भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
श्रीरासलीलारहस्य २७५ प्रतिकूलता हो सकती है, अतः अभय अभेदमें ही है। इसीसे कहा है—‘यदा ह्येवैष एतस्मिन्नदृश्येऽ- नात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयनेऽभयं प्रतिष्ठां विन्दते। अथ सोऽभयं गतो भवति।’ (तैत्तिरीय० २।७) अर्थात् जो कोई इस अदृश्य, अरूप, अनिर्वाच्य और अनिकेत ब्रह्ममें अभय स्थिति प्राप्त कर लेता है, वह अभय पदको प्राप्त हो जाता है। यदि हम प्राकृत क्षुद्र पदार्थोंको अपने आत्मा या आत्मीयोंसे भिन्न समझते हैं तो वह हमें स्वार्थसे भ्रष्ट कर देता है, तब यदि हम पूर्णपरब्रह्म परमात्माको अपने सर्वान्तरतम परप्रेमास्पद प्रत्यगात्मासे भिन्न मानेंगे तो वह हमें हमारे परम स्वार्थसे पतित क्यों न कर देगा ? इसीसे विवेकी वेद, शास्त्र, धर्म, ईश्वर इन सभीको अपना परप्रेमास्पद बनानेके लिये अपनेसे अभिन्न समझता है। वह एक अणुको भी अपने आत्मासे भिन्न नहीं समझता। इसलिये यह नास्तिकता नहीं परम आस्तिकता है। विवेकसे भगवत्तत्त्वके परातत्त्वज्ञानकी निवृत्ति हो जाती है। विवेकी भगवान्को कोई बाह्य वस्तु नहीं समझता, उसकी दृष्टिमें तो जिस अपने आत्माके लिये सारी वस्तुएँ प्रिय होती हैं, उसीका वास्तविक स्वरूप भगवान् हो जाते हैं। इसलिये उसका तो भगवान्के प्रति निरुपाधिक और निरतिशय प्रेम हो जाता है। इस प्रकार यह विवेकरूप चन्द्र भक्तितत्त्वका बाधक नहीं, परम साधक है। उस उडुराजका विशेषण है—‘ककुभः—कं ब्रह्मात्मकं कुं कुत्सितं प्रकृतिप्राकृतात्मकं जगत् भासयतीति ककुभः’ अर्थात् क—ब्रह्मस्वरूप सुख और कु—प्रकृति एवं प्राकृत पदार्थोंसे होनेवाला कुत्सित जगत्—इन दोनोंको ही भासित करनेवाला होनेसे यह ककुभ है। जिस समय जगत् और परमानन्दमय परब्रह्मका विवेक होता है, उस समय जागतिक सुख सर्वथा निःसार प्रतीत होने लगता है। ब्रह्मानन्द तो निरतिशय और त्रिकालाबाधित है, किंतु प्राकृत सुख सातिशय और अनित्य है; अतः ब्रह्मानन्दकी बाढ़में उस प्राकृत सुखका तो विलीन हो जाना ही परम मंगल है। अथवा ‘के ब्रह्मणि कुषु कुत्सितेष्वपि भाति दीप्यते इति ककुभः’ अर्थात् यह आत्मानात्मविवेक अथवा विवेकचतुष्टय चाहे ब्रह्मा हो और चाहे कुत्सित—निम्नकोटिके प्राणियोंमें हो, दोनोंकी ही शोभा बढ़ाता है। वस्तुतः न्यूनता तो वहीं है, जहाँ इसका अभाव है। ‘प्रियः’—यह भी ‘उडुराजः’ का ही विशेषण है; क्योंकि यह विवेकचन्द्र परप्रेमास्पद श्रीभगवान्की प्राप्ति करानेवाला होनेके कारण सभीको प्रिय है तथा समस्त अनर्थोंकी निवृत्ति करनेवाला होनेसे भी प्रिय है। इसीका विशेषण ‘दीर्घदर्शनः’ भी है। ‘दीर्घमन- पबाध्यं दर्शनं यस्य अपौरुषेयत्वेन समस्तपुंदोष- शङ्काकलङ्कराहित्येनाप्रामाण्यशङ्काशून्यवेदजनित- त्वाद असौ दीर्घदर्शनः’ अर्थात् अपौरुषेय होनेके कारण जो पुरुषोचित दोषोंके शंकारूप कलंकसे रहित है, अतः जिसके अप्रामाण्यकी कोई आशंका नहीं है, उस वेदसे उत्पन्न होनेके कारण जिसका दर्शन—ज्ञान दीर्घ यानी अबाध्य है, वह विवेकचन्द्र दीर्घदर्शन है; क्योंकि विवेक वेदसे होता है और वेद अपौरुषेय होनेके कारण सब प्रकारके पुरुषोचित दोषोंके शंकारूप कलंकसे रहित है अथवा इसका दर्शन दीर्घकालमें— अनेकों जन्मोंके पश्चात् होता है—इसलिये यह दीर्घदर्शन है; जैसा कि श्रीभगवान्ने भी कहा है— ‘बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।’ (गीता ७।१९) विवेककी महिमा ऐसा जो विवेकचन्द्र है, वह ‘चर्षणी’— अधिकारी पुरुषोंके ‘शुचः’—शोकोपलक्षित विविध दुःखोंको विचाररूप अपनी कल्याणमयी और सुखप्रद किरणोंसे मार्जन करता हुआ उदित हुआ; क्योंकि मनकी उच्छृंखल वृत्तियोंका शमन करनेके लिये लाखों उपाय एक ओर और विवेक एक ओर है। उन मानसिक सन्तापोंकी शान्तिके लिये जो अन्य साधन
२७६ भक्तिसुधा हैं, उनमेंसे बहुतोंका तो अनुष्ठान ही असम्भव है तथा बिना विवेकके उनसे पूर्ण शान्ति भी नहीं होती, किंतु यथार्थ विवेक तो एक क्षणमें ही सभी विक्षेपोंको शान्त कर देता है। हमारे चित्तमें हर समय ऐसे विचारोंका तुमुल युद्ध छिड़ा रहता है कि अमुक कार्य ठीक नहीं हुआ, अमुक पुरुषका व्यवहार उचित नहीं था, हमें अमुक समयतक अमुक कार्य अवश्य कर लेना चाहिये, हमें अमुक झंझट लगा ही हुआ है इत्यादि। यह विक्षेप किसी भी प्रकारकी बाह्य सुविधाओंसे निवृत्त नहीं हो सकता; किंतु जिस समय ठीक-ठीक विवेक होता है, उस समय इसका ढूँढ़नेपर भी पता नहीं लगता। आयुर्वेदमें भी कई जगह शारीरिक रोगोंके हेतु मानसिक रोग ही माने गये हैं। उन मानसिक रोगोंकी चिकित्सा तो ओषधि आदिसे हो ही नहीं सकती। कई स्थलोंमें तो कारणकी चिकित्सा करनेसे ही कार्यकी भी चिकित्सा हो जाती है; किंतु जहाँ कार्य बहुत उग्र हो जाता है, वहाँ पहले ओषधिप्रयोगद्वारा कार्यको निर्बल करके पीछे कारणकी चिकित्सा करते हैं। किंतु यहाँ आध्यात्मिक राज्यमें तो यदि शोक, मोह एवं ईर्ष्या आदि रोगोंकी चिकित्सा हो जाय तो बाह्य व्याधियोंका आश्रयभूत शरीर ही प्राप्त न हो। अतः पूर्ण स्वास्थ्य तो उन मूलभूत रोगोंकी चिकित्सा होनेसे ही प्राप्त हो सकता है। इसीसे पूर्वकालमें जब शत्रुओंसे पराजित होनेपर किसी राजाका राज्य छिन जाता था तो वह महर्षियोंकी ही शरण लेता था और वे उसे यही उपदेश करते थे— यत्किञ्चिन्मन्यसेऽस्तीति सर्वं नास्तीति विद्धि तत्। एवं न व्यथते प्राज्ञः कृच्छ्रामप्यापदं गतः॥ अर्थात् तुम जिस वस्तुको ऐसा मानते हो कि वह है, उसे यही समझो कि वह है ही नहीं। ऐसा निश्चय रहनेसे बुद्धिमान् पुरुष कड़ी-से-कड़ी आपत्ति प्राप्त होनेपर भी व्यथित नहीं होता। वस्तुतः आत्मासे भिन्न जितना भी प्रतीयमान जगत् है, उसमें अस्तित्व- बुद्धिपूर्वक जो भले-बुरेपनका निश्चय करना है, वही सारे दुःखोंका मूल है। यह प्रपंच तो अनन्त है। इसमें किसी भी समय अनुकूलता-प्रतिकूलताका अभाव हो जाय, यह सर्वथा असम्भव है। अतः जबतक इसमें सत्यत्वबुद्धि रहेगी, तबतक हृदयके तापोंकी शान्ति हो ही नहीं सकती। वस्तुतः अभिनिवेशपूर्वक निरर्थक एक ही वस्तुका बारम्बार अनुसन्धान करना ही पूरा रोग है। किंतु जिस समय विवेकचन्द्रका उदय होता है, उस समय सारी अनुकूलता-प्रतिकूलता बालूकी भीतके समान ढह जाती है। वह विवेकचन्द्र क्या करता हुआ उदित हुआ?— 'अरुणेन ब्रह्मात्मना विषयेण प्राच्याः प्राचीनायाः धियः मुखं सत्त्वात्मकं भागं विलिम्पन्' अर्थात् अरुण यानी ब्रह्मरूप विषयसे प्राग्भवा बुद्धिके सत्त्वात्मक भागको विलेपित करता उदित हुआ। तात्पर्य यह है कि जिस समय विवेकरूप चन्द्रका प्रादुर्भाव होता है, उस समय बुद्धि पूर्ण परब्रह्मरूप रंगसे रँग जाती है। यह नियम है कि बुद्धि अपने विषयसे अनुरंजित हुआ करती है। विवेक होनेपर एकमात्र शुद्ध परब्रह्मकी ही सत्ता रह जाती है; इसलिये उस समय बुद्धि ब्रह्मरागसे ही अनुरंजित हो जाती है। प्रेम यानी रागका आस्पद होनेके कारण भी परमात्मा अरुण कहा जाता है अथवा यों समझो कि 'प्राच्याः अविवेकदशापन्नायाः बुद्धेः मुखं जाड्यात्मकं दुःखत्मकं वा भागम् अरुणेन ब्रह्मसाक्षात्कारजन्येन सुखेन विलिम्पन् तिरोहितं कुर्वन् उद्गात्'—प्राची यानी अविवेक दशाको प्राप्त हुई बुद्धिके मुख—जाड्यात्मक या दुःखात्मक भागको अरुण यानी ब्रह्मसाक्षात्कारजनित सुखसे विलेपित-तिरोहित करता हुआ उदित हुआ। किस प्रकार उदित हुआ, सो बतलाते हैं— 'यथा प्रियः श्रीकृष्णः प्रियायाः श्रीवृषभानुनन्दिन्या मुखम् अरुणेन कुङ्कुमेन विलिम्पन् उद्गात्।' अर्थात् जिस प्रकार प्रिय श्रीकृष्णचन्द्र अपनी प्रियतमा श्रीवृषभानुनन्दिनीके मुखको अरुण कुंकुमसे विलेपित करते हुए उदित हुए थे, उसी प्रकार यह विवेकचन्द्र उदित हुआ।
इसके सिवा प्रथम श्लोककी व्याख्या करते हुए जहाँ 'ताः' शब्दसे ज्ञानीरूपा प्रजा ग्रहण की गयी है, वहाँपर यह समझना चाहिये कि जिस समय भगवान् श्रीकृष्णने ज्ञानियोंके विवेकी अन्तःकरणरूप अरण्यमें रमण करनेकी इच्छा की 'तदैव'—उसी समय 'उडुराजः' परमात्मारूप चन्द्रका उनके विवेकी अन्तःकरणरूप वृन्दारण्यमें श्रुतिरूपा व्रजांगनाओंके साथ रमण करनेके लिये उदय हुआ। यहाँ 'उडुराजः' शब्दका तात्पर्य ऐसा समझना चाहिये—'उडुस्थानीयेषु परिमितज्ञानक्रियादिशक्तिशीलेषु जीवेषु राजते इति उडुराजः' अर्थात् परमात्मारूप चन्द्र उडुस्थानीय परिमित ज्ञानक्रियादिशील जीवोंमें राजमान हैं, इसलिये उडुराज हैं। जीवोंकी उपाधि मलिन है, इसीसे उनकी ज्ञान-शक्ति और क्रिया-शक्ति अभिभूत रहती है। उनकी शक्ति परिच्छिन्न है। अतः उन्हें विषयके साथ इन्द्रियोंका सन्निकर्ष होनेपर ही कुछ ज्ञान होता है। प्रमाण-निरपेक्ष ज्ञान नहीं होता; क्योंकि सारे प्रमाण आवरणके अभिभावक हैं। किंतु परमात्माकी ज्ञान- शक्ति और क्रिया-शक्ति अपरिच्छिन्न हैं, उनकी उपाधिभूता लीलाशक्ति भी परम विशुद्धा है। अतः वह अपने आश्रय परमात्माका आवरण नहीं करती; इसलिये परमात्माकी स्वाभाविकी ज्ञानशक्ति और क्रिया-शक्ति अपनी उपाधिसे अनभिभूता होनेके कारण किसी प्रकारके प्रमाणकी अपेक्षा नहीं रखती। इस प्रकार प्रमाणानपेक्ष ज्ञान क्रियावान् होनेके कारण ही परमात्मा अन्य जीवोंकी अपेक्षा अधिक राजमान (शोभाशाली) है और इसीसे जीवरूप उडुओंकी अपेक्षासे उसे उडुराज कहा है। अथवा यों समझो कि घटाकाशस्थानीय जीव उडुके समान हैं और महाकाशरूप परमात्मा नियन्तृत्वेन जीवोंमें विराजमान है। यह नियन्तृत्व ऐसा है कि जैसे घटाकाश महाकाशके अधीन है, उसी प्रकार अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य परमेश्वरके अधीन है। इसीसे अभेद होते हुए भी नियमन बन जाता है अथवा जैसे प्रतिबिम्ब बिम्बाधीन हैं, उसी प्रकार जीव ईश्वरके अधीन हैं। इस प्रकार भी वह उडुराज है। अथवा 'रलयोः डलयोश्चैव' आदि नियमके अनुसार 'उडुराजः' के स्थानमें 'उरुराजः' मानें तो यों समझना चाहिये—'उरुधा जीवेशादिरूपेण बहुधा राजत इति 'उरुराजः' अर्थात् जीव-ईश्वरादिरूपसे अनेक प्रकार राजमान है, इसलिये परमात्मा उरुराज है; जैसे कि कहा है—'इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते।' (बृहदारण्यक० २।५।१९) अथवा सगुण- निर्गुणरूपसे अनेक प्रकार राजमान है, इसलिये उरुराज है; या जायमान और अजायमानरूपसे राजमान है, इसलिये उरुराज है; जैसा कि श्रुति कहती है— 'अजायमानो बहुधा विजायते' (मुद्गलोपनिषद् २) अर्थात् अजन्मा होनेपर भी परमात्मा महदादिरूपसे अनेक प्रकार उत्पन्न हुआ है अथवा रासलीलामें वे अनेक रूपसे राजमान हुए थे, इसलिये उरुराज हैं। श्रुति भी कहती है—'स एकधा भवति दशधा भवति शतधा सहस्रधा भवति' इत्यादि। अथवा बहुतसे विभक्त पदार्थोंमें अविभक्तरूपसे अकेला ही विराजमान है, इसलिये परमात्मा उरुराज है। 'अविभक्तं विभक्तेषु' अर्थात् विभक्त जो कार्यवर्ग उसमें परमात्मा अविभक्त यानी कारणरूपसे स्थित है; अथवा विभक्त जो साक्ष्यवर्ग उसमें वह अविभक्त यानी साक्षीरूपसे स्थित है; या ऐसा समझो कि विभक्त जो काल्पनिक प्रपंच उसमें वह अधिष्ठानरूपसे ओतप्रोत है। इन्हीं सब कारणोंसे परमात्मा उरुराज यानी उडुराज है। वह स्वप्रकाश पूर्ण परब्रह्म परमात्मा, जो सबका महाकारण और स्वरूपतः कार्यकारणातीत है, ज्ञानियोंके विवेकी अन्तःकरणरूप अरण्यमें रमण करनेके लिये आविर्भूत हुआ। यहाँ 'रमण' का अर्थ है 'तत्' पदार्थके साथ 'त्वं' पदार्थका ऐक्य हो जाना। जो अन्तःकरण विवेकचन्द्रकी शीतल सुकोमल अमृतमय किरणोंसे सुशोभित है, उस अन्तःकरणरूप वृन्दारण्यमें यह 'तत्' पदार्थरूप भगवान् 'त्वं' पदके अर्थभूत अनन्त जीवरूप व्रजांगनाओंके साथ रमण करनेको अर्थात्
अपने साथ उनका तादात्म्य स्थापित करनेको प्रकट होता है, क्योंकि असली रमण तो यही है कि नायक और नायिकाका देश, काल और वस्तुरूप व्यवधानसे रहित सम्मिलन हो। यही पारमार्थिक रमण है। लौकिक रमणमें तो कुछ-न-कुछ व्यवधान रहता ही है; क्योंकि जबतक द्वैत बना हुआ है, तबतक उसमें विभाग भी रहता ही है। वे भगवान् रूप उडुराज सबके अभिलषित हैं, इसलिये ‘प्रियः’ हैं; क्योंकि वे सभीके अन्तरात्मा हैं। आत्मा नामकी वस्तु किसीको भी अप्रिय नहीं होती। संसारमें सुख-प्राप्ति और दुःख-निवृत्तिके लिये जितनी चेष्टाएँ होती हैं, सब आत्मार्थ ही हैं। ऐसी स्थितिमें अपने परप्रेमास्पद भगवान्के साथ कौन रमण करना न चाहेगा ? इसके सिवा और भी वे कैसे हैं ? ‘दीर्घदर्शनः’— ‘अनाद्यविद्याबीजनिवृत्त्यनन्तरं दीर्घेण कालेन दर्शनं यस्य स दीर्घदर्शनः’ अर्थात् अनादि अविद्यारूप बीजभावकी निवृत्तिके पश्चात् जिनका बहुत देरमें दर्शन होता है, ऐसे ये भगवान् दीर्घदर्शन हैं। इस संसारमें नाना प्रकारके कर्मजालमें फँसे हुए जीवको प्रथम तो नर-देह ही दुर्लभ है; उसमें भी पुंस्त्व-प्राप्ति कठिन है तथा पुरुषोंमें भी विशुद्ध निष्काम भावसे स्वधर्माचरण करना दुर्लभ है एवं स्वधर्मपरायणोंमें भी कोई विरले ही विवेक-वैराग्यनिष्ठ होते हैं। यह भगवद्दर्शन अनेकों सोपानातिक्रमणोंके पश्चात् प्राप्त होनेवाला है। इसलिये यह निश्चय ही अत्यन्त दीर्घकालसाध्य है। किंतु सबके अन्तरात्मा और परप्रेमास्पद होनेके कारण वे सबको सुलभ भी हैं। अतः ‘के ब्रह्मणि कुषु कुत्सितेषु सम एव भातीति ककुभः’—क अर्थात् ब्रह्मामें और कु—कुत्सित जीवोंमें समान रूपसे भासमान होनेके कारण ककुभ हैं। वे जिस प्रकार हमारे मन और अहंकारादि तथा उनके विकार, श्रद्धा, अश्रद्धा, धी, ह्री आदिके अवभासक हैं, उसी प्रकार ब्रह्मासे लेकर कीट-पतंगादिपर्यन्त सभी जीवोंके प्रमाता, प्रमाण और प्रमेयके प्रकाश हैं। इस प्रकार सबको सुलभ होनेके कारण वे ‘ककुभ’ हैं। अतः ‘के स्वर्गे कौ पृथिव्यां सर्वत्रैव भातीति ककुभः’ अथवा ‘कं स्वर्गः कुः पृथिवी भाति विभाति यस्मात् स ककुभः’ अर्थात् भगवान् स्वर्ग और पृथिवी सभी जगह भासमान हैं अथवा उन्हींसे स्वर्ग और पृथिवी भी भासमान हैं, इसलिये भी वे ‘ककुभ’ हैं। अतः सब कुछ उन्हींसे भासित है— ‘तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥’ (श्वेताश्वतर० ६।१४) इस प्रकार वे सभीको सुलभ हैं। इसीसे ज्ञानीरूप चर्षणियोंकी उपासनासे सन्तुष्ट होकर वे अपने साथ उनका तादात्म्य स्थापितकर उन्हें भगवदीय आनन्दका अनुभव कराना चाहते हैं। इसीलिये वे उनके विवेकी अन्तःकरणरूप आकाशमें उदित हुए। क्या करते हुए उदित हुए ?—‘करैः स्वांश- विशेषैर्वैषयिकसुखैश्चर्षणीनामज्ञजनानामपि तत् सुखप्राप्तिनिमित्तान् शुचः शोकान् सृजन् दूरीकुर्वन् उदगात्’ अर्थात् वे अपनी किरणोंसे अपने अंशभूत वैषयिकसुखोंद्वारा चर्षणी यानी अज्ञजनोंके भी उस सुखकी अप्राप्तिसे होनेवाले शोकोंको निवृत्त करते हुए उदित हुए। वास्तवमें विचारना चाहिये कि वैषयिक सुख भी क्या हैं? वे अनन्त अविकारी परमानन्दमूर्ति परब्रह्मके कण ही तो हैं। वे उस परमानन्द-सिन्धुकी बूँदें ही तो हैं। किंतु लोग भ्रमवश भगवान्को छोड़कर तुच्छ वैषयिक सुखोंकी अभिलाषा करके व्यर्थ दुःख पाते हैं। श्रीगोसाईंजी महाराज कहते हैं— अस प्रभु हृदयं अछत अविकारी। सकल जीव जग दीन दुखारी॥ (रा०च०मा० १।२३।७) इस प्रकार क्योंकि वैषयिक सुख परब्रह्म परमात्माके ही अंशभूत हैं, इसलिये वे उनके द्वारा उन अज्ञ पुरुषोंके जो कि अनन्त भगवत्स्वरूपानन्दसे अनभिज्ञ हैं, उन विषयोंकी अप्राप्तिके कारण होनेवाले शोकको
निवृत्त करते हुए प्रकट हुए और क्या करते हुए प्रकट हुए ? 'प्राच्याः प्राचीनायाः निर्वृत्तिकायाः बुद्धेर्मुखं प्रधानं सत्त्वात्मकं भागम् अरुणेन स्वाभिव्यक्ति- जनितेन सुखेन विलिम्पन् उदगात्' अर्थात् वे प्राचीना यानी निवृत्तिकामिनी बुद्धिके मुख यानी प्रधान सात्त्विक भागको अपनी अभिव्यक्तिसे उत्पन्न हुए सुखके द्वारा विलेपित करते हुए उदित हुए। भगवत्सुखका बुद्धिपर ही लेप करना युक्तियुक्त भी है; क्योंकि वही उसे ग्रहण कर सकती है—'स्वयं तदन्तःकरणेन गृह्यते' अर्थात् ब्रह्माभिव्यक्तिजनित जो सुख है, उसकी अभिव्यक्ति निश्चयात्मिका बुद्धिपर ही होती है। वे परब्रह्मरूप उडुराज किस प्रकार उदित हुए, सो बतलाते हैं—'यथा कश्चित् दीर्घदर्शनः दीर्घेण कालेन दर्शनं यस्य एवंभूतः प्रियः प्रियायाः विप्रोषित- भर्तृकायाः शुचः विभागसम्भूतानि शोकाश्रूणि शान्तमैः करैः करव्यापारैः मृजन् करधृतेन अरुणेन कुङ्कुमेन मुखं विलिम्पन् च स्यात्तथा' अर्थात् जिस प्रकार कोई दीर्घकालके अनन्तर आनेवाला प्रवासी पति अपनी वियोगसन्तप्ता प्रियतमाके शोकाश्रुओंको अपने सुशीतल कर-व्यापारोंसे पोंछता है तथा उसके मुखको अपने हाथमें लिये हुए कुंकुमसे लाल कर देता है, उसी प्रकार ये उडुराज उदित हुए। अथवा यों समझो कि जिस समय भगवान्ने रमण करनेकी इच्छा की और गोपांगनाओंके सौन्दर्य- माधुर्य एवं तपका स्मरणकर उनको वृन्दावनमें आह्वान करनेका संकल्प किया, उसी समय उडुराज- प्रेमाम्बुराशिकी वृद्धि करनेवाला चन्द्रमा सस्यरूप चर्षणियोंके शोकसूर्यकी तीक्ष्णतर किरणोंसे उत्पन्न हुई म्लानताको अपनी सुशीतल किरणोंसे निवृत्त करता हुआ उदित हो गया। इसके सिवा 'उडुराजः' इस शब्दसे भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र भी अभिप्रेत हो सकते हैं; क्योंकि यौवनकी अतिशयता १ के कारण उडुओ-नक्षत्रोंके समान स्वच्छ हैं और रंजन यानी अनुरागजनक होनेके कारण राजा हैं अथवा यदि 'उरुराजः' ही 'उडुराजः' है—ऐसा मानें तो इस प्रकार अर्थ करना चाहिये— 'स्वकीयप्रेमातिशयेन उरुधा रञ्जयतीति उरुराजः' अथवा 'उरून् महतस्तत्त्वदर्शिनोऽपि महामुनीन् रञ्जयति स्वानुरागयुक्तान् करोतीति उरुराजः' अर्थात् अपनी प्रेमातिशयताके कारण अनेक प्रकारसे रंजन करते हैं अथवा जो महान् तत्त्वदर्शी भी हैं, उन महामुनियोंका भी अपने अनुराग-विशेषके द्वारा अनुरंजन करते हैं; इसलिये श्रीकृष्णचन्द्र उरुराज हैं। वे प्रिय अर्थात् धन, धाम और सुहृद्वर्गसे भी प्रियतर २ यानी सबके सर्वस्वभूत और दीर्घदर्शन—जिनका दर्शन दीर्घ यानी अत्यन्त मूल्यवान् है, ऐसे श्रीकृष्णचन्द्र चर्षणी यानी गोपीजनोंके शोक—प्रियतमके विरहजनित सन्तापको निवृत्त करने तथा 'ककुभः'३ सौन्दर्यातिशयके कारण मन्दगामिनी प्राची पूजनीया प्रियतमा श्रीवृषभानु- नन्दिनीके मानादिजनित आँसुओंको अपने कर-व्यापारोंसे निवृत्त करते एवं अरुण कुंकुमादिसे उनका मुख विलेपित करते विहारस्थलमें आविर्भूत हुए। श्रीवृषभानुनन्दिनी भगवान्की नित्य सहचरी हैं। जिस प्रकार शक्तिके बिना शिव, मधुरिमाके बिना मिश्री और दाहिका शक्तिके बिना अग्नि नहीं रह सकते, उसी प्रकार श्रीराधिकाजीके बिना श्यामसुन्दर नहीं देखे जाते। वे उनकी स्वरूपभूता आह्लादिनीशक्ति हैं। उन्हींके कारण श्रीकृष्णचन्द्रकी सारी शोभा है; अतः उन्हें छोड़कर वे एक पल भी नहीं रह सकते। वे निरन्तर उनकी सन्निधिमें रहते हैं और एक-दूसरेसे तादात्म्यको प्राप्त हो परस्पर एक-दूसरेकी शोभा बढ़ाते हैं। माधुर्य भावसे उपासना करनेवाले बहुत- १. यों तो भगवान्की अवस्था इस समय केवल ८-१० वर्षकी थी; किंतु रासक्रीड़ाके लिये वे इस समय अपनी योगमायासे युवावस्थासम्पन्न हो गये थे। २. 'यद्दारमार्थसुहृत्प्रियात्मतनयप्राणाशयास्त्वत्कृते ॥' (श्रीमद्भा० १०।१४।३५) अर्थात् गोपांगनाओंके गृह, धन, सुहृद्, प्रिय, आत्मा (शरीर), पुत्र, प्राण और मन—ये सभी जिनके लिये थे। ३. 'कुम्भ मन्दायां गतौ' इस धातुसे 'ककुभः' शब्द सिद्ध होता है।
२८० भक्तिसुधा से भावुकोंके मतमें तो श्रीकृष्णकृपाकी प्राप्तिके लिये श्रीप्रियाजीकी उपासना ही कर्तव्य है। उनका मत है कि श्रीराधिकाजी स्वाधीनभर्तृका हैं, भगवान् उनके अधीन हैं, वे नित्य निकुंजमें निरन्तर श्रीप्रियाजीके सौन्दर्यसमास्वादनके लिये उन्हें अपने माधुर्यरसका नैवेद्य समर्पण करते हैं। इस प्रकार भगवान्से आराधित होनेके कारण ही वे 'श्रीराधा' कहलाती हैं। अतः उनका आह्वान करनेके लिये भगवान्को वेणुनाद करनेकी आवश्यकता नहीं थी। वे तो उनकी सन्निधिमें ही थीं और उनकी प्रसन्नताके लिये ही यह लीला भी की गयी थी। ऐसी अवस्थामें यह प्रश्न होता है कि फिर भगवान्के वेणुनादका और क्या प्रयोजन था ? यहाँ यही समझना चाहिये कि भगवान्ने अन्य यूथेश्वरी और साधनसिद्धा व्रजांगनाओंको बुलानेके लिये ही वंशीध्वनि की थी। वे चिरकालसे भगवत्संगके लिये उत्सुक थीं और तरह-तरहके व्रत-उपवास भी कर रही थीं, अतः उन्हें उनकी उपासनाका फल देनेके लिये ही भगवान्ने वंशीध्वनि की। × × × इस तरह अखण्डमण्डल श्रीवृषभानुनन्दिनीके मुखके समान चन्द्रमाको तथा उसकी शीतल सुकोमल रश्मियोंसे रंजित मनोहर वनको देखकर श्रीव्रजांगनाओंका मन हरण करनेवाले वेणुगीत-पीयूषको प्रवाहित किया। उस प्रेमानन्द-समुद्रको बढ़ानेवाले गीतको सुनकर उनका मन मोहित होकर कृष्णकी ओर आकर्षित हो उठा, मानो कृष्णने हठात् उनके मनको हर लिया। बस फिर क्या था, जैसे नदियाँ समुद्रकी ओर दौड़ती हैं, वैसे ही समस्त व्रजांगनाएँ संभ्रमसे श्रीकृष्णकी ओर चल पड़ीं। मानो जब प्रेमानन्दमें मन बह चला, तब मनके परतन्त्र शरीर भी उसी वेगमें बह चला। यह गीत पीयूषप्रवाहक इतर प्रवाहोंकी तरह अपने संसर्गी पदार्थोंको गन्तव्यकी ओर न ले जाकर उद्गम-स्थान श्रीकृष्णकी ओर ही ले जाता है। किंवा जब श्रीकृष्णके वेणुगीतरूप चौरने व्रजांगनाओंके धैर्य, विवेक आदि रत्नोंसे भरपूर मनोमंजूषाको हर लिया तो वे व्याकुल होकर उसीके अन्वेषणके लिये दौड़ पड़ीं। कोई दोहन, कोई परिवेषण, कोई लेपन, मार्जन, अंजन, पति-शुश्रूषण छोड़कर उलटे-पलटे भूषण- वसन धारणकर श्रीकृष्णके पास चल पड़ीं। पति, पिता, भ्राता आदिके रोकनेपर भी वे न रुकीं। जब कुछ व्रजांगनाओंको उनके पति आदिने गृहके भीतर रोक लिया तो वे वहीं नेत्र मींचकर श्रीकृष्णका ध्यान करने लगीं। प्रियतमके दुःसह विरहजन्य तीव्र तापसे समस्त पाप कम्पित हो उठे और ध्यानप्राप्त प्रियतमके परिरम्भणजन्य अनन्त आनन्दसे पुण्य भी दुर्बल हो गये। इस तरह व्रजांगनाएँ सद्यः क्षीणबन्धन होकर गुणमय देहको त्याग जारबुद्धिसे भी उन्हीं भगवान्को प्राप्त हो गयीं। भगवान्का गोपांगनाओंको उपदेश समीपमें आयी हुई व्रजांगनाओंको देखकर भगवान् अपनी वचन-चातुरीसे मोहित करते हुए बोले—'हे महाभागाओ! आपका स्वागत है। हम आपलोगोंका क्या प्रिय करें? व्रजमें कुशल तो है? आपलोग अपने आगमनका कारण कहो। यह घोररूपा रजनी घोर व्याघ्रादि जन्तुओंसे निषेवित है। आपलोग व्रजमें जाओ। हे सुमध्यमाओ! यहाँ स्त्रियोंको नहीं ठहरना चाहिये। आपलोगोंके माता, पिता, भ्राता, पति आपलोगोंको घरमें न देखकर ढूँढ़ते होंगे। बन्धुओंको संकट न पहुँचाओ। बहुत हो चुका, अब आपलोग विलम्ब मत करो। व्रजको चली जाओ।' आनन्दकन्द भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रने व्रजांगनाओंको यही आदेश दिया कि तुमलोग गोष्ठमें रहकर अपने पतियोंकी शुश्रूषा करो। हमारी प्राप्तिका यही उपाय है। यदि पातिव्रत्यमें तुम्हारी गति न हो तो 'शुश्रूषध्वं सतीः' पतिव्रताओंकी सेवा करो। इस व्याजसे भगवान्ने समस्त पुरुषोंको यही उपदेश किया है कि जिनकी गति परब्रह्मकी उपासनामें न हो, वे देवता और माता- पितादिरूप वैदिक और लौकिक ईश्वरोंकी उपासना करें। यदि वे पहले इन ईश्वरोंकी सेवा करेंगे तो
क्रमशः उन्हें परमेश्वरकी प्राप्ति हो जायगी। इससे सिद्ध हुआ कि जिन पुरुषोंके पाप-पुंजकी कर्म और उपासनाद्वारा निवृत्ति हो गयी है, वे ही भगवद्धाममें प्रवेश करनेके अधिकारी हो सकते हैं— 'नराणां क्षीणपापानां कृष्णे भक्तिः प्रजायते।' इसके सिवा यह भी प्रसिद्ध ही है कि— वर्णाश्रमाचारवता पुरुषेण परः पुमान्। विष्णुराराध्यते पन्था नान्यस्तत्तोषकारकः॥ (श्रीविष्णुपुराण ३।८।९) अतः यदि तुम वर्णाश्रम-धर्माचारके द्वारा इन लौकिक और वैदिक ईश्वरोंकी सेवा करोगे, तभी परमेश्वरकी प्राप्ति कर सकोगे। अनभिज्ञ पुरुषोंको ही मोहवश स्वधर्ममें अरुचि और परधर्ममें रुचि होती है। इसी प्रकार अर्जुनको भी जो परधर्ममें रुचि हुई थी, वह उसका मोह ही था। उसने जो क्षात्रधर्मका परित्यागकर ब्राह्मणधर्मका आश्रय लिया था और बन्धुवधसे विरत होकर कहा था कि 'गुरून्हत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके।' (गीता २।५) वह उसका भयंकर व्यामोह ही था। जिस प्रकार रुग्णावस्थामें पित्तादिके दूषित हो जानेसे लोगोंको निम्बादि कटु पदार्थोंमें रुचि होने लगती है और दुग्धादिमें अरुचि हो जाती है, उसी प्रकार मोहके कारण ही स्वधर्ममें अरुचि हुआ करती है। अतः रुचि हो या न हो, उचित यही है कि स्वधर्मका आश्रय लिया जाय और परधर्मका परित्याग किया जाय। इससे सिद्ध हुआ कि जिस प्रकार भगवान्ने व्रजांगनाओंसे कहा था कि मुझ परपुरुषका संग छोड़कर तुम अपने पतियोंकी सेवा करो, इसी प्रकार साधारण मनुष्योंको भी उनका यही आदेश है कि उन्हें स्वधर्मका ही आश्रय लेना चाहिये। जिस प्रकार छतपर जानेके लिये प्रत्येक सीढ़ीपर होकर जाना पड़ता है, उसी प्रकार परमात्मप्राप्तिमें भी क्रमिक साधनाका अवलम्बन करना होता है। जो लोग सोपानातिक्रम करके परमोच्च नैष्कर्म्यका आश्रय लेते हैं, उनका ऐसा पतन होता है कि फिर उत्थान होना दुर्लभ हो जाता है। इसीसे महापुरुष कर्मत्यागमें भय दिखलाया करते हैं। भगवान्ने भी इसी कारण कर्मानुष्ठानकी आवश्यकता प्रदर्शित करनेके लिये अर्जुनसे कहा था— सन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ। तयोस्तु कर्मसन्न्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते॥ (गीता ५।२) साधारण पुरुषोंके लिये तो यही क्रम है; हाँ, गुणातीतोंकी बात अलग है। गुणातीत तो कहते ही उसे हैं, जिसपर गुणोंका आक्रमण न हो। अतः अज्ञ पुरुषोंको उनका अनुकरण न करके स्वधर्मका ही आश्रय लेना चाहिये। यदि वे उसे छोड़कर नैष्कर्म्यपर आरूढ़ होना चाहेंगे तो सर्वथा पतित हो जायेंगे। यह बात भी सुनिश्चित है कि प्रयत्न केवल साधनमें ही होता है, फलमें प्रयत्न नहीं होता। साधनके पर्यवसानमें फल तो स्वतः प्राप्त हो जाता है। यदि किसी काष्ठको काटना है तो कुठारका उद्यमन और निपातन किया जाता है। वहाँ प्रयत्नकी आवश्यकता कुठारके उद्यमन-निपातनमें ही होती है; उसके परिणाममें द्वैधीभाव तो स्वयं हो जाता है। इसी प्रकार आवश्यकता इसी बातकी है कि हम सबसे पहले कर्मद्वारा अपनी उच्छृंखल प्रवृत्तियोंका निरोध करके फिर सात्त्विक प्रवृत्तियोंद्वारा अपनी राजस, तामस प्रवृत्तियोंका निरोध करें। उसके पश्चात् जब हमारी सात्त्विक प्रवृत्तिका भी निरोध हो जायगा तो स्वस्वरूपकी उपलब्धि स्वतः ही हो जायगी। ज्यों ही मानस व्यापारकी शान्ति हुई कि 'तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्॥' (योगदर्शन १।३) इस सूत्रके अनुसार द्रष्टाकी अपने स्वरूपमें स्थिति हो जाती है। वस्तुतः नैष्कर्म्य क्या है—इस बातको साधारण पुरुष समझ भी नहीं सकते, इसीलिये वे कर्मत्यागकी व्यर्थ चेष्टामें प्रवृत्त होते हैं। जिस प्रकार नौकारूढ़ व्यक्तिको भ्रमवश तटस्थ वृक्षादि चलते दिखायी देते हैं और अपनेमें स्थिरता प्रतीत होती है, उसी प्रकार
२८२ भक्तिसुधा अज्ञानियोंको मोहवश अपने निष्क्रिय शुद्ध स्वरूपमें कर्मकी प्रतीति होती है। इसी बातको भगवान्ने इन शब्दोंमें व्यक्त किया है— कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः। स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्॥ (गीता ४।१८) वास्तवमें अकर्म तो स्वरूपस्थिति है, वह कर्तव्य नहीं है। जो अकर्मको कर्तव्य समझकर देहेन्द्रियव्यापारकी निवृत्तिका प्रयत्न करते हैं, वे अकर्मके रहस्यसे सर्वथा अनभिज्ञ हैं। इस प्रकारका प्रयत्न भी तो एक व्यापार ही है; अतः वह निवृत्ति नहीं, उसे व्यापारशान्ति ही कहा जा सकता है। वस्तुतः ‘संन्यासस्तु पूर्णब्रह्मणि सम्यङ्न्यासः' इस लक्षणके अनुसार पूर्ण ब्रह्ममें सर्वथा आत्मसमर्पण करनेका नाम ही संन्यास है। वह उपेय या साध्य है, उपाय या साधन नहीं है। इसीसे भगवान् गोपिकाओंको उपदेश करते हैं कि मैं तो उपेय हूँ, तुम मुझे प्राप्त करनेके लिये पतिशुश्रूषण-रूप उपायका अवलम्बन करो। स्वधर्ममें निष्ठा होनेका उपाय यदि मोह या दुर्दैववश तुम्हारी स्वधर्ममें निष्ठा नहीं है तो अहंकार छोड़ो और शास्त्रज्ञोंका सत्संग करो। इससे स्वधर्ममें तुम्हारी अभिरुचि होगी। इसी बातको लक्षित करनेके लिये भगवान्ने व्रजांगनाओंसे कहा है—‘शुश्रूषध्वं···· सतीः' (श्रीमद्भा० १०। २९। २२) (सत्पुरुषोंकी सेवा करो), स्त्रियोंके लिये पतिव्रता ही सत्पुरुष हैं। जिस प्रकार स्त्रियोंके लिये भगवान्ने पतिव्रताओंका संग करनेकी आज्ञा दी है, उसी प्रकार पुरुषोंको शास्त्रज्ञ और निःस्पृह ब्राह्मणोंका सहवास करना चाहिये। मनु भगवान्ने भी ब्राह्मणोंसे ही उपदेश ग्रहण करनेकी आज्ञा दी है। वे कहते हैं— अध्येतव्यमिदं शास्त्रं ब्राह्मणेन प्रयत्नतः। शिष्येभ्यश्चोपदेष्टव्यं सम्यक् नान्येन केनचित्॥ जो लोग देखा-देखी दूसरोंको उपदेश करने लगते हैं, वे उनके पतनके ही कारण होते हैं। वास्तविक कल्याण तो शास्त्रज्ञ ब्राह्मणके ही उपदेशसे हो सकता है। जिस प्रकार कोई साधारण पुरुष किसी वैद्यराजके थोड़ेसे ओषधिप्रयोगोंको देखकर यदि स्वयं भी वैद्यराज होनेका दावा करके ओषधि देने लगे तो वह रोगियोंकी मृत्युका ही कारण होता है, उसी प्रकार अनधिकारी उपदेशक जनताके अमंगलके ही हेतु होते हैं। अज्ञजन केवल श्रवणके ही अधिकारी हैं। शास्त्रज्ञ ब्राह्मणोंसे श्रवण करके वे अपना कल्याण अवश्य कर सकते हैं; इसीसे भगवान्ने कहा है कि— अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते। तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः॥ (गीता १३।२५) अतः उन्हें आत्मकल्याणके लिये श्रवण तो अवश्य करना चाहिये, किंतु दूसरोंको उपदेश करनेका प्रयत्न न करना चाहिये। इस प्रकार जिस तरह स्त्रियोंको पतिव्रताओंकी सेवा करनी आवश्यक है, उसी प्रकार पुरुषोंको ब्राह्मणोंकी शुश्रूषा करनी चाहिये। यदि उनकी सेवामें रहते-रहते जल्दी लाभ न भी हुआ तो ‘तबहिं होइ सब संसय भंगा। जब बहु काल करिअ सतसंगा॥' (रा०च०मा० ७।६१।४) कुछ दिन धैर्य रखकर उनकी सेवामें तत्पर रहो। अधिक मलकी निवृत्तिके लिये अधिक कालतक मार्जनकी आवश्यकता होती है। इसी तरह जन्म-जन्मान्तरके पापोंकी निवृत्तिमें कुछ समय लगना स्वाभाविक ही है। यदि उनके कथनमें रुचि नहीं होती तो भी कुछ काल तो अरुचिसे भी उन्हींकी आज्ञामें रहो। वैद्य रोगीके लिये हितकर समझकर जो ओषधि देता है, रोगीको किसी प्रकारका ननु-नच न करके उसीको सेवन करना चाहिये; उसे अपनी रुचिकी अपेक्षा नहीं करनी चाहिये। संसारमें सत्संग बहुत दुर्लभ है। साधुजन कहीं साइनबोर्ड लगाकर नहीं बैठते। उनकी प्राप्ति सौभाग्यसे ही होती है। श्रीगोसाईंजी महाराज कहते हैं— पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता। सतसंगति संसृति कर अंता॥ (रा०च०मा०७।४५।६)
श्रीरासलीलारहस्य २८३
श्रीमद्भगवद्गीतामें आत्मकल्याणके लिये साधुसेवाकी आवश्यकता भगवान् कृष्णने इस प्रकार दिखलायी है— तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया। उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥ (गीता ४।३४) किंतु सेवामें धैर्यकी बहुत आवश्यकता है; जल्दबाजीसे काम नहीं चलता। देखो इन्द्रने दीर्घ कालतक सेवा की, तभी उसका अन्तःकरण शुद्ध हुआ और वह आत्मतत्त्वकी उपलब्धिमें समर्थ हो सका। गीतामें भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र कहते हैं— परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥ (गीता ४।८) इस प्रकार भगवान्ने 'साधुओंका परित्राण' अपने अवतारका प्रधान प्रयोजन बतलाया है। अब यह प्रश्न होता है कि साधु किसे कहते हैं? भाष्यकार भगवान् शंकराचार्यने 'साधूनाम्' इस पदका पर्याय 'सन्मार्गस्थानाम्' लिखा है। अपनी कुल-परम्पराका समादर आवश्यक है किंतु 'सन्मार्ग' क्या है? इसका निर्णय होना बहुत कठिन है। यदि कहा जाय कि शास्त्रानुमोदित मार्गका नाम सन्मार्ग है तो इसमें भी सन्देह होता है; क्योंकि यह निश्चय होना कठिन है कि सच्चास्त्र कौन है। लोग शंका करते हैं कि वेद ही सच्चास्त्र क्यों है, कुरान या बाइबिल आदिको ही प्रधान सच्चास्त्र क्यों न माना जाय? यद्यपि यह बात युक्तिसे भी सिद्ध की जा सकती है कि वेद ही सच्चास्त्र है तथापि यहाँ इसका प्रसंग नहीं है। इसलिये विशेष न कहकर थोड़ा-सा संकेत किया जाता है। मान लीजिये आपको कहीं जाना है। अपने ध्रुवकी ओर जाते-जाते आगे चलनेपर आपको चार मार्ग मिले। उस समय चारों मार्गोंसे यात्री आ-जा रहे हैं। आप उनसे पूछते हैं कि अमुक स्थानको कौन मार्ग जाता है तो वे सभी अपने-अपने मार्गको वहाँ जानेवाला और अधिक सुविधाजनक बतलाते हैं। वे अपने-अपने मार्गकी प्रशंसा करते हैं—इतना ही नहीं अपितु अपनेसे भिन्न मार्गोंको विघ्नबहुल और त्याज्य भी बतलाते हैं। ऐसी अवस्थामें आप क्या करेंगे? हमारे विचारसे तो आप यही देखेंगे कि इनमें कोई हमारा परिचित (आप्तपुरुष) भी है। तब उनमें जो आपके ग्रामके आस-पासका होगा, औरोंकी अपेक्षा उसीका विश्वास करोगे। अतः विचारवानोंका यही कर्तव्य है कि आप्तवाक्यका अवलम्बन करें। यह साधारण धर्म कहा जाता है कि जो आचार-विचार अपनी कुलपरम्परासे चला आया हो, उसीका आश्रय लिया जाय। आप जिस देश, जाति, सम्प्रदाय या कुलमें उत्पन्न हुए हैं; उसमें जो पुरुष या शास्त्र अधिक आदरणीय माने गये हों, उन्हींके मार्गका अवलम्बन करें, क्योंकि पिता अपने पुत्रका अहित कभी नहीं चाह सकता। अतः पिता-पितामह-प्रपितामह-क्रमसे जो मार्ग चला आया हो, उसीका आश्रय लेना चाहिये। धर्मके विषयमें यह व्यापक लक्षण है। यह जैसा हिन्दुओंके लिये है, वैसा ही ईसाई, मुसलमान, जैन, बौद्ध आदि अन्य मतावलम्बियोंके लिये भी है। उन्हें भी अपने-अपने आचार्य और धर्मग्रन्थोंका आश्रय लेना चाहिये। यदि आप आरम्भसे ही यह निश्चय करने लगेंगे कि कौन मार्ग श्रेष्ठ है तो इसका निर्णय कभी नहीं कर सकेंगे। यह तो बहुत लम्बा-चौड़ा क्रम है, इसका निर्णय तो कभी नहीं होगा। ऐसी अवस्थामें आप धर्ममार्गका अवलम्बन कैसे कर सकेंगे? राजाको सारी शक्तियाँ प्राप्त होती हैं; वह चाहे जिसे उजाड़ सकता है और चाहे जिसे बसा सकता है; उसे कोई रोकनेवाला नहीं होता। फिर भी वह अपने ही बनाये हुए नियमोंका अनुसरण करता है। वस्तुतः बिना नियमके कोई भी व्यवस्था हो नहीं सकती। इस प्रकारकी नियम-शृंखलाका नाम ही तो धर्म है। लौकिक श्रृंखलासे बद्ध प्रवृत्तिका नाम लौकिक
२८४ भक्तिसुधा व्यवहार है और वैदिक श्रृंखलासे बद्ध प्रवृत्तिका नाम धर्म है। किंतु नियम-निर्माणका कार्य अभिज्ञ पुरुष ही कर सकते हैं; अतः यहाँ फिर वही लक्षण लागू हो जाता है कि जो जिस धर्म, जिस जाति और जिस कुलमें उत्पन्न हुए हैं, उन्हें उसीमें उत्पन्न हुए आप्त पुरुषोंके मार्गका अवलम्बन करना चाहिये। विद्यार्थीको यदि कोई अक्षर दिखलाकर कहा जाय कि यह 'क' है और इसपर वह कहने लगे कि इसे 'क' क्यों कहते हैं तो उसे इसका हेतु किसी प्रकार नहीं समझाया जा सकता और उसे कोरा ही रहना पड़ेगा। इसका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये तो पहले-पहल उसे आचार्यके कथनमें अन्ध-श्रद्धा ही करनी होगी। पीछे जब उसकी बुद्धि विकसित होगी और उसे व्याकरणशास्त्रके सूक्ष्म रहस्यका पता चलेगा तो उसे स्वयं ही सब बात मालूम हो जायगी। जब वैद्य रोगीको ओषधि देता है तो वह क्यों नहीं कहता कि मैं इसे क्यों सेवन करूँ। उस समय उसे वैद्यमें श्रद्धा करनी ही पड़ती है। श्रुतिने भी 'श्रद्धत्स्व तात श्रद्धत्स्व' इस अजातशत्रुकी उक्तिद्वारा श्रद्धाका ही विशेष महत्त्व प्रतिपादन किया है। अतः आस्तिकोंको यह तर्क करनेकी आवश्यकता नहीं है कि वेद अपौरुषेय क्यों हैं? जो आर्यावर्तमें उत्पन्न हुए हैं और आर्यधर्मावलम्बी हैं, उन्हें पहले- पहल ऐसा मानना ही चाहिये। पीछे जब समझनेकी योग्यता होगी, तब वे इस तथ्यको समझ भी सकेंगे। पहले योग्यता प्राप्त करो; 'श्लोकवार्तिक', 'तन्त्रवार्तिक' और 'पञ्चपादिकाविवरण' आदि ग्रन्थोंको देखो; तब समझ सकोगे कि वेद अपौरुषेय क्यों हैं। उस समय तुम यह जान लोगे कि वेद ही सच्छास्त्र क्यों हैं और उनसे भिन्न किसी अन्य ग्रन्थको यह सम्मान क्यों प्राप्त नहीं है? उन्हींके अनुमोदित धर्मकी रक्षा करनेके लिये भगवान् कह रहे हैं— परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥ (गीता ४।८) कर्तव्याकर्तव्यके निर्णयके लिये शास्त्रका ही प्रामाण्य है अबतक जो कुछ कहा गया है, वह हमारी ही कल्पना हो—ऐसी बात नहीं है। भगवान्ने भी कर्तव्याकर्तव्यका विवेचन करनेके लिये शास्त्रकी ही शरण लेनेकी आज्ञा दी है। इसीसे वे कहते हैं— 'तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।' (गीता १६।२४) वह शास्त्र क्या है? इसका भगवान् स्पष्टतया खुले शब्दोंमें उत्तर देते हैं कि 'वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो' (गीता १५।१५)। अतः वेद ही सच्छास्त्र है। पूर्वमीमांसक 'शास्त्र' शब्दका अर्थ वेद ही करते हैं। उत्तरमीमांसाका सूत्र है—'शास्त्रयोनित्वात्' (वेदान्तदर्शन १।१।३); इसकी व्याख्या करते हुए आचार्य लोग कहते हैं 'शास्त्रम् ऋग्वेदादि'। सांख्यादिमें तो 'शास्त्र' शब्दका उपचारसे प्रयोग होता है। जैसे 'वेदान्त' शब्दका मुख्य अर्थ उपनिषद् है; ब्रह्मसूत्रादिमें उसका औपचारिक प्रयोग होता है, क्योंकि वे उन्हींका विचार करते हैं। 'शिष्यते हितमुपदिश्यतेऽनेन इति शास्त्रम्' इस व्युत्पत्तिके अनुसार भी वेद ही शास्त्र हैं, क्योंकि निरपेक्ष हितका उपदेश उन्हींमें किया गया है। अन्य शास्त्रोंमें जो हितोपदेश हैं, उसे श्रुति-प्रामाण्यकी अपेक्षा है। वैदिक लोग दर्शन, स्मृति और गीताका भी स्वतःप्रामाण्य नहीं मानते; उनका प्रामाण्य वेदमूलक होनेके ही कारण है। मनुस्मृति इसीलिये प्रामाणिक है; क्योंकि वह वेदानुमोदित धर्मका प्रतिपादन करती है और श्रुति उसके लिये कहती है कि 'यद्वै मनुरवदत्तद्भेषजम्'। श्रीमद्भगवद्गीता भी वेदानुसारिणी होनेके कारण ही प्रामाणिक है। यदि भगवदुक्ति होनेके कारण उसे स्वतःप्रमाण कहा जाय तो बौद्ध दर्शन भी प्रामाणिक माना जायगा। किंतु वेद-विरुद्ध होनेके कारण बौद्ध दर्शन भगवदवतार भगवान् बुद्धकी उक्ति होनेपर भी प्रामाणिक नहीं है। प्रमाणोंका किसी अर्थमें सांकर्य होता है और
श्रीरासलीलारहस्य २८५ किसीमें व्यवस्था होती है। शब्द केवल श्रोत्रेन्द्रियसे ही ग्रहण किया जा सकता है, उसका ज्ञान किसी अन्य इन्द्रियसे नहीं हो सकता। अतः श्रोत्र शब्दग्रहणमें इन्द्रियान्तर-निरपेक्ष प्रमाण है। यहाँ प्रमाणकी व्यवस्था है। किंतु दूरस्थ जल नेत्रसे भी ग्रहण किया जा सकता है। ऐसे ही और भी कितने ही पदार्थ हैं, जो कई प्रमाणोंसे ज्ञात हो सकते हैं। उनमें प्रमाणोंका सांकर्य है। वेद स्वतःप्रमाण हैं और गीतादिका प्रामाणिकत्व वेदमूलक होनेके कारण है—ऐसा कहकर हमने गीताका निरादर नहीं किया। जैसा हम पहले दिखा चुके हैं, हमारा यह कथन भगवदुक्तिके ही अनुसार है। अतः यह तो उसका सम्मान है। जो लोग ऐसा कुतर्क करते हैं कि गीताके वेदानुसारी होनेमें क्या प्रमाण है, उनकी यह चेष्टा साहसमात्र है। गीताके वेदानुसारित्वमें शंका करना बड़ी भारी धृष्टता है। एक बात बहुत ध्यान देनेयोग्य है। लोग चमत्कारोंसे बहुत आकर्षित होते हैं। शास्त्रानुयायियोंपर जनताकी ऐसी श्रद्धा नहीं होती, जैसी कि चमत्कारोंपर होती है। किंतु ऐसा कोई नियम नहीं है कि सिद्धि वैदिकोंमें ही होती हो। जैन आदि अन्य मतावलम्बियोंमें भी सिद्धियाँ और तितिक्षा आदि गुण देखे जाते हैं। परंतु उनका अनुगमन नहीं करना चाहिये। वैदिक मतावलम्बी यदि इन गुणोंसे शून्य हो तो भी उसीका अनुसरण करना चाहिये। यदि अहिंसा और दया आदि भी हमारे शास्त्रोंकी विधिसे विपरीत हों तो वे पाप हैं और शास्त्रानुमोदित हिंसा भी धर्म है। अर्जुनको दया और करुणा ही तो हो रही थी; परंतु भगवान् कहते हैं— कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्। अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ॥ (गीता २।२) इस प्रकार भगवान्ने उस दया और करुणाको भी 'अनार्यजुष्ट', 'अस्वर्ग्य' और 'अकीर्तिकर', 'कश्मल' (पाप) कहकर त्याज्य बतलाया है। अतः पहले लकीरके फकीर बनो। जो कुछ शास्त्र कहता है, उसे आँख मूँदकर ग्रहण करो। पहले कुछ योग्यता प्राप्त कर लो तब निर्णय करना। यदि तुम्हें कोई अनुमान करना है तो पहले प्रतिज्ञा, व्याप्ति एवं निगमन आदि पंचावयव वाक्य एवं देवाभास आदिका ज्ञान प्राप्त करो। जबतक तुम्हें सत् और असत् हेतुका विवेक न होगा, तबतक ठीक- ठीक अनुमान कैसे कर सकोगे? हमें शान्ति, तितिक्षा और अहिंसा—ये कुछ भी अपेक्षित नहीं है, हमें केवल वैदिक विधिकी अपेक्षा है। जो ऐसा मानते हैं कि 'तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।' (गीता १६।२४) यह भगवद्वाक्य है और जो भगवद्वाक्यको अपना सर्वस्व माननेका दावा करते हैं, उन्हें तो यही कर्तव्य है, औरोंके लिये हमारा कुछ कहना नहीं है। आजकल लोगोंकी कुछ ऐसी प्रवृत्ति है कि जब वे दूसरोंके आचरणपर दृष्टि डालते हैं तो उन्हें निरी भूलें दिखायी देती हैं, किंतु अपनी भूल उन्हें कभी नहीं दीखती। श्रीगोसाईंजी महाराज कहते हैं— पर उपदेस कुसल बहुतेरे। जे आचरहिं ते नर न घनेरे॥ (रा०च०मा० ६।७८।२) अतः दूसरोंकी समीक्षामें न पड़कर हमें पहले अपनी ही ओर देखना चाहिये। शास्त्रकी आज्ञा है कि 'स्वधर्माचरणं शक्त्या विधर्माच्च निवर्तनम्।' (श्रीमद्भा० ३।२८।२) स्वधर्मका यथाशक्ति पालन करना चाहिये और विधर्मका त्याग, जो लोग यथाशक्ति स्वधर्मका पालन करते हैं, वे ही सत्पुरुष हैं। कुछ कर्म तो ऐसे हैं, जिनका न करना पाप है; जैसे सन्ध्या, अग्निहोत्र एवं बलिवैश्वदेव आदि। वे नित्यकर्म हैं। इसी प्रकार पार्वण श्राद्धादि नैमित्तिक कर्म भी अवश्यकर्तव्य हैं। उनका परित्याग करनेमें दोष माना गया है। आज थोड़े-से ब्राह्मण ही ऐसे दिखायी देते हैं, जो इन सब धर्मोंका यथायोग्य पालन करते हैं। परंतु उनके प्रति अन्य लोगोंकी विशेष आस्था नहीं देखी जाती; अतः
२८६ भक्तिसुधा उनका उत्साह भी कितने दिन रह सकेगा ? प्रवृत्तिके लिये आस्थाकी भी अत्यन्त आवश्यकता है। इसीलिये प्रत्येक ग्रन्थके पहले उसका माहात्म्य दिया जाता है और उस ग्रन्थके पाठके समय उसका पाठ भी अनिवार्य होता है। वह अर्थवाद अभिरुचिकी वृद्धिके लिये है। किंतु उस कर्मके कर्ताको उसमें अर्थवाद- दृष्टि नहीं करनी चाहिये। इसीसे नाममें अर्थवाद- बुद्धि करना भी एक नामापराध माना गया है। नामोच्चारण न करनेका दोष निवृत्त हो सकता है; परंतु नामापराधकी निवृत्ति नहीं हो सकती। अतः यदि वैदिक कर्मोंकी प्रवृत्ति करनी है तो उसका माहात्म्य भी सत्पुरुषोंमें प्रख्यात होना चाहिये। कर्मयोगकी आज भी बहुत महिमा है। परंतु इस समय इसके अनेक अर्थ हो रहे हैं। 'योगः कर्मसु कौशलम्' (गीता २।५०) इस भगवदुक्तिका आश्रय लेकर महात्मा तिलकने तो कर्म करनेकी कुशलताको ही कर्मयोग कहा है। किंतु भगवान्का तो यही कथन है कि 'कर्म ब्रह्म''''प्रतिष्ठितम् ॥' (गीता ३।१५) अर्थात् कर्म ब्रह्ममें स्थित है। यहाँ 'ब्रह्म' शब्दका अर्थ करते हुए वे कहते हैं कि 'ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्' (गीता ३।१५) अर्थात् ब्रह्म अक्षर परमात्मासे उत्पन्न हुआ है। अतः वेद ही ब्रह्म है और वेदोक्त कर्म ही कर्मयोग है। आज भक्तशिरोमणि श्रीगोसाईंजी महाराजकी 'नहिं कलि करम न भगति बिबेकू। राम नाम अवलंबन एकू॥' (रा०च०मा० १।२७।७)—इस उक्तिका अवलम्बन करके सारे धर्म-कर्मोंको तिलांजलि देकर केवल हरिनाम-संकीर्तनमें लगनेकी ही प्रवृत्ति हो रही है। हम भगवन्नाम-संकीर्तनको हेय-दृष्टिसे नहीं देखते। वह तो परम मंगलमय है, परंतु गोसाईंजीके तात्पर्यको न समझकर उनकी उक्तिका आश्रय लेकर कर्तव्य कर्मकी अवहेलना करना कदापि क्षम्य नहीं हो सकता। जबतक कर्मके करनेमें परम लाभ सुनिश्चित न होगा और उसके परित्यागमें परम हानिका निश्चय न होगा, तबतक उसमें प्रवृत्ति नहीं हो सकती। जिस प्रकार आत्मज्ञानके लिये श्रुति कहती है कि 'इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः।' (केन० २।५) उसी प्रकार कर्मके अकरणमें भी प्रत्यवाय-प्राप्तिका पूर्ण निश्चय होना चाहिये। इसीसे अग्निहोत्रादि नित्यकर्मोंके लिये तो शास्त्रकी जबरदस्त आज्ञा है, किंतु सोमादि नित्य- कर्मोंके लिये यथाशक्ति पदका अध्याहार किया गया है। नित्यकर्मोंमें भी यथाशक्ति पदका अध्याहार हो सकता है; जैसे रोगके समय सन्ध्योपासन न कर सके तो केवल मानसिक संध्या ही कर ले अथवा केवल अर्घ्यदान कर ले। किंतु अधर्म तो कभी कर्तव्य नहीं हो सकता। अतः क्षत्रिय, वैश्यको ब्राह्मणके धर्मका आश्रय करना अथवा शूद्रको वेदाध्ययन करना कभी विहित नहीं हो सकता। इसलिये यदि तुम परम कल्याण चाहते हो तो ऐसे ब्राह्मणोंका समाश्रयण करो, जो पापसे सर्वथा बचा हुआ हो और धर्मका यथाशक्ति पालन करता हो, वही सत्पुरुष है। उसकी सेवा करनेसे ही परमात्माकी प्राप्ति कर सकोगे। भगवान्ने 'शुश्रूषध्वं'''' सतीः' (श्रीमद्भा० १०।२९।२२) ऐसा कहकर सर्वसाधारणको यही उपदेश किया है। पहले कह चुके हैं कि जीवमात्र परतन्त्र होनेके कारण केवल परब्रह्म परमात्मा ही पूर्ण पुरुष है। 'पतीन् शुश्रूषध्वम्' इस कथनसे भी स्त्रीमात्रके परमपति सच्चिदानन्दघन परमपुरुष परमात्मा ही विवक्षित हैं। अतः जिस प्रकार स्त्रियोंको पतियोंका शुश्रूषण आवश्यक है, उसी प्रकार जीवमात्रको पूर्ण परब्रह्म परमेश्वरकी आराधना करना परम कर्तव्य है। इसमें किसी प्रकारकी शंका नहीं करनी चाहिये। परंतु एक ही परमात्माकी आराधना विवक्षित होनेपर भी यहाँ 'पतीन्' ऐसा बहुवचन क्यों है ? यह कथन जीवभेदकी दृष्टिसे है। जिस प्रकार गगनस्थ सूर्य एक ही है तथापि जलपात्रोंके भेदसे उसके अनेकों प्रतिबिम्ब पड़ते हैं, उसी प्रकार एक ही सच्चिदानन्दघन परमात्मा विभिन्न अन्तःकरणोंमें विभिन्न
श्रीरासलीलारहस्य २८७ रूपसे प्रतिफलित हो रहे हैं अथवा भावनाभेद या अवतारभेदके कारण यह बहुवचन हो सकता है; क्योंकि एक ही भगवान्—राम, कृष्ण, शिव आदि अनेकों रूपोंमें प्रकट हुए हैं। गोपांगनाओंके लिये तो यह प्रयोग आदरार्थ भी हो सकता है; क्योंकि उनके लिये तो एकमात्र भगवान् ही आराध्यदेव, रक्षक, पति और गुरु हैं तथा गुरुजन आदि आदरणीय व्यक्तियोंके लिये बहुवचनका प्रयोग किया जाता है। इसके सिवा इस प्रकरणमें रासलीलाके समय एक ही भगवान् अनेकरूप होनेवाले हैं। अतः भावी भेदके कारण भी कथन हो सकता है। यदि तुम पतिशुश्रूषणकी रीति न जानती हो, तुम्हें इस बातका पता न हो कि पतिदेवको किस प्रकार अपने अनुकूल बनाया जाता है तो 'शुश्रूषध्वं...सतीः'—पतिव्रताओंकी सेवा करो। इससे तुम सेवाकी विधि जान जाओगी। जैसे श्रीसीताजीको श्रीअनसूयाजी और कौसल्याजी आदिने उपदेश किया था, उसी प्रकार जीव अपने परमपति सर्वेश्वर भगवान्को कैसे अपने अनुकूल करे, यदि यह जानना हो तो उसे वैसा आचरण जाननेके लिये सत्पुरुषोंकी सेवा करनी चाहिये। जो लोग भगवान्को प्रसन्न करना जानते हैं और जो शास्त्रानुमोदित मार्गसे चलते हैं, वे ही इस मार्गमें सत्पुरुष हैं। उनकी कृपासे भगवान्की प्राप्ति हो जानेपर फिर कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता। भगवान्के संकल्पसे ही बन्ध-मोक्षकी प्रवृत्ति है। जबतक भगवान्में अनुराग नहीं है, तबतक तुम कैसे ही विद्वान् या मेधावी हो, यों ही भटकते रह जाओगे। सारा शास्त्रज्ञान भी भगवद्भक्ति-विमुखोंके लिये केवल भारमात्र रह जाता है— मद्भक्तिविमुखानां हि शास्त्रगर्तेषु मुह्यताम्। न ज्ञानं न च मोक्षः स्यात् तेषां जन्मशतैरपि ॥ शास्त्रानुमोदित आचरणके बिना शास्त्रज्ञान निष्फल है यह बात भगवद्भक्ति-विमुख शास्त्रज्ञोंके लिये है। इससे हम शास्त्रकी अवहेलना नहीं करते। ऐसा शास्त्रज्ञ दूसरोंका कल्याण तो कर सकता है, किंतु स्वयं कोरा ही रह जाता है; जैसे दीपक औरोंको तो प्रकाशित करता है, किंतु उसके नीचे अँधेरा ही रहता है। इस विषयमें विद्वानोंकी भी ऐसी ही सम्मति है कि विद्वान् रागी होनेपर भी दूसरोंका कल्याण कर सकता है, किंतु शास्त्रानभिज्ञ पुरुष विरक्त रहनेपर भी दूसरोंको पथप्रदर्शन नहीं कर सकता। जिसके हाथमें दीपक है, वह स्वयं भले ही अँधेरेमें रहे, परंतु दूसरोंको तो प्रकाश प्रदान कर ही सकता है। इसी प्रकार एक विद्वान् भी जो सब प्रकारके अधिकारियोंके लिये तदनुकूल साधनोंका ज्ञान रखता है, यदि स्वयं आचरण न भी करे तो भी दूसरोंको तो ठीक-ठीक उपदेश कर ही सकता है। ऐसी गाथा भी है कि कहीं कथा होती थी। उसे सुन-सुनकर श्रोता तो कितने ही मुक्त हो गये, परंतु पण्डितजी कथा ही बाँचते रह गये; क्योंकि जबतक शास्त्रानुमोदित आचरण न होगा, तबतक केवल शास्त्रज्ञानसे कोई कल्याणका पात्र नहीं हो सकता। 'आचारहीनं न पुनन्ति वेदाः' मरणकालमें सारे शास्त्र इसी प्रकार छोड़कर चले जाते हैं, जैसे पत्रहीन वृक्षको पक्षीगण। अतः आत्मकल्याणमें आचरणकी ही प्रधानता है। इसीसे कहा है— पण्डिता बहवो राजन्बहुज्ञाः संशयच्छिदः। सदसस्पतयोऽप्येके असन्तोषात् पतन्त्यधः ॥ (श्रीमद्भा० ७।१५।२१) अतः साधन-सम्पन्न प्राणी ही आत्मकल्याण कर सकता है। इसलिये जो शास्त्रज्ञ है, परंतु शास्त्रोक्त धर्मोंमें निष्ठा नहीं रखता, उसके लिये शास्त्र अकिंचित्कर हैं। वह दूसरेके लिये अवश्य आदरणीय है, परंतु उसे स्वयं अपनेपर जुगुप्सा ही करनी चाहिये। उसके प्रति श्रद्धा और सद्भाव रखनेसे दूसरोंका कल्याण अवश्य हो सकता है; भले ही वह स्वयं नरकगामी ही हो। कई पदार्थ ऐसे हैं, जो स्वतः स्वरूपतः पतित हैं, परंतु यदि उनकी विधिवत् सेवा- पूजा की जाय तो अपने उपासकका कल्याण कर सकते हैं। गौ स्वयं पशु है, परंतु अपने भक्तको
गोलोक ले जाती है। अश्वत्थ वृक्ष स्वयं स्थावर है, किंतु अपनी पूजा करनेवालेका कल्याण कर सकता है। इसी प्रकार ब्राह्मण यद्यपि शरीरदृष्टिसे अस्थिमांस एवं चर्मरूप ही है तो भी अपनेमें श्रद्धा रखनेवालेके लिये तो सब प्रकारके मंगलका ही कारण होता है। ब्राह्मण यदि दुराचारी भी हो तो भी पूजनीय है। श्रीगोसांईजी महाराज कहते हैं— पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना॥ (रा०च०मा० ३।३४।२) ऐसी ही बात एक स्मृतिमें भी कही गयी है— दुःशीलोऽपि द्विजः पूज्यः न तु शूद्रो जितेन्द्रियः। कः परित्यज्य गां दुष्टां दुहेच्छीलवतीं खरीम् ॥ भगवान् कृष्ण कहते हैं— न ब्राह्मणान्मे दयितं रूपमेतच्चतुर्भुजम्। सर्ववेदमयो विप्रः सर्वदेवमयो ह्यहम् ॥ (श्रीमद्भा० १०।८६।५४) यह बात सुशिक्षित और सदाचारसम्पन्न ब्राह्मणोंके लिये ही कही गयी हो, ऐसी बात नहीं है। भगवान्का तो यह कथन है कि— ब्राह्मणो जन्मना श्रेयान् सर्वेषां प्राणिनामिह। तपसा विद्यया तुष्ट्या किमु मत्कलया युतः ॥ (श्रीमद्भा० १०।८६।५३) किंतु इससे यह नहीं समझना चाहिये कि गुणहीन ब्राह्मण स्वयं भी कल्याणका पात्र हो सकता है। उसे स्वयं तो नरक ही भोगना पड़ेगा। उसकी अपेक्षा तो स्वधर्मनिष्ठ शूद्रकी ही सद्गति होनी अधिक सम्भव है। इसी भावको लक्ष्यमें रखकर श्रीमद्भागवत (७।९।१०)-में कहा है— 'विप्राद् द्विषड्गुणयुतादरविन्दनाभपादारविन्द- विमुखाच्छ्वपचं वरिष्ठम्। मन्ये....॥' इस प्रकार श्रीमद्भागवतमें कहीं तो गुणहीन ब्राह्मणको भी सर्वथा पूजनीय बतलाया गया है और कहीं भगवद्भक्तिहीन द्वादश-गुण-विशिष्ट ब्राह्मणकी अपेक्षा भगवच्चरणानुरागी श्वपचकी उत्कृष्टता दिखलायी गयी है। आजकल ब्राह्मण लोग तो प्रशंसापरक वाक्योंको लेकर अपनी पूजनीयताका दावा करते हैं और अब्राह्मण लोग निन्दापरक वाक्योंको लेकर उन्हें नीचा दिखानेका प्रयत्न करते हैं। परंतु बात बिलकुल उल्टी है। वस्तुतः ब्राह्मणोंको तो यह चाहिये कि अपने ब्राह्मणत्वका अभिमान छोड़कर निन्दापरक वाक्योंके अभिप्रायानुसार भगवद्भक्ति और शास्त्रानुमोदित आचरणको ग्रहण करें तथा अब्राह्मणोंको यह उचित है कि ब्राह्मणोंके गुणदोषकी ओर न देखकर ब्राह्मणमात्रमें श्रद्धा रखें; क्योंकि शास्त्रमें जहाँ आचारहीन ब्राह्मणकी निन्दा की गयी है, वह उनके कल्याणकी दृष्टिसे है और जहाँ उनकी प्रशंसा की गयी है, वह ब्राह्मणेतर वर्णोंकी ब्राह्मणमात्रके प्रति श्रद्धा परिपक्व करनेके लिये है। संसारमें शास्त्रज्ञ होना सरल है, परंतु अपने परम प्रेमास्पद प्रभुको स्वानुकूल कर लेना परम दुर्लभ है। किंतु भूषण यही है। पत्नी बड़ी रूपवती हो और तरह-तरहके वस्त्रालंकारोंसे सुसज्जिता हो, परंतु यह उसका भूषण नहीं है। उसकी वास्तविक शोभा तो इसीमें है कि वह अपने प्राणाधार प्रियतमको अपने अनुकूल बना ले। इसी प्रकार शास्त्रज्ञोंका भूषण भी यही है कि वे परम प्रभु श्रीपरमात्माको अपने अनुकूल कर लें। जहाँ भगवान् रहते हैं, वहीं सारे गुण रहते हैं; अतः यदि भगवान् प्रसन्न हो गये तो मानो सर्वगुणसम्पन्नता प्राप्त हो गयी। इसीसे 'पतीन् शुश्रूषध्वम्' ऐसा कहा है और इस पतिशुश्रूषाका प्रकार समझनेके लिये 'शुश्रूषध्वं सतीः' यह कहा है। यहाँ व्रजांगनाओंके लिये 'सतीः' शब्दसे क्या विवक्षित होगा ? उनके लिये जो भिन्न यूथेश्वरियाँ हैं, वे ही सती हैं। उनकी शुश्रूषा करनेसे ही वे अचिन्त्यानन्दसुधासिन्धु भगवान्के सौन्दर्य एवं माधुर्य रसका समास्वादन कर सकेंगी; क्योंकि वे यूथेश्वरियाँ भगवान्को स्वाधीन करना जानती हैं। भगवान्का यह उपदेश पहले भी है कि यहाँ जो आह्लादिनीशक्तिस्वरूपा श्रीराधेश्वरी हैं, उनके कृपाकटाक्षसे ही यूथेश्वरी व्रजबालाओंको भगवान्को स्वाधीन करनेका सामर्थ्य
प्राप्त हुआ है। इसी प्रकार अन्य गोपांगनाओंको उन यूथेश्वरियोंकी सेवा करनेसे ही उसकी प्राप्ति हो सकती है। अतः उन्हें उन्हींका आश्रय लेना चाहिये। किंतु इसके लिये ब्रजमें जानेकी क्या आवश्यकता थी? इसका कारण बतलाते हैं— 'क्रन्दन्ति वत्सा बालाश्च तान् पाययत दुह्यत।' (श्रीमद्भा० १०।२९।२२) यह ऐसी ही बात है जैसे 'मामनुस्मर युध्य च।' (गीता ८।७) इधर अपनी प्राप्तिके लिये भगवान् उन्हें यूथेश्वरियोंकी सेवा करनेका आदेश देते हैं और उधर इसके साथ ही बालकोंको दुग्धपान कराने और गोदोहन करनेकी भी आज्ञा दे रहे हैं। इससे सर्वसाधारणके लिये भगवान्का यही मत प्रतीत होता है कि उन्हें निरन्तर भगवत्स्मरण करते हुए अपने लौकिक और वैदिक कर्तव्योंका भी यथावत् पालन करते रहना चाहिये। स्त्रियोंके लिये बालकोंको दुग्धपान कराना आदि गृहकृत्य धर्म ही है। जिस प्रकार क्षत्रियोंके लिये युद्ध और वैश्योंके लिये व्यापार कर्तव्य है, उसी प्रकार स्त्रियोंको सब प्रकारके गृहकृत्योंको सुचारु रूपसे सम्पन्न करते रहना चाहिये। इधर 'क्रन्दन्ति वत्सा बालाश्च तान् पाययत दुह्यत' इस वाक्यसे अन्य जीवरूप स्त्रियोंके लिये भगवान्का यह उपदेश है कि जब तुम मेरी ओर आने लगते हो तो ये अज्ञानी इन्द्रियाधिष्ठाता देवगण अपने पशुको अपने अधिकारसे बाहर जाता देखकर 'क्रन्दन्ति'—चिल्लाने लगते हैं। ये विघ्न करनेमें समर्थ हैं, इसलिये उस साधकके मार्गमें तरह-तरहके विघ्न उपस्थित कर देते हैं। श्रीमद्भागवत (११।४।१०)-में कहा है— 'त्वां सेवतां सुरकृता बहवोऽन्तरायाः स्वौको विलङ्घ्य परमं व्रजतां पदं ते।' देवता लोग नहीं चाहते कि यह प्राणी उनके पंजेसे निकलकर भगवद्धाममें प्रवेश करे। श्रुति भगवती कहती है 'नैतद्देवानां प्रियं यदैतन्मनुष्या विद्युः' अतः ऐसी परिस्थिति होनेपर ये बालक और वत्सरूप देवगण क्रन्दन करने लगते हैं। बाल अज्ञको कहते हैं। देवता लोग भोगप्रधान हैं, अभोक्ता आत्मतत्त्वमें उनकी गति नहीं है, इसलिये वे 'बाल' हैं तथा ऐसी पाशविक प्रवृत्तिके कारण ही उन्हें 'वत्साः' कहा गया है। देवताओंको 'असुर' भी कहा गया है— 'असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः।' (ईशावास्य० ३) 'असु' शब्दका अर्थ प्राण है; 'असुषु रमन्त इति असुराः' इस व्युत्पत्तिके अनुसार देवताओंको असुर कहा गया है, क्योंकि उनकी प्रवृत्ति प्राणादि अनात्माके पोषणमें ही है। जिस समय देवासुर-संग्राममें देवताओंको विजय प्राप्त हुई तो वे भगवान्को भूलकर अभिमानवश उसे अपना ही पुरुषार्थ समझने लगे। वे इस बातको भूल गये कि हमारे देह, इन्द्रिय एवं अन्तःकरण आदि सभी जड़ हैं। सर्वान्तर्यामी श्रीहरिकी प्रेरणाके बिना उनमें कुछ भी गति नहीं हो सकती। ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥ (गीता १८।६१) इस प्रकार देवताओंको मोहवश असुरभावको प्राप्त होते देखकर भगवान्ने उनका मानमर्दन किया और तब उनकी आँखें खुलीं। परंतु देवताओंका यह असुरत्व सापेक्ष है। जो लोग जगन्मोहिनी मायाके अधिकारको पार कर गये हैं, जिनका बुद्ध्यादिमें आत्मत्वाभिनिवेश सर्वथा गलित हो गया है और जिन्हें निखिल प्रपंच अपने स्वरूपभूत चिदाकाशमें प्रतीत होते हुए तलमलिन्यके समान सर्वथा असत् अनुभव होता है, उन तत्त्वनिष्ठ जीवन्मुक्तोंकी अपेक्षासे ही वे 'असुर' हैं। अन्य मनुष्यों एवं असुरोंकी अपेक्षा तो वे 'सुर' ही हैं। वस्तुतः सारा विवाद व्यष्टि-अभिमानमें ही है। व्यष्टि-अभिमानके कारण ही जीव अपनेको पण्डित, बुद्धिमान्, ऐश्वर्यशाली, सुखी, दुःखी अथवा अशक्त समझता है। यदि इस परिच्छिन्नत्वाभिमानको छोड़कर समष्टिमें आत्मबुद्धि हो जाय तो फिर कोई विवाद
२९२ भक्तिसुधा हमें सृष्टि-प्रतिपादक वाक्योंका सीधा-सादा अर्थ छोड़कर ब्रह्ममें ही तात्पर्य मानना पड़ेगा। अतः हे श्रुतियो! तुम इधर परब्रह्मके प्रतिपादनका प्रयत्न क्यों करती हो? जाओ साध्यसाधनरूप प्रपंचका ही प्रतिपादन करो। इसमें विशेष प्रयास भी नहीं है। देखो, 'कदाचनस्तरीरसि नेन्द्र सश्चसि दाशुषे' यह श्रुति स्पष्टतया इन्द्रका ही प्रतिपादन करती है; इसी प्रकार कोई श्रुति पुरोडाशकी स्तुति करती है; जैसे—'स्योनं ते सदनं कृणोमि घृतस्य धारया सुशेवं कल्पयामि, तस्मिन् सीद अमृते प्रतितिष्ठ व्रीहीणां मेध सुमनस्यमानः।' श्रुतियोंका जो शब्दार्थ होता है, वह आपाततः ही प्रतीत हो जाता है—'औत्पत्तिकस्तु शब्दस्यार्थेन सम्बन्धः' इस वाक्यके अनुसार शब्द और अर्थका सम्बन्ध स्वाभाविक है। अतः जिन इन्द्र, वरुण, वायु आदि देवताओंका श्रुतियाँ आपाततः प्रतिपादन कर रही हैं, वे ही श्रुतियोंके पति हैं, उन्हींकी तुम सेवा करो; परपुरुषरूप निर्विशेष ब्रह्मका आश्रय मत लो। यहाँ जो 'सतीः' शब्दमें द्वितीया है, वह प्रथमाके अर्थमें है। इसका तात्पर्य यह है कि 'पतीन् शुश्रूषध्वं यस्माद्ययं सत्यः'—तुम पतियों (अपने प्रतिपाद्य देवताओं)-की सेवा करो; क्योंकि तुम सती हो और यदि 'सतीः' शब्दको द्वितीयान्त ही माना जाय तो इस वाक्यका अर्थ होगा—'सतियोंकी सेवा करो'। सतियाँ वे श्रुतियाँ हैं, जो अपने प्रतिपाद्य देवताओंका ही प्रतिपादन करती हैं, परब्रह्मतक नहीं दौड़तीं। तुम उन्हींका अनुगमन करो; क्योंकि मीमांसकोंका जबरदस्त आग्रह है कि 'आम्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्यमतदर्थानाम्' अर्थात् 'वेद क्रियार्थ है, इसलिये जो वाक्य क्रियार्थ नहीं हैं, उनका कोई प्रयोजन नहीं है।' मीमांसकोंका मत है कि विधि-निषेधरूपसे क्रियापरक होनेपर ही वाक्यकी सार्थकता है। विधि- वाक्य इष्टप्राप्तिका उपदेश करनेके कारण सार्थक है; जैसे—'ज्वरितः सन् पथ्यमश्नीयात्' (ज्वरग्रस्त होनेपर पथ्य भोजन करे), इसी प्रकार 'अग्निहोत्रं जुहुयात्', 'स्वर्गकामो यजेत्' आदि वाक्योंकी अर्थवत्ता है तथा निषेधवाक्य अनिष्ट-परिहारका उपाय उपदेश करनेके कारण सार्थक है, जैसे— 'सर्पाय अङ्गुलिं न दद्यात्' (सर्पको अंगुली मत पकड़ाओ)। इसी प्रकार 'ब्राह्मणो न हन्तव्यः' आदि वाक्य समझने चाहिये। परंतु 'यह राजा जाता है', 'पृथ्वी सात द्वीपोंवाली है' इत्यादि सिद्ध-वस्तु- प्रतिपादक वाक्य और 'वायुर्वे क्षेपिष्ठा देवता' (वायु शीघ्रगामी देवता है) इत्यादि अर्थवाद किसी क्रियामें उपयोगी न होनेके कारण व्यर्थ हैं। जो हितका उपदेश करे, वह शास्त्र है अब यहाँ सन्देह किया जा सकता है कि अर्थवादको सार्थक न माननेपर तो उसका शास्त्रत्व ही सिद्ध नहीं हो सकता, क्योंकि 'शिष्यते हितमुपदिश्यतेऽनेन इति शास्त्रम्' इस लक्षणके अनुसार शास्त्र उसीको कहते हैं, जो हितका उपदेश करता है; जिस उक्तिका कोई प्रयोजन नहीं होता, उसे शास्त्र नहीं कहा जा सकता, वह तो उन्मत्तप्रलापवत् उपेक्षणीय ही होती है। वाचस्पतिमिश्रका कथन है— 'प्रतिपित्सितं त्वर्थं प्रतिपादयन् प्रतिपाद- यितावधेयवचनो भवति। अप्रतिपित्सितन्तु प्रतिपाद- यन्नायं लौकिको नापि परीक्षक इत्युन्मत्तवदुपेक्ष्यः स्यात्।' किंतु वस्तुतः अर्थवादका अशास्त्रत्व माना नहीं गया; क्योंकि 'स्वाध्यायोऽध्येतव्यः' इस विधिसे स्वाध्यायपदवाच्य समस्त वेदराशिका [आचार्य- परम्परासे] अध्ययन करनेका विधान किया गया है। समस्त वेदराशिके अन्तर्गत तो अर्थवाद भी है ही और गुरुपरम्परापूर्वक वेदाध्ययनका 'घृतकुल्या पयःकुल्यादि' की प्राप्तिरूप अदृष्ट फल भी बतलाया गया है। इसके सिवा श्रौतसूत्रकार कर्काचार्यजी भी कहते हैं कि 'वेदे मात्रामार्त्रास्याप्यानर्थक्यं न वक्तुं शक्यम्' अर्थात् वेदमें एक मात्राकी व्यर्थता नहीं बतलायी जा सकती। अतः मीमांसकको अर्थवादकी सार्थकता अवश्य बतलानी चाहिये।
श्रीरासलीलारहस्य २९३
मीमांसक कह सकता है कि विधिके साथ एकवाक्यतापन्न होकर विधिविहित अर्थकी स्तुति करनेमें अर्थवादका उपयोग होता है; इसी तरह ये सार्थक हो सकते हैं। किंतु वेदाध्ययनसे घृतकुल्या, पयःकुल्या आदि अदृष्ट फलकी कल्पना करनेकी क्या आवश्यकता है ? इससे तो वेदार्थज्ञानरूप दृष्ट फल ही प्राप्त हो जाता है और दृष्ट फलके रहते हुए अदृष्ट फलकी कल्पना करना व्यर्थ है। इसपर शंका होती है कि यदि ऐसी बात है तो वेदार्थ-ज्ञान स्वतन्त्रतासे स्वयं वेदाध्ययन कर लेनेसे ही हो सकता है; उसके लिये ‘स्वाध्यायोऽध्येतव्यः’ इस वाक्यसे आचार्यपरम्परापूर्वक अध्ययन करनेकी ही विधि क्यों की गयी है ? उत्तरमें कहा जा सकता है कि गुरुपरम्परापूर्वक अध्ययन करनेसे वेद संस्कृत होता है और संस्कृत वेद ही यज्ञ-यागादिमें उपयोगी है। इसलिये यह विधि सार्थक है। वेदाध्ययनसे वेदार्थ-ज्ञानकी निष्पत्ति तो अन्वय-व्यतिरेकसे स्वतः सिद्ध है। जिस प्रकार भोजन करनेवाले पुरुषको तृप्ति हो ही जाती है, उसी प्रकार जो कोई वेदाध्ययन करेगा, उसे वेदार्थज्ञान होगा ही। इसमें विधि की आवश्यकता नहीं है। विधिकी सार्थकता अप्राप्त विषयका प्रतिपादन करनेमें ही होती है। जिस प्रकार तण्डुलनिष्पत्ति नखविदलनसे भी हो सकती है और मुसलावहननसे भी। किंतु यागादिमें मुसलावहनन ही करना चाहिये; इसीलिये ‘व्रीहीनवहन्ति’ यह विधि की गयी है। इसका फल अदृष्ट होता है। इसी प्रकार वेदार्थका ज्ञान गुरुसे अध्ययन करनेपर भी हो सकता है और व्युत्पन्नमति पुरुषोंको स्वयं अपने बुद्धिबलसे भी हो सकता है। इसीसे यह विधि की गयी है कि ‘स्वाध्यायोऽध्येतव्यः’ अर्थात् गुरुपरम्परासे ही अध्ययन करना चाहिये। इसीसे वेदाध्ययन सार्थक होगा। वेदाध्ययनसे वेदार्थका ज्ञान होगा, तब वेदार्थका अनुष्ठान किया जायगा और उससे स्वर्गादिकी प्राप्ति होगी। इस प्रकार दृष्ट फलके साथ वह अदृष्ट फलका भी जनक होगा। ‘आम्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्यमतदर्थनाम्’ इस सूत्रके अनुसार अर्थवादकी सार्थकता न होनेसे अर्थवाद उत्तप्त हो रहा है और इसी प्रकार विधि भी उत्तप्त है; क्योंकि स्वभावतः विधिमें लोगोंकी प्रवृत्ति नहीं होती। उसमें प्रवृत्ति होनेके लिये उसकी स्तुतिकी आवश्यकता है। पहले यह पद्धति थी कि बड़े-बड़े राजा लोग सभाएँ कराया करते थे। उनमें शास्त्रार्थ होता था। वहाँ जो विद्वान् विजयी होता था, उसका बहुत आदर-सत्कार किया जाता था। उस सम्मानके प्रलोभनसे ही विद्वान् लोग न्याय, मीमांसा आदि शुष्क विषयोंका भी अध्ययन करते थे। इस प्रकार जिस कर्मकी महत्ता सत्पुरुषोंमें प्रसिद्ध होती है, उसीमें लोगोंकी प्रवृत्ति हुआ करती है। वैदिक एवं स्मार्त कर्मोंमें भी लोगोंकी तभी प्रवृत्ति हो सकती है, जब लोग उन कर्मोंको करनेवालोंका आदर करें। ऐसा तो कोई विरला ही विद्वान् होता है, जो आदर आदिकी अपेक्षा न रखकर कर्तव्य-बुद्धिसे ही शास्त्र-रक्षा करे। यह बात अवश्य है कि ऐसे महानुभावोंका भी सर्वथा अभाव नहीं है। इस समय यद्यपि अश्वमेध, राजसूय एवं अग्निष्टोम आदि यज्ञोंको कोई नहीं पूछता तो भी ऐसे भी ब्राह्मण हैं, जिन्होंने शुष्क इष्टियोंद्वारा अश्वमेधादि कृत्योंका अभ्यास किया है और आवश्यकता पड़नेपर वे उनका अनुष्ठान करा सकते हैं। शास्त्र कह रहे हैं—‘अहरहः सन्ध्यामुपासीत’, ‘अग्निहोत्रं जुहुयात्’, ‘स्वाध्यायोऽध्येतव्यः।’ किंतु इन विधिवाक्योंसे प्रेरित होकर आज कितने आदमी उनका पालन करते हैं ? किंतु जनतामें हरिनाम- संकीर्तनकी थोड़ी-सी महिमा प्रसिद्ध होनेके कारण उसका प्रचार दिनों-दिन बढ़ रहा है। इससे सिद्ध हुआ कि विधिमें प्रवृत्ति होनेके लिये उसकी स्तुतिकी आवश्यकता है। अतः इधर अर्थवाद अपनी सार्थकताके लिये और विधि अपनेमें प्रवृत्ति होनेके लिये उत्तप्त
थे, उन्होंने 'नष्टाश्वरथदग्धन्याय'* से परस्पर एक- दूसरेकी कार्यसिद्धि की। अर्थवादने विधिकी स्तुति करके विधिमें रुचि उत्पन्न की और विधिने अर्थवादको अपने फलसे फलवान् बना दिया। इसी प्रकार मन्त्रोंकी सार्थकताके विषयमें भी प्रश्न होनेपर उनका उपयोग द्रव्य और देवताओंके स्मारक होनेमें है, यह समाधान किया जाता है। इस तरह विधि, निषेध, अर्थवाद और मन्त्र— इन सभीका प्रामाण्य क्रियापरत्वेन ही है। इसीसे भगवान् श्रुतिस्वरूपा व्रजांगनाओंसे कहते हैं कि अपने प्रामाण्यके लिये तुम अपने समुदायका ही अनुगमन करो। जिस प्रकार तुम्हारा समुदाय क्रियापरक है, उसी प्रकार तुम भी क्रियापरक हो जाओ, शुद्ध चैतन्यरूप सिद्ध वस्तुका प्रतिपादन मत करो। यदि कहा जाय कि हमारा अप्रामाण्य हो जाने दो तो ऐसा कथन भी ठीक नहीं; क्योंकि तुम सती— अपौरुषेय होनेसे सर्वदोष-विवर्जित हो, तुम्हें मीमांसकोंका संग छोड़ना उचित नहीं है। कुछ 'द्यावाभूमी जनयन् देव एकः' (यजु० १७।१९) इत्यादि श्रुतियाँ कह सकती हैं कि मीमांसक तो हमारे स्वार्थका ही अपलाप करते हैं, क्योंकि वे हमारे सर्वस्व परब्रह्मकी सत्ता ही स्वीकार नहीं करते, फिर हमीं उनकी अपेक्षा क्यों करें? परंतु यह विचार ठीक नहीं है। मीमांसक जो ईश्वरका खण्डन करते हैं, वे केवल वेदनिर्मातृत्वेन उसे स्वीकार नहीं करते; क्योंकि नैयायिकोंके मतानुसार अनुमानसिद्ध सर्वज्ञ ईश्वरकृत होनेके कारण वेदोंका प्रामाण्य है और इधर ईश्वरके सर्वज्ञत्वका ज्ञान भी वेदसे ही होता है। इस प्रकार वेद और ईश्वर इन दोनोंमें अन्योन्याश्रय दोषकी प्राप्ति होती है। इसके सिवा एक दोष यह भी है कि जिन युक्तियोंसे अनुमान करके नैयायिक वेदनिर्माता ईश्वरका सर्वज्ञत्व सिद्ध करते हैं, उन्हीं युक्तियोंसे बौद्ध, ईसाई और यवन लोग अपने धर्मग्रन्थोंके निर्माताओंको सर्वज्ञ सिद्ध कर सकते हैं। वेदान्त-दर्शनके मतमें भी ईश्वरकी सिद्धि अनुमानसे नहीं, बल्कि शास्त्रसे ही होती है; जैसा कि 'शास्त्रयोनित्वात्' (वेदान्त- दर्शन १।१।३), 'तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि', (बृहदारण्यक० ३।९।२६) एवं 'वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः' (गीता १५।१५) इत्यादि वाक्योंसे सिद्ध होता है। वेदोंकी अपौरुषेयता इसीसे शास्त्ररक्षकका आदर भगवान् भी करते हैं। वे कहते हैं—'विप्रप्रसादाद्धरणीधरोऽहम्।' अतः मीमांसक लोग वेदका प्रामाण्य ईश्वरकृत होनेके कारण नहीं मानते। बल्कि अपौरुषेय होनेके कारण मानते हैं। इसीसे उन्होंने जो ईश्वरका खण्डन किया है। वह इसीलिये है कि उन्हें ईश्वरनिर्मितत्वेन वेदका प्रामाण्य इष्ट नहीं है। वह स्वतःप्रमाण है। उत्तरमीमांसा और पूर्वमीमांसाका यह सिद्धान्त है कि प्रमाण स्वतःप्रमाण हुआ करता है; उसका अप्रामाण्य परतः होता है। यदि प्रमाणका प्रामाण्य परतः माना जायगा तो जिस प्रमाणसे उसका प्रामाण्य सिद्ध किया जायगा, उसके प्रामाण्यकी सिद्धिके लिये किसी तीसरे प्रमाणकी अपेक्षा होगी और उनके प्रामाण्यके लिये चौथे प्रमाणकी आवश्यकता होगी। इस प्रकार अनवस्थाका प्रसंग उपस्थित हो जायगा। वेदातिरिक्त अन्य ग्रन्थोंका भी प्रामाण्य तो स्वतः सिद्ध है, किंतु पौरुषेय और सादि होनेके कारण उनका अप्रामाण्य परतः है। उनका पौरुषेयत्व और सादित्व तो उन्हींसे सिद्ध होता है। कोई भी पुरुष सर्वज्ञ नहीं हो सकता; अन्यथा अनेक सर्वज्ञ मानने पड़ेंगे। यदि अनेक सर्वज्ञ माने जायँ तो उनके कथनमें विरोध नहीं होना चाहिये। परंतु ऐसी बात है नहीं; जीवमात्रमें अल्पज्ञत्व, सातिशयत्व और करणापाटव आदि दोष रहते ही हैं। इसलिये उनके रचे हुए ग्रन्थ भी प्रामाणिक नहीं हो सकते।
- दो राजा वनमें गये हुए थे। उनमेंसे एकका घोड़ा मर गया और दूसरेका रथ नष्ट हो गया। वे आपसमें मिल गये। उनमेंसे एकने अपना रथ दिया और दूसरेने घोड़ा। इस प्रकार परस्पर मिलकर वे उस वनसे निकलकर सकुशल नगरमें पहुँच गये। इसे 'नष्टाश्वरथदग्धन्याय' कहते हैं।
जिस प्रकार अन्य ग्रन्थोंका पौरुषेयत्व प्रदर्शित किया जा सकता है, उस प्रकार वेदका पौरुषेयत्व सिद्ध नहीं किया जा सकता। यदि पूछा जाय कि इसमें प्रमाण क्या है ? तो परोक्ष वस्तुके अभावमें तो प्रमाणाभाव ही पर्याप्त प्रमाण होता है। हम तो वेदके कर्ताका अभाव बतला रहे हैं, अतः उसके लिये किसी प्रमाणकी आवश्यकता नहीं है। कहा जा सकता है कि ऐसे भी कितने ही ग्रन्थ हैं कि जिनके कर्ताका ज्ञान नहीं है; तो क्या उन्हें भी अपौरुषेय ही मानना चाहिये ? इसमें हमारा कथन यह है कि उन ग्रन्थोंकी सम्प्रदाय-परम्पराका विच्छेद देखा जाता है, इसलिये वे अपौरुषेय नहीं हो सकते। किंतु वेदोंकी सम्प्रदाय-परम्पराका विच्छेद नहीं हुआ; क्योंकि उसके विच्छेदमें कोई प्रमाण नहीं है। यदि कहा जाय कि कहीं-कहीं वेदोंकी उत्पत्ति भी तो सुनी जाती है; जैसे—'अस्य महतो भूतस्य निश्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः' (बृहदारण्यक० २।४।१०) इत्यादि वाक्योंसे ज्ञात होता है। यह कथन ठीक है, किंतु इसके साथ ही 'वाचा विरूप नित्यया', 'अनादिनिधना नित्या वागुत्सृष्टा स्वयंभुवा' आदि वाक्योंसे उनका नित्यत्व भी प्रमाणित होता है। अतः इन दोनों प्रकारके वाक्योंकी एकवाक्यता होनी चाहिये। इनका अभिप्राय केवल यही है कि पूर्व कल्पकी आनुपूर्वीके समान इस कल्पके आरम्भमें भी भगवान् स्वयम्भूसे उसी आनुपूर्वीके अनुस्मरणपूर्वक वेदोंका आविर्भाव हुआ। इसीसे भगवान् कहते हैं कि तुम अपने समुदायमें जाओ, क्योंकि मीमांसक भी परमब्रह्म परमात्माका खण्डन नहीं करते। वे केवल न्यायप्रतिपादित अनुमानसिद्ध सर्वज्ञ ईश्वरको स्वीकार नहीं करते, अपौरुषेय वेदप्रतिपादित सर्वज्ञ ईश्वरका खण्डन वे कभी नहीं करते। कर्मफल देनेवाला या कर्ममें देवतादिरूपसे ईश्वर उन्हें भी मान्य है ही, परंतु तुम स्वतन्त्र विधि निरपेक्ष अद्वैत ब्रह्ममें मत आसक्त हो। अतः तुम साध्यसाधनमय प्रपंचका ही प्रतिपादन करो, निर्विशेष परब्रह्मका प्रतिपादन करनेका प्रयत्न मत करो। इसमें 'मा चिरम्'—देरी भी नहीं होगी। इसलिये 'शुश्रूषध्वं पतीन्'—अपने-अपने प्रतिपाद्य देवताओंका ही प्रतिपादन करो। समस्त जीवोंके अधिष्ठान साक्षात् परब्रह्म भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र ही हैं यह सुनकर मानो श्रुतियोंको यह सन्देह हुआ कि यदि हम अनन्त परब्रह्मका ही प्रतिपादन करेंगी तो अन्य देवता तो उसीमें आ जायँगे; क्योंकि वे भी तो ब्रह्मसे अभिन्न ही हैं। यह नियम है कि कार्यगत सत्ता कारणमें ही रहती है, अतः समस्त कार्यका पर्यवसान कारणमें ही होता है। जिस प्रकार मृत्तिकाका प्रतिपादनकर देनेपर घटादिका भी प्रतिपादन हो ही जाता है, उसी प्रकार सबके अधिष्ठानभूत परब्रह्मका प्रतिपादन करनेपर अवान्तर देवताओंका प्रतिपादन भी हो ही जाता है। वास्तवमें तो सत्तामात्र शुद्ध ब्रह्म ही सम्पूर्ण शब्दोंका वाच्य है; क्योंकि यह निखिल प्रपंच उसीसे तो उत्पन्न हुआ है—'तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः । आकाशाद्वायुः।' (तैत्तिरीय० २।१) अतः यह ब्रह्मरूप ही है। इसलिये यदि व्रजांगनाएँ अपने प्राकृत पतियोंको छोड़कर भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके पास गयीं तो उनका पातिव्रत भंग नहीं हुआ, क्योंकि— गोपीनां तत्पतीनां च सर्वेषामेव देहिनाम्। योऽन्तश्चरति सोऽध्यक्षः क्रीडनेनेह देहभाक् ॥ (श्रीमद्भा० १०।३३।३६) जिस प्रकार तरंग समुद्रसे भिन्न नहीं होती, इसलिये यदि एक तरंगके साथ दूसरी तरंगका सम्बन्ध है तो वस्तुतः वह सम्बन्ध समुद्रके ही साथ है; क्योंकि वही समस्त तरंगोंका अधिष्ठान है, इसी प्रकार समस्त जीवोंके अधिष्ठान साक्षात् परब्रह्म भगवान् कृष्णचन्द्र ही हैं। अतः श्रुतियोंको यह विचार हुआ कि यदि हम परब्रह्मका ही प्रतिपादन करेंगी तो भी हमारा पातिव्रत भंग नहीं होगा। इसपर भगवान् कहते हैं—'सच है, मेरे साथ
सम्बन्ध करनेसे तुम्हारा पातिव्रत तो भंग नहीं होगा तथापि 'क्रन्दन्ति वत्सा बालाश्च' (श्रीमद्भा० १०।२९।२२)—ये बालक और बछड़े तो रो रहे हैं। इसपर दया करनी चाहिये। ये अज्ञानी हैं, अपने अधिष्ठानभूत मुझ परब्रह्मको नहीं जानते, इसलिये बाल हैं तथा इनकी प्रवृत्ति अनात्म पदार्थोंमें है, इस पाशविक प्रवृत्तिके ही कारण ये वत्स हैं। तुम्हें चाहिये कि इनपर दया करके इन्हें इनके इष्ट पदार्थ सोमादिका प्रदान करो।' यदि विचार किया जाय तो उपास्य-उपासनाका पर्यवसान तो प्रेमातिशयमें होता है। उसके लिये उपासना साधन है। 'भक्ति' शब्दके भी दो अर्थ हैं—'भज्यते सेव्यते भगवदाकारमन्तःकरणं क्रियतेऽनया सा भक्तिः' अर्थात् जिसके द्वारा भगवदाकार वृत्ति की जाय उसे भक्ति कहते हैं और दूसरा 'भजनं भक्तिः' भगवदाकार वृत्ति ही भक्ति है। इस प्रकार भक्ति साध्य भी है और साधन भी। इस प्रकार 'उपासना' शब्दका भी तात्पर्य यह है—'लक्ष्यमुपेत्य यद्दीर्घकालं नैरन्तर्येणादरपूर्वकमासनं तदुपासनम्' अर्थात् अपने लक्ष्यतक पहुँचकर जो दीर्घ कालतक अव्यवहित रूपसे उसकी सन्निधिमें रहता है, उसका नाम उपासना है। इस तरह यदि हम अपने ध्येयका दीर्घकालतक सेवन करेंगे तो उसके प्रति हमारे हृदयमें राग उत्पन्न होगा। 'ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।' (गीता २।६२) भगवान्की इस उक्ति के अनुसार यदि हम विषय-चिन्तन करते-करते विषयासक्त हो जाते हैं तो दीर्घकालतक भगवच्चिन्तन करनेपर उनमें भी हमारा राग हो ही जाना चाहिये। प्रेम आरम्भमें ही नहीं होता; वह तो दीर्घकालतक सत्कारपूर्वक अपने प्रियतमका निरन्तर चिन्तन करते रहनेपर ही होता है। जिस समय भगवान्में हमारा प्रेम होगा, उस समय हमें उनकी प्राप्तिकी उत्कट अभिलाषा हो जायगी। प्रेमकी अभिवृद्धि प्रेमास्पदमें ही होती है एक बात और ध्यान देनेकी है, प्रेमकी अभिवृद्धि प्रेमास्पदमें ही हुआ करती है। जो प्रेम करनेयोग्य नहीं होता, उसका दीर्घकालतक चिन्तन किया जाय, तब भी उसमें प्रेम नहीं हो सकता। व्याघ्र और सर्पादिका जन्मभर चिन्तन करते रहो, उनमें प्रेम कभी नहीं होगा। उनमें तो द्वेषकी ही वृद्धि होगी, प्रेम तो प्रेमास्पदमें ही हो सकता है। चिन्तनसे केवल योग्यता मिलती है। प्रेमास्पदका चिन्तन करनेसे प्रेम बढ़ता है और द्वेषका चिन्तन करनेसे द्वेषकी वृद्धि होती है। विषय भी सुखके साधन हैं, इसलिये उनमें भी प्रेम हो जाया करता है। प्रेम दोमें ही होता है—सुखमें तथा सुखके साधनमें। सुखके साधनमें जो प्रेम होता है वह स्थायी नहीं होता, जबतक वह पदार्थ सुखप्रद रहता है, तभीतक उसमें प्रेम रहता है। देखो, जल तभीतक प्रिय लगता है, जबतक हमें तृषा रहती है। परंतु सुख तो सदा ही प्रेमास्पद है। अतः निरतिशय प्रेम सुखमें ही हो सकता। केवल सुखस्वरूप तो एकमात्र श्रीभगवान् ही हैं, इसलिये हमें उन्हींमें प्रेम करना चाहिये। प्रेमके इन दो भेदोंको शास्त्रमें सोपाधिक और निरुपाधिक प्रेम भी कहा है। प्रेमके विषयमें यह नियम है कि अत्यन्त नीच परिस्थितिमें रहनेवाला पुरुष भी उसीको अधिकाधिक प्रेमास्पद समझता है, जो जितना उसका अधिक आन्तरिक होता है। जो देहात्मवादी हैं, जिन्हें विविध प्रकारके सौख्योपभोग ही इष्ट हैं, उनका प्रेम भी आधिकाधिक अन्तरंगमें ही होता है। देखिये, पुत्रादिकी अपेक्षा शरीर अधिक प्रिय है, शरीरकी अपेक्षा मन अधिक प्रिय है; इसीसे मन उद्विग्न होनेपर उसे शान्त करनेके लिये आत्महत्यातक कर लेते हैं। मन भी जब चंचलताके कारण अशान्तिका हेतु दिखायी देने लगता है तो उसके भी नाशका प्रयत्न किया जाता है। यहाँतक कि अन्तमें अभ्यासी लोग बुद्धिका भी निरोध करते हैं। इससे ज्ञात होता है कि जो बुद्धिसे लेकर स्थूल प्रपंचपर्यन्त सम्पूर्ण दृश्यवर्गका प्रकाशक है, वह सर्वान्तरतम आत्मा ही निरुपाधिक परमप्रेमका आस्पद है। हमारा परमाराध्य प्रभु बहिरंग नहीं है। वेद-शास्त्र