भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीरासलीलारहस्य २७५ प्रतिकूलता हो सकती है, अतः अभय अभेदमें ही है। इसीसे कहा है—‘यदा ह्येवैष एतस्मिन्नदृश्येऽ- नात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयनेऽभयं प्रतिष्ठां विन्दते। अथ सोऽभयं गतो भवति।’ (तैत्तिरीय० २।७) अर्थात् जो कोई इस अदृश्य, अरूप, अनिर्वाच्य और अनिकेत ब्रह्ममें अभय स्थिति प्राप्त कर लेता है, वह अभय पदको प्राप्त हो जाता है। यदि हम प्राकृत क्षुद्र पदार्थोंको अपने आत्मा या आत्मीयोंसे भिन्न समझते हैं तो वह हमें स्वार्थसे भ्रष्ट कर देता है, तब यदि हम पूर्णपरब्रह्म परमात्माको अपने सर्वान्तरतम परप्रेमास्पद प्रत्यगात्मासे भिन्न मानेंगे तो वह हमें हमारे परम स्वार्थसे पतित क्यों न कर देगा ? इसीसे विवेकी वेद, शास्त्र, धर्म, ईश्वर इन सभीको अपना परप्रेमास्पद बनानेके लिये अपनेसे अभिन्न समझता है। वह एक अणुको भी अपने आत्मासे भिन्न नहीं समझता। इसलिये यह नास्तिकता नहीं परम आस्तिकता है। विवेकसे भगवत्तत्त्वके परातत्त्वज्ञानकी निवृत्ति हो जाती है। विवेकी भगवान्को कोई बाह्य वस्तु नहीं समझता, उसकी दृष्टिमें तो जिस अपने आत्माके लिये सारी वस्तुएँ प्रिय होती हैं, उसीका वास्तविक स्वरूप भगवान् हो जाते हैं। इसलिये उसका तो भगवान्के प्रति निरुपाधिक और निरतिशय प्रेम हो जाता है। इस प्रकार यह विवेकरूप चन्द्र भक्तितत्त्वका बाधक नहीं, परम साधक है। उस उडुराजका विशेषण है—‘ककुभः—कं ब्रह्मात्मकं कुं कुत्सितं प्रकृतिप्राकृतात्मकं जगत् भासयतीति ककुभः’ अर्थात् क—ब्रह्मस्वरूप सुख और कु—प्रकृति एवं प्राकृत पदार्थोंसे होनेवाला कुत्सित जगत्—इन दोनोंको ही भासित करनेवाला होनेसे यह ककुभ है। जिस समय जगत् और परमानन्दमय परब्रह्मका विवेक होता है, उस समय जागतिक सुख सर्वथा निःसार प्रतीत होने लगता है। ब्रह्मानन्द तो निरतिशय और त्रिकालाबाधित है, किंतु प्राकृत सुख सातिशय और अनित्य है; अतः ब्रह्मानन्दकी बाढ़में उस प्राकृत सुखका तो विलीन हो जाना ही परम मंगल है। अथवा ‘के ब्रह्मणि कुषु कुत्सितेष्वपि भाति दीप्यते इति ककुभः’ अर्थात् यह आत्मानात्मविवेक अथवा विवेकचतुष्टय चाहे ब्रह्मा हो और चाहे कुत्सित—निम्नकोटिके प्राणियोंमें हो, दोनोंकी ही शोभा बढ़ाता है। वस्तुतः न्यूनता तो वहीं है, जहाँ इसका अभाव है। ‘प्रियः’—यह भी ‘उडुराजः’ का ही विशेषण है; क्योंकि यह विवेकचन्द्र परप्रेमास्पद श्रीभगवान्की प्राप्ति करानेवाला होनेके कारण सभीको प्रिय है तथा समस्त अनर्थोंकी निवृत्ति करनेवाला होनेसे भी प्रिय है। इसीका विशेषण ‘दीर्घदर्शनः’ भी है। ‘दीर्घमन- पबाध्यं दर्शनं यस्य अपौरुषेयत्वेन समस्तपुंदोष- शङ्काकलङ्कराहित्येनाप्रामाण्यशङ्काशून्यवेदजनित- त्वाद असौ दीर्घदर्शनः’ अर्थात् अपौरुषेय होनेके कारण जो पुरुषोचित दोषोंके शंकारूप कलंकसे रहित है, अतः जिसके अप्रामाण्यकी कोई आशंका नहीं है, उस वेदसे उत्पन्न होनेके कारण जिसका दर्शन—ज्ञान दीर्घ यानी अबाध्य है, वह विवेकचन्द्र दीर्घदर्शन है; क्योंकि विवेक वेदसे होता है और वेद अपौरुषेय होनेके कारण सब प्रकारके पुरुषोचित दोषोंके शंकारूप कलंकसे रहित है अथवा इसका दर्शन दीर्घकालमें— अनेकों जन्मोंके पश्चात् होता है—इसलिये यह दीर्घदर्शन है; जैसा कि श्रीभगवान्ने भी कहा है— ‘बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।’ (गीता ७।१९) विवेककी महिमा ऐसा जो विवेकचन्द्र है, वह ‘चर्षणी’— अधिकारी पुरुषोंके ‘शुचः’—शोकोपलक्षित विविध दुःखोंको विचाररूप अपनी कल्याणमयी और सुखप्रद किरणोंसे मार्जन करता हुआ उदित हुआ; क्योंकि मनकी उच्छृंखल वृत्तियोंका शमन करनेके लिये लाखों उपाय एक ओर और विवेक एक ओर है। उन मानसिक सन्तापोंकी शान्तिके लिये जो अन्य साधन