भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७४ भक्तिसुधा
अज्ञानतस्तत्र पतन्ति चान्ये ज्ञाने फलं पश्य यथा विशिष्टम्॥ अर्थात् ज्ञानमें किस प्रकार विशेष फल है, वह इसीसे समझ लो कि लोग सर्प, कुशा और जलाशय आदिका ज्ञान होनेपर ही उनसे बचते हैं, उनका पता न होनेपर तो वे उनके शिकार हो ही जाते हैं। इसी प्रकार विवेकसे ही मनुष्यकी प्रवृत्ति भगवत्तत्त्वमें होती है। यदि विवेक न हो तो कौन प्रेमास्पद है और कौन त्याज्य है—इसका ज्ञान ही कैसे हो? अतः जो हृदयारण्य विवेकचन्द्रकी शीतल और सुकोमल किरणोंसे अनुरंजित नहीं हुआ, उसमें भगवान्का प्राकट्य होना असम्भव है। इसलिये भगवत्साक्षात्कारके लिये अन्तःकरणमें विवेकरूप चन्द्रका प्रादुर्भाव अवश्य होना चाहिये। जो लोग इस विवेकचन्द्रको भगवद्भक्तिका बाधक समझते हैं, उनके विषयमें क्या कहा जाय? उनके सिद्धान्तानुसार यदि द्वैतस्थिति ही परमकल्याणका हेतु है तो वह तो कीट-पतंग सभीको प्राप्त ही है। अतः वे सभी परमकल्याणके भागी होने चाहिये। वस्तुतः प्रेमका कारण तो अपने परप्रेमास्पदत्वका ज्ञान ही है। यदि हमारी दृष्टिमें अपने प्रेमास्पदसे भिन्न अन्य पदार्थोंकी भी सत्ता रहेगी तो हमारा प्रेम उनमें भी बँटा रहेगा और यदि वे सब-के-सब अपने प्रेमास्पदमें ही लीन हो जायेंगे तो हमारा सारा प्रेम सिमटकर एकमात्र उस अपने आराध्यदेवमें ही पुंजीभूत हो जायगा। प्रेमका नाश तो होगा नहीं; क्योंकि वह आत्मस्वरूप है। अतः निर्विकल्पालम्बनविवेकसम्पन्न हुए बिना तो ठीक-ठीक भगवत्प्रेम हो ही नहीं सकता। एक बात ध्यान देनेकी और भी है। निरतिशय प्रेम सदा 'त्वं' पदार्थके लिये ही हुआ करता है; अपने आराध्यदेवमें भी जो प्रेम होता है, वह आत्मीय होनेके ही नाते होता है। इसीसे भगवती श्रुति कहती है— 'न वा अरे देवानां कामाय देवाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय देवाः प्रिया भवन्ति।' (बृहदारण्यक० ४।५।६) अर्थात् हे मैत्रेयी! देवता लोग देवताओंके लिये प्रिय नहीं होते; बल्कि अपने ही लिये प्रिय होते हैं। जो उपासक अपनेको भगवान्से भिन्न समझते हैं, वे किसलिये उनमें प्रेम करते हैं? इसीलिये न कि ऐसा करनेसे हमारा कल्याण होगा अथवा ऐसा करनेमें ही हमें आनन्द आता है; अतः उनका वह भगवत्प्रेम भी आत्मतुष्टिके ही लिये होता है। जिन महानुभावोंका ऐसा कथन है कि हमारा सिद्धान्त तो तत्सुखित्व अर्थात् भगवान्के सुखमें सुखी रहना है; वे भी इसीलिये तो भगवत्सुखमें सुखी हैं, न कि उन्हें उसीमें सुख मिलता है। इस प्रकार यदि यह नियम है कि आत्माके लिये ही सब कुछ प्रिय होता है तो जो उपासक अपनेसे भिन्न मानकर किसी उपास्यकी उपासना करता है, वह भी वास्तवमें तो अपने सुखके लिये ही ऐसा करता है। इस प्रकार उसका उपास्य उसके सुखका शेषभूत हो जाता है, किंतु परप्रेमास्पद तो शेषी ही हुआ करता है, शेष नहीं होता। वह तो शेषीका शेष होनेके कारण आपेक्षिक प्रेमका ही आस्पद होता है। आत्यन्तिक प्रेमका आस्पद तो शेषी ही होता है। अतः हम जिस किसी भी तत्त्वको अपनेसे भिन्न मानेंगे, वह हमारे परप्रेमका आस्पद नहीं होगा। बल्कि जिसे हम अपनेसे भिन्न मानेंगे, वह हमें अपना शत्रु समझकर अपने परम स्वार्थसे च्युत कर देगा; क्योंकि अपनेसे भिन्न कोई भी पदार्थ माननेपर द्वैत हो जाता है और थोड़ेसे भी द्वैतको श्रुति भयका कारण बतलाती है—'उदरमन्तरं कुरुते। अथ तस्य भयं भवति।' (तैत्तिरीय० २।७) यदि कोई सभीको अपनेसे भिन्न समझता है तो सभी उसका तिरस्कार करने लगते हैं; जैसा कि श्रुति कहती है—'सर्वं तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनः सर्वं वेद।' (बृहदारण्यक० २।४।६) इसपर कोई-कोई महानुभाव कहा करते हैं कि अनुकूलोंमें भेद रहनेपर भी भय नहीं होता, किंतु अनुकूलता सदा बनी ही रहेगी, इसमें भी तो कोई प्रमाण नहीं है। आज अनुकूलता है तो कल