भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 275

श्रीरासलीलारहस्य २६३ हर्षोत्कर्षसे उद्गत रोमावली है, वे ही ये वृक्ष हैं। इस प्रकार भगवल्लीला-दर्शनके लिये उल्लसित होकर विराट् भगवान्‌का मनरूप चन्द्रमा प्रकट हुआ। उस चन्द्रमाका विशेषण है— ‘ककुभः—के स्वर्गे मण्डलरूपेण कौ पृथिव्यां प्रकाशरूपेण च भातीति ककुभः।’ अर्थात् जो मण्डलरूपसे आकाशमें और प्रकाशरूपसे पृथिवीमें प्रकाशित होता है, वह चन्द्रमा ककुभ है। वह क्या करता हुआ उदित हुआ ? ‘शान्तैः करैश्चर्षणीनां श्रीकृष्णरसास्वादनाय वृन्दारण्यं प्रति अभिसरणशीलानां व्रजाङ्गनाजनानां शुचः तम आदिरूपान् प्रतिबन्धान् मृजन् उद्दीपन- विधया वा लोककुलमर्यादारूपान् प्रतिबन्धान् मृजन् उद्गात्।’ अर्थात् वह अपनी सुखस्वरूप एवं सुखप्रद किरणोंसे, श्रीकृष्णरसास्वादनके लिये वृन्दारण्यकी ओर जानेवाली व्रजांगनाओंके शोक अर्थात् अन्धकारादि- रूप प्रतिबन्धोंका अथवा उद्दीपनरूपसे उनके लोक एवं कुलमर्यादारूप प्रतिबन्धोंका निराकरण करता हुआ उदित हुआ। इसके सिवा अपनी नित्यप्रिया श्रीवृषभानुदुलारीके समान अन्य गोपांगनाओंके भी विरहतापसन्तप्त पीले मुखोंको प्रियतमके संगमकी सम्भावनासे होनेवाले अनुरागरूप उदयकालीन अरुणिमासे अनुरंजित करता हुआ उदित हुआ। भगवान्‌की परमाह्लादिनी शक्तिरूपा श्रीराधिकाजी तो नित्य ही भगवत्-संश्लिष्टा हैं, अतः उन्हें यह वियोगजनित ताप नहीं है और इसीसे उनके मुखमें पीतता भी नहीं है, प्रत्युत नित्य ही दीप्तियुक्त अरुणिमा है। किंतु अन्य व्रजांगनाओंको यह सौभाग्य उपासनाके पश्चात् प्राप्त होता है। अतः उपासनाकी परिपक्वतासे पूर्व, जब कि पूर्वरागका भी प्रादुर्भाव नहीं होता, वे भगवद्विरहसे व्यथित रहती हैं और उनका समस्त अंग पीला पड़ जाता है। इस समय इस चन्द्रमाने उदित होकर प्रियतमके समागमका सन्देश सुनाकर उस पीतिमाको अरुणिमामें परिणत कर दिया। परम प्रेमास्पद परमानन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्रसे तादात्म्य-प्राप्तिके लिये भला कौन उत्सुक न होगा ? परंतु अधिकांश उपासक तो उपासनाका परिपाक होनेके अनन्तर ही उन्हें प्राप्त कर पाते हैं। किंतु श्रीराधिकाजीका भगवान्‌के साथ शाश्वत सम्प्रयोग है। जिस प्रकार सुधासमुद्रमें मधुरिमा नित्य-निरन्तर और सर्वत्र है, उसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्णमें उनकी आह्लादिनी शक्ति श्रीवृषभानुनन्दिनी हैं। अतः श्रीकृष्ण और राधिकाजीका नित्य संयोग है। उनके सिवा और किसीको यह सौभाग्य प्राप्त नहीं है। यद्यपि तत्त्वतः तो भगवान् सद्घन, चिद्घन और आनन्दघन ही हैं। अतः उनमें अन्य वस्तुके संयोगका अवकाश तभी हो सकता है, जब वह भगवद्रूप हो। विजातीय वस्तुका उसके साथ कभी योग नहीं हो सकता और वस्तुतः विजातीय कोई वस्तु है भी नहीं। विचारवानोंने तो जीवको भगवत्स्वरूप ही कहा है। श्रीगोसाईंजी महाराज कहते हैं— ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुखरासी॥ (रा०च०मा० ७।११७।२) जीवमें जो सुखित्व-दुःखित्वादि प्रतीत होते हैं, वे यदि स्वाभाविक होते तो उसमें भगवत्सम्प्रयोगकी योग्यता ही नहीं हो सकती थी। अतः उसके ये धर्म आरोपित हैं। आरोपकी निवृत्ति होते ही जीवका भी भगवान्‌से तादात्म्य हो जाता है। इसी प्रकार श्रीवृषभानुसुता तो भगवान्‌से नित्यसंश्लिष्टा हैं; किंतु इतर व्रजबालाओंका उनसे कल्पित भेद है। उस भेदकी निवृत्ति होते ही उनका भी भगवान्‌से अभेद हो जायगा। मायामोहित जीव प्रायः भगवान्‌की ओर प्रवृत्त नहीं होता; इसीसे वह बाह्य प्रपंचमें आसक्त रहता है। जिस समय किसी महान् पूर्वपुण्यके प्रभावसे उसकी प्रवृत्ति भगवान्‌की ओर होती है, उस समय वह बाह्य

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