भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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२८० भक्तिसुधा से भावुकोंके मतमें तो श्रीकृष्णकृपाकी प्राप्तिके लिये श्रीप्रियाजीकी उपासना ही कर्तव्य है। उनका मत है कि श्रीराधिकाजी स्वाधीनभर्तृका हैं, भगवान् उनके अधीन हैं, वे नित्य निकुंजमें निरन्तर श्रीप्रियाजीके सौन्दर्यसमास्वादनके लिये उन्हें अपने माधुर्यरसका नैवेद्य समर्पण करते हैं। इस प्रकार भगवान्‌से आराधित होनेके कारण ही वे 'श्रीराधा' कहलाती हैं। अतः उनका आह्वान करनेके लिये भगवान्‌को वेणुनाद करनेकी आवश्यकता नहीं थी। वे तो उनकी सन्निधिमें ही थीं और उनकी प्रसन्नताके लिये ही यह लीला भी की गयी थी। ऐसी अवस्थामें यह प्रश्न होता है कि फिर भगवान्‌के वेणुनादका और क्या प्रयोजन था ? यहाँ यही समझना चाहिये कि भगवान्‌ने अन्य यूथेश्वरी और साधनसिद्धा व्रजांगनाओंको बुलानेके लिये ही वंशीध्वनि की थी। वे चिरकालसे भगवत्संगके लिये उत्सुक थीं और तरह-तरहके व्रत-उपवास भी कर रही थीं, अतः उन्हें उनकी उपासनाका फल देनेके लिये ही भगवान्‌ने वंशीध्वनि की। × × × इस तरह अखण्डमण्डल श्रीवृषभानुनन्दिनीके मुखके समान चन्द्रमाको तथा उसकी शीतल सुकोमल रश्मियोंसे रंजित मनोहर वनको देखकर श्रीव्रजांगनाओंका मन हरण करनेवाले वेणुगीत-पीयूषको प्रवाहित किया। उस प्रेमानन्द-समुद्रको बढ़ानेवाले गीतको सुनकर उनका मन मोहित होकर कृष्णकी ओर आकर्षित हो उठा, मानो कृष्णने हठात् उनके मनको हर लिया। बस फिर क्या था, जैसे नदियाँ समुद्रकी ओर दौड़ती हैं, वैसे ही समस्त व्रजांगनाएँ संभ्रमसे श्रीकृष्णकी ओर चल पड़ीं। मानो जब प्रेमानन्दमें मन बह चला, तब मनके परतन्त्र शरीर भी उसी वेगमें बह चला। यह गीत पीयूषप्रवाहक इतर प्रवाहोंकी तरह अपने संसर्गी पदार्थोंको गन्तव्यकी ओर न ले जाकर उद्गम-स्थान श्रीकृष्णकी ओर ही ले जाता है। किंवा जब श्रीकृष्णके वेणुगीतरूप चौरने व्रजांगनाओंके धैर्य, विवेक आदि रत्नोंसे भरपूर मनोमंजूषाको हर लिया तो वे व्याकुल होकर उसीके अन्वेषणके लिये दौड़ पड़ीं। कोई दोहन, कोई परिवेषण, कोई लेपन, मार्जन, अंजन, पति-शुश्रूषण छोड़कर उलटे-पलटे भूषण- वसन धारणकर श्रीकृष्णके पास चल पड़ीं। पति, पिता, भ्राता आदिके रोकनेपर भी वे न रुकीं। जब कुछ व्रजांगनाओंको उनके पति आदिने गृहके भीतर रोक लिया तो वे वहीं नेत्र मींचकर श्रीकृष्णका ध्यान करने लगीं। प्रियतमके दुःसह विरहजन्य तीव्र तापसे समस्त पाप कम्पित हो उठे और ध्यानप्राप्त प्रियतमके परिरम्भणजन्य अनन्त आनन्दसे पुण्य भी दुर्बल हो गये। इस तरह व्रजांगनाएँ सद्यः क्षीणबन्धन होकर गुणमय देहको त्याग जारबुद्धिसे भी उन्हीं भगवान्‌को प्राप्त हो गयीं। भगवान्‌का गोपांगनाओंको उपदेश समीपमें आयी हुई व्रजांगनाओंको देखकर भगवान् अपनी वचन-चातुरीसे मोहित करते हुए बोले—'हे महाभागाओ! आपका स्वागत है। हम आपलोगोंका क्या प्रिय करें? व्रजमें कुशल तो है? आपलोग अपने आगमनका कारण कहो। यह घोररूपा रजनी घोर व्याघ्रादि जन्तुओंसे निषेवित है। आपलोग व्रजमें जाओ। हे सुमध्यमाओ! यहाँ स्त्रियोंको नहीं ठहरना चाहिये। आपलोगोंके माता, पिता, भ्राता, पति आपलोगोंको घरमें न देखकर ढूँढ़ते होंगे। बन्धुओंको संकट न पहुँचाओ। बहुत हो चुका, अब आपलोग विलम्ब मत करो। व्रजको चली जाओ।' आनन्दकन्द भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रने व्रजांगनाओंको यही आदेश दिया कि तुमलोग गोष्ठमें रहकर अपने पतियोंकी शुश्रूषा करो। हमारी प्राप्तिका यही उपाय है। यदि पातिव्रत्यमें तुम्हारी गति न हो तो 'शुश्रूषध्वं सतीः' पतिव्रताओंकी सेवा करो। इस व्याजसे भगवान्‌ने समस्त पुरुषोंको यही उपदेश किया है कि जिनकी गति परब्रह्मकी उपासनामें न हो, वे देवता और माता- पितादिरूप वैदिक और लौकिक ईश्वरोंकी उपासना करें। यदि वे पहले इन ईश्वरोंकी सेवा करेंगे तो