भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 271

है कि मानो समुद्र अपनी उत्ताल तरंगोंद्वारा चन्द्रमासे मिलना चाहता है। इससे यह सूचित होता है कि प्रिय वस्तु चाहे कितनी ही दूर रहे; किंतु प्रेमीको उसके प्रति अनुरागकी वृद्धि होती है। इसीसे जब-जब पूर्णचन्द्रका उदय होता है, तभी-तभी समुद्र अत्यन्त उत्सुकतासे उससे मिलनेके लिये उत्ताल तरंगोंसे उछलने लगता है। यह सब देखकर प्रेमियोंकी ऐसी भावना हो जाती है कि जिस प्रकार यह समुद्र अपने प्रियतमतक पहुँचनेके प्रयत्नमें बारम्बार असफल होते रहनेपर भी हताश नहीं होता, उसी प्रकार हमें भी अपने प्रियतमसे निराश या निरपेक्ष नहीं होना चाहिये। इस प्रकार प्रेमियोंको प्रेमरीति सिखानेवाला, भगवान् कृष्णमें रमणेच्छा उत्पन्न करानेवाला तथा समस्त जीवोंको आनन्दित करनेवाला होनेके कारण चन्द्रमा सब प्रकारसे प्रेमास्पद ही है। इसी प्रकार सर्वान्तरात्मा श्रीभगवान् भी सभीके परम-प्रेमास्पद हैं; क्योंकि कोई पुरुष कैसा ही नास्तिक या देहाभिमानी क्यों न हो, उसे भी अपनी आत्मामें ही निरतिशय प्रेम होता है। यह चन्द्रमा कैसा है? 'दीर्घदर्शनः—दीर्घ- कालान्तरे अनेकरात्र्यवसाने दर्शनं यस्य स दीर्घदर्शनः' अर्थात् जिसका दर्शन बहुत-सी रात्रियोंके पीछे होता है; क्योंकि पूर्णचन्द्र एक मासके अनन्तर ही उदित होता है। यदि इसे भगवान्‌का विशेषण माना जाय तो इस प्रकार अर्थ होगा—'दीर्घमबाध्यं दर्शनं यस्य स दीर्घदर्शनः' अर्थात् जिनका दर्शन दीर्घ यानी अबाध्य है; क्योंकि 'न हि द्रष्टुर्दृष्टे- र्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वात्' इस सूत्रके अनुसार सर्वसाक्षी भगवान्‌की दर्शनशक्तिका लोप कभी नहीं होता। भगवान् कृष्ण प्रत्यगात्मा होनेके कारण ही 'प्रियः'—परप्रेमास्पद हैं तथा सर्वान्तरतम प्रत्यगात्मा होनेके कारण ही सर्वद्रष्टा हैं। जो सर्वद्रष्टा है, वह किसीका दृश्य नहीं हो सकता; क्योंकि वह जिसका दृश्य होगा, उसका द्रष्टा नहीं हो सकता और ऐसा होनेपर उसका सर्वद्रष्टृत्व बाधित हो जायगा। अतः सर्वद्रष्टा श्रीभगवान्की दर्शनशक्तिका किसी समय लोप नहीं होता। दर्शन दो प्रकारका है—बौद्धदर्शन और पौरुषेय- दर्शन। भिन्न-भिन्न इन्द्रियोंद्वारा अन्तःकरणका उन इन्द्रियोंके विषयोंसे संश्लिष्ट होकर तदाकार हो जाना बौद्धदर्शन है। यह बुद्धिका परिणाम है। यहाँ बुद्धि ही इन्द्रियोंद्वारा विषयोंको व्याप्तकर उनके आकारमें परिणत हो जाती है। इसीको कहीं-कहीं पौरुषेयदर्शन भी कहा है। बुद्धिमें जो पुरुषत्वका आरोप होता है, उसीके कारण बुद्धिनिष्ठ दर्शन पुरुषनिष्ठ-सा जान पड़ता है। तात्पर्य यह है कि बुद्धिमें जो विवेक-ज्ञान और शब्दादि- ज्ञान है, इनका अपनेमें आरोप करके यह पुरुष 'अहं विवेकवान्' और 'अहं शब्दज्ञानवान्' प्रतीत होता है। वस्तुतः तो यह आरोप भी बुद्धिमें ही है। पुरुषसे इसका कोई सम्बन्ध नहीं है। यहाँ यह सन्देह होता है कि यदि यह आरोप बुद्धिनिष्ठ है तो इसकी पुरुषनिष्ठता प्रतीत नहीं होनी चाहिये, बुद्धिनिष्ठता ही अनुभूत होनी चाहिये। किंतु बुद्धि प्रकृतिका विकार होनेके कारण जड़ है, अतः यह आरोप अनुभवका विषय (दृश्य) ही होना चाहिये, अनुभवरूप नहीं होना चाहिये। परंतु ऐसी बात तो है नहीं; इसलिये इसे बुद्धिनिष्ठ ही क्यों माना जाय? इसका उत्तर यह है कि यह बुद्धिनिष्ठ आरोप बुद्धिमें पुरुषत्वकी भ्रान्ति करानेके कारण बुद्धिनिष्ठ होनेपर भी पुरुषनिष्ठ-सा जान पड़ता है; इसीसे वस्तुतः वह आरोप अनुभवका विषय होनेपर भी अनुभवरूप-सा प्रतीत होता है। इस प्रकार सिद्धान्ततः यही निश्चय हुआ कि बौद्ध बोध ही पौरुषेय बोध-सा प्रतीत होता है। पौरुषेय बोध बुद्धिबोधसे भिन्न नहीं है। इसीसे कहा है—'एकमेव दर्शनं ख्यातिरेव दर्शनम्'। यहाँ तत्तदाकारवृत्ति ही 'ख्याति' कही गयी है। व्युत्थान- अवस्थामें पुरुष ख्यात्याकार हो जाता है—'वृत्ति- सारूप्यमितरत्र'। वृत्तियाँ शान्त, घोर और मूढ़भेदसे