बदला हुआ है। जहाँ पर्वत था, वह विस्तृत समतल भूमि है, जहाँ नदी थी, वहाँ मरुभूमि दिखायी देती है और जहाँ वन था, वहाँ नगर बसे हुए हैं। यह देखकर उसने मुनिकुमारसे इसका कारण पूछा। मुनिकुमारने कहा—'तुम्हें मेरे ब्रह्माण्डमें तो एक ही दिन व्यतीत हुआ जान पड़ा था; किंतु उतने ही समयमें यहाँ कई युग बीत गये हैं। इसलिये अब यहाँ सब कुछ बदल गया है। तुम्हारे कुलमें भी अब बहुत-सी पीढ़ियाँ बीत चुकी हैं; तुम्हारे सामने जितने मनुष्य थे, उनमें तो केवल तुम ही रह गये हो।' यह सुनकर राजाको बड़ा विस्मय और विषाद हुआ। फिर उसने मुनिकुमारसे इसका रहस्य पूछा।
मुनिकुमार बोला—'राजन्! वस्तुतः यह प्रपंच संकल्पमात्र है। साधारण लोगोंके संकल्प शुद्ध नहीं होते, उनमें कई संकल्पोंका सांकर्य रहता है; इसलिये वे सिद्ध भी नहीं होते। यदि हमारा संकल्प सिद्ध हो जाय और उसमें अन्य संकल्पोंका मेल न रहे तो हम उसे प्रत्यक्ष व्यावहारिक रूपमें देख सकते हैं। जिस संकल्पकी पूर्वकोटि और परकोटि ज्ञात होती है, वह तो कल्पना ही है, वह सिद्ध संकल्प नहीं है। यदि हमारा संकल्प ऐसा हो जाय कि उसकी पूर्वकोटिका [अर्थात् वह कब और किस प्रकार आरम्भ हुआ था—इस बातका] भान न रहे तो वह अवश्य प्रत्यक्ष हो जायगा। मेरा संकल्प सिद्ध हो गया है। उस संकल्प-शक्तिसे ही मैंने इस शिलामें ब्रह्माण्डकी भावना कर ली है। मेरा ब्रह्माण्ड इस ब्रह्माण्डकी अपेक्षा बृहत्तर है। जितने समयमें मैंने वहाँ एक दिनकी भावना की थी, उतने समयमें इस ब्रह्माण्डके ब्रह्माने कई युगोंकी भावना की। अतः वहाँ केवल एक दिन हुआ और यहाँ कई युग बीत गये। वस्तुतः सारा प्रपंच भगवान्का संकल्प ही है। जो शक्ति भगवान्में है, वही योगियोंमें भी हो जाती है। वे यदि घटको पट कहें तो उसे पट होना पड़ेगा। ब्रह्मादिका संकल्प भी ऐसा ही है। इसीसे उनके संकल्पित पदार्थ उन्हें भी प्रतीत होते हैं और हमें भी। अन्य पुरुषोंके संकल्प ऐसे नहीं होते, उन्हें अपने संकल्पोंकी पूर्वकोटि ज्ञात रहती है; अतः उनके संकल्पित पदार्थ केवल उन्हें ही प्रतीत होते हैं, दूसरोंको नहीं।' इसीसे पहले कहा गया है—'मनसो ह्युन्मनीभावे द्वैतं नैवोपलभ्यते ॥' क्योंकि प्रपंचकी प्रतीति मनकी चंचलतामें ही होती है, उसकी स्थिरतामें नहीं। अतः भगवान् बुद्धियोंसे कहते हैं—'अरी बुद्धियो! जबतक तुम स्थिर होकर अपने परम प्रेमास्पद परब्रह्म परमात्माका सुखास्वादन न करोगी, तबतक तुम्हारा श्रम निवृत्त न होगा। श्रमकी निवृत्ति परमप्रेमास्पदके सुखास्वादनसे ही होती है; क्योंकि जिस समय प्राणी प्रेमविह्वल होता है, उस समय उसकी इन्द्रियाँ और मन शिथिल पड़ जाते हैं। जिस समय कोई प्रेमी दीर्घकालके प्रवासके अनन्तर अपनी प्रियतमासे मिलता है और उन दोनोंका परस्पर आलिंगन होता है, उस समय उन्हें बाहर- भीतरका कुछ भी ज्ञान नहीं रहता। यह दशा प्राकृत प्रेमियोंकी है, फिर परमानन्द-सौख्य-सुधासिन्धु श्रीश्यामसुन्दरका संयोग होनेपर उनके दिव्य रूप, दिव्य स्पर्श एवं दिव्य गन्धका समास्वादन करनेपर जो विलक्षण स्थिति होती है, उसका तो कहना ही क्या है? श्रुति कहती है—उस समय तो न बाह्य जगत्का ज्ञान रहता है और न आन्तरका—'नान्तरं किञ्चन वेद न बाह्यम्।' उस समय उसका चित्त भी अपने अधिष्ठानभूत चिदात्मामें लीन हो जाता है— 'तच्चापि चित्तवडिशं शनकैर्वियुङ्क्ते।' लीलाके विकासके लिये नित्य अभिन्न श्रीवृषभानुदुलारी और रासेश्वर श्रीकृष्णका द्वैधीभाव जिस समय जीवको अपने एकमात्र प्रियतम परमानन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्रका आश्लेष होता है, उस समय जो आनन्दातिरेक होता है, उसमें उसके मन और इन्द्रिय आदि ऐसे परिप्लुत हो जाते हैं कि उसे अपना भी भान नहीं रहता। उस स्थितिमें भक्त और भगवान्का सर्वथा अभेद हो जाता है। भगवान्की नित्यनिकुंज- लीलामें श्रीवृषभानुदुलारीके साथ उनका नित्य संयोग रहता है। वहाँ उनका कभी विप्रयोग नहीं होता, क्योंकि भगवान् कृष्ण अचिन्त्यानन्द-सुधासिन्धु हैं और श्रीरासेश्वरीजी उनकी मधुरिमा हैं। वस्तुतः वे एक ही तत्त्व हैं, केवल रसानुभूतिके लिये ही उनके दिव्यमंगल विग्रहोंका प्रादुर्भाव हुआ है। वे यद्यपि सर्वदा एकरूप हैं तथापि लीलाविशेषोपयुक्त रसाभिव्यक्तिके लिये उनका विप्रयोग आवश्यक है। अतः लीलाविशेषके विकासके लिये ही उनका द्वैधीभाव होता है। उस समय जितने भावोंकी अपेक्षा है, उन सभीका प्रादुर्भाव होता है। यह ठीक है कि उस नित्य लीलामें उनका कायिक और ऐन्द्रियक विप्रयोग कभी नहीं होता। उनके मन, प्राण, नेत्र तथा
श्रीरासलीलारहस्य ३१५ प्रत्येक अंग-प्रत्यंग परस्पर संश्लिष्ट हैं। तथापि उस संश्लेषसे प्रेमातिशयके कारण उनमें जो विह्वलता आती है, उससे श्रीवृषभानुनन्दिनीका मन कृष्णसुखका अनुभव नहीं करता और श्रीकृष्णचन्द्रका विह्वल मन श्रीनिकुंजेश्वरीजीकी माधुर्यसुधाका आस्वादन करना भूल जाता है। यहाँ केवल इतना ही विप्रयोग होता है। अब इधर अध्यात्ममें आइये। यह बुद्धिरूपा प्रमदा सुषुप्तिमें थोड़ा-सा उस ब्रह्मसुखका रसास्वादन करती है। इसीसे उस समय इसे आत्मविस्मृति हो जाती है। बस, जिस समय बुद्धि अपनेको भूली कि उसे प्रपंचका भान ही नहीं रहता। फिर तो बुद्धि बुद्धि नहीं रहती, मन मन नहीं रहता और प्राण प्राण नहीं रहते। वे सब केवल चिन्मात्र हो जाते हैं। इसीसे भगवान्ने कहा है कि 'हे बुद्धियो! जबतक तुम मुझमें ही स्थित न होगी, तबतक तुम्हारे बाल-बच्चेरूप ये इन्द्रियाँ और मन आदि रोते ही रहेंगे।' परंतु करें क्या ? बहुत कुछ विचार भी करते हैं, तब भी विषय हमें अपनी ओर आकर्षित कर ही लेते हैं। हम स्वयं उनकी ओर जानेका संकल्प नहीं करते तथापि जिस समय कोई असाधारण रूप हमारे सामने आता है, उस समय नेत्र उसकी ओर खिंच जाते हैं; जिस समय कोई सुमधुर शब्द सुनायी देता है, कान वहाँसे हटना नहीं चाहते; जब कोई दिव्य गन्ध मालूम होती है तो घ्राणेन्द्रिय उसमें फँस ही जाती है तथा जब कोई सुस्वादु पदार्थ सामने आता है तो रसनेन्द्रिय उसका रस लेने ही लगती है। ये सब हठात् हमें अपनी ओर खींच लेते हैं। यह सब उस महामायाका ही प्रभाव है। ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा॥ बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति। (श्रीदुर्गासप्तशती १।५५-५६) यह देवी भगवती कौन है? विषय-रूपमें परिणत हुई प्रकृति ही वह महामाया है। उसके कारण बड़े-बड़े ज्ञानी, तपस्वी और जितेन्द्रिय भी अपनी- अपनी निष्ठासे विचलित हो जाते हैं। नारद, विश्वामित्र और ब्रह्मादिको भी उसने नहीं छोड़ा, फिर हम-जैसे साधारण पुरुषोंकी तो बात ही क्या है? अतः महापुरुषोंका यही उपदेश है कि कोई कैसा ही विवेकी हो, उसे सर्वदा विषयोंसे दूर ही रहना चाहिये; वहाँ उसे अपनी पण्डिताईका भरोसा नहीं करना चाहिये। भगवान् शंकराचार्य कहते हैं- 'आरूढयोगोऽपि निपात्यतेऽधः सङ्गेन योगी किमुताल्पसिद्धिः।' अतः विषयोंके रहते हुए ये बाल-बच्चे तो रोते ही रहेंगे। यदि तुम इनका रोना बन्द करना चाहती हो तो तुम अपने पतिदेव अचिन्त्यानन्द-सुधासिन्धु परब्रह्मका चिन्तन करो। उसमें निश्चल हो जानेपर विषयोंकी सत्ता ही नहीं रहेगी। इस प्रकार जब विषय ही न रहेंगे तो रोयेंगे किसके लिये ? इन्द्रियोंको विषय-सेवन मत कराओ वास्तवमें तो इन्द्रियाँ और इन्द्रियवृत्तियाँ परब्रह्मकी ही ओर जाना चाहती हैं, विषयोंकी ओर जाना इन्हें अभीष्ट नहीं है। परंतु करें क्या, विषयरूप चुम्बक बलात् अपनी ओर खींच लेता है। इसीसे बृहदारण्यकोपनिषद्में इन्द्रियोंको ग्रह बतलाया है और विषयोंको अतिग्रह। इन्द्रियाँ और मन प्राणीको इसी प्रकार ग्रहण किये हुए हैं, जैसे ग्रह अर्थात् भूत। उन ग्रहोंसे गृहीत होकर यह जीव रोता-चिल्लाता है। इन ग्रहोंसे छूटनेके लिये उसे श्रीकृष्णरूप ग्रहकी शरण लेनी चाहिये। जिस समय यह कृष्ण-ग्रह- गृहीतात्मा हो जायगा, उस समय वे क्षुद्र ग्रह इसका कुछ भी न बिगाड़ सकेंगे। किंतु विषय अतिग्रह हैं। आत्मापर मनरूप ग्रह चढ़ा हुआ है, उसपर इन्द्रियरूप दस भूत सवार हैं और उनपर भी विषयरूप विकट भूत लगे हुए हैं। इन अतिग्रहोंसे गृहीत होनेपर भला इन्द्रियोंकी आत्माकी ओर कैसे प्रवृत्ति हो सकती है ? पहले हम कह चुके हैं कि स्वयम्भू भगवान्ने इन्द्रियोंकी बहिर्मुख करके हिंसित कर दिया है। हिंसा किसे कहते हैं ? अनभिमत कर्म करना पड़े-यही हिंसा है। इन्द्रियाँ विषयोंकी ओर जाना नहीं चाहतीं,
३१६ | भक्तिसुधा
भगवान्ने इन्द्रियोंको बहिर्मुख कर दिया। इससे उन्हें बलात्कार उनकी ओर जाना पड़ा। यही उनकी हिंसा है। अतः भगवान् कहते हैं—'हे बुद्धियो! ये इन्द्रियरूप बालक विषयोंकी ओर जानेसे रो रहे हैं और परमानन्द-सुधाका पान नहीं कर पाते। इसमें कारण तुम्हीं हो, क्योंकि यदि तुम चंचलता छोड़ दो तो इन विषयोंकी सत्ता ही न रहे। उस समय ये इन्द्रियाँ जायँगी ही कहाँ? तब तो ये ब्रह्मानन्द-सुधाका ही पान करेंगी। अतः इन्हें शान्त और तृप्त करनेके लिये भी तुम मेरा ही चिन्तन करो।' इन्द्रिय और इन्द्रियवृत्तियाँ बुद्धिकी ही अवस्था- विशेष हैं। इसलिये ये उसके बालक ही हैं। जिस प्रकार दर्पणके भीतर अनेक प्रकारके पदार्थ प्रतिबिम्बित होते हैं, उसी प्रकार शुद्ध चैतन्य-रूप दर्पणमें समस्त प्रपंच प्रतिबिम्बित हैं। दर्पणमें जो आकाशकी प्रतीति होती है, वह वस्तुतः निरवकाशमें ही अवकाशकी प्रतीति है। दर्पणके अवयव इतने सघन हैं कि उनमें किसी पदार्थका प्रवेश होना सम्भव ही नहीं है। अतः उसमें जितने समुद्र, नदी, पर्वत एवं वन आदि प्रतीत होते हैं, वे सब असत् ही हैं। इसी प्रकार शुद्ध चैतन्यरूप दर्पणमें अनेकविध प्रपंच प्रतीत हो रहा है। परंतु वस्तुतः वह सब केवल स्वयं-प्रकाश शुद्ध चेतन ही है। परंतु उनकी प्रतीति क्यों होती है ? यहाँ दो बातें ध्यान देनेकी हैं—(१) जिस समय आप दर्पणके शुद्ध स्वरूपपर दृष्टि ले जायँगे, उस समय आपको उसमें प्रतिबिम्बित पदार्थ दिखायी नहीं देंगे और जिस समय आप प्रतिबिम्बित पदार्थ देखेंगे, उस समय दर्पणका शुद्ध स्वरूप नहीं देख सकेंगे। यही बात परब्रह्मके विषयमें भी है। परब्रह्मको ग्रहण करनेवाली वृत्ति प्रपंचको ग्रहण नहीं कर सकती और प्रपंचको ग्रहण करनेवाली वृत्ति परब्रह्मको ग्रहण नहीं कर सकती। (२) यह भी निश्चित बात है कि प्रतिबिम्बित पदार्थोंकी सत्ता दर्पणके ही अधीन है और वस्तुतः दर्पणको ग्रहण किये बिना हम प्रतिबिम्बितको ग्रहण भी नहीं कर सकते। यह कभी सम्भव नहीं है कि हम तरंगको तो देख लें और जलको न देखें तथा हमें सौरलोक या चन्द्रालोककी प्रतीति तो न हो, किंतु उनसे प्रकाश्य पदार्थोंकी प्रतीति हो जाय। इसी प्रकार हमें पहले ब्रह्मका ग्रहण होता है और पीछे प्रपंचका; क्योंकि सारे पदार्थ उसीके प्रकाशसे प्रकाशित हैं— 'तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥' (श्वेताश्वतर० ६।१४) किंतु इस समय जो ब्रह्मका ग्रहण होता है, वह उसके शबल रूपका होता है। उसके शुद्ध स्वरूपका ग्रहण तो प्रपंचकी उपेक्षा करते-करते उसकी अप्रतीति होनेपर ही होगा; जिस प्रकार कि शुद्ध दर्पणका ग्रहण तभी हो सकता है जब कि प्रतिबिम्बका ग्रहण न किया जाय। जिस समय बुद्धि प्रपंचको ग्रहण करती है, उस समय वह बहुत घबराती है; क्योंकि इसमें सिंह- व्याघ्रादि बड़े-बड़े भयानक पदार्थ भी हैं। लोकमें प्रतिबिम्बसे भय होना प्रसिद्ध है। माता बालकको अपनी परछाईं नहीं देखने देती, क्योंकि उसे भय है कि वह उसे वेताल समझकर डर जायगा। स्वकल्पित मिथ्या वेतालसे भी मृत्यु हो जाती है। इसी प्रकार यह प्रपंच चिद्रूप दर्पणमें प्रतिबिम्बित परछाईं है। अतः विवेकवती बुद्धिरूप माताको उचित है कि वह इन्द्रिय और इन्द्रियवृत्तिरूप अपने बालकोंको उनके कल्याणके लिये यह प्रपंचरूप परछाईं न देखने दे और केवल दर्पणस्थानीय ब्रह्मको ही देखे। यहाँ यह शंका न करनी चाहिये कि प्रतिबिम्ब तो किसी बिम्बका हुआ करता है; अतः परब्रह्ममें जो प्रपंच प्रतिफलित होता है, उसका भी कोई बिम्ब होना चाहिये। दर्पणादि परिच्छिन्न पदार्थ हैं, इसलिये उनमें जो प्रतिबिम्ब पड़ता है, वह बिम्बके ही कारण होता है; किंतु ब्रह्म तो अपरिच्छिन्न है, उससे पृथक् और स्थान ही कहाँ है, जहाँ उसमें प्रतिफलित होनेवाला बिम्ब रहेगा। बिम्बभूत जो कोई भी पदार्थ होगा, वह
श्रीरामलीलारहस्य ३१७ देश, काल और वस्तुके अन्तर्गत ही होगा। किंतु देश, काल और वस्तु तो प्रतिबिम्बके ही अन्तर्गत हैं। यदि कहो कि अनुमानसे तो कोई-न-कोई बिम्ब मानना ही होगा; क्योंकि लोकमें बिना बिम्बका कोई प्रतिबिम्ब देखनेमें नहीं आता। किंतु अनुमान भी तो एक ज्ञान ही है; अतः यह भी ज्ञानस्वरूप ब्रह्मसे बाहर नहीं हो सकता, फिर उसमें ज्ञेय पदार्थ तो ब्रह्मके बाहर हो ही कैसे सकता है ? अतः ब्रह्ममें जो प्रतिबिम्ब है, वह बिम्बरहित है। यह इस दर्पणकी विलक्षणता है। यही इसकी अनिर्वचनीया शक्तिरूपा माया है। यही माया सबको मोहित किये हुए है। किंतु यह इसका स्वभाव अवश्य है कि यदि तुम इसमें प्रतिबिम्बित प्रपंचको देखना छोड़ दो तो तुम्हें शुद्ध ब्रह्मका साक्षात्कार हो जायगा और साक्षात्कार होते ही माया और उसका प्रपंच सदाके लिये मिट जायगा। इसीसे भगवान् बुद्धियोंसे कहते हैं—'मा यात गोष्ठम्' —तुम विषयोंकी ओर मत जाओ; बल्कि इन इन्द्रियोंके विषयरूप हाऊकी निवृत्तिके लिये तुम केवल शुद्ध परब्रह्मको ही देखो। तुम भास्यवर्गको मत देखो, केवल भानको ही देखो। ऐसा करनेके लिये भगवान् क्यों कहते हैं ? क्योंकि 'क्रन्दन्ति वत्सा बालाश्च' —ये इन्द्रियाँ रो रही हैं। अतः न तो तुम्हीं प्रपंचको देखो और न इन्हींको दिखाओ अन्यथा इनकी मृत्यु हो जायगी। देखो—जिस समय तुम इस प्रपंचको देखती हो, उस समय तुम्हारे ये बालक भी उसे ही देखने लगते हैं। अतः तुम उसे मत देखो और 'तान् मा पाययत मा दुह्यत च' अर्थात् इन इन्द्रियोंको विषय-सेवन मत कराओ और न इनके सामने विषयोंको ही आने दो; क्योंकि इन्हें विषयरूप पयःपान कराना तो विष ही पिलाना है। इन्हें वह प्रिय अवश्य है, परंतु उसके सेवनसे इनका अनिष्ट ही होगा। रोगी बालक कुपथ्य करना चाहा ही करता है, परंतु माता उसे करने थोड़े ही देती है। उनके सेवनसे इन्हें शान्ति या तृप्ति भी नहीं हो सकती। विषय-सेवनसे तो इनकी विषयाभिलाषा और भी बढ़ जायगी— 'भोगमनुविवर्धत इन्द्रियाणां कौशलम्।' अतः इनके हितके लिये इन्हें विषय-सेवन मत करने दो। विषय-सेवन न करनेसे इन्द्रियोंकी भोग- वासना निर्बल पड़ जायगी। यह ठीक है कि इन्द्रियोंके निग्रहसे उनकी बाह्य प्रवृत्ति मन्द पड़ जाती है तथापि उनकी आन्तरिक शक्ति बढ़ जाती है। एक व्यक्ति कुछ काल मौन रहता है। इससे वागिन्द्रिय अवश्य मन्द पड़ जाती है। वह अधिक बोल नहीं सकता। परंतु वह जो कुछ कहता है, वही हो जाता है। यदि वह वटवृक्षको नीमका वृक्ष बतला दे तो उसे निम्बवृक्ष हो जाना पड़ता है। योगदर्शनमें मौनसे वाक्सिद्धि मानी गयी है। इसी प्रकार जो बालब्रह्मचारी है, वह एकाएक कामाहत नहीं होता। अत्यन्त रूपवती स्त्रियोंको देखकर भी उसका चित्त विचलित नहीं होता। एक बार महर्षि नारद तप कर रहे थे। उन्हें तपोभ्रष्ट करनेके लिये इन्द्रने कुछ अप्सराएँ भेजीं, परंतु उनके सारे हाव- भाव कटाक्ष उन्हें विचलित करनेमें समर्थ न हो सके। करते कैसे! इस समय श्रीनारदजीकी मनोवृत्ति तो एकमात्र भगवत्तत्त्वमें ही स्थित थी, उसे तो उनका भान भी नहीं हुआ। इस समय भगवान्की उनपर पूर्ण कृपा थी। भला जिनके ऊपर भगवान्की कृपा है, उनका कोई क्या बिगाड़ सकता है ? सीम कि चाँपि सकइ कोउ तासू। बड़ रखवार रमापति जासू॥ (रा०च०मा० १।१२६।८) भगवान् कृष्णने भी उद्धवको यही उपदेश किया है कि हे उद्धव! ये इन्द्रियाँ मनुष्यको ठगनेवाली हैं। ये उसे असदभिनिवेशमें ग्रस्त कर देती हैं; अतः तुम इनसे विषयसेवन मत करो। तस्मादुद्धव मा भुङ्क्ष्व विषयानसदिन्द्रियैः। आत्माग्रहणनिर्भातं पश्य वैकल्पिकं भ्रमम्॥ (श्रीमद्भा० ११।२२।५६) भगवान् शंकराचार्यजीने भी यही कहा है कि शम, दम, उपरति, तितिक्षा आदि साधनोंसे सम्पन्न होकर ही ब्रह्मविचार करना चाहिये। यदि इन्द्रियोंको
३१८ भक्तिसुधा स्वाधीन न किया जायगा तो वेदान्त-चर्चा केवल तोतेकी कहानी ही होगी।* उससे तुम्हारा कल्याण नहीं हो सकता। अतः यदि तुम वास्तवमें अपना कल्याण चाहते हो तो विषयोंको त्यागो। रसनाको रसास्वादनसे रोको, श्रोत्रोंसे शब्द-ग्रहण मत करो और घ्राणेन्द्रियसे गन्ध मत सूँघो। सारी इन्द्रियोंका निरोध कर दो। मुक्तिमिच्छसि चेत्तात विषयान् विषवत्त्यज। क्षमार्जवदयातोषसत्यं पीयूषवद्भज॥ आत्मलाभका यही उपाय है। इसीसे भगवान्ने कहा है— यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञान आत्मनि। ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्यच्छेच्छान्त आत्मनि॥ (कठ०१।३।१३) पहले अपनी इन्द्रियोंकी प्रवृत्तिको शास्त्रीय करो। इससे उनकी उच्छृंखलता शान्त हो जायगी। फिर धीरे- धीरे अभ्यासद्वारा उनसे विषय ग्रहण करना छोड़ दो। श्रीमधुसूदन सरस्वतीने अपनी गीताकी टीकामें कहा है—यदि घरमें चोर घुस रहे हों तो सबसे पहले दरवाजा बन्द कर लेना चाहिये; पीछे कोई और उपाय करो। इसी प्रकार विषयोंपर विजय प्राप्त करनेके लिये पहले इन्द्रियोंको उनके विषयोंसे निवृत्त करो। यदि अन्तःकरणमें भोगवासना बनी हुई हो तो भी इन्द्रियोंसे अन्य विषयोंको तो ग्रहण मत करो। अब जो विषयरूप चोर तुम्हारे अन्तःकरणरूप घरमें घुस आये हैं, उनकी परब्रह्मरूप राजाके यहाँ रिपोर्ट करो, वह अवश्य इनका प्रबन्ध कर देंगे। श्रीगोसाईंजी महाराज कहते हैं— मम हृदय भवन प्रभु तोरा। तहँ बसे आइ बहु चोरा॥ अति कठिन करहिं बरजोरा। मानहिं नहिं बिनय निहोरा॥ × × × कह तुलसिदास सुनु रामा। लूटहिं तसकर तव धामा॥ चिंता यह मोहिं अपारा। अपजस नहिं होइ तुम्हारा॥ (वि०प० १२५) अतः भगवन्, आप उन्हें निकालिये, नहीं तो आपका अपयश अवश्य होगा; क्योंकि— ममता तरुन तमी अँधिआरी। राग द्वेष उलूक सुखकारी॥ तब लगि बसति जीव मन माहीं। जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं॥ (रा०च०मा० ५।४७।३-४) वास्तवमें जिस राजाके राज्यमें चोर प्रजाका धन अपहरण करते हैं, उस राजाके लिये वह कलंक ही है; क्योंकि प्रजा तो राजाका सर्वस्व है। 'प्रजायन्त इति प्रजाः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार 'प्रजा' शब्दका अर्थ ही पुत्र है। अतः राजाका यह परम कर्तव्य है कि वह प्रजाके हितकी रक्षा करे। प्रभुको एकमात्र आश्रय बना लेनेपर सारे विकार निवृत्त हो जाते हैं इस प्रकार जिस समय यह जीव प्रभुको ही अपना एकमात्र आश्रय बना लेता है, उस समय उसके सारे विकार निवृत्त हो जाते हैं। जब वह स्वयंप्रकाश श्रीहरिके सम्मुख होता है, तब उसके हृदय-भवनका कल्मषरूप अन्धकार तत्काल निवृत्त हो जाता है। अतः भगवान्का भी बुद्धियोंके प्रति यही कथन है कि तुम इन इन्द्रियवृत्तियोंको पयःपान मत कराओ। यह बात ठीक है कि इन्द्रियोंके व्यापारका सर्वथा निरोध नहीं किया जा सकता। शरीर-रक्षाके लिये भोजनादि भी करना ही होगा। अतः आवश्यकता इसी बातकी है कि अपनी प्रवृत्तियोंको शास्त्रीय करो। नित्य-नैमित्तिक कर्मोंका अनुष्ठान करो। उन्हीं विषयोंको ग्रहण करो, जिनके बिना तुम्हारा निर्वाह न हो सके। * एक बार एक व्यक्तिको यह देखकर बड़ी करुणा हुई कि बेचारे निरीह तोते व्यर्थ मनुष्योंके चंगुलमें फँसते हैं। इसलिये उसने सोचा कि इन्हें कोई ऐसा पाठ पढ़ा दिया जाय जिससे ये उसमें न फँसें। उसने एक तोतेको यह बात सिखला दी—'तोते! सावधान रहना। नलीके ऊपर मत बैठना और अगर बैठ जाओ तो उसे छोड़ देना। उसे तुम्हींने पकड़ रखा है, उसने तुम्हें नहीं पकड़ा।' उस तोतेसे सुनकर यह पाठ उस प्रान्तके सब तोतोंनें सीख लिया। सब इसी प्रकार कहने लगे। परंतु उस व्यक्तिने देखा कि एक तोता नलीमें फँसा हुआ है और मुँहसे यही बात कह रहा है। यही दशा साधनहीन वेदान्तियोंकी होती है। वे मुखसे तो अपनेको शुद्ध-बुद्ध-मुक्त कहते रहते हैं; किंतु वस्तुतः रहते विषयोंमें आसक्त ही हैं। इस प्रकारके ज्ञानसे कोई लाभ नहीं हो सकता।
भगवान्के दिये हुए देह और इन्द्रियोंका सदुपयोग करो। भगवान्ने अपनी प्राप्तिके लिये ही ये देह और इन्द्रियाँ आदि दी हैं। अतः इनसे वही कार्य करो, जो भगवत्प्राप्तिमें सहायक हैं। इनकी सात्त्विकी प्रवृत्तिको प्रबल करो, राजसको निर्बल कर दो और तामस प्रवृत्ति बिलकुल मत होने दो। देखो, जिस समय हनुमान्जी लंकाको गये थे, उस समय पहले उन्हें सुरसा मिली। उसे उन्होंने अपने पुरुषार्थसे प्रसन्नकर उसका आशीर्वाद प्राप्त किया। वह देवमाता थी, अतः सात्त्विकी प्रवृत्तिरूपा होनेके कारण उसे अपने अनुकूल कर लेना ही उचित था। उसके पश्चात् छायाग्राहिणी सिंहिका राक्षसी मिली, जो समुद्रमें ऊपर उड़नेवाले प्राणियोंकी छाया पकड़कर उन्हें गिरा लेती और फिर खा जाती थी। वह तामस प्रवृत्ति की थी। उसे उन्होंने मार डाला। फिर लंकामें पहुँचनेपर उन्हें लंकिनी मिली। उसने भी उनका मार्ग रोका; किंतु उसे उन्होंने एक मुक्केसे ही ठीक कर लिया। वह राजस प्रवृत्ति थी; उसे दमनसे शिथिल कर देना ही ठीक था। इसी प्रकार हमें सात्त्विक प्रवृत्तिको बढ़ाना चाहिये, राजस प्रवृत्तिको शिथिल कर देना चाहिये और तामसका सर्वथा नाश कर देना चाहिये। वे तो पापरूपा हैं। अतः जो कर्म शास्त्रविहित हैं, उनका तो यथाशक्ति पालन करो। 'यथाशक्ति' शब्दका प्रयोग विहित कर्मोंके लिये ही हो सकता है, पापकर्मोंमें 'यथाशक्ति' शब्दकी प्रवृत्ति नहीं हो सकती। विहित कर्मोंमें भी जिनके न करनेसे प्रत्यवाय होता है, वे तो अवश्य करने चाहिये। अग्निष्टोमादि याग अत्यधिक अर्थसाध्य हैं; प्रत्येक व्यक्ति उनका अनुष्ठान करनेमें समर्थ नहीं है। इसलिये 'यथाशक्ति' शब्दका प्रयोग उन्हींके लिये किया गया है। सन्ध्या, अग्निहोत्र एवं बलिवैश्वदेव आदि कर्मोंको, जिनमें न तो विशेष परिश्रम है और न व्यय ही, अवश्य करना ही चाहिये। आजकल एक परिष्कृत सनातनधर्मका आविर्भाव हुआ है। उसके अनुयायी शास्त्रके किसी अंशको तो प्रामाणिक मानते हैं और किसीकी उपेक्षा कर देते हैं। परंतु इसे शास्त्रका प्रामाण्य स्वीकार करना नहीं कहा जा सकता। इसे तो स्वेच्छाचार ही कहा जायगा। तुम कहते हो गीता हमारा सर्वस्व है, किंतु गीता तो कहती है— यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः। न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥ (गीता १६।२३) अब देखना यह है कि शास्त्र क्या कहता है? तुम शूद्रोंको शास्त्राध्ययन कराना चाहते हो, परंतु शास्त्र तो इसकी आज्ञा नहीं देता। यही नहीं, वर्णाश्रम-धर्मका भी लोप करना चाहते हो। शूद्र और वैश्य ब्राह्मणोंका कर्म कर रहे हैं और ब्राह्मण वैश्य तथा शूद्रोंका। परंतु शास्त्र तो कहता है— 'स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥' (गीता ३।३५) अपने वर्णधर्ममें तुम्हारी प्रवृत्ति नहीं होती, उसमें तुम्हें दोष दिखायी देता है। यह तुम्हारा व्यामोह ही है। अर्जुनको भी ऐसा ही व्यामोह हुआ था। इसीसे वह युद्धमें दोषदृष्टिकर भिक्षा माँगनेके लिये तैयार हो गया था। परंतु बाह्य दृष्टिसे ऐसा दोष किस कर्ममें नहीं रहता— 'सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः॥' (गीता १८।४८) भाई, समाजका कोई भी अंग व्यर्थ नहीं है। जैसे सिर आवश्यक है, वैसे ही चरण भी है। शरीरके किसी भी अंगमें पीड़ा हो, उसके कारण सारा शरीर ही अस्वस्थ रहा करता है। अतः हम किसी भी वर्णको नगण्य और हेय नहीं समझते। हमारे विचारसे तो सभीको परधर्मकी ओर प्रवृत्त न होकर अपने ही वर्णके लिये विहित कर्मोंका यथाशक्ति अनुष्ठान करना चाहिये। इस प्रकार स्वधर्मानुष्ठान करते हुए नित्यप्रति कुछ कालके लिये अपनी इन्द्रियोंकी वृत्तियोंका
३२० भक्तिसुधा सर्वथा निरोध करनेका भी प्रयत्न करो। ऐसा करते- करते परब्रह्मका साक्षात्कार होनेपर ही इन इन्द्रियोंका क्रन्दन बन्द होगा। इन्द्रियोंको तुष्ट करनेकी चेष्टासे तृष्णा और भी अधिक बढ़ती है इसके विपरीत यदि इन इन्द्रियरूप वत्स और बालकोंको विषयरूप पयःपान कराया जायगा तो ये और भी अधिक क्रन्दन करेंगे। तुम इन्हें जितना ही तृप्त करनेका प्रयत्न करोगे, ये उतने ही अधिक अतृप्त होते जायँगे। अतः इन्हें तृप्त करनेका प्रयत्न छोड़कर तुम अपने एकमात्र परम पति शुद्ध-बुद्ध- मुक्तस्वरूप परब्रह्मकी ही ओर देखो। इसमें कोई आयास भी नहीं है; विषयदर्शनमें तो आयास भी अधिक है और परिणाममें दुःख भी है। परंतु ब्रह्मदर्शनमें तो कोई परिश्रम भी नहीं करना पड़ता और उसका परिणाम भी परम सुखमय है। परब्रह्म तो स्वयंप्रकाश है, उसे प्रकाशित करनेके लिये कोई व्यापार नहीं करना पड़ता; बल्कि उसके लिये तो व्यापारका त्याग ही कर्तव्य है। परंतु विचित्रता तो यही है कि हमसे व्यापार ही नहीं छोड़ा जाता। यदि मन, बुद्धि और इन्द्रियोंका व्यापार छूट जाय तो परब्रह्मकी उपलब्धि तत्काल हो सकती है। यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह। बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहुः परमां गतिम्॥ (कठ० २।३।१०) इसीसे भगवान् कहते हैं—'गोष्ठं मा यात'— जहाँ पशुप्राय जीव रहते हैं, उस प्रपंचकी ओर मत जाओ। ऐसा करनेसे ही उनका क्रन्दन शान्त होगा। यदि प्रतिबिम्बपर दृष्टि न ले जाकर केवल दर्पणपर ही दृष्टि जाय तो प्रतिबिम्बकी प्रतीति नहीं होगी। इसी प्रकार यदि तुम अपनी वृत्तिको अन्तर्मुख करके विषयोंतक नहीं ले जाओगी तो तुम्हें विषम विषाक्त संसारकी प्रतीति नहीं होगी। यदि कहो कि ये इन्द्रियाँ हमारे बालक हैं, हमें इनपर दया करनी ही चाहिये। इन्हें विषय प्रिय हैं, इसलिये हमें इन्हें अभिलषित विषय प्राप्त कराने ही चाहिये—तो इसपर भगवान् कहते हैं—'तान् मा दुह्यत'—तुम इनके लिये अभिलषित पदार्थ प्रस्तुत मत करो। इन्हें विषयप्राप्ति नहीं होगी तो ये स्वयं ही क्रमशः शान्त हो जायँगी। इन्हें विषय देना तो मानो विष देना है। यही बात प्रेमियोंकी आचार्यभूता व्रजांगनाओंसे भगवान् कहते हैं कि तुम व्रजमें मत जाओ। मैं ही निखिल ब्रह्माण्डका परमपति हूँ। अतः तुम मेरी ही सेवा करो। इस समय यदि तुम्हारे बाल- बच्चे क्रन्दन भी करते हों तो भी उन्हें तुम पयःपान मत कराओ और न बछड़ोंके लिये दोहन ही करो; क्योंकि वे तुम्हारे परमधर्मके विरोधी हैं। यदि भगवत्प्रेममें दया आदि धर्म विरोधी होते हों तो उनका त्याग ही करना चाहिये। भगवान्की यह विचित्र वाचोभंगी सुनकर कुछ व्रजांगनाओंकी तो अभिरुचि सुस्थिर हुई और कुछको व्यामोह हुआ। भगवान्का यह वाग्विन्यास बड़ा ही विचित्र था। इससे भिन्न-भिन्न निष्ठावाले भिन्न- भिन्न अर्थ निकाल सकते थे। कर्मियोंके लिये इसमें कर्मानुष्ठानका आदेश था, जिज्ञासुओंके लिये कर्म-संन्यासकी विधि थी, उपासकोंके लिये कर्म- समुच्चयका विधान था, गोपियोंके लिये गोष्ठको लौट जानेका आदेश था और प्रकारान्तरसे न लौटनेके लिये भी अनुमति थी। वस्तुतः रासपंचाध्यायीरूप यह अमृतसिन्धु ऐसा गम्भीर है कि हम इसके एक बिन्दु का मर्म भी यथावत् नहीं समझ सकते। वेद भगवान्की सुषुप्तिके समय उनके अज्ञात रूपसे प्रकट हुए श्वासोच्छ्वास हैं— 'अस्य महतो भूतस्य निश्वसितमेतद्यदृग्वेदः' (बृहदारण्यक० २।४।१०) किंतु उनका मर्म आकलन करनेमें भी बड़े-बड़े मनीषिजन घबराते हैं, फिर जिन वाक्योंका उच्चारण प्रभुने स्वयं लीला-विग्रह धारण करके किया, उनके
श्रीरामलीलारहस्य ३२१ भावगाम्भीर्यका तो कहना ही क्या है; उसके तो जितने अर्थ किये जायँ, थोड़े ही हैं। अब हम इस श्लोकका उपसंहारकर आगेके श्लोकपर विचार करते हैं। भगवान्ने कहा था कि हे व्रजांगनाओ! तुम जाओ। इसपर व्रजांगनाएँ सोचती हैं—ऐसी जल्दी क्या है, वनकी शोभा देखकर चली जायँगी। किंतु भगवान् कह रहे हैं—'मा चिरम्'—देरी मत करो; क्योंकि यह रात्रिकाल पतिशुश्रूषारूप परमधर्मका उपयुक्त समय है और धर्मानुष्ठानमें विलम्ब होना उचित नहीं है। इसलिये तुम जाओ और पतियोंकी तथा उनकी माता आदि सतियोंकी शुश्रूषा करो। इस प्रकार भगवान्के निराकरण करनेपर व्रजांगनाएँ बहुत खिन्न हुईं। वे सन्तप्त होकर दीर्घ निःश्वास छोड़ती हुई कुछ सोच रही हैं—यह देखकर भगवान् कहते हैं— अथवा मदभिस्नेहाद् भवत्यो यन्त्रिताशयाः। आगता ह्युपपन्नं वः प्रीयन्ते मयि जन्तवः ॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।२३) भगवान्की यह रीति है कि वे सीधे-सीधे किसीको उत्तर नहीं देते; न तो सहसा स्वीकार ही करते हैं और न अस्वीकार ही। संसारमें दो प्रकारके लोग ही सुखी होते हैं; या तो परम बोधवान् और या अत्यन्त मूढ़— यश्च मूढतमो लोके यश्च बुद्धेः परं गतः। तावुभौ सुखमेधेते क्लिश्यत्यन्तरितो जनः ॥ (श्रीमद्भा० ३।७।१७) इसलिये भगवन्मार्गमें लगे हुए प्राणी प्रायः व्याकुल ही दिखायी दिया करते हैं। वस्तुतः इस व्याकुलताकी आवश्यकता भी है। जिस समय भगवान्के सम्मिलनकी अभिलाषा क्षुधा-पिपासाके समान अत्यन्त बढ़ जाय, तभी प्राणीको समझना चाहिये कि हम ठीक मार्गपर चल रहे हैं, परंतु यह प्राणी दीर्घकालसे भगवान्से बिछुड़ा हुआ है। इसलिये इसे भगवत्- सम्मिलनकी उत्कट इच्छा होना अत्यन्त दुर्लभ है। जैसे अजीर्णके रोगीको भूख लगना अत्यन्त आनन्दका हेतु होता है, उसी प्रकार प्रपंचासक्त जीवको भगवत्प्राप्तिकी तृष्णा अत्यन्त सौभाग्यका फल है। इसीसे भगवान् शंकराचार्यने भगवत्प्राप्तिके साधनोंमें सबसे अन्तिम साधन मुमुक्षा बतलाया है। इस मुमुक्षाके पश्चात् ही जिज्ञासा होती है। यदि भगवान्के ज्ञानकी उत्कट इच्छा हो जाय तो फिर उनके मिलनेमें कुछ भी देरी न हो। सारे साधन इस जिज्ञासाके लिये ही हैं। भगवान्को जाननेकी यह उत्कट इच्छा भगवत्कृपासे ही होती है। यदि यह हमारे हाथकी चीज होती तो इस प्रकार प्रार्थना क्यों की जाती— 'माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोत्, अनिराकरणमस्तु'। (केनोपनिषद् शान्तिपाठ) यदि हम भगवान्का निराकरण न करनेमें समर्थ होते तो इसके लिये प्रार्थना क्यों की जाती ? परंतु नहीं, हम सब कुछ जानते हुए भी अनादिमायासे मोहित होकर उनका निराकरण करते हैं। हम जान-बूझकर भी अनन्तानर्थके निदानभूत संसारमें गिरते हैं। परंतु किया क्या जाय— 'केनापि देवेन हृदि स्थितेन यथा नियुक्तोऽस्मि तथा करोमि।' इसीसे महानुभाव लोग नास्तिकोंकी भी निन्दा नहीं करते; क्योंकि वे जानते हैं कि यह बात उनके वशकी नहीं है। एक व्यक्ति अपने कल्याणकी कामनासे संसारसे विरक्त होता है, परंतु पीछे मायासे मोहित होकर वह पतित हो जाता है। इसमें उसका क्या दोष है; वह तो अपना कल्याण ही चाहता है। न्यायकुसुमांजलिकार श्रीउदयनाचार्यजी नास्तिकोंके लिये कल्याण-कामना करते हुए भगवान्से प्रार्थना करते हैं— इत्येवं श्रुतिनीतिसम्प्लवजलैर्भूयोभिराक्षालिते येषां नास्पदमदधासि हृदये ते शैलसाराशयाः। किंतु प्रस्तुतविप्रतीपविधयोऽप्युच्चैर्भवच्चिन्तकाः काले कारुणिक त्वयैव कृपया ते भावनीया नराः ॥ (पञ्चमस्तबक १८)
३२२ भक्तसुधा महानुभावोंको दूसरोंको दुःखमें देखकर खेद हुआ ही करता है। इसीसे उदयनाचार्यजीने जो नास्तिकमतका खण्डन किया है, वह उन्हें भगवत्सुखसे वंचित देखकर करुणावश ही किया है—द्वेषके कारण नहीं किया। देखो महर्लोकनिवासी जीवोंको किसी प्रकारका कष्ट नहीं होता; परंतु वे जो अपनेसे नीचेके लोगोंको परमात्मसुखसे वंचित देखते हैं, इससे तो उन्हें खेद होता ही है। वस्तुतः देखा जाय तो हमलोग भी नास्तिकप्राय ही हैं। यदि भगवान्की सत्तामें हमारा पूरा विश्वास होता तो हमें लुक-छिपकर पाप करनेका साहस कैसे होता? भगवान् तो अन्तर्यामी हैं, वे तो हमारी मानसिक क्रियाको भी जानते हैं। अतः ऐसी परिस्थितिमें हमारे मनकी भी दुष्प्रवृत्ति कैसे हो सकती है? इस प्रकार यदि सच पूछा जाय तो हमसे तो नास्तिक ही अच्छे हैं। हम तो ऊपरसे आस्तिकताका दावा करते हुए वस्तुतः नास्तिक हैं, किंतु वे प्रत्यक्ष अपना दोष स्वीकार कर लेते हैं। अतः सिद्ध हुआ कि भगवान्का निराकरण करना—यह मायामोहित जीवोंका स्वभाव ही है। श्रीमद्भागवतादिमें यह प्रसिद्ध ही है कि गर्भावस्थामें जीवको भगवान्का प्रत्यक्ष ज्ञान हो जाता है। उस समय उसे अपने पूर्वजन्मोंकी भी स्मृति होती है और वह समझता है कि मैं भगवान्से विमुख रहनेके कारण ही अनन्त जन्मोंमें भटकता रहा हूँ। उस समय वह भगवान्की प्रार्थना करता है। पूर्वजन्मोंमें भी उसने इसी प्रकार सहस्रों बार प्रार्थना की थी; परंतु संसारमें पदार्पण करते ही उसे उसका कुछ भी ध्यान नहीं रहा। अतः यह देखकर कि मैं अनन्त बार प्रभुके प्रति अपनी प्रतिज्ञा भुला चुका हूँ, उसे बहुत संकोच भी होता है; तथापि प्रभुका स्वभाव समझकर वह फिर भी उनके सामने रोता ही है। यही दशा भगवान्से मिलनेके लिये वनको जाते समय भरतजीकी थी— फेरति मनहुँ मातु कृत खोरी। चलत भगति बल धीरज धोरी॥ जब समुझत रघुनाथ सुभाऊ। तब पथ परत उताइल पाऊ॥ (रा०च०मा० २।२३४।५-६) अहा! प्रभुका स्वभाव कैसा करुणामय है! उन्हें अपराधका तो स्मरण ही नहीं होता, किंतु थोड़े-से भी उपकारको वे बारम्बार स्मरण करते हैं— रहति न प्रभु चित चूक किए की। करत सुरति सय बार हिए की॥ (रा०च०मा० १।२९।५) अतः प्रभुका ऐसा स्वभाव समझकर ही जीव उस समय उनसे प्रार्थना करता है कि भगवन्! अब मैं अवश्य आपके चरणोंका समाश्रयण करूँगा। मैं आपको भूलकर बहुत भटक चुका हूँ, अब ऐसी भूल नहीं करूँगा। परंतु गर्भसे बाहर आते ही वह फिर प्रभुको भूल जाता है। यदि थोड़ी-सी विद्या या वैभव मिल गया तो फिर तो सीधे-सीधे प्रभुका निराकरण करने लगता है। परंतु भगवान् तो उनका भी अमंगल नहीं चाहते। वे जानते हैं कि 'ये अज्ञ हैं; मेरी मायासे मोहित हो रहे हैं।' इसीसे यह प्रार्थना की जाती है कि 'मैं ब्रह्मका निराकरण न करूँ और ब्रह्म मेरा निराकरण न करे।' किंतु भगवान्का निराकरण न करना अपने हाथकी बात नहीं है। यह तो भगवत्कृपासाध्य ही है। वह भगवत्कृपा तभी हो सकती है; जब हम भगवान्की आज्ञाका पालन करें और शास्त्र ही भगवान्की आज्ञा है— श्रुतिस्मृती ममैवाज्ञे यस्त उल्लंघ्य वर्तते। आज्ञाच्छेदी मम द्रोही मद्भक्तोऽपि न वैष्णवः ॥ सच्चा भगवत्प्रेमी वही है, जो शास्त्रका उल्लंघन नहीं करता अतः सच्चा भगवत्प्रेमी वही है, जो शास्त्रका उल्लंघन नहीं करता। वैष्णवधर्मका लक्षण करते हुए कहा है— 'न चलति निजवर्णधर्मतो यः सममतिरात्मसुहृद्विपक्षपक्षे।' (श्रीविष्णुपुराण ३।७।२०)
श्रीरासलीलारहस्य ३२३
वस्तुतः भगवत्कृपा तो सर्वत्र समान रूपसे विद्यमान है। उसे केवल अभिव्यक्त करना है और वह अभिव्यक्ति भगवदाज्ञा-पालनसे ही हो सकती है। श्रीगोसांईजी महाराज कहते हैं—'अग्या सम न सुसाहिब सेवा।' (रा०च०मा० २।३०१।४) जिस समय भरतजी भगवान्को लौटानेके लिये चित्रकूटपर्वतपर गये, उस समय उनका विशेष आग्रह देखकर भगवान्ने कहा कि 'भरत, तुम जैसा कहो वैसा ही करूँ।' उस समय भरतजीने यही सोचा कि मुझे अपने सुख-दुःखका विचार न करके भगवान्की आज्ञाका ही प्राधान्य रखना चाहिये; क्योंकि सेवकका धर्म तो स्वामीकी आज्ञाका पालन करना ही है। इधर व्रजांगनाओंका व्रत भी तत्सुखसुखित्व ही था। वृन्दावनसे मथुरा कुछ दूर नहीं थी; परंतु भगवान्की इच्छा न देखकर उन्होंने मरणसे भी सहस्रगुण दुःखदायिनी वियोग-व्यथा तो सहन की, किंतु वे मथुरा नहीं गयीं। अतः सेवकका प्रधान कर्तव्य तो स्वामीकी आज्ञाका पालन करना ही है। प्रभु-मिलनकी तीव्र उत्कण्ठा होना बड़े सौभाग्यकी बात है जिस समय भगवान् देखते हैं कि मेरा भक्त मुझसे मिलनेके लिये अत्यन्त उत्सुक है, उस समय वे उसे अपनी माधुरीका थोड़ा-सा रसास्वादन करा देते हैं। ऐसा वे इसीलिये करते हैं, जिससे कि उस उपासककी भगवन्मिलनकी तृष्णा और भी अधिक तीव्रतर हो जाय। इसीसे भगवान्का भजन करनेवालोंको कभी-कभी कुछ विलक्षण आनन्दका अनुभव हुआ करता है; परंतु वह स्थिर नहीं रहता। वह भजनानन्द तो प्रभु-प्रेमकी आसक्तिके लिये है। जिस प्रकार किसी कामुक पुरुषको कामिनी-सौन्दर्यका थोड़ा- सा भी व्यसन हो जानेपर फिर उसे कितना ही समझाया जाय, वह उसे छोड़ नहीं सकता, उसी प्रकार जिसे भजनानन्दकी थोड़ी-सी भी चाट लग गयी है, उसे संसारका कोई भी सुख आकर्षित नहीं कर सकता।
देखो—जिस समय नारदजीने देखा कि मेरी माताका देहावसान हो गया तो वे यह समझकर कि मेरा भगवद्भजनका एकमात्र प्रतिबन्ध नष्ट हो गया, बहुत प्रसन्न हुए और तत्काल वनको चल दिये। वहाँ इन्द्रियोंका निरोधकर दीर्घकालतक भगवद्भजन करते रहे। इसी समय एक दिन भगवान्ने उन्हें अपनी मधुरिमाका यत्किंचित् रसास्वादन कराया। परंतु वह आनन्द बहुत जल्दी तिरोहित हो गया। इससे नारदजी बड़े व्यग्र हुए। उन्होंने बहुत यत्न किया, परंतु पुनः उस रसका समास्वादन न कर सके। उन्होंने प्रभुसे बहुत अनुनय-विनय की, वे बहुत विह्वल हुए, परंतु प्रभुने फिर कृपा न की। वास्तवमें तो प्रभुकी यह कठोरता ही परम कृपा थी। भगवान्की सबसे बड़ी कृपा तो यही है कि जीव उनके लिये अत्यन्त तृषित हो जाय। यह तो परम सौभाग्य है। हमलोग स्त्री, धन आदिके लिये निरन्तर शोक- समुद्रमें डूबे रहते हैं, किंतु प्रभुके लिये हमारा अन्तःकरण कभी द्रवीभूत नहीं होता। न जाने वह समय कब आयेगा, जब प्रभुके विप्रयोगानलमें दग्ध होकर हमारा एक-एक पल एक-एक कल्पके समान व्यतीत होगा। भावुकोंकी स्थिति ऐसी ही विलक्षण हुआ करती है। अतः भगवान्ने देखा कि नारदके प्रेमका अभी शैशवकाल है। अभी इसके पनपनेकी आवश्यकता है। जिस समय जतु (तरल लाख)-के समान इसका अन्तःकरण सर्वथा द्रवीभूत हो जायगा, उसी समय यह मेरा यथावत् प्रेम प्राप्त कर सकता है। इसलिये भगवान्ने यह कठोरता धारण की थी। उनकी यह कठोरता भी कोमलता थी। प्रभुने थोड़ा-सा रसास्वादन इसीलिये कराया था, जिससे उनकी तृषा खूब बढ़ जाय; क्योंकि बिना रस-परिचयके उसमें प्रवृत्ति नहीं होती। इसी प्रकार जब भगवान् कृष्णने देखा कि मेरे उपेक्षाके वचन सुनकर गोपांगनाएँ कुछ उदास हो चली हैं, उन्हें आश्वासन देनेके लिये उन्होंने कहा—
३२४ भक्तिसुधा अथवा मदभिस्नेहाद् भवत्यो यन्त्रिताशयाः। आगता ह्युपपन्नं वः प्रीयन्ते मयि जन्तवः॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।२३) पहली उत्थानिकामें कहा जा चुका है कि जब प्राणी बहुत कालतक भगवच्चिन्तन करते रहनेपर भी भगवत्कृपासे वंचित रहता है तो उसकी लगनमें कुछ शिथिलता आ जाती है। हम रूप-रसादि शब्दोंका जितना ही अधिक सेवन करेंगे, उतनी ही उनके प्रति हमारी तृष्णा बढ़ती जायगी। शास्त्रालोचनकी भी ऐसी ही बात है। जिन्हें शास्त्रावलोकनका व्यसन हो जाता है, उनसे फिर उसके बिना रहा नहीं जाता। इसी प्रकार जो लोग निरन्तर भगवच्चरित्रोंका श्रवण- कीर्तन करते रहते हैं, उनका भी उसमें सुदृढ़ अनुराग हो जाता है। ऐसा अनुराग सनकादिमें था। आसा बसन ब्यसन यह तिन्हहीं। रघुपति चरित होइ तहँ सुनहीं॥ (रा०च०मा० ७।३२।६) किंतु यदि भगवद्भजन कुछ कालके लिये छूट जाता है तो उसका स्वारस्य भी कुण्ठित हो जाता है—उसका फिर नये सिरेसे अभ्यास करना होता है। इसीसे योगसूत्रकार महर्षि पतंजलिने कहा है—'स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमिः॥' (योगदर्शन १।१४) आप चाहे भगवच्चरित्रोंका श्रवण-मनन करें, चाहे कर्मनिष्ठाको दृढ़ करें, चाहे योगाभ्यासमें प्रवृत्त हों और चाहे वेदान्तश्रवण करें— सभीको दीर्घकालतक आदरपूर्वक सेवन करनेकी आवश्यकता है। यदि आपको खिचड़ी बनानी है तो उसके लिये जैसी और जितनी अग्निकी जितनी देरतक आवश्यकता है यदि उतनी अग्नि न देंगे अथवा बीच-बीचमें अग्निसंयोगको रोक देंगे तो खिचड़ी कभी बन ही न पायेगी। इसी प्रकार भगवद्भजनमें सफलता प्राप्त करनेके लिये भी दीर्घकालतक निरन्तर पर्याप्त अभ्यासकी अपेक्षा है। इसी तरह यदि दीर्घकालतक भगवच्चरणस्मरण और भगवत्स्वरूपानुध्यान करते रहोगे तो उसका व्यसन हो जायगा और यह व्यसन ही परम सौभाग्य है। 'पुंसो भवेद् यहिं संसरणापवर्ग- स्त्वय्यब्जनाभसदुपानया मतिः स्यात्॥' (श्रीमद्भा० १०।४०।२८) परंतु यदि दीर्घकालतक प्रियतमके सम्मिलनकी चाह लगी रहे—प्रभुसे मिलनेकी उत्कण्ठा उत्तरोत्तर बढ़ती जाय तो यह बड़े ही सौभाग्यकी बात है। ऐसी प्रीति तो चातक और मीनमें ही देखी जाती है। जग जस भाजन चातक मीना। नेम पेम निज निपुन नबीना॥ (रा०च०मा० २।२३४।३) चातकका एक ही नियम है। वह स्वाति-बूँदको छोड़कर दूसरे जलकी ओर कभी दृष्टिपात भी नहीं करता। उसके अभावमें वह निर्मल-नीर-प्रपूरित सरोवरके तटपर भी पीऊ-पीऊ रटते-रटते मर जायगा, परंतु अन्य जल कदापि ग्रहण न करेगा। अपने एकमात्र प्रियतम पयोधरको छोड़कर वह किसीसे याचना नहीं करता। परंतु वह पयोधर उसे क्या देता है? खूब गर्ज-तर्जकर ओलोंकी वर्षा करता है और बिजली भी गिरा देता है। जलदु जनम भरि सुरति बिसारउ। जाचत जलु पबि पाहन डारउ॥ (रा०च०मा० २।२०५।३) परंतु उसकी तो एक ही टेक रहती है। क्या उसे जलकी कमी है? नहीं, परंतु यदि उसे अमृत भी दिया जाय तो भी वह अपना नियम भंग नहीं कर सकता। चातकु रटनि घटें घटि जाई। बढ़ें प्रेमु सब भाँति भलाई॥ (रा०च०मा० २।२०५।४) यही दशा मीनकी है। वह तो एक क्षणके लिये भी अपने प्राणाधार जलका वियोग सहन नहीं कर सकता। इसी विषयमें कविकी उत्प्रेक्षा है— आपदिरेऽम्बरपथं परितः पतङ्गा भृङ्गा रसालमुकुलानि समाश्रयन्ति। संकोचमञ्चति सरस्त्वयि दीनदीनो मीनो नु हन्त कतमां गतिमभ्युपैतु॥ (सुभाषितरत्नभाण्डागार) 'अरे सर! इस समय तो तुममें बड़े दिव्यातिदिव्य पुष्प विद्यमान हैं। इसीसे तेरे बहुत-से साथी बने हुए
श्रीरासलीलारहस्य [३२५]
हैं। परंतु जब तू क्षीण हो जायगा, तुझमें खिले हुए कमल कुम्हला जायँगे; तब ये हंस तुझे छोड़कर गगनमण्डलमें विहार करने लगेंगे और ये भ्रमर, जो तेरे परम प्रेमी बने हुए हैं, वे भी तुझे छोड़कर रसाल- मुकुलका ही आश्रय लेंगे। परंतु बता, यह मीन कहाँ जायगा ? इसे तेरे साथ ही—नहीं, नहीं, तुझसे भी पहले सूख जाना होगा।' साधन-कार्यमें श्रद्धा (उत्साह)-की बड़ी आवश्यकता है इस प्रकार प्रेमास्वादन करनेवालोंमें प्रधान तो चातक और मीन ही हैं। अन्य प्रेमियोंमें तो इस तरहका एकांगी प्रेम प्रायः देखा नहीं जाता। लोकमें यह कहावत प्रसिद्ध ही है कि 'एक हाथसे ताली नहीं बजती' वहाँ तो प्रेमके बदलेमें प्रेम किया जाता है। अतः दोनों ओरसे प्रेमकी अपेक्षा होती है। इसलिये जब प्राणी भगवान्के सम्मिलनकी आकांक्षासे कुछ कालतक भगवच्चिन्तनमें तत्पर रहता है और फिर भी भगवान्की ओरसे उसे कोई सहारा नहीं मिलता तो उसका धैर्य भग्न हो जाता है और उसकी श्रद्धा शिथिल पड़ जाती है। साधनमार्गमें श्रद्धाकी बड़ी आवश्यकता है। योगदर्शनमें श्रद्धाका अर्थ उत्साह किया है। वहाँ बतलाया है कि वह माताके समान योगीपर अनुग्रह करता है। बिना श्रद्धा या उत्साहके साधनमार्गमें प्रवृत्ति नहीं हो सकती। अतः श्रद्धापूर्वक स्वाध्याय और अभ्यासमें तत्पर रहनेकी आवश्यकता है। भगवन्मार्गमें शीघ्रतर प्रगति होनेके लिये स्वाध्याय और योगाभ्यास दोनोंहीके क्रमिक अनुष्ठानकी अपेक्षा है। स्वाध्यायाद्योगमासीत योगात्स्वाध्यायमावसेत्। स्वाध्याययोगसम्पत्त्या परमात्मा प्रकाशते ॥ (श्रीविष्णुपुराण ६।६।२) यदि तुम निरन्तर ध्यानपरायण होकर आरम्भसे ही चार घण्टेकी समाधि लगानेका प्रयत्न करोगे तो उसमें कभी सफल न हो सकोगे। पहले-पहले केवल पाँच मिनट ध्यानका अभ्यास करो; फिर पाँच मिनट स्वाध्याय करो। इस प्रकार ध्यान और स्वाध्यायका साथ-साथ अभ्यास करते हुए क्रमशः ध्यानकालमें वृद्धि करो। ध्यानके बढ़नेपर धीरे-धीरे स्वाध्यायमें कमी कर सकते हो। उससे पहले यदि स्वाध्याय छोड़कर केवल ध्यानमें ही लगोगे तो ध्यान तो होगा नहीं, केवल मनोराज्य या तन्द्रामें समयका अपव्यय होगा। स्वाध्याय क्या है ? अपने प्रियतमके स्वरूपका परिचायक अध्ययन ही स्वाध्याय कहलाता है। यदि तुम भगवान् कृष्णका साक्षात्कार करना चाहते हो तो श्रीसूरदासजीके उन पदोंका पाठ करो, जिनमें भगवान्के दिव्यातिदिव्य स्वरूपसौष्ठवका वर्णन किया गया है अथवा श्रीमद्भागवतसे भगवान्की दिव्य-मंगलमयी मूर्तिकी स्फूर्ति करनेवाले अंशोंका परिशीलन करो। उसके मननसे जब तुम्हारी मनोवृत्ति ध्येयाकार हो जाय तो जितने काल वह स्वरूप मानस नेत्रोंके सामने रह सके, उतने समयतक ध्यान करो। फिर जब ध्यानमें शिथिलता आये तो स्वाध्याय करो। इसी प्रकार निर्गुणोपासकोंको भी 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' (तैत्तिरीय० २।१) आदि वाक्योंका मनन करते हुए ही ध्यानाभ्यासमें प्रवृत्त होना चाहिये। इस तरह स्वाध्याय और ध्यानका क्रमिक अभ्यास करनेसे ही प्रभुके स्वरूपकी स्फूर्ति जल्दी हो सकती है। जब बहुत काल अभ्यास करते रहनेपर भी भगवत्स्वरूपकी स्फूर्ति नहीं होती तो साधक बहुत निरुत्साह हो जाता है। उसका उत्साह बनाये रखनेके लिये ही स्वाध्यायकी आवश्यकता है। बहुत-से लोग भिन्न-भिन्न महात्माओंके पास जाकर साधनकी बात पूछा करते हैं। उन्हें कोई कुछ साधन बतलाता है और कोई कुछ दूसरा साधन बतला देता है। वे कुछ दिनतक साधनका अवलम्बन करते हैं और उसमें असफल होनेपर निरुत्साह हो जाते हैं। उनका हृदय विषादग्रस्त हो जाता है। किंतु विषादसे कोई लाभ नहीं होता। लाभ तो साधन- मार्गमें चलनेसे ही होगा। विषादसे शोक-मोहके
सिवा और कुछ हाथ नहीं लगता। इसलिये साधकको विषाद नहीं करना चाहिये। जिस समय तुम्हारा साधन पूरा होगा, उस समय साध्य अवश्य मिलेगा; उसके लिये उतावले क्यों होते हो ? तनिक हिरण्यकशिपुके तपकी ओर ध्यान दो। उसके शरीरको पिपीलिकाओंने छलनी कर दिया था, मांस सर्वथा सूखकर केवल अस्थि-चर्ममात्र रह गये थे; तो भी वह निरुत्साह नहीं हुआ। वह कहता है कि ‘काल नित्य है और आत्मा नित्य है; अतः यदि शरीर नष्ट भी हो जाय तो कोई चिन्ता नहीं, हम तपस्यासे पीछे नहीं हटेंगे। यह है तपस्याका उत्साह।’ देखो, वे लोग राक्षस थे, किंतु उनकी धारणा कैसी स्थिर थी। हमलोग दस दिन माला फेरते हैं और कोई आनन्दानुभव न होनेके कारण समय और मन्त्रको दोष देने लगते हैं। किंतु यह हमारी भूल है। हमें दृढ़तापूर्वक अपने साधनपर डटे रहना चाहिये। एक वैश्य व्यापारको अपना सर्वस्व समझता है। व्यापार करनेमें वह अपनी सर्वस्व रक्षा मानता है और व्यापार न करनेमें सर्वस्वका नाश समझता है। इसीसे वह धन, स्त्री, गृह और देशकी भी उपेक्षा करके विदेशमें चला जाता है तथा अपने कारोबारके लिये दिन-रात एक कर देता है। लोग कहते हैं— ‘महाराज ! भजन करते हैं तो निद्रा बहुत सताती है।’ किंतु तनिक स्टेशनमास्टर और खजांचियोंसे तो पूछो, उन्हें कितनी निद्रा आती है ? वे जानते हैं कि थोड़ा- सा भी प्रमाद होनेसे हानि होनेकी सम्भावना है। वे दो-चार रुपयेकी हानिकी आशंकासे रातभर जागते रहते हैं। इसी प्रकार तुम्हें भी यदि भजनमें ढील होनेपर हानिकी आशंका होती तो आलस्य कैसे आ सकता था ? जिसे तीव्र क्षुधा या तीव्र पिपासा होती है, उससे कब बैठा जाता है? इसी प्रकार यदि भगवत्तत्त्वके न जाननेमें अपनी हानि सुनिश्चित हो और उसके ज्ञानमें अपना परम लाभ निश्चित हो तो प्रमाद हो ही नहीं सकता। भगवती श्रुति कहती है— ‘इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः।’ (केन० २।५) याद रखें—यदि इस मनुष्यजन्ममें आप भगवान्का साक्षात्कार न कर सके तो ‘महती विनष्टिः’— सर्वस्वनाश हो जायगा; क्योंकि जब दो रुपयेकी हानिकी आशंकासे रातको नींद नहीं आती तो सर्वस्वनाशकी आशंका होनेपर कैसे आलस्य सतायेगा ? हमें जो काम करना है, उसकी आवश्यकताका अनुभव करना चाहिये। भगवद्भजनमें सर्वस्व लाभ है और उसकी उपेक्षामें सर्वनाश है—जबतक ऐसा सुदृढ़ निश्चय न होगा, भजनमें प्रगति कैसे होगी ? सामान्य रूपसे यह बात सभीको निश्चित है कि एक दिन अवश्य मरना होगा। परंतु यह निश्चय रहते हुए भी साठ-साठ वर्षके बूढ़े भी दुराचार, दम्भ और पापसे निवृत्त नहीं होते। इसमें क्या हेतु है?—मोह। मोह ही उन्हें मृत्युकी घड़ीका विस्मरण करा देता है। एक तो इस प्रकारका मृत्युका सामान्यरूपेण निश्चय और दूसरा अपने पुत्र या बन्धुकी मृत्युको देखकर होनेवाला वैराग्य—क्या ये दोनों समान हैं? हमें भी अपनी मृत्युका निश्चय है; परंतु क्या हम उसकी ओरसे निश्चिन्त नहीं हैं? किंतु यदि हमें राजाज्ञा हो जाय कि आजसे पाँचवें दिन तुम्हें फाँसी दे दी जायगी तो फिर क्या पाँच दिनतक हमें नींद आ सकती है ? अतः हमें ऐसा अभिमान न करना चाहिये कि हम परमार्थ-विषयको जानते ही हैं, हमें सत्पुरुष या सच्छास्त्रोंके संगकी क्या आवश्यकता है? यदि तुम ऐसा सोचोगे तो तुम्हारी प्रगति शिथिल पड़ जायगी। नहीं, इनका संग तो विवेक और वैराग्यको उद्दीपन करनेवाला है। इस उद्दीपनकी बहुत आवश्यकता है। हमें विचारशक्तिको निरन्तर जाग्रत् रखना चाहिये। इस प्रकार जब भजनकी आवश्यकता सुनिश्चित रहेगी तो भजनमें प्रमाद न होगा। यह कोई जादू-टोना या मन्त्र नहीं है, यह तो युक्ति और अनुभवसिद्ध बात है। उत्साह-भंग होनेसे
पुरुष निर्वीर्य हो जाता है; अतः उत्साहको स्थिर बनाये रखना चाहिये। सुनते हैं ध्रुवजीको छः महीनेमें ही भगवान्का दर्शन हो गया था। जिस समय भगवान् उनके समक्ष प्रकट हुए, ध्रुवने कहा—'भगवन्! मैं तो सुनता था, आप बड़े दुराराध्य हैं, परंतु मुझपर आपने इतनी शीघ्र कृपा कर दी।' भगवान्ने कहा—'ध्रुव, तुम यह मत समझो कि हम छः मासमें ही मिल गये हैं; आओ देखो, हमारी प्राप्तिके लिये तुम्हारे कितने शरीर शुष्क हुए हैं।' ध्रुवजीने दिव्य-दृष्टिसे देखा कि उनके सहस्रों शरीर कन्दराओंमें सूखे हुए पड़े हैं। भगवान् बुद्धकी तो प्रतिज्ञा थी— 'इहासने शुष्यतु मे शरीरम्।' भगवत्प्राप्तिका एकमात्र साधन— भगवत्सम्मिलनकी तीव्रतर अभिलाषा—एक दृष्टान्त अतः असफलतासे हताश मत हो। साधनमें लगे रहो। देखो—वायुयान आदि लौकिक पदार्थोंके आविष्कारमें भी कितने समय, धन, जन-समुदायका क्षय हुआ है। भगवत्प्राप्ति तो उसकी अपेक्षा कहीं अधिक मूल्यवान् है। बस, लगे रहो, भगवान् अवश्य कृपा करेंगे। तुमने टिट्टिभकी गाथा सुनी होगी। समुद्र उसके अण्डेको हर ले गया था। इससे कुपित होकर उसने समुद्रको सुखा डालनेका निश्चय किया। वह अपने पंजेमें बालू भरकर समुद्रमें डाल देता और चोंचसे एक बूँद पानी लेकर समुद्रसे बाहर डाल देता। उसने दृढ़ निश्चय कर लिया कि चाहे कितने ही जन्म बीत जायँ समुद्रको अवश्य सुखा डालना है। यह सब लीला देवर्षि नारदजीने भी देखी और टिट्टिभकी दुर्दशा देखकर उन्हें उसपर बड़ी दया आयी। उन्होंने यह सारा समाचार पक्षिराज गरुड़को सुनाया और उन्हें अपने सजातियोंकी सहायता करनेके लिये उत्तेजित किया। फिर क्या था? पक्षिराजके तो पर मारते ही समुद्रमें खलबली पड़ गयी; उसे तुरंत हार माननी पड़ी और टिट्टिभके अण्डे लाकर देने पड़े। यह समुद्रकी पराजय टिट्टिभके अपने प्रयत्नसे नहीं हुई थी। उसमें तो गरुड़जीकी सहायता ही कारण थी। परंतु यदि टिट्टिभ ऐसा हठ न करता तो गरुड़जी क्यों आते? इसी प्रकार जो लोग दत्तचित्त होकर तन-मनसे लग जाते हैं, उन्हींपर भगवान्की कृपा होती है और उसीसे वे भगवत्प्राप्ति करनेमें समर्थ होते हैं। भगवत्प्राप्तिका एकमात्र साधन तो भगवत्सम्मिलनकी तीव्रतर तृषा ही है; उस छटपटाहटके बिना भगवत्कृपा अत्यन्त दुर्लभ है। हठ वश शठ बहु साधन करहीं। भक्ति हीन भव सिन्धु न तरहीं॥ इस प्रकार दीर्घकालतक भगवान्के लिये सतृष्ण रहते-रहते भी जब साधकको प्रभुकी ओरसे कोई सहारा मिलता दिखायी नहीं देता तो वह श्रान्त हो जाता है, उसका हृदय कुछ अवसन्न हो उठता है। उस समय प्रभु उसपर अनुग्रह करते हैं। प्रभुके हृदयाकाशमें जो अनुग्रहरूप चन्द्र विराजमान है, प्रभुके मन्दहासके द्वारा उसकी शीतल किरणें साधकके सन्तप्त हृदयतक पहुँचकर उसे शान्त कर देती हैं। इस प्रकार प्रभुका अनुग्रह होनेपर साधकको कुछ आश्वासन प्राप्त होता है और वह चौगुने उत्साहसे साधनमें जुट जाता है। यही स्थिति यहाँ व्रजांगनाओंकी थी। वे लौकिक-वैदिक सभी प्रकारकी श्रृंखलाओंको तोड़कर भगवान्की सन्निधिमें आयी थीं; किंतु यहाँ उनका इस प्रकार तिरस्कार हुआ। जिनके लिये उन्होंने सर्वस्व त्यागकर अनेकविध विघ्नोंका सामना किया था, वे ही ऐसे निष्ठुर भावसे उनकी उपेक्षा कर रहे हैं। ऐसी स्थितिमें उनके अनाश्वासका अवकाश है या नहीं? परंतु प्रभु बड़े कृपालु हैं। उनका तात्पर्य उनके तिरस्कारमें तो था ही नहीं। वे तो 'स्थूणानिखननन्याय' से अपने प्रति उनकी निष्ठाकी परीक्षा कर रहे थे; वे तो उनकी निष्ठाको और भी सुदृढ़ करना चाहते थे। इससे यह नहीं समझना चाहिये कि व्रजांगनाओंके भावमें भी कोई न्यूनता रहनी सम्भव थी। वे तो
३२८ भक्तिसुधा प्रेममार्गकी आचार्या हैं। मीन और चातकमें जो प्रेम उपलब्ध होता है, वह तो व्रजांगनाओंके प्रेमसुधासिन्धुका एक कणमात्र है। जीव और परब्रह्ममें जो प्रेमसम्बन्ध है, उस प्रेमका तो एक अंश भी मीन और चातकमें नहीं है। 'आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति।' (बृहदारण्यक० २।४।५) किंतु हाँ, वह प्रेम तिरोहित अवश्य है तथा व्रजांगनाओंका भगवान्के प्रति जो अनुराग है, वह तो तत्त्वज्ञ महानुभावोंके आत्मप्रेमकी अपेक्षा भी कहीं बढ़कर है। हम कह चुके हैं— मुक्तानामपि सिद्धानां नारायणपरायणः। सुदुर्लभः प्रशान्तात्मा कोटिष्वपि महामुने ॥ (श्रीमद्भा० ६।१४।५) यद्यपि तत्त्वज्ञ भी प्रपंचका मिथ्यात्व निश्चय करके सजातीय, विजातीय और स्वगत-भेदशून्य परब्रह्ममें ही स्थित होते हैं तथापि चतुर्थ, पंचम और षष्ठ भूमिकावाले ज्ञानियोंका आत्मप्रेम भी उतना प्रौढ़ नहीं होता, जैसा कामुकोंका अपनी प्रेयसीके प्रति होता है। इसीसे विद्यारण्य स्वामीने जीवन्मुक्तिविवेकमें तत्त्वज्ञानके पश्चात् भी मनोनाशकी आवश्यकता बतलायी है, क्योंकि आत्मज्ञान हो जानेपर भी प्रारब्धकी प्रबलता रहनेके कारण विक्षेप बना ही रहता है। इसीसे चित्त ब्रह्मानुसन्धानसे हटकर विषयोंकी ओर चला जाया करता है। ज्ञानी लोग प्रपंचचिन्तनमें अनर्थ समझकर ही उसे उस ओरसे हटाकर पुनः ब्रह्मानुसन्धानमें जोड़ते रहते हैं। ऐसा करते हुए भी उनका चित्त कई बार आत्मानुसन्धानसे हटकर अनात्मपदार्थोंकी ओर चला जाता है। आत्मानुसन्धानमें उसकी स्वारसिक प्रवृत्ति नहीं होती। इसीके लिये योगाभ्यास किया जाता है। निरन्तर योगाभ्यास करते-करते ब्रह्मतत्त्वमें उसकी स्वारसिक प्रवृत्ति हो जाती है। ऐसा नारायण-परायण महापुरुष सुदुर्लभ है। व्रजांगनाओंकी ऐसी स्थिति स्वाभाविक थी। भगवान्के अनेक प्रकारसे तिरस्कार करनेपर भी उनकी मनोवृत्ति भगवान्से विचलित नहीं हो सकती थी। व्रजांगनाएँ तो परम सिद्ध थीं; उनके चरणकमल तो योगेश्वरोंके लिये भी वन्दनीय हैं। परंतु उन्हें लक्ष्य करके ही भगवान्ने सर्वसाधारणके कल्याणके लिये ऐसी कई बातें कही हैं, जिनकी वे पात्र नहीं थीं। हाँ, उनमें भी जो सुदृढ़ निष्ठावाली नहीं थीं, उनके लिये वे बातें उपयुक्त भी हो सकती हैं। भगवान्द्वारा व्रजांगनाओंको आश्वासन इस प्रकार कई बार भगवान्के उपेक्षा करनेपर सम्भव है व्रजांगनाओंको कुछ सन्ताप हुआ हो। अतः उन्हें अपनी अवहेलनासे कुछ खिन्न देखकर भगवान्ने उन्हें आश्वासन देनेके लिये कहा— अथवा मदभिस्नेहाद् भवत्यो यन्त्रिताशयाः। आगता ह्युपपन्नं वः प्रीयन्ते मयि जन्तवः ॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।२३) 'मैंने जो तुम्हारे विषयमें तरह-तरहके पक्षोंकी कल्पना कर रखी थी, वह व्यर्थ थी। मैं अब समझा; आप तो हमारे प्रेमसे आकृष्ट-चित्ता होकर ही हमसे मिलने आयी हैं।' व्रजांगनाएँ वस्तुतः प्रेमके प्रवाहमें बहकर ही आयी थीं; वे स्वयं अपनी इच्छासे वहाँ नहीं आयीं। भगवान्के मुखारविन्दसे वेणुनादके रूपमें निःसृत जो प्रेमतत्त्व था, उसीने उन्हें खींच लिया था। व्रजांगनाओंका अन्तःकरण तो स्वयं ही प्रेमामृतपूरित एक महासरोवरके समान था; किंतु वह अनेकविध प्रतिबन्धसे निबद्ध था। उसे लौकिक-वैदिक मर्यादारूप बहुत-से बाँधोंने मर्यादामें रोक रखा था, किंतु जब यहाँ श्यामघनने वेणुनादरूप गर्जन करते हुए दिव्यातिदिव्य रसका वर्षण किया तो उससे गोपांगनाओंके हृदयस्थ प्रेमसमुद्रका बाँध टूट गया। उसमें ऐसी बाढ़ आ गयी कि वह और अधिक काल मर्यादामें न रह सका। व्रजांगनाओंने अपनी मर्यादाकी यहाँतक रक्षा की थी कि शरीरकी सुध-बुध भूल जानेपर भी उन्होंने अपनी गोपजातिके लिये विहित लौकिक-वैदिक कृत्योंकी उपेक्षा नहीं की। वे दधिमन्थनादि गृहकृत्य करती ही रहीं। हाटमें गोरस बेचने जातीं, किंतु प्रेमविभोर होकर 'दही लो' कहनेके बदले 'श्याम लो' पुकारने लगतीं ! इससे हमलोगोंके लिये उन्होंने यही उपदेश दिया है