भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 274, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रकारसे विचार करते हैं—'उडुराजः, उडुषु उडुसदृशर्तुषु राजत इति उडुराजः—वसन्तः। यदैव भगवान् रन्तुं मनश्चक्रे तदैव उडुराजो—वसन्त उदगात्।' अर्थात् जो उडुस्थानीय अन्य ऋतुओंमें शोभायमान है, वह वसन्त ही उडुराज है। जिस समय भगवान्ने रमण करनेकी इच्छा की, उसी समय वह वसन्तरूप उडुराज उदित हो गया। वह वसन्त-ऋतु कैसा है ? 'दीर्घदर्शनः—दीर्घकाले दर्शनं यस्य।' अर्थात् वर्तमान जो शरद्-ऋतु है, उसकी अपेक्षा जिसका दर्शन दीर्घकालमें होना सम्भव है। ऐसा वसन्त-ऋतु भी कालका अतिक्रमण करके उदित हुआ। उसीका विशेषण है 'ककुभः—के स्वर्गे कौ पृथिव्यां भातीति ककुभः' अर्थात् जो क—स्वर्ग और कु—पृथिवीमें भासित होता है। इससे वसन्तोपलक्षित होलिकामें होनेवाले उत्सवादि भी सूचित होते हैं। 'प्रिय' भी उसीका विशेषण है; क्योंकि सबके प्रेमका आस्पद होनेके कारण वह सबका प्रिय भी है। वह वसन्तरूप ककुभ और प्रिय उडुराज उदित हुआ। क्या करता हुआ उदित हुआ ? 'प्रियसङ्गमाभावजनितविषादान् मृजन् शान्तमैः करैश्च स्वोद्दीपनविभावजनितेन अरुणेन प्रिय- सङ्गमसम्भावनाजनितेनानुरागेण प्राच्या नित्य- प्रियायाः श्रीवृषभानुनन्दिन्या इव चर्षणीनां श्रीकृष्णेन सह रन्तुं गमनशीलानामन्यासां व्रजाङ्गनानां विरहाग्निना पीतं मुखं विलिम्पन्'। अर्थात् वह प्रियसंगमाभावके कारण उत्पन्न हुए विषादको अपनी शान्त किरणोंसे (अथवा सुखस्वरूप एवं सुखप्रद किरणोंसे) निवृत्त करते हुए तथा अपने उद्दीपनविभावरूप चन्द्रमासे उत्पन्न हुए अरुण यानी प्रियतमके समागमकी सम्भावनासे प्रकट हुए अनुरागद्वारा प्राची—नित्यप्रिया श्रीवृषभानुसुताके समान, अन्य सब चर्षणीगण भगवान् श्रीकृष्णके साथ रमण करनेके लिये अभिसरण करनेवाली समस्त गोपांगनाओंके विरहाग्निजनित पीड़ासे पीले पड़े हुए मुखोंका लेपन करते हुए उदित हुए। यहाँ 'प्राच्या मुखम् अरुणेन विलिम्पन्' इसका अर्थ यह भी हो सकता है— 'प्राच्याः नित्यप्रियायाः व्रजभुवः मुखं मुख्यं भागं श्रीवृन्दारण्यम् अरुणेन किंशुकादिपुष्प- विकासेन विलिम्पन्।' अर्थात् नित्यप्रिया व्रजभूमिके मुख (मुख्य भाग) श्रीवृन्दारण्यको अरुण-किंशुकादि रक्तपुष्पोंके विकासद्वारा रंजित करते हुए उदित हुए। उस समय वसन्तके उदयसे यों तो सभी जीव और भूमियोंकी ग्लानि निवृत्त हो गयी थी; किंतु उसने प्रधानतया वृन्दारण्यको तो किंशुककुसुमादिकी अरुणिमासे और भी अनुरंजित कर दिया था। इस प्रकार जब समस्त जड़वर्ग भगवान्की लीलामें उपयुक्त होनेके लिये उद्यत हुआ तो विराट् भगवान्का मनरूप चन्द्रमा भी उस रमणलीलामें उद्दीपनरूपसे सहायक होकर उदित हुआ; क्योंकि विराट् तो भगवान्का परम भक्त है। उस चन्द्रमामें जो उदयकालीन लालिमा है, वह उसका भगवद्विषयक अनुराग है तथा उसमें जो श्यामता है, वह मानो ध्यानाभिव्यक्त भगवत्स्वरूप है। उस चन्द्रमाकी जो अरुण कान्ति है, वह मानो भगवल्लीलाकी सम्भावनासे प्रादुर्भूत हुए मानसिक उल्लासके कारण जो उसकी मन्द मुसकान है, उसीके कारण विकसित हुई दन्तावलीकी अधर-कान्तिमिश्रित आभा है तथा उस चन्द्रमाका जो निखिलव्योमव्यापी अमृतमय शीतल प्रकाश है, वह भगवद्दर्शनके अनन्तर विराट् भगवान्का उदार हास है। विराट्के ईषत्-हासमें उसकी देदीप्यमान दन्तपंक्तिकी आभा ओष्ठोंकी अरुणिमासे अरुण होकर प्रकट होती है; किंतु उसके उदार हासमें ओष्ठोंके दूर हो जानेसे उन ओष्ठोंकी अरुणिमाका सम्बन्ध बहुत कम रह जाता है, इसलिये उस समय उस दन्तपंक्तिकी दीप्ति बहुत स्फुट होती है। नक्षत्रमण्डल ही विराट् भगवान्की दन्तावली है। उस उल्लासके कारण जो