भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 290, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ेंअपने साथ उनका तादात्म्य स्थापित करनेको प्रकट होता है, क्योंकि असली रमण तो यही है कि नायक और नायिकाका देश, काल और वस्तुरूप व्यवधानसे रहित सम्मिलन हो। यही पारमार्थिक रमण है। लौकिक रमणमें तो कुछ-न-कुछ व्यवधान रहता ही है; क्योंकि जबतक द्वैत बना हुआ है, तबतक उसमें विभाग भी रहता ही है। वे भगवान् रूप उडुराज सबके अभिलषित हैं, इसलिये ‘प्रियः’ हैं; क्योंकि वे सभीके अन्तरात्मा हैं। आत्मा नामकी वस्तु किसीको भी अप्रिय नहीं होती। संसारमें सुख-प्राप्ति और दुःख-निवृत्तिके लिये जितनी चेष्टाएँ होती हैं, सब आत्मार्थ ही हैं। ऐसी स्थितिमें अपने परप्रेमास्पद भगवान्के साथ कौन रमण करना न चाहेगा ? इसके सिवा और भी वे कैसे हैं ? ‘दीर्घदर्शनः’— ‘अनाद्यविद्याबीजनिवृत्त्यनन्तरं दीर्घेण कालेन दर्शनं यस्य स दीर्घदर्शनः’ अर्थात् अनादि अविद्यारूप बीजभावकी निवृत्तिके पश्चात् जिनका बहुत देरमें दर्शन होता है, ऐसे ये भगवान् दीर्घदर्शन हैं। इस संसारमें नाना प्रकारके कर्मजालमें फँसे हुए जीवको प्रथम तो नर-देह ही दुर्लभ है; उसमें भी पुंस्त्व-प्राप्ति कठिन है तथा पुरुषोंमें भी विशुद्ध निष्काम भावसे स्वधर्माचरण करना दुर्लभ है एवं स्वधर्मपरायणोंमें भी कोई विरले ही विवेक-वैराग्यनिष्ठ होते हैं। यह भगवद्दर्शन अनेकों सोपानातिक्रमणोंके पश्चात् प्राप्त होनेवाला है। इसलिये यह निश्चय ही अत्यन्त दीर्घकालसाध्य है। किंतु सबके अन्तरात्मा और परप्रेमास्पद होनेके कारण वे सबको सुलभ भी हैं। अतः ‘के ब्रह्मणि कुषु कुत्सितेषु सम एव भातीति ककुभः’—क अर्थात् ब्रह्मामें और कु—कुत्सित जीवोंमें समान रूपसे भासमान होनेके कारण ककुभ हैं। वे जिस प्रकार हमारे मन और अहंकारादि तथा उनके विकार, श्रद्धा, अश्रद्धा, धी, ह्री आदिके अवभासक हैं, उसी प्रकार ब्रह्मासे लेकर कीट-पतंगादिपर्यन्त सभी जीवोंके प्रमाता, प्रमाण और प्रमेयके प्रकाश हैं। इस प्रकार सबको सुलभ होनेके कारण वे ‘ककुभ’ हैं। अतः ‘के स्वर्गे कौ पृथिव्यां सर्वत्रैव भातीति ककुभः’ अथवा ‘कं स्वर्गः कुः पृथिवी भाति विभाति यस्मात् स ककुभः’ अर्थात् भगवान् स्वर्ग और पृथिवी सभी जगह भासमान हैं अथवा उन्हींसे स्वर्ग और पृथिवी भी भासमान हैं, इसलिये भी वे ‘ककुभ’ हैं। अतः सब कुछ उन्हींसे भासित है— ‘तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥’ (श्वेताश्वतर० ६।१४) इस प्रकार वे सभीको सुलभ हैं। इसीसे ज्ञानीरूप चर्षणियोंकी उपासनासे सन्तुष्ट होकर वे अपने साथ उनका तादात्म्य स्थापितकर उन्हें भगवदीय आनन्दका अनुभव कराना चाहते हैं। इसीलिये वे उनके विवेकी अन्तःकरणरूप आकाशमें उदित हुए। क्या करते हुए उदित हुए ?—‘करैः स्वांश- विशेषैर्वैषयिकसुखैश्चर्षणीनामज्ञजनानामपि तत् सुखप्राप्तिनिमित्तान् शुचः शोकान् सृजन् दूरीकुर्वन् उदगात्’ अर्थात् वे अपनी किरणोंसे अपने अंशभूत वैषयिकसुखोंद्वारा चर्षणी यानी अज्ञजनोंके भी उस सुखकी अप्राप्तिसे होनेवाले शोकोंको निवृत्त करते हुए उदित हुए। वास्तवमें विचारना चाहिये कि वैषयिक सुख भी क्या हैं? वे अनन्त अविकारी परमानन्दमूर्ति परब्रह्मके कण ही तो हैं। वे उस परमानन्द-सिन्धुकी बूँदें ही तो हैं। किंतु लोग भ्रमवश भगवान्को छोड़कर तुच्छ वैषयिक सुखोंकी अभिलाषा करके व्यर्थ दुःख पाते हैं। श्रीगोसाईंजी महाराज कहते हैं— अस प्रभु हृदयं अछत अविकारी। सकल जीव जग दीन दुखारी॥ (रा०च०मा० १।२३।७) इस प्रकार क्योंकि वैषयिक सुख परब्रह्म परमात्माके ही अंशभूत हैं, इसलिये वे उनके द्वारा उन अज्ञ पुरुषोंके जो कि अनन्त भगवत्स्वरूपानन्दसे अनभिज्ञ हैं, उन विषयोंकी अप्राप्तिके कारण होनेवाले शोकको