भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 288, कुल 778 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 288

२७६ भक्तिसुधा हैं, उनमेंसे बहुतोंका तो अनुष्ठान ही असम्भव है तथा बिना विवेकके उनसे पूर्ण शान्ति भी नहीं होती, किंतु यथार्थ विवेक तो एक क्षणमें ही सभी विक्षेपोंको शान्त कर देता है। हमारे चित्तमें हर समय ऐसे विचारोंका तुमुल युद्ध छिड़ा रहता है कि अमुक कार्य ठीक नहीं हुआ, अमुक पुरुषका व्यवहार उचित नहीं था, हमें अमुक समयतक अमुक कार्य अवश्य कर लेना चाहिये, हमें अमुक झंझट लगा ही हुआ है इत्यादि। यह विक्षेप किसी भी प्रकारकी बाह्य सुविधाओंसे निवृत्त नहीं हो सकता; किंतु जिस समय ठीक-ठीक विवेक होता है, उस समय इसका ढूँढ़नेपर भी पता नहीं लगता। आयुर्वेदमें भी कई जगह शारीरिक रोगोंके हेतु मानसिक रोग ही माने गये हैं। उन मानसिक रोगोंकी चिकित्सा तो ओषधि आदिसे हो ही नहीं सकती। कई स्थलोंमें तो कारणकी चिकित्सा करनेसे ही कार्यकी भी चिकित्सा हो जाती है; किंतु जहाँ कार्य बहुत उग्र हो जाता है, वहाँ पहले ओषधिप्रयोगद्वारा कार्यको निर्बल करके पीछे कारणकी चिकित्सा करते हैं। किंतु यहाँ आध्यात्मिक राज्यमें तो यदि शोक, मोह एवं ईर्ष्या आदि रोगोंकी चिकित्सा हो जाय तो बाह्य व्याधियोंका आश्रयभूत शरीर ही प्राप्त न हो। अतः पूर्ण स्वास्थ्य तो उन मूलभूत रोगोंकी चिकित्सा होनेसे ही प्राप्त हो सकता है। इसीसे पूर्वकालमें जब शत्रुओंसे पराजित होनेपर किसी राजाका राज्य छिन जाता था तो वह महर्षियोंकी ही शरण लेता था और वे उसे यही उपदेश करते थे— यत्किञ्चिन्मन्यसेऽस्तीति सर्वं नास्तीति विद्धि तत्। एवं न व्यथते प्राज्ञः कृच्छ्रामप्यापदं गतः॥ अर्थात् तुम जिस वस्तुको ऐसा मानते हो कि वह है, उसे यही समझो कि वह है ही नहीं। ऐसा निश्चय रहनेसे बुद्धिमान् पुरुष कड़ी-से-कड़ी आपत्ति प्राप्त होनेपर भी व्यथित नहीं होता। वस्तुतः आत्मासे भिन्न जितना भी प्रतीयमान जगत् है, उसमें अस्तित्व- बुद्धिपूर्वक जो भले-बुरेपनका निश्चय करना है, वही सारे दुःखोंका मूल है। यह प्रपंच तो अनन्त है। इसमें किसी भी समय अनुकूलता-प्रतिकूलताका अभाव हो जाय, यह सर्वथा असम्भव है। अतः जबतक इसमें सत्यत्वबुद्धि रहेगी, तबतक हृदयके तापोंकी शान्ति हो ही नहीं सकती। वस्तुतः अभिनिवेशपूर्वक निरर्थक एक ही वस्तुका बारम्बार अनुसन्धान करना ही पूरा रोग है। किंतु जिस समय विवेकचन्द्रका उदय होता है, उस समय सारी अनुकूलता-प्रतिकूलता बालूकी भीतके समान ढह जाती है। वह विवेकचन्द्र क्या करता हुआ उदित हुआ?— 'अरुणेन ब्रह्मात्मना विषयेण प्राच्याः प्राचीनायाः धियः मुखं सत्त्वात्मकं भागं विलिम्पन्' अर्थात् अरुण यानी ब्रह्मरूप विषयसे प्राग्भवा बुद्धिके सत्त्वात्मक भागको विलेपित करता उदित हुआ। तात्पर्य यह है कि जिस समय विवेकरूप चन्द्रका प्रादुर्भाव होता है, उस समय बुद्धि पूर्ण परब्रह्मरूप रंगसे रँग जाती है। यह नियम है कि बुद्धि अपने विषयसे अनुरंजित हुआ करती है। विवेक होनेपर एकमात्र शुद्ध परब्रह्मकी ही सत्ता रह जाती है; इसलिये उस समय बुद्धि ब्रह्मरागसे ही अनुरंजित हो जाती है। प्रेम यानी रागका आस्पद होनेके कारण भी परमात्मा अरुण कहा जाता है अथवा यों समझो कि 'प्राच्याः अविवेकदशापन्नायाः बुद्धेः मुखं जाड्यात्मकं दुःखत्मकं वा भागम् अरुणेन ब्रह्मसाक्षात्कारजन्येन सुखेन विलिम्पन् तिरोहितं कुर्वन् उद्गात्'—प्राची यानी अविवेक दशाको प्राप्त हुई बुद्धिके मुख—जाड्यात्मक या दुःखात्मक भागको अरुण यानी ब्रह्मसाक्षात्कारजनित सुखसे विलेपित-तिरोहित करता हुआ उदित हुआ। किस प्रकार उदित हुआ, सो बतलाते हैं— 'यथा प्रियः श्रीकृष्णः प्रियायाः श्रीवृषभानुनन्दिन्या मुखम् अरुणेन कुङ्कुमेन विलिम्पन् उद्गात्।' अर्थात् जिस प्रकार प्रिय श्रीकृष्णचन्द्र अपनी प्रियतमा श्रीवृषभानुनन्दिनीके मुखको अरुण कुंकुमसे विलेपित करते हुए उदित हुए थे, उसी प्रकार यह विवेकचन्द्र उदित हुआ।