भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 270

२५८ भक्तिसुधा हुए उडुराज ( श्रीकृष्णचन्द्र) उस विहारस्थलमें उदित हो गये। यहाँ ‘उडुराज’ शब्दमें उपमालंकार है अर्थात् श्रीकृष्णरूप चन्द्र जो कि चन्द्रमाके समान हैं, वे प्रियतमा श्रीराधिकाजीका मुखविलिम्पन करते हुए उस विहारस्थलमें इसी प्रकार प्रकट हुए, जैसे चन्द्रमा प्राची दिशाको अनुरंजित करते हुए उदित होते हैं। उडुराज जिस प्रकार प्राची दिशाके मुख यानी प्रधान भागको करों (किरणों)-से अनुरंजित करते हैं, उसी प्रकार यहाँ क्रीड़ाभूमिमें श्रीकृष्णचन्द्र करकमलोंमें ली हुई होलिका-रोलिका (होलीके गुलाल)-से श्रीराधिकाजीका मुखमण्डल अनुरंजित करते हैं। जिस प्रकार उदयकालीन चन्द्रमा उदयरागसे प्राची दिशा और समस्त आकाशको अरुण कर देता है, ठीक उसी प्रकार भगवान् कृष्णने प्रकट होकर अपने शन्तम-कर अर्थात् मंगलमय कर-व्यापारोंसे समस्त व्रजांगनाओंके मुखमण्डलको अरुण कर दिया। यहाँ ‘शन्तमैः करैः’ यह भगवान्‌के समस्त मंगलमय अंगोंका उपलक्षण है। वे अंग मंगलमय हैं और मंगलकारक भी हैं; क्योंकि भगवान् ‘आनन्दमात्रकरपाद- मुखोदरादि’ तथा— नमो विज्ञानरूपाय परमानन्दमूर्तये । सच्चिदानन्दरूपाय कृष्णायाक्लिष्टकारिणे ॥ —आदि वाक्योंके अनुसार शुद्ध सन्मात्र, चिन्मात्र और आनन्दमात्र तत्त्व हैं तथा ‘एष ह्येवानन्दयति’ इस श्रुतिके अनुसार वे ही सब प्राणियोंको आनन्दित भी करते हैं, अतः वे आनन्दप्रद भी हैं। उन्होंने नित्यप्रिया श्रीवृषभानुनन्दिनीके समान अन्य व्रजांगनाओंके मुखमण्डलको भी सुखमय और सुखावह कर- व्यापारोंसे अरुण किया तथा उनके कर्णरन्ध्रोंको वेणुरागसे और हृदयाकाशोंको प्रेमरागसे रंजित कर दिया। इस प्रकार वे उदित हुए। यहाँ ‘करैः’ में जो बहुवचन है, वह स्वरूपोंकी बहुलताके अभिप्रायसे भी हो सकता है; क्योंकि यहाँ रासलीलामें भगवान्‌को अनेक रूपसे आविर्भूत होना है। अतः भगवान्‌के अनेक रूपोंकी अपेक्षासे बहुवचनका प्रयोग उचित ही है। व्रजांगनाओंको जो भगवान्‌के साथ विहारावसर प्राप्त न होनेका शोक था, उसे भी अपने शन्तम-कर यानी सुखप्रद लीलामय विहारविशेषोंसे ही निवृत्त करते हुए भगवान् प्रकट हुए। यहाँ ‘वर्तमानसामीप्ये वर्तमानवद्वा’ इस सूत्रके अनुसार ‘मृजन्’ में भविष्यदर्थमें वर्तमानका प्रयोग हुआ है अर्थात् भगवान् अपने साथ विहार करनेका सुअवसर न मिलनेके कारण जो गोपांगनाओंको शोक था, उसकी निवृत्ति करेंगे, इसीलिये उदित हुए हैं। यहाँ— रलयोर्डलयोश्चैव सषयोर्बवयोस्तथा। वदन्त्येषां च सावर्ण्यमलङ्कारविदो जनाः ॥* इस वचनके अनुसार ‘उडुराजः’ की जगह ‘उरुराजः’ भी समझा जाता है अर्थात् जिस समय भगवान् वृन्दारण्यमें पधारे, उस समय श्रीयशोदा और नन्दबाबाको विकलता होनेकी सम्भावना हुई; क्योंकि जिस प्रकार फणि मणिको नहीं छोड़ सकता, उसी प्रकार वे भगवान्‌से विलग नहीं रह सकते थे। अतः भगवान् अनेक रूपसे प्रकट हुए अर्थात् वृन्दारण्यमें प्रकट होनेपर भी वे एक रूपसे श्रीयशोदाजीके शयनागारमें ही रहे। इसीसे उन्हें ‘उरुधा—बहुधा राजते यः स उरुराजः’ इस व्युत्पत्तिके अनुसार उरुराज—अनेक रूपसे सुशोभित होनेवाले कहा है। यहाँ ‘प्रियः’ यह उडुराजका विशेषण है। जिस प्रकार रसिक और भक्त पुरुष दोनोंको ही चन्द्रमा प्रिय है, उसी प्रकार भगवान् भी सबके परम-प्रेमास्पद हैं। चन्द्रमामें रसिकोंका प्रेम तो शृंगाररसका उद्दीपन विभाव होनेके कारण है; किंतु साथ ही वह भक्तोंको भी अत्यन्त प्रिय है; क्योंकि उसके मध्यमें जो श्यामता है, वह उन्हें हृदयाकाशमें स्थित ध्यानाभिव्यक्त भगवत्स्वरूपका स्मरण दिलाती है तथा उसके दर्शनमात्रसे भी अपने प्रियतमके प्रति प्रेमियोंके अनुरागकी वृद्धि होती है। देखो, चन्द्रमा अत्यन्त दूर देशमें है तो भी वह समुद्रकी अभिवृद्धिका हेतु होता है। जान पड़ता

  • अर्थात् अलंकाररहस्यज्ञ महानुभाव र और ल, ड और ल, स और ष तथा ब और व इनकी सवर्णता बतलाते हैं।