भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिवृत्त करते हुए प्रकट हुए और क्या करते हुए प्रकट हुए ? 'प्राच्याः प्राचीनायाः निर्वृत्तिकायाः बुद्धेर्मुखं प्रधानं सत्त्वात्मकं भागम् अरुणेन स्वाभिव्यक्ति- जनितेन सुखेन विलिम्पन् उदगात्' अर्थात् वे प्राचीना यानी निवृत्तिकामिनी बुद्धिके मुख यानी प्रधान सात्त्विक भागको अपनी अभिव्यक्तिसे उत्पन्न हुए सुखके द्वारा विलेपित करते हुए उदित हुए। भगवत्सुखका बुद्धिपर ही लेप करना युक्तियुक्त भी है; क्योंकि वही उसे ग्रहण कर सकती है—'स्वयं तदन्तःकरणेन गृह्यते' अर्थात् ब्रह्माभिव्यक्तिजनित जो सुख है, उसकी अभिव्यक्ति निश्चयात्मिका बुद्धिपर ही होती है। वे परब्रह्मरूप उडुराज किस प्रकार उदित हुए, सो बतलाते हैं—'यथा कश्चित् दीर्घदर्शनः दीर्घेण कालेन दर्शनं यस्य एवंभूतः प्रियः प्रियायाः विप्रोषित- भर्तृकायाः शुचः विभागसम्भूतानि शोकाश्रूणि शान्तमैः करैः करव्यापारैः मृजन् करधृतेन अरुणेन कुङ्कुमेन मुखं विलिम्पन् च स्यात्तथा' अर्थात् जिस प्रकार कोई दीर्घकालके अनन्तर आनेवाला प्रवासी पति अपनी वियोगसन्तप्ता प्रियतमाके शोकाश्रुओंको अपने सुशीतल कर-व्यापारोंसे पोंछता है तथा उसके मुखको अपने हाथमें लिये हुए कुंकुमसे लाल कर देता है, उसी प्रकार ये उडुराज उदित हुए। अथवा यों समझो कि जिस समय भगवान्ने रमण करनेकी इच्छा की और गोपांगनाओंके सौन्दर्य- माधुर्य एवं तपका स्मरणकर उनको वृन्दावनमें आह्वान करनेका संकल्प किया, उसी समय उडुराज- प्रेमाम्बुराशिकी वृद्धि करनेवाला चन्द्रमा सस्यरूप चर्षणियोंके शोकसूर्यकी तीक्ष्णतर किरणोंसे उत्पन्न हुई म्लानताको अपनी सुशीतल किरणोंसे निवृत्त करता हुआ उदित हो गया। इसके सिवा 'उडुराजः' इस शब्दसे भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र भी अभिप्रेत हो सकते हैं; क्योंकि यौवनकी अतिशयता १ के कारण उडुओ-नक्षत्रोंके समान स्वच्छ हैं और रंजन यानी अनुरागजनक होनेके कारण राजा हैं अथवा यदि 'उरुराजः' ही 'उडुराजः' है—ऐसा मानें तो इस प्रकार अर्थ करना चाहिये— 'स्वकीयप्रेमातिशयेन उरुधा रञ्जयतीति उरुराजः' अथवा 'उरून् महतस्तत्त्वदर्शिनोऽपि महामुनीन् रञ्जयति स्वानुरागयुक्तान् करोतीति उरुराजः' अर्थात् अपनी प्रेमातिशयताके कारण अनेक प्रकारसे रंजन करते हैं अथवा जो महान् तत्त्वदर्शी भी हैं, उन महामुनियोंका भी अपने अनुराग-विशेषके द्वारा अनुरंजन करते हैं; इसलिये श्रीकृष्णचन्द्र उरुराज हैं। वे प्रिय अर्थात् धन, धाम और सुहृद्वर्गसे भी प्रियतर २ यानी सबके सर्वस्वभूत और दीर्घदर्शन—जिनका दर्शन दीर्घ यानी अत्यन्त मूल्यवान् है, ऐसे श्रीकृष्णचन्द्र चर्षणी यानी गोपीजनोंके शोक—प्रियतमके विरहजनित सन्तापको निवृत्त करने तथा 'ककुभः'३ सौन्दर्यातिशयके कारण मन्दगामिनी प्राची पूजनीया प्रियतमा श्रीवृषभानु- नन्दिनीके मानादिजनित आँसुओंको अपने कर-व्यापारोंसे निवृत्त करते एवं अरुण कुंकुमादिसे उनका मुख विलेपित करते विहारस्थलमें आविर्भूत हुए। श्रीवृषभानुनन्दिनी भगवान्की नित्य सहचरी हैं। जिस प्रकार शक्तिके बिना शिव, मधुरिमाके बिना मिश्री और दाहिका शक्तिके बिना अग्नि नहीं रह सकते, उसी प्रकार श्रीराधिकाजीके बिना श्यामसुन्दर नहीं देखे जाते। वे उनकी स्वरूपभूता आह्लादिनीशक्ति हैं। उन्हींके कारण श्रीकृष्णचन्द्रकी सारी शोभा है; अतः उन्हें छोड़कर वे एक पल भी नहीं रह सकते। वे निरन्तर उनकी सन्निधिमें रहते हैं और एक-दूसरेसे तादात्म्यको प्राप्त हो परस्पर एक-दूसरेकी शोभा बढ़ाते हैं। माधुर्य भावसे उपासना करनेवाले बहुत- १. यों तो भगवान्की अवस्था इस समय केवल ८-१० वर्षकी थी; किंतु रासक्रीड़ाके लिये वे इस समय अपनी योगमायासे युवावस्थासम्पन्न हो गये थे। २. 'यद्दारमार्थसुहृत्प्रियात्मतनयप्राणाशयास्त्वत्कृते ॥' (श्रीमद्भा० १०।१४।३५) अर्थात् गोपांगनाओंके गृह, धन, सुहृद्, प्रिय, आत्मा (शरीर), पुत्र, प्राण और मन—ये सभी जिनके लिये थे। ३. 'कुम्भ मन्दायां गतौ' इस धातुसे 'ककुभः' शब्द सिद्ध होता है।